... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

4 अप्रैल, 2016

ई-कल्पना कहानी

खोज जारी है

अलका प्रमोद

रजत ने मेल खोली और एक एक कर के पढ़ना शुरु किया.

- मीता ने आई इल्यूजन का मजेदार चित्र भेजा था, यूं तो गांधी जी का चित्र था पर ध्यान से कुछ देर देखो तो हिटलर नजर आता था. उसने लापरवाही से मीता को जवाब में थैंक्स  फेंका और मेल को डिलीट कर दिया. ओ माई गाड, इतने मेल आते हैं कि अगर उन्हे रखने लगे तो उसके मेल बाक्स में हजारों मेल हो जायें और फिर जरुरत की मेल ढूंढना मुश्किल हो जाये.

- आशीष ने अपनी और उसकी कालेज लाइफ की कुछ फोटो भेजी थीं.

देख कर वह पुराने कालेज के दिनों में खो गया. क्या दिन थे, कालेज में पढ़ाई तो दूसरे नम्बर पर आती थी कालेज जाने का असली मजा तो दोस्तों के साथ मस्ती में था, खास कर लड़कियों के बारे में बातें करना उनका पीछा करना ... रीना तो क्लास की सबसे हाॅट लड़की थी सारे लड़के उसके पीछे वाली सीट पर बैठने के लिये अवसर ढूंढते थेे. उसके पीछे की सीट पाने की होड़ में सब जल्दी से जल्दी आने की प्रयास करते थे नही तो समय से लेक्चर सुनने तो कुछ घोंचू किताबी कीड़े ही आते थे.

वो बात दूसरी है कि बाद में सुना कि रीना जैसी स्मार्ट लड़की ने पता नही क्यों उस किताबी कीड़े वैभव से शादी कर ली सुना था कि वो पीसीएस हो गया था ...

उसके मोबाइल पर ट्रिंग की आवाज ने उसे फिर अतीत से नेट की दुनिया में ला पटका.

 

आयी हुई मेल में जंक मेल अधिक थीं काम की कम. रजत को खीज सी हुई उसने एक सरसरी दृष्टि डाल कर  सभी मेल बिना पढ़े मिटाना शुरु कर दिया. तभी मेल मिटाते मिटाते एक मेल पर उसके हाथ रुक गये. मानों सागर में गोता लगाते लगाते अचानक मोती हाथ लग गये. मेल में किसी अन्तरा ने उसेे फेसबुक पर  आमंत्रित किया था. उसने फेसबुक खेाली  और मित्रों की सूची को क्लिक किया. यूँ तो वह अन्जान लेागों के आमंत्रण पर बिना कुछ सोचे डिलीट क्लिक कर देता है पर अंतरा नाम के साथ एक सुंदर स्त्री की फोटो देख  उसके हाथ एकाएक रुक गये उसके मन ने उसे उकसाया, क्या हर्ज हैे, दोस्ती करने में मेल पर कुछ  विचारों का आदान प्रदान करना कोई गलत तो है नही, और इससे पहले कि उसका मन न के पक्ष में कोई तर्क दे उसने शीघ्रता से स्वीकृति में कर्सर क्लिक कर दिया.

अंतरा के आमंत्रण को स्वीकृति भेजने के साथ साथ रजत ने पहला काम किया कि फेसबुक से नमिता के साथ अपने जो फोटो उसने लगाये थे हटा दिये.मन ने टकोहा मारा अगर मात्र दोस्ती ही कर रहे हो तो नमिता की फोटो क्यों हटा रहे हो. क्षणांश को अपराध बोध की एक लहर सी उठी पर उसने तुरंत ही उस लहर को दरकिनार कर अपने को सफाई सी दी,  हुंह् ,मैं कौन सा फ्लर्ट कर रहा हूं ,  नमिता के साथ अपनी फोटो तो इस लिये हटा रहा हूं कि अपना व्यक्तिगत जीवन हर एक से बांटना कुछ अच्छा नही लगता.

रजत अपनी अकेली कोई स्टाइलिश सी फोटो ढूंढने लगा उसे कोई फोटो ऐसी नही लगी जो फेसबुक पर लगाये. अपने पर उसे गुस्सा आ रहा था. फिर उसके गुस्से की दिशा नमिता की ओर मुड़ गई. जहां भी जाती है अपनी ही फोटो खिंचवाती रहती है. वो तो बेचारा बस फोटोग्राफर ही बना रहता है. बस मेमसाब के पोज लेते रहो.

बड़ी मुश्किल से उसको एक फोटो ऐसी लगी जो प्रभावशाली थी. उसने उसे फेसबुक पर लगाया और कुछ ही क्षणों में अंतरा ने लिखा, वाउ! लुकिंग हॅाट.

रजत का तो मन बल्लियों उछलने लगा उसने तुरंत धन्यवाद दे कर आग्रह किया, अपने बारे में कुछ और बताओ.

मैं अकेले रहती हूँ ... और तुम?

मुझे भी अकेला ही समझो, वो क्या कहते हें भीड़ के बीच अकेला ... रजत ने गोल मोल सा जवाब दिया.

पढ़ती हो या जाब कर रही हो ...

हूँ जाब कर रही हूँ यार.

आई लाइक स्मार्ट एण्ड सेल्फडिपेंडेंट लेडी ...

तब तो मैं आप की पसंद पर खरी उतरती हूँ.

वैसे मैं मल्टी नेशनल में एक्ज्क्यूटिव हूँ और जहाँ तक स्मार्टनेस का सवाल है लोग कुछ ऐसा ही कहते हैं, बाकी आप जब मिलेंगे तो बताइयेगा.

यानि कि मिलने का रास्ता भी खुला हेेै रजत ने मन ही मन सोचा.

यह तो बस प्रारम्भ ही था धीरे धीरे रजत का इंटर नेट का आकर्षण नशे में बदलने लगा, फिर तो रजत का संसार ही मानो अन्तरजाल के आसपास ही सिमटने लगा.

आफिस हो या घर, यहाँ तक कि और कहीं भी अवसर मिलता तो फोन पर ही मेल देखने लगता. क्या पता  अंतरा ने कोई मेल भेजी हो. अब अन्य मेल देखना और उनका उत्तर देना उसे व्यर्थ का काम लगता.

वही बोरिंग चुटकुले नेताओं के कार्टून या प्राकृतिक दृश्य. कभी कभी तो बिना पढ़े ही वो मेल डिलीट कर देता.

आफिस से आ कर चाय का कप ले कर उसने लैपटाप आन किया. इण्टरनेट पर रेडिफ मेल खोला. अंतरा की मेल आई थी. उसने अपनी फ़ोटो भेजी थी. हर चित्र में उसकी अदाओं में मस्ती झलक रही थी. उसने लिखा था, मुझे लाइफ में मस्ती पसंद है ...

रजत के होठों पर मुसकराहट आ गई उसके मन में तरंगे उठने लगीं. उसने तुरंत जवाब दिया, तब तो हम लोगों की खूब पटेगी.

तभी नमिता अपनी चाय का कप ले कर वहीं आ गई और लैपटाप की स्क्रीन पर झांकने लगी. रजत चौंक पड़ा. उसने तुरंत विन्डो मिनिमाइज की और चिढ़ कर बोला, ये क्या तरीका है ? हर काम में व्यवधान डालना जरूरी है क्या ?

अरे, मैं तो बस देख रही थी. तुम तो ऐसे चौंक पड़े मानो किसी लड़की की फोटो देख रहे हो. नमिता ने सहज रूप में कहा.

यानि कि नमिता ने अंतरा का फोटो नही देखा. रजत ने चैन की सांस ली और मन ही मन सोचा कि अब सावधान रहना पड़ेगा नही तो जिस दिन नमिता को हमारी और अंतरा की दोस्ती का पता चल गया समझो खैर नही.

ऐसा नहीं अंतरा मात्र आकर्षक ही थी, उसका मानसिक स्तर भी रजत केा प्रभावित करता था.धीरे धीरे अपने आफिस की समस्या हो या घर की, वह अंतरा से कह कर अपना मन हलका कर लेता और प्रायः अंतरा की राय पर अमल करके उसकी समस्या आसानी से सुलझ जाती.

रजत आफिस से लौटा तो नमिता ने बताया, विशाल का फोन आया था कल उसने अपनी वेडिंग एनीवर्सरी  पर पार्टी रखी है.

गनीमत है कल शनिवार है, नही तो उसके यहाँ तो रात के बारह बजते है.

हाँ, वो तो ठीक हैे, पर चलो गिफ्ट तो आज ही ले लें. कल तो अफिस से आते ही तुम्हे सात बज जाएगा और नौ बजे वहाँ पहुँचना है.

रजत ने घड़ी देखी सात बजे थे आज पूरे दिन वो अंतरा की मेल नही देख पाया और अब ये नमिता का गिफ्ट का चक्कर.

क्या सोच रहे हो?

कुछ नही जरा एक ज़रूरी काम हेै, कर लें फिर चलते हैं.

नमिता बिगड़ गई.  आज कल तुम्हे हर समय काम ही रहता है. बात करने तक का समय नही रहता. आफिस तो आफिस घर में भी हर समय कम्प्यूटर में ही सिर दिये रहते हो.

नमिता का मूड बिगड़ते देख कर रजत ने सहूलियत से ही काम लेने में भलाई समझी.उसने नम्र होते हुये कहा, प्लीज नमू मुझे कुछ देर काम कर लेने दो, तब तक तुम तैयार हो, फिर चलते हैं और हाँ, फिर वहाँ से तुम्हारी मन पसंद चाट खा कर आएंगे और फिर डिनर की छुट्टी. यह सुन कर नमिता खुश हो गई और तैयार होने लग गई. 

रजत ने चैन की साँस ली और नमिता के वहाँ से हटते ही अंतरा को चैट पर आंमत्रित किया.

उसने अंतरा से सलाह ली कि विशाल को क्या गिफ्ट दे, अंतरा ने कहा, यू एस बी पोर्ट वाला म्यूजिक सिस्टम दे दो, आज का बेस्ट इन थिंग है .

रजत उसकी पसंद का कायल हो गया. तभी नमिता तैयार हो कर आ गई.

इससे पहले कि नमिता देखती कि वह कौन सा आफिस का महत्वपूर्ण काम कर रहा है उसने अंतरा को  बाय  कहा और चैट बाक्स बन्द कर दिया.

सिटी माल में नमिता गिफ्ट वर्ल्ड में गई तो रजत बोला,क्या यार, जब देखो वही गिफ्ट वर्ल्ड पहुंच जाती हो. अरे कुछ अपडेट हो कोई इन थिंग लो.

अरे हद हो गई,  अभी तक तो गिफ्ट वर्ल्ड की बड़ी तारीफ़ें करते थे, अब अचानक आउट डेटेड लगने लगा.

वैसे हम भी तो जाने कि ये इन थिंग कहाँ मिलेगी , नमिता ने व्यंग से पूछा.

रजत ने चिढ़ कर कहा, अरे इन थिंग की कोई स्पेशल दुकान है क्या? मेरा मतलब है कि कोई यू एस बी पोर्ट वाला म्यूजिक सिस्टम दे दें.

हुंह्, वो भी कोई गिफ्ट  हुआ. क्या पता उनकेा गाना सुनने का शौक हो न हो.

मेरे हिसाब से तो लेटेस्ट स्टाइल का डिनर सेट दे दें.

रजत चिढ़ गया, तुम घरेलू औरतों को तो बस किचेन ही नजर आता है दुनिया कहां से कहां चली गयी और तुम लोग उसी में उलझी हो.

नमिता चिढ़ गई, हम किचेन में न उलझें तो रोज जो तरह तरह के व्यंजनों का लुत्फ़ उठाते हो वह कहाँ से मिलेगा? अन्ततः बहस के बाद विजय रजत की ही हुई और उन लोगों ने एक म्यूजिक सिस्टम ही लिया जिसमे पेन ड्राइव से ही गाने बजते थे. 

नमिता इधर अनुभव कर रही थी कि कुछ दिनों से उसकी हर बात में रजत को कोई न कोई कमी दिखाई पड़ने लगी है और वह पहले की तरह न तो घर आ कर बात करता है न छुट्टी के दिन कहीं चलने को कहता है. बस जब देखो लेैपटाप में उलझा रहता है.

अगर नमिता नाराज होती है तो उसका एक ही जवाब होता है, अब काम बढ़ गया है तो मैें क्या कर सकता हूँ?

कभी कभी जब नमिता ज़्यादा ही टोकती, तो कहता, तुम तो अनपढ़ों की तरह बिहेव करने लगी हो. अरे कुछ क्रियेटिव करो क्रियेटिव सोचो.

नमिता ने एक दिन कहा, क्या बात है आज कल तुमको मेरी हर बात बुरी लगने लगी है. वैसे आजकल तुम कुछ जादा ही कम्प्यूटर से चिपके रहते हो. लगता है अब मुझसे बोर हो गये हो. कोई और पसंद आ गयी है क्या ?

रजत के कान खड़े हो गये. उसने तुरंत पैंतरा बदला और नमिता को बाहों में खींचते हुये बोला, कम आन डार्लिंग, मैं तुम्हे कितना प्यार करता हूँ, तुम समझ ही नही सकती ,अब काम भी तो तुम्हारे लिये ही करता हूँ न.

फिर थोड़ा गंभीर हो कर बोला, वैसे सच तो यह है कि मैं भी गिल्टी फील करता हूं ,मैं तुम्हे पहले जैसा समय नही दे पाता.

नमिता पिघल गई. उसने कहा, अरे मैं तो मजाक कर रही थी. तुम सीरियस हो गये.

रजत के सीने पर सिर रखते हुये उसने दुलार से कहा, मुझे पता है, मेरा रजत मुझे सुख देने के लिये ही दिन रात लगा रहता है. आज हम दो हैंं, कल परिवार बढ़ेगा तो जिम्मेदारी तो बढ़ेगी ही न .

यह सुन कर कल्पना की रंगीन दुनिया में हिंडोले ले रहे रजत को लगा मानो  हिंडोला झटके के साथ जमीन पर आ गिरा. इससे पहले कि उसका मूड खराब हो उसने काम में व्यस्तता का नाटक करतेे हुये नमिता से किनारा किया और नमिता के जाते ही अपने मस्तिष्क की हाज़िर जवाबी और अभिनय के लिये स्वयं की पीठ ठोंकी.

 

यह सच था कि अब उसका नमिता के प्रति आकर्षण मृतप्राय हो गया था ,पता नही कैसे इसी नमिता से मिलने के लिये वह दिन रात उत्सुक रहता था. न तो यह अंतरा जैसी हाट और सेक्सी थी, न ही इसका मानसिक स्तर अंतरा जैसा था. अब तो बस किसी तरह उसे फीके पकवान के समान  झेल रहा था. 

अंतरा का नशा उस पर मालती की बेल सा चढ़ता ही जा रहा था. रजत कब सोता है, कब खाता है, क्या खाता है, सब अंतरा को पता रहता. अपना व्यक्तिगत जीवन कब रजत उससे बांटने लगा वह स्वयं भी न जान पाया. अंतरा उसके जीवन का अंतरंग हिस्सा बन चुकी थी. या कह लें कि उसके जीवन की धुरी बन गयी थी और  उस धुरी के चारों ओर निर्मित स्वप्नलोक में वह बेसुध सा घूम रहा थी. चाहे अंतरा का स्टाइल हो या उसकी चुटीली बातें, ज्ञान हो या उसकी बौद्धिक क्षमता  वह हर तरह से उसका लोहा मान चुका था. अनचाहे ही वह नमिता और अंतरा की तुलना करने लगता और अंतरा का पलड़ा सदा ही भारी पाता.

सदा की तरह दीपावली पर रजत को बोनस की राशि मिली थी. नमिता प्रतीक्षा में थी कि रजत उसे कोई सरप्राइज देगा, पर उसकी प्रतीक्षा शून्य में खो गई. रजत ने अंतरा को बताया कि उसे बोनस मिला है, तो उसने तुरंत उसे इक्विटी बाण्ड में नियोजित करने की राय दी और इसी के साथ रजत  के हदय में अपनी जड़ें और गहरे जमा लीं. अंतरा से पूछे बिना तो वह कोई कदम ही नही उठाता. नमिता को भले न पता हो, पर अंतरा को उसकी हर बात की जानकारी होती थी.

रात को नमिता करवट ले कर उसकी बाहों में आ गयी, उसने नमिता को बाहों में ले तो लिया, परंतु उसकी कल्पना में अंतरा थी. उसके हाथ भले ही नमिता को स्पर्ष कर रहे थेे पर वह कल्पना अंतरा की ही कर रहा था. एक दो बार तो उद्दाम आवेग के क्षणों में उसके मुंह से अंतरा का नाम निकलते निकलते रह गया.

अब तो  स्थिति यह  हो गई कि रजत के लिये अंतरा से दूर रहना कठिन हो रहा था. वह जब भी अंतरा को मेल भेजता, मिलने के लिये  अनुरोध करता. पर अंतरा हर बार  बड़ी चतुराई से उसके अनुरोध को कल पर टाल जाती.

उस दिन  जब अंतरा ने मेल पर उसे लिखा, हाय. तो उसने कोई उत्तर नही दिया.

अंतरा ने लिखा, मुझसे क्या गलती हो गई ?

 रजत ने तो भी कोई उत्तर नही दिया.

अंतरा ने लिखा, पिछली पिक्चर में तुम बहुत कूल लग रहे थे.

तो भी रजत ने कोई उत्तर नही दिया.  

अंतरा समझ गयी कि अब टालने से काम नही चलेगा. उसने लिखा,  ओके, हम अगले वीकैंड पर कैफे-डे में मिलते हैं. अब तो मान जाओ.

यह सुन कर रजत उछल पड़ा. उसका रूठना काम कर गया था. उसने तुरंत लिखा, इस वीकैंड पर क्यों नही ?

कूल बेबी कूल. पेशेंस का अपना मजा है. फिर तुमसे मिलने के लिये मुझे भी तो कुछ तैेयारी करनी पड़ेगी. कहते हैें न, फर्स्ट इम्प्रेशन इस लास्ट इम्प्रेशन.

अरे, मैं तो यूँ ही तुम्हारा फैन हूँ. रजत ने मन ही मन अंतरा के मन में अपने लिये  महत्व देख कर प्रसन्न होते हुये लिखा. फिर अधिक हठ न करते हुये वह अगले वीकैंड के लिये मान गया.

पूरे सप्ताह  रजत मानो कल्पना के आकाश में उड़ता रहा. अब तक जिसे स्क्रीन पर देखा था उसे साक्षात देखने का अवसर आ गया था. उसने सोच लिया था कि एक बार मिल भर ले, फिर तो अन्तरा को ऐसा शीशे में उतारेगा कि वह उससे दूर रह भी नही पाएगी. वह तो न जाने क्या क्या सोच गया कि वह होटल में एक कमरा बुक कर लिया करेगा और पूरा दिन अंतरा के साथ बिताएगा. कभी सोचता अंतरा ने बताया है कि उसे पहाड़ों के लिये फेसिनेशन हेै, तो वह कुछ दिनो की छुट्टी ले कर उसके साथ घूमने जाएगा. उसने नमिता को अपनी उदारता का प्रदर्शन करते हुये उसकी मम्मी पापा के पास भेज कर राह का काँटा भी साफ कर दिया.

अंतरा ने प्रामिस करवाया था कि वह अगली बार मिलने से पहले नेट पर संपर्क नही करेगी. उसका कहना था कि वियोग के बाद मिलने का अलग ही आनन्द है. एक एक दिन उसे एक एक साल लग रहा था और उसे पहली बार अनुभव हो रहा था कि किसी की प्रतीक्षा से बड़ा कोई दंड नही. इसमें कितनी बेचैनी होती है.

वह दिन रात तरह तरह के हवाई किले बनाता. उसका दीवानापन इतना बढ़ गया था कि उसने सोच लिया था कि एक बार अंतरा मिल जाये तो उसे कहीं न जाने देगा. यद्यपि उसका शत्रु मस्तिष्क उसके इन आनन्द के क्षणों में बाधा डालने का पूरा प्रयास करता और गाहे बगाहे उसके सामने नमिता का प्रश्न उठा कर उसके मुँह का स्वाद कसैला करने से न चूकता. खीज कर इस मस्तिष्क की गुस्ताखी का दंड देने के लिये उसने तय कर लिया था कि अंतरा एक बार हाँ कह दे, तो वह नमिता से तलाक ले लेगा. बहुत दिन निभा लिया. इसमें क्या बुरा है. अगर दो मन न मिलें तो एक छत के नीचे रहने का क्या लाभ, सच तो यह है कि अंतरा जैसी सुंदर आधुनिक और बौद्धिक लड़की ही उसके लिये उपयुक्त जीवन साथी है.

वह सोच रहा था कि समय इलास्टिक की तरह होता है कभी वही चौबीस घंटे खिंच कर इतने लम्बे लगने लगते है कि मानों बीत ही न रहे हों तो कभी झटके से सिकुड़ कर पलक झपकते कब निकल जाते है पता ही नही चलता. उसे अंतरा पर क्रोध आ रहा था. जुदाई के बाद मिलने का मजा माई फुट.  यहाँ तो सात दिनों में जान ही निकल जाएगी. किसी तरह उसने छःदिन बिताये. 

किसी तरह एक दिन और बीता. दूसरे दिन सुबह होते ही उसने नेट पर अंतरा से सम्पर्क करना चाहा क्योंकि आज तो सात दिन की समय सीमा पूरी हो गयी थी, उनको  मिलना ही था.

पर अंतरा का अता पता नही था. रजत का संयम अपने सारे बांध तोड़ चुका था. उसे अंतरा पर क्रोध आने लगा. इतना भी क्या भाव खाना.                 

 

बेचैनी में शाम को बैठा बेमन से यूँ ही टीवी के चैनल घुमा रहा था कि उसके मोबाइल में ट्रिंग की आवाज आयी. उँह्, तो अब अंतरा को याद आयी है. मैं भी जवाब नही दूंगा, उसने रूठते हुये सोचा. पर मन है कि मानता नही, उसने सोचा मैसेज तो देख ही लें. देखे मैडम ने क्या लिखा है. हाँ, जवाब नही देगा, खूब तड़पाएगा अंतरा को. पर मैसेज पढ़ कर तो मानों उसे चार सौ चालीस वोल्ट का करेंट ही लग गया. मैसेज उसके बैंक से था  कि उसके बैंक के मोड अकाउन्ट से छः लाख रूपये डेबिट हुये हैं. वह चौंका इतना बड़ी राषि कैसे निकल सकती है. उसने तो निकाला ही नही. बल्कि वह तो आज की अंतरा को घुमाने के लिये पैसे एकत्र कर रहा है. उसने तुरंत बैंक फोन किया पर बैंक में तो छुट्टी थी. उसने ग्राहक सेवा में फोन किया, तो पता चला आनलाइन उसके अकाउन्ट से छः लाख निकाले गये हैं.

अचानक उसके मस्तिष्क में संशय के साँप ने फन उठाया, कहीं इस सब के पीछे अंतरा का हाथ तो नही.

मन ने विरोध के झंडे गाड़ दिये, नही नही,वो ऐसा नही कर सकती. वो मुझसे प्यार करती है. मेरी सच्ची दोस्त है.

वो ही कर सकती है, मूर्ख, मस्तिष्क ने डपटा.

तूने तो उस दिन बातों बातों में उसे अपना पासवर्ड भी बताया था.

मन बगलें झाँकने लगा. उसे समझ नही आ रहा था कि अपनी मूर्खता के लिये कहाँ मुँह छिपाये. वो दिन और आज का दिन - रजत को अंतरा नहीं मिली. न तो नेट पर न ही साइबर क्राइम की रिपोर्ट पर की गयी खोज में.

उसकी खोज आज भी जारी है.

 

लखनऊ निवासी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की वनस्पति विज्ञान की स्नातकोत्तर, श्रीमती अलका प्रमोद उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन में अधिकारी हैं. ये एक कहानीकार हैं - इनके अनेकों कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं - बाल साहित्यकार हैं और कई पत्रिकाओं के सम्पादक मंडल में हैं. इनकी कहानियाँ देश की सभी प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, कईयों को पुरस्कार मिल चुके हैं, ये स्वयं अनेकों उपाधियों और पुरुस्कारों से सम्मानित की जा चुकी हैं. इनका उपन्यास यूँ ही राह चलते चलते शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा है.

अलका जी से सम्पर्क के लिये ई-मेल - pandeyalka@rediffmail.com