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भिखारी

धीरज कुमार श्रीवास्तव

फटे-पुराने चिथड़े कपड़े, काली होती चमड़ी, आंखों में कीचड, पैरों में बिवाइयां। उसका यही रूप था। वो एक भिखारी था जो रुपा के घर के बाहर खड़ा, आर्द्रस्वर में बार-बार, निरीह स्वर में कह रहा था, ‘‘माई ! कुछ खाने को दे दो। कई दिनों से भूखा हूं। तेरे बाल-बच्चे जिएं माई।’’ कहकर वो याचना भरी निगाहों से द्वार की ओर देख रहा था। उसे आशा थी कि घर की मालकिन अभी घर के अंदर से बाहर निकलेगी और उसकी झोली में आटा, चावल या कुछ पैसे डाल देगी।

रुपा अंदर बैठी कबसे उस भिखारी की आवाज सुन रही थी। उसे भिखारियों से सख्त नफ़रत थी। भिखारियों का स्वर कानों में पड़ते ही मानों उसके तन-बदन में आग लग जाती थी। उसका बदन जैसे सुलगने लगता था। वो वैसे ही चुपचाप बैठी रही। उसने उठने का कोई उपक्रम न किया। वो एकटक जलते हुए चूल्हे को ताक रही थी। चूल्हे में दाल उबल रहा था। फिर उसकी कानों में आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘माई, कुछ दे दो। कई दिनों से भूखा हूं। तेरे बाल-बच्चे जिएं। माई।’’

रुपा झुंझला उठी। गुस्से से चूल्हे में पानी डालती हुई उठ खड़ी हुई। चूल्हा भभकाकर बुझ गया था।

अभी वो खड़ी ही हुई थी कि सास की आवाज उसके कानों में पड़ी, ‘‘अरी, देख बाहर कोई भिखारी आया है। वो कबसे चिल्ला रहा है। तुझे सुनाई नही देता क्या ? जा, कुछ देकर चलता कर उसे। हे भगवान्, कान में रुई डाले बैठी रहती है। कुछ सुनती ही नहीं।’’

रुपा, सास की फटकार सुनकर तिलमिला उठी थी। गुस्से से उबलकर, दनदनाती हुई, बाहर आई। एक गंदे भिखारी को अपने दरवाजे के पास बैठे देखकर चिल्ला उठी, ‘‘अ-अरे ! बाहर निकल यहां से। सारा घर गंदा कर दिया, बेहया कहीं का।’’ भिखारी शायद थक जाने के कारण दरवाजे के पास आकर चबूतरे पर बैठ गया था। वो रुपा का रुप देखकर हड़बड़ाकर खड़ा हो गया और निरीहपूर्ण आंखों से उसकी तरफ देखने लगा था।

रुपा का रौद्र-रूप देखते ही उसके बदन में कंपकंपी आ गई थी। वो करुण स्वर में घिघिया उठा, ‘‘माई ! कुछ खाने को दे दो। दो दिनों से भूखा हूं। ठीक से चला नहीं जाता। आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है।’’

‘‘चल-चल। कुछ नहीं देती। बाहर निकल।’’ रुपा दुत्कार उठी, ‘‘पता नही कहां से रोज-रोज मांगने चले आते हैं भिखारी। शरम भी नही आती। बेहया कहीं के ! चल, उठ, निकल यहां से। सारा चबूतरा गंदा कर दिया।’’ कहते हुए रुपा चेहरा बनाने-बिगाड़ने लगी।

बूढ़ा भिखारी एक पल कुछ न बोल सका। बस एकटक बेचारगी से रुपा के चेहरे की ओर ताकता रहा। फिर थोड़ी देर बाद विश्वास जुटाकर बोला, ‘‘तेरे बाल-बच्चे बने रहें माई। तेरा घर-परिवार बना रहे।’’ भिखारी ने एक बार फिर आर्द्र स्वर में दुहाई दी।

एक गंदे, मैले कुचले भिखारी के मुंह से अपने परिवार व बच्चे के बारे में सुनकर रुपा बिफर उठी। आंखे निकालती हुई बोली, ‘‘चुपकर, नामुराद ! जो अपनी गंदी जुबान से मेरे परिवार का नाम लिया तो। म्लेच्छ कहीं का ! बड़ा आया दुआ देने वाला। चल, भाग यहां से।’’

बूढ़ा सहम गया। आंखें बेबसी के मारे भींग आई। एक अंजुरी दाने के लिये इतनी उपेक्षा ! इतना क्रोध ! इतना अभिमान ! उसका मन वितृष्णा से भर उठा। हाथ जोड़कर बोला, ‘‘माई ! सब समय का खेल है। किसी का समय एक-सा नहीं रहता। एक भूखे लाचार गरीब को इस तरह दुत्कारना ठीक नहीं। जन्म से कोई भिखारी नहीं होता, माई। मैं भी कभी आपकी तरह था। मेरे भी द्वार पर लोग मांगने के लिए आया करते थे लेकिन हम लोग भी उनका उपहास उड़ाकर भगा दिया करते थे। दुत्कार देते थे। बस...एक मुठ्ठी भर दाने के लिए माई। एक दिन, एक भिखारी आया और बद्दुआ देकर चला गया। हम सब हंसते ही रह गए।’’ वो अपने आंसू पोंछते हुए बोला, ‘‘एक बार गांव में बहुत जोर की बाढ़ आई। सारा गांव बह गया। उसमें मेरा भी परिवार था। बूढ़ा हूं माई, ठीक से काम-धाम नहीं कर सकता इसलिए भीख मांगता हूं। बदन में अब जोर नहीं रहा कि कोई काम कर सकूं। भीख मांगना मजबूरी है माई, शौक नहीं !’’ भिखारी की आंखों से आंसू निकलकर उसके गर्द भरे चेहरे पर घुलमिल हो रहे थे।

फिर वो लाठी टेकते हुए उठा और एक नजर भींगी आंखों से रुपा की ओर देखा। फिर बोला, ‘‘खुश रहो माई ! तेरा घर-परिवार आबाद रहे।’’ कहकर वो आगे बढ़ गया।

रुपा किर्तव्यविमूढ़-सी खड़ी रह गई। उसकी आंखों के आगे अंधेरा-सा छा गया। आंखें धुंधला आई थीं। ‘बा-बा !’ उसके मुंह से निकला लेकिन तब तक वो बूढ़ा उसकी नजरों से दूर जा चुका था। झुकी कमर लिए हुए। लाठी टेकते हुए।

धीरज श्रीवास्तव

परिचयः
जन्मः 23 अक्टूबर 1976, प्रतापगढ़
भाषाः हिन्दी, अंग्रेजी
विद्याएँः कविता, कहानी, गज़ल, नज़्म, एकांकी/नाटक, उपन्यास
शिक्षाः एम.ए.(दर्षन शास्त्र)

कृतियाँः
गज़़ल संग्रहः कुछ फूल और भी हैं (साझा) सन् 2001
संपादनः हिन्दुस्तान एकादमी, इलाहाबाद
गज़़ल संग्रहः काव्य स्पर्श (साझा) सन् अगस्त 2019 में
संपादनः कवि अनुभव शर्मा द्वारा, दिल्ली
नाटकः गालिब की एक शाम (चयनित) प्रकाषित सन् दिसम्बर 2019
प्रकाशनः प्रतिश्रुति प्रकाषन, कोलकाता
रेडियो नाटकः
1.गालिब की एक शाम (2018)
2.बारिष में कविता (2019)
संपादनः इलाहाबाद आकाषवाणी से प्रसारित

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