... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

लेखक परिचय

अलका प्रमोद

मैं ,अलका प्रमोद ने भले ही इलाहाबाद विष्वविद्यालय से वनस्पति विज्ञान में एमएससी किया और जीविकोपार्जन हेतु उ0प्र0 पावर कारपोरेशन विभाग लखनऊ को चुना पर छात्र जीवन में लिखी गई कालेज पत्रिका व आकाशवाणी में प्रकाशित प्रसारित रचनाए सिद्व करतीं हैं मेरे मन में सुप्त रचनाशीलता के बीज की। 
     जब जीवन के मोड़ पर अचानक  कठोर  धूप से सामना हुआ तो ताप में झुलसते मन को पापा साहित्यकार  श्री कृष्णेष्वर डींगर ने लेखन के लिये प्रेरित किया  । काल के कठोर प्रहारों से विचलित भटकते मन को ठंडक मिली सृजन की छांव में। लगभग वर्ष1992-1993 में पुनः गति पा कर आज तक सतत गतिशील है और जब भी मन व्यथित हुआ है तो सृजनशीलता ने संरक्षण दिया है। प्रथम कहानी मुक्ता पत्रिका में प्रकाशित हुई तब से अभी तक पांच कहानी संग्रह 1.सच क्या था 2.धूप का टुकड़ा 3.समान्तर रेखाएं 4.स्वयं के घेरे 5. रेस का घोड़ा, 6.उपन्यास-.यूं ही राह चलते चलते तथा नौ बाल विज्ञान एवं साहित्य की पुस्तकें 7.नन्हे फरिश्ते 8.. चुलबुल-बुलबुल , 9. अन्तरिक्ष की सैर 10.. मशीनी जिन्न 11.. सौर ऊर्जा और उसके प्रयोग 12..विज्ञान कल से आज तक, 13.मशीनी मानव रोबोट  ,14. चन्द्रशेखर वेंकट रमन, 15.डा0 ए पी जे अब्दुल कलाम , अस्तित्व में आ चुके हैं।                                                   जिनके लिये यदा कदा मिलने वाले लगभग 22- 23 पुरस्कारो/ सम्मानों,जिनमें उ0 प्र0 हिन्दी संस्थान के विद्यावती कोकिल जैसे महत्वपूर्ण सम्मान तथा होमी भाभा संस्थान ,दिल्ली प्रेस द्वारा प्रदत्त प्रतिष्ठित पुरस्कार भी सम्मिलित हैं, ने मुझे प्रेात्साहित किया तो मेरी कुछ रचनाओं के अनुवाद और शोध छात्रों द्वारा मेरे रचना संसार पर शोध ने मेंरे आत्मविश्वास में वृद्धि की। द संडे पत्रिका ने सदी की 111 महिला साहित्यकारों मे स्थान दे कर मुझे  कलम को निरंतर चलने के लिये प्रेरित किया ।
      मेरे जीवन में प्रायः मन पर हस्ताक्षरित आस-पास की घटनाओं ने मन को उद्वेलित कर कलम उठाने को विवश किया तथा कल्पना के ताने बाने में  गुंथ कर कहानी/ उपन्यास के पात्र अनायास ही आ खड़े हुए । इस प्रकार कहानी और उपन्यास   आकार ग्रहण करते रहे हैं। मन के भावों के संप्रेशण हेतु  कविताओं ने जन्म लिया।
    प्रत्येक रचना के जन्म ने मुझे मात्त्व का सुख दिया और हर बार जब रचना प्रकाशित हुई तो लगा मेरी संतान ने सफलता के सोपान चढ़ मुझे गैारवान्वित किया है। हां मेरा यह मानना है कि भले ही सृजन अभिव्यक्ति का माध्यम हो पर वह मात्र तभी तक स्वांतः सुखाय  होता है जब तक डायरी के पन्नों में बन्द रहता है। जब कोई भी रचना पाठकों को समर्पित होती है तो वह समाज की थाती बन जाती है अतः रचनाकार का समाज के प्रति गंभीर दायित्व हो जाता है अतः विधा कोई भी हो विचार यथार्थ हो या कल्पना मेरा यह प्रयास अवश्ष्य रहता है कि मेरी रचना समाज में मनोरंजन के साथ साथ समारात्मकता विस्तारित करे।