... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

विष का प्याला

संगीता ने भर्राए और टूटे-फूटे वर्णों में बस एक शब्द मुँह से निकाला, “दी…दी!” और कटे हुए पेड़ की तरह वह लड़खड़ाकर मंजरी के कंधे पर लगभग गिर ही पड़ी। उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। मंजरी ने बड़ी मुश्किल से संगीता को सँभाला, क्योंकि उसे खुद भी किसी के द्वारा संभाले जाने की ज़रूरत थी। उसकी आँखों से भी आँसुओं की अविरल धारा बहने लगी।

पल भर में ही पिछले पूरे हफ़्ते का घटनाचक्र मंजरी की आँखों के सामने से घूम गया।

हफ़्ते भर पहले की बात थी, जब मंजरी ने संगीता को फ़ोन किया था। इस समय मंजरी को दफ़्तर में होना चाहिए था और संगीता को मंजरी के घर पर होना चाहिए था।

कुछ दिनों से संगीता मनमानी जैसा करने लगी थी।

संगीता उसकी पूरे समय की नौकरानी, जो एक तरह से मंजरी का पूरा घर ही संभालती थी। संगीता मंजरी के पास और 12-13 साल से भी ज़्यादा समय से काम कर रही थी। मंजरी नौकरीपेशा महिला थी, और उसे यह सोचकर ही झुरझुरी आ जाती थी कि अगर संगीता नहीं होती, तो वह दफ़्तर को, और घर को, और बच्चों को, और हाँ पति को कैसे संभालती। घर में बच्चों का सारा काम, खाना बनाना, घर संभालना, सौदा-सुलुफ़ – सब कुछ संगीता के हवाले करके मंजरी बहुत आराम से दफ़्तर की ओर चल देती थी। यहाँ तक कि शशि भैया की देखभाल भी संगीता के ही ज़िम्मे थी (हालाँकि उस अर्थ में नहीं जिस अर्थ में आप समझना चाहते होंगे)।

लेकिन इसके बदले में मंजरी ने संगीता को दिया भी भरपूर था। वह एक तरह से परिवार की सदस्य ही थी। उसकी तनख्वाह, कपड़े-लत्ते, भोजन वगैरह सबका ख़्याल मंजरी पूरे मनोयोग से रखती थी। उस पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं थी। शशि कभी-कभी दबी जबान में कहता था कि माई को इतना सिर पर चढ़ाना ठीक नहीं है। लेकिन किसी पत्नी ने आज तक भला अपने पति की बात सुनी है, जो मंजरी सुनती? कभी नहीं। जब बात ज़्यादा ही बढ़ जाती, तो मंजरी कह देती “तो बुला लो अपनी माँ को काम करने के लिए”, जिसका कोई जवाब शशि के पास नहीं होता था। मंजरी के सामने तो उसकी बोलती बंद हो जाती, लेकिन इसका बदला वह संगीता से लेने की पूरी कोशिश करता। वह उसे फालतू के काम बताता, बेबात बिठाए रखता, वगैरह-वगैरह। लेकिन संगीता को भी ऐसी फ़रमाइशों को धता बताना बहुत अच्छी तरह आता था। ऐसा नहीं था कि शशि को यह बात समझ में नहीं आती थी। ख़ूब आती थी और अपने पक्ष को मज़बूत बनाने के लिए वह इसकी शिकायत यदा-कदा मंजरी से करता भी था, लेकिन तब ऊपर बताया गया चक्र फिर से घूम जाता था और शशि को अपना मन मसोसकर रह जाना पड़ता था।

इस तरह से गाड़ी चलती जा रही थी, अगर इसे चलना कहा जाए तो!

संगीता का पहनावा, रहना-सहना, खाना-पीना सब ऐसा था कि अगर कोई अंजान व्यक्ति घर पर आता, तो उसे यह समझने में समय लगता था कि संगीता घर की सदस्य नहीं है, बस माई है। एक बात तो ... का दोस्त घर पर पहुँचा, तो उसने संगीता के पैर ही छू लिए। फिर वह काफ़ी शर्मिंदा जैसा रहा और सबने उसका मज़ाक जैसा भी उड़ाया। मंजरी ने उसे ज़रूर तसल्ली देने की कोशिश की कि तो क्या हुआ? वह भी तो बड़ी है। लेकिन बात बनी नहीं, क्योंकि इतना कहते-कहते उसकी हँसी छूट गई और ठगा-सा रह गया। बात उसके दिल को इतनी लगी कि फिर वह घर नहीं आया। हाँ संगीता उस दिन ज़रूर किसी विजेता कि तरह पूरे घर में काफ़ी प्रसन्नचित्त-सी घूमती रही।

पूरा-का-पूरा घर ही संगीता के हवाले था। वह कब आती है, क्या बनाती है, क्या खाती है, कैसे चीज़ों को रखती है, बच्चों को कैसे संभालती है, बाज़ार का काम कैसे करती है, इस पर मंजरी ऊपरी तौर से तो ज़रूर नज़र रखती थी लेकिन बारीकियों में जाने के लिए न तो उसके पास समय था, न ऊर्जा थी, और न उसे इसकी कभी बहुत ज़्यादा ज़रूरत महसूस हुई थी।

उधर संगीता भी पूरे परिवार का, और ख़ास तौर से मंजरी का बहुत सम्मान करती थी। उसे याद है कि बहुत छोटी उम्र में ही जब उसका पति बहुत ज़्यादा दारू पीने के कारण मर गया था, और वह अपने पीछे चार बच्चे छोड़ गया था, तो उसे समझ नहीं आता था कि अपना पहाड़-सा जीवन अब वह कैसे काटेगी, और परिवार, बच्चों, और खुद को कैसे संभालेगी ? ऐसे समय में उसे मंजरी के यहाँ पूरे समय का काम मिला, जिसका मतलब था कि उसे काम ढूँढ़ने के लिए अब दर-दर भटकने की ज़रूरत नहीं थी। उसका वेतन भी, माई का काम करने वाली उसके साथ की बाकी औरतों से ज़्यादा था; और इससे भी बढ़कर, इस घर में जो सम्मान उसे मिला, उसका तो जैसे कोई मोल ही नहीं था। संगीता अकसर यह बात पूरे दिल से और खुले रूप से कहती थी, “दीदी आप मुझे काम से मत निकालना। नहीं, तो मैं तो मर ही जाऊँगी!”

मंजरी भी अकसर अपनी नौकरानियों को, और उनमें भी ख़ास तौर से, संगीता को अपनी लाइफ़ लाइन कहती थी। पति दूसरे शहर में काम करते थे, और सप्ताहांत पर ही घर पर आ पाते थे। वैसे तो यह स्थिति इतनी ज़्यादा बुरी भी नहीं थी, क्योंकि विवाह-पुराण में कहा गया है कि पति (या पत्नी – जैसी भी स्थिति हो) से जितना कम सामना हो, उतना ही अच्छा होता है। लेकिन ऐसे में घर की पूरी ज़िम्मेदारी मंजरी के ही कंधों पर आ गई थी। जहाँ संगीता घर के हर काम में मंजरी और उसके परिवार के साथ खड़ी हुई नज़र आती थी, वहीं मंजरी और उसका परिवार भी हर मौके पर, चाहे वह ख़ुशी का अवसर हो गया दुख का, चाहे कोई त्यौहार हो, ग़मी या कोई हारी-बीमारी, वे संगीता के साथ खड़े हुए नज़र आते थे।

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि इस बीच फ़ोन की वह घटना हुई जिसका ऊपर जिक्र किया गया है। मंजरी ने संगीता को फ़ोन किया और पूछा, “तू कहाँ है?”

संगीता को आज कुछ देरी हो गई थी, पर वह घर के पास ही थी, तो उसने झूठ कह दिया, “दीदी, मैं घर पर हूँ।”

“किसके घर पर?” मंजरी ने थोड़ा सख़्ती से पूछा, उसे लगा कि वह अभी तक अपने ही घर पर बैठी हुई है।

“दीदी, आपके घर पर।” संगीता ने लटपटाते हुए कहा।

मंजरी ने फ़ोन काट दिया। वह अपने गुण या अवगुण से अच्छी तरह वाकिफ़ थी कि वैसे तो वह हमेशा कोमलता से, सौम्यता से, प्यार से, सज्जता से बात करती थी, लेकिन अगर उसे ग़ुस्सा आ जाए, तो फिर उसका अपने ऊपर कोई नियंत्रण नहीं रहता था, और वह जो मुँह में आए, उसे कहने से वह बाज नहीं आती थी, चाहे सामने वाला तार-तार ही क्यों न हो जाए।

उस दिन मंजरी अभी तक घर से नहीं निकली थी। उसके पास फ़ोन आया था कि माँ बीमार है और उसे अस्पताल में भरती किया गया है। उसने तय किया था कि वह माँ को देखते हुए दफ़्तर जाए और वह इसी की तैयारी में लगी हुई थी। यह बात अचानक हुई थी, इसलिए संगीता को इस बारे में कुछ पता नहीं था। जब संगीता लपकते-झपकते घर पर आई, तो उसने देखा कि बाहर ताला नहीं लगा था। उसे लगा कि दोनों बेटियों में से कोई घर पर है, इसलिए उसने बेधड़क घंटी बजा दी। लेकिन उसके सिर पर घड़ों पानी पड़ गया जब उसने देखा कि दरवाज़ा मंजरी ने खोला है।

संगीता बुरी तरह खिसिया गई, क्योंकि उसे पता नहीं था कि वह इस तरह रंगे हाथ पकड़ी जाएगी। और हालाँकि मंजरी ने अब तक संयम बरता था, लेकिन संगीता को देखकर उसका सब संयम काफूर हो गया। उसने उसे वहीं खड़े-खड़े उसे सौ बातें सुना दीं कि कैसे वह उस पर इतना भरोसा करती है, कैसे वह पूरा घर उसके भरोसे छोड़कर जाती है, कैसे वह उसका पूरा ख़्याल रखती है, कैसे वह उसे दूसरों से ज़्यादा तनख्वाह देती है, कैसे वह उसकी हर तरह से मदद करती है, कैसे वह उसकी हारी-बीमारी में काम आती है, कैसे वह उसके परिवार, बच्चों का ख़्याल रखती है, कैसे वह उसे परिवार का ही सदस्य मानती है, कैसे बच्चे उसकी इज़्ज़त करते हैं, आदि-आदि। और पूर्णाहूति की तरह आखिरी में उसने यह भी जोड़ दिया कि उसे संगीता से इस तरह की उम्मीद नहीं थी।

संगीता को काटो दो खून नहीं। वह बोले तो क्या बोले, क्योंकि उसकी चोरी रंगे हाथों पकड़ी गई थी। वह उस घड़ी को कोस रही थी, जब उसके मन में आया था कि दीदी को झूठ बोल दे। वह यह भी तो कह सकती थी कि बस दो मिनट में पहुँच रही थी, पर किसे पता था कि दीदी घर से ही फ़ोन करके उसे जाल में फँसा रही हैं। उसके पास सफ़ाई देने के लिए, या कुछ भी कहने के लिए कोई शब्द नहीं था। वह हारे हुए अपराधी की तरह सिर झुकाए खड़ी रही।

जब मंजरी की सारी भाप निकल गई, तो वह संगीता के रास्ते से हट गई। संगीता चुपचाप भीतर आकर अपने काम में लग गई।

ऐसा अकसर होता है कि जब हम किसी व्यक्ति के बारे में बुरा सोचने लगते हैं, तो उसकी सारे बुरी बातें ही हमारे ध्यान में आती हैं। उसकी अच्छी बातें न जाने कहाँ छिप जाती हैं। मंजरी को भी इस समय संगीता की सारी कमियाँ ही नज़र आ रही थी। कैसे वह समय पर काम पर नहीं आती, कैसे वह कामचोरी करती है, कैसे वह पैसों का ठीक हिसाब नहीं देती, वगैरह-वगैरह। उसे यह भी ख्याल आया कि कैसे शशि उसकी अकसर शिकायत करता रहता है, जिस पर उसने कभी ध्यान ही नहीं दिया।

मंजरी ने उसी पल सोच लिया कि अब इसके नखरे बहुत बढ़ गए हैं, और इसे आगे काम पर रखे रहना ठीक नहीं होगा, और कि वह उसे निकाल देगी। लेकिन वह इस बात को समझती थी कि इस मामले में जल्दबाज़ी करना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इसके चले जाते ही उसके सारे काम रुक जाएँगे। उसने तय किया कि वह चुपचाप कोई नहीं नौकरानी ढूँढ़ लेगी, और जब वह पूरा काम समझ जाएगी, तो इसे लात मारकर निकाल दिया जाएगा।

और उधर संगीता भी काम करते-करते सोच रही थी कि यह उसका सरासर अपमान है, और दीदी को इस तरह से उससे छल करके पूछताछ नहीं करनी चाहिए थी। उसने सोचा कि वह घर के लिए इतना काम करती है, लेकिन दीदी ने बिल्कुल लिहाज नहीं किया, और इतनी बातें सुना दीं। उसने खुद से कहा कि उसे पैसा मिलता है, तो वह काम भी तो पूरा करती है, और कि वह नौकर है, कोई गुलाम नहीं है, और वह इतनी गई-गुजरी भी नहीं है कि उसे कोई दूसरा काम ना मिल सके। तो उसने भी मन-ही-मन ठान लिया कि मैं यह काम छोड़ दूँगी।

मंजरी जब अस्पताल के लिए निकलने लगी, तो उसने संगीता से कहा कि वह जा रही है और रात को देर से आएगी, और कि बच्चों का ध्यान रखना। संगीता ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। बस चुपचाप सिर झुकाए रही। फिर हिम्मत करके नज़रें झुकाए-झुकाए बस इतना कहा, “दीदी, अब मैं काम नहीं कर सकूँगी।”

मंजरी के तो पैरों के नीचे की ज़मीन ही निकल गई। हालाँकि यही बात वह खुद संगीता को कहना चाहती थी, लेकिन इसके लिए वह उचित समय का इंतजार कर रही थी ताकि दूसरी नौकरानी का इंतज़ाम हो जाए, और सब काम जम जाए। उसे उम्मीद नहीं थी कि इस दौड़ में संगीता उससे बाज़ी मार लेगी।

अबकी बार चुप रह जाने की बारी मंजरी की थी इसलिए वह चुप रह गई, और बिना एक भी शब्द बोले, लेकिन संगीता को बहुत सख़्त नज़रों से देखते हुए वह घर से बाहर निकल गई।

विष का प्याला राणा ने भेजा, पीकर मीरा हांसी - राणा ने विष का प्याला भेजा था और उसे मीरा ने हँसकर पी लिया था। विष का प्याला पीने में तो हम लोग माहिर हो चुके हैं। कभी यह बॉस के अश्लील मज़ाक या अवांछित स्पर्श का होता है, कभी जीवन साथी की झिड़कियों का होता है, कभी साथियों के तानों का होता है, कभी दोस्तों की दगाबाज़ी का होता है, कभी संतानों की अवहेलना का होता है। गरज़ यह कि विष के प्याले हमें हर तरफ़ से मिलते रहते हैं, और हम उन्हें मन मारकर पीते रहते हैं। मंजरी के लिए भी संगीता की यह बात विष का प्याला थी, जिसे मन मारकर उसने पी लिया, क्योंकि उसे संगीता की अभी गरज थी। लेकिन क्योंकि वह ऐसी स्थिति में थी कि इस विष के प्याले का बदला ले सके, इसलिए उसने तय कर लिया कि वह जल्दी-से-जल्दी कोई दूसरा इंतज़ाम करेगी, और संगीता की छुट्टी करके ही दम लेगी।

अस्पताल में अपनी माँ का हालचाल लेने के बाद जब मंजरी दफ़्तर पहुँची, और अपनी सहेलियों के साथ उसका चाय का अड्डा जमा, तो वहाँ मुख्य रूप से चर्चा का विषय नौकरानियों की ज़्यादतियाँ ही रहा, क्योंकि मंजरी के जेहन पर यह विषय बुरी तरह छाया हुआ था। उसे यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी कि एक अदना-सी नौकरानी ने उसे जवाब दे दिया। और इससे भी बढ़कर बात यह थी कि उसे यह बिल्कुल समझ में नहीं आ रहा था कि इस समस्या का हल वह कैसे निकाले, क्योंकि वह नौकरानी को तुरंत निकाल भी नहीं सकती थी, और उसके साथ काम जारी भी नहीं रख सकती थी। मुहावरे के अनुसार उसकी हालत साँप के मुँह में छछूंदर जैसी हो गई थी, जिसे साँप न तो निगल सकता था और न ही उगल सकता था। जैसे दोस्तों के साथ डिनर की मेज़ पर बैठे हुए उसने गरम भोजन का कौर मुँह में रख लिया हो, जिसे न अब निगलते बनता था और न ही निकालते।

उसने अपनी सहेलियों के सामने इसी विषय को बहुत ज़ोरदार ढंग से उठाया कि नौकरानियों के दिमाग़ अब बिल्कुल नहीं मिलते, कि उनके नखरे अब बहुत बढ़ गए हैं, और यह कि उसे समझ नहीं आ रहा कि वह अपनी इस भारी समस्या से कैसे निकले।

कामकाजी महिलाओं के बीच नौकरानी बहुत प्रिय विषय होता है। जीवन के लिए बहुत आवश्यक बुराई की तरह हर किसी को अपना घर और दफ़्तर दोनों संभालने के लिए नौकरानी की ज़रूरत होती है, और क्योंकि इस ज़रूरत की जानकारी बहुत इफ़रात से नौकरानियों को हो गई है, तो वे भी गाहे-ब-गाहे अपना अधिकार जमाने, और कामकाजी महिलाओं का शोषण करने से बाज नहीं आतीं।

साझा करने के लिए सहेलियों के पास अपने दुखड़े थे, तो उन्होंने पूरी तन्मयता से उन्हें चाय के साथ परोस दिया।

संतोष ने कहा गया है कि इन लोगों का तो यही हाल है। और फिर उसने अपनी नौकरानी के द्वारा उसके लिए पैदा की गई परेशानियों की तल्लीनता से गिनती शुरू की, जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं। उसने बताया कि कैसे उसे हर छह महीने में नई नौकरानी ढूँढ़नी पड़ती है, कैसे वे ठीक से काम नहीं करतीं, कैसे वे चीज़ें बर्बाद करती हैं, कैसे वे हाथ-पर-हाथ रखे बैठी रहती हैं, कैसे अगर उन्हें कुछ न कहा जाए तो वे उँगली तक नहीं हिलातीं, कैसे वे फ़ोन पर घंटों लगी रहती हैं, और कैसे उनसे अपने पति की रक्षा करने का दूभर काम उनके सिर पर आ जाता है। वगैरह-वगैरह। फिर उसने यह भी जोड़ा कि मैं इसलिए हर छह महीने में नौकरानी बदल देती है, ताकि कोई घर में पैर न जमा ले और मेरे लिए ख़तरा न बन जाए। इस बीच अपनी बात पर ज़ोर देने और अपनी विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए वह अपने हाथों और आँखों को नचाती रही, जैसा कि ऐसे अवसरों पर वह हमेशा करती थी।

यह सुनकर मंजरी को अपने फ़ैसले का समर्थन जैसा ही लगा कि उसे अपनी नौकरानी भी अब बदल देनी चाहिए। संतोष ने बल्कि टिप्पणी भी की कि मुझे तो बहुत आश्चर्य होता है कि तेरे साथ यह नौकरानी दस-बारह साल से है। और आखिर में उसने निष्कर्ष के रूप में कहा कि मैं तो तेरी हिम्मत की दाद देती हूँ कि इसे तू चला कैसे रही है।

मंजरी समझ नहीं पाई उसने यह कहकर उसकी तारीफ़ की है या उसका मखौल उड़ाया है। उसने असमंजस जैसे भाव से कहा, “वो तो ठीक है लेकिन यार मेरी दो लड़कियाँ हैं। उनकी वज़ह से मैं बार-बार नौकरानी नहीं बदल सकती थी, इसलिए चला रही थी। लेकिन अब वे बड़ी हो गई हैं, और खुद को संभाल सकती हैं, और इस बार तो इसने बिल्कुल हद ही कर दी है, और पानी बिल्कुल सिर के ऊपर निकल गया है, इसलिए मुझे इसे बदलना ही पड़ेगा।”

सीमा ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाई और कहा कि इन छोटे लोगों के मुँह नहीं लगना चाहिए, और इन्हें हमेशा इनकी औकात बताते रहना चाहिए, वरना ये लोग सिर पर चढ़कर नाचने में देर नहीं लगाते। उसने बताया कि कैसे वह अपनी नौकरानी से कभी भी मुस्कराकर बात नहीं करती, उनके परिवार वालों का हालचाल नहीं पूछती, अगर वह बीमार हो जाती है तो कभी उसके स्वास्थ्य के बारे में नहीं पूछती, वगैरह-वगैरह।

कोई और दिन होता, तो शायद मंजरी ऐसे मौके पर नौकरानियों का पक्ष लेने में नहीं हिचकती। वह ज़रूर कहती कि भई वे भी इंसान हैं, हमें उनके साथ भी मानवीयता का व्यवहार करना चाहिए, और उनकी ज़रूरतों का ख़्याल रखना चाहिए, और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे हमारी कितनी मदद करते हैं, अगर वे न हों तो हम न तो नौकरी कर सकती हैं और न ही ठीक से घर की देखभाल कर सकती हैं। कुल मिलाकर यह है कि हमारी ज़िंदगी उन पर टिकी हुई है और अगर वे अपना सहारा हटा लें, तो हमें दिन में तारे दिख जाएँगे। और साथ ही वह गर्व के साथ यह जोड़ना भी न भूलती कि कैसे वह अपनी नौकरानियों का इतनी अच्छी तरह से रखती है कि जैसे वे परिवार के सदस्य ही हों।

लेकिन आज बात दूसरी थी, उसने जो विष का प्याला पिया था, वह बार-बार उसके शरीर में असहनीय लहरें पैदा कर रहा था। उसने उसके मानवीयता के, लोगों की मदद करने के, और ऐसे सभी सिद्धांतों को जलाकर राख कर दिया था कि उसके मन में इस तरह की बात एक बार भी नहीं आई। और वह बराबर इसी विषय पर सोचती रही कि कैसे संगीता से छुटकारा लिया जाए, और छुटकारा भी इस तरह से लिया जाए कि वह ज़िंदगी भर याद रखें कि उसका पाला किससे पड़ा था।

कुल मिलाकर, उन्हें आज बात करने के लिए किसी दूसरे विषय की तलाश करने में सिर नहीं खपाना पड़ा और उनकी बातचीत नौकरानी पुराण के आसपास ही घूमती रही। और लब्बोलुआब यह है कि जब उन लोगों का अड्डा ख़त्म हुआ, तो मंजरी पूरी तरह फ़ैसला कर चुकी थी कि अब वह जल्द-से-जल्द नई नौकरानी ढूँढ़ लेगी और संगीता को निकाल बाहर करेगी। लेकिन चिंता यह बनी हुई थी कि ऐसी नौकरानी मिलेगी कहाँ से, जिस पर इतना ही भरोसा किया जा सके, और जो काम में इतनी ही निपुण भी हो।

संगीता अगले दिन काम पर नहीं आई। उसने मंजरी को फ़ोन करने के बजाय उसकी छोटी बेटी अंशुल को फ़ोन किया और कहा कि वह अब काम पर नहीं आएगी।

हालाँकि अंशुल अभी छोटी थी, लेकिन यह बात सुनकर उसके चेहरे पर चिंता के बादल छा गए, क्योंकि वह समझती थी कि ऐसी स्थिति में ममा पर और घर पर क्या परेशानी आने वाली है। उसने तुरंत यह बात अपनी माँ को बताई। यह बात सुनकर मंजरी की समझ में नहीं आया कि वह इस पर क्या प्रतिक्रिया दें। अंशुल थोड़ा रुकी, और क्योंकि संगीता आंटी होल्ड पर थी, इसलिए उसने फिर से पूछा कि ममा मैं आंटी को क्या जवाब दूँ। हालाँकि संगीता नौकरानी थी, लेकिन बच्चे उसे आंटी से नीचे कभी और किसी तरह से संबोधित नहीं करते थे, उन्हें उसके साथ कठोरता से बोलने की सख़्त मनाही थी। और वे उसके साथ ठीक वैसा ही व्यवहार रखते थे, जैसा कि किसी आंटी के साथ किया जाना चाहिए।

इस बीच मंजरी को सोचने का मौका मिल गया, और उसने बात को टालने के अंदाज़ से कहा, “आंटी को बोल दो कि वह इस हफ़्ते में आ जाए और, ममा खुद बात करेगी।”

अंशुल ने यह बात संगीता के लिए दोहरा दी, और उसने कोई आनाकानी या ना-नुकुर नहीं किया, और काम पर आना शुरू कर दिया।

मंजरी को इस बात का आभास नहीं था, क्योंकि ऐसा आभास किसी को भी नहीं हो सकता, लेकिन अगले कुछ दिन उसके लिए बहुत मुश्किल वाले होने वाले थे। उसकी माँ की बीमारी बढ़ गई है और उसके पास अस्पताल में देखभाल के लिए किसी-न-किसी के रहने की ज़रूरत हो गई। उसे दफ़्तर से छुट्टी लेनी पड़ी, और वह अपनी माँ की देखभाल के लिए ज़्यादातर समय अस्पताल में रुकने लगी। उसकी बेटियाँ भी माँ को आराम देने के लिए बारी-बारी से नानी के पास अस्पताल में रुकने लगीं।

सारे घर की ज़िम्मेदारी एक बार फिर से संगीता के सिर पर आ गई, और उसने बिना कोई एतराज़ किए इस पूरी ज़िम्मेदारी को संभाल भी लिया। इस बीच, अंशुल को बुखार आ गया और उसकी तीमारदारी भी संगीता ने ही की। मंजरी खुद घर और अस्पताल के बीच चक्कर काट-काटकर थक चुकी थी, और उसका पुराना पीठ का दर्द फिर से उभर आया था। संगीता को बदलना है, नई नौकरानी ढूँढ़नी है, उसे काम समझाना है, और कुल मिलाकर, संगीता को उसकी औकात याद दिलानी है - ये सब बातें मंजरी के दिमाग़ से कहीं दूर चली गई थीं।

लेकिन यह बात वह भूल चुकी थी, ऐसा कहना शायद ठीक नहीं होगा। उसके दिमाग़ में कहीं पीछे ज़रूर यह बात थी कि इस समस्या को हमेशा-हमेशा के लिए निपटाना है। लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी आ गई थी कि उसे संगीता की ओर से दिया जाने वाला विष का प्याला बार-बार पीना पड़ रहा है। दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने पड़ने से बचती थीं। आपस में एक-दो बातें बस काम के बारे में ही होती थीं, और कोशिश यह रहती थी कि एक-दूसरे से कन्नी काटकर निकल जाया जाए।

हालाँकि दिल-ही-दिल में मंजरी संगीता की बहुत शुक्रगुजार थी कि वह कठिन घड़ी में उसके काम आ रही है, लेकिन दोनों के बीच की खाई इतनी ज़्यादा बढ़ गई थी कि उसे लगने लगा था कि यह संगीता का काम है, जिसके लिए उसे अपेक्षित से ज़्यादा तनख्वाह मिल रही है। जहाँ तक संगीता की बात है, उसमें मन से अब यह बात दूर जा चुकी थी। अपने अपमान के बात वह भूल चुकी थी। ग़रीब आदमी के लिए यह ज़रूरी भी होता है कि एक तो वह किसी भी बात से अपमानित महसूस न करें, अपने अपमान को अपमान न समझे, और अगर वह भूलवश ऐसा कर भी बैठे, तो जितना जल्दी हो इस अपमान को पी जाए। समाजशास्त्र के इसी अकाट्य नियम का पालन करते हुए, उसने अपने मन से यह बात काफ़ी पहले निकाल दी थी। और यही कारण था कि वह बिना किसी मानसिक उथल-पुथल के, जो किसी हद तक मंजरी के मन में बनी हुई थी, इस समय भी मंजरी का काम कर रही थी, और पूरे दिल से कर रही थी।

मंजरी अपनी माँ के पास अस्पताल में थी। वह रात भर वहाँ थी, और अब उसकी बड़ी बेटी मेघना को माँ की जगह लेने के लिए अस्पताल पहुँचना था। नानी की देखभाल करने के लिए, आज उसने छुट्टी ले ली थी। मंजरी उसका इंतज़ार कर रही थी, ताकि जाकर घर को थोड़ा संभाल सके, और कुछ देर के लिए अपनी कमर भी सीधी कर सके।

तभी उसके पास संगीता का फ़ोन आया। उसके मन में तत्काल यह अंदेशा हुआ कि कहीं यह काम छोड़कर तो नहीं जा रही। डरते-डरते उसने पूछा, “क्या बात है?”

उधर से संगीता बहुत मुश्किल से बात कर पा रही थी। भर्राई हुई आवाज में वह केवल टूटे-फूटे शब्दों में डर, चिंता, आशंका, दुःख, पीड़ा आदि के मिश्रित भावों में बस इतना कह पाई “दीदी, आप जल्दी से घर आ जाओ।”

मंजरी ने बहुत पूछने की कोशिश की कि क्या हुआ है, लेकिन उधर से संगीता बस रोए जा रही थी। अपनी माँ को कुछ समझाकर, मंजरी जल्दी से घर की तरफ़ भाग ली। अस्पताल से घर की दूरी लगभग एक घंटे की थी। टैक्सी में बैठकर मंजरी ने फिर कोशिश की कि किसी तरह से संगीता से पूछे कि क्या बात हुई है, लेकिन वह कुछ भी बता नहीं सकी। उसने मेघना को फ़ोन किया, लेकिन वह नो रिप्लाई पर था। पता करने का कोई और ज़रिया नहीं था, इसलिए उसने आँखें मूँद लीं और घर पहुँचने का इंतज़ार करने लगी, क्योंकि वह कुछ और कर भी नहीं सकती थी। हाँ, वह कुछ कर सकती थी, जो उसने किया। वह भगवान को याद करती रही।

चिंता के मारे मंजरी का बहुत बुरा हाल था, क्योंकि वह सोच नहीं पा रही थी कि आखिर हुआ है, तो क्या हुआ है। वह बस अटकलें ही लगा सकती थी कि क्या कोई चोरी हुई है, या आग लग गई है, या कोई बड़ी चीज़ टूट गई है, संगीता को चोट लग गई है, लेकिन वह किसी भी निष्कर्ष पर पहुँच नहीं पा रही थी। उसके सामने था, तो बिल्कुल अंधकार, प्रकाश की एक भी किरण के बिना।

किसी तरह आशंका की मूर्ति बनी मंजरी घर पहुँची, तो संगीता ने दरवाज़ा खोला और वह दृश्य पैदा हुआ, जिसका जिक्र हम शुरू में कर चुके हैं।

संगीता ने आँखों से आँसुओं की धारा बहाते हुए बताया कि कैसे जब वह घर पहुँची, तो दरवाज़ा अंदर से बंद था। जब उसने घंटी बजाई, तो मेघना ने अंदर से चिल्लाकर कहा कि मैं अपनी जगह से हिल नहीं सकती। संगीता की कुछ समझ में नहीं आया, तो उसने मुश्किल से दरवाज़े की जाली तोड़ी, अंदर से कुंडी खोली, और भीतर पहुँची। वहाँ उसने देखा कि मेघना सोफ़े पर बैठी हुई दर्द से कराह रही है। वह अपनी जगह से हिल भी नहीं पा रही। अपनी तरफ़ से जो कुछ पूछताछ, तीमारदारी, वगैरह वह कर सकती थी, उसने की और फिर तुरंत ही मंजरी को फ़ोन किया।

बहुत ज़्यादा रोने-धोने का समय नहीं था, इसलिए दोनों अलग हुए। मंजरी मेघना के पास पहुँची, तो मेघना के रुके हुए आँसुओं का बाँध बह निकला। वह बुक्का फाड़-फाड़कर रोने लगी। चार घंटे पहले वह जिस तरह से सोफ़े पर बैठी थी, वैसे ही अभी बैठी हुई थी। उसने बताया कि जब वह सैंडल पहनने के लिए नीचे झुकी, तो बस झुकी की झुकी रह गई। मंजरी उसके हाथ अपने हाथों में लेकर सहलाते हुए बारीकी से जानने की कोशिश कर रही थी कि क्या हुआ है, और यह समझने की कोशिश भी कर रही थी कि अब क्या किया जाना है। अपने दर्द के कारण मेघना के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे, अपनी बेटी की दयनीय हालत देखकर लेकिन मंजरी की आँखों से आँसू नहीं रुक रहे थे, और उधर संगीता भी दयनीय हालत में एक तरफ़ बैठी आँसू बहाती हुई जैसे पूछ रही थी कि दीदी मैं क्या करूँ?

कहा गया है कि आँसुओं में बहुत ताक़त होती है। वह ताक़त यहाँ देखने को मिली, जब मंजरी और संगीता के बीच का विष धुलकर इस तरह बह गया जैसे वह कभी था ही नहीं।

प्रो. राजेश कुमार -परिचय

जन्म - 23 जनवरी, 1958 को गाँव करौदा हाथी, ज़िला मुज़फ़्फ़र नगर, उत्तर प्रदेश

योग्यता - दिल्ली विश्वविद्यालय,  भारत से विद्यावाचस्पति

अनुभव :

  • निदेशक (कार्यक्रम), शैक्षिक प्रौद्योगिकी प्रबंधन अकादमी, गुड़गाँव और परामर्शदाता, आस विद्यालय, मुंबई

  • निदेशक (शैक्षिक, और व्यावसायिक शिक्षा), राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षण संस्थान, भारत सरकार 2017 तक

  • 3 साल से अधिक समय तक रूस में भारत के जवाहर लाल नेहरू सांस्कृतिक केंद्र में प्रोफ़ेसर  (हिंदी)

  • टेक्सस विश्वविद्यालय में 1 साल तक प्रोफ़ेसर और शैक्षिक निदेशक

  • , माइक्रोसॉफ़्ट, एप्पल, आदि में अग्रणी भाषाविज्ञानी

  • आकाशवाणी दिल्ली, और दिल्ली दूरदर्शन में समाचार वाचक और समाचार संपादक

  • अनेक लघु फिल्मों का निर्देशन

  • हिंदी समिति, यूके की हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता का राष्ट्रीय संयोजक

  • “हैलो इंडिया”  पत्रिकाओं का संपादन

सम्मान - उत्तर प्रदेश साहित्य अकादमी, टेलीग्राफ़, श्री रामजी वोरा सेवा समिति से सम्मानित

प्रकाशन

साहित्य, भाषा विज्ञान, और शिक्षा के क्षेत्र में अनेक आलेख, और पुस्तकें और साहित्य प्रकाशन। प्रमुख पुस्तकें हैं-

  • बेहतरीन व्यंग्य - प्रकाश्य

  • मेरा कमरा बदल दीजिए (कहानी संकलन), 2018, अमन प्रकाशन, नई दिल्ली

  • दिव्यचक्षु (नाटक), 2018, व्यंग्य यात्रा, नई दिल्ली

  • मेरी शिकायत यह है... (व्यंग्य संकलन), 2017, अमन प्रकाशन, नई दिल्ली

  • हमारे पूर्वज (बाल उपन्यास), 2014, सरस्वती विहार प्रकाशन, नोएडा

  • कैलाश सत्यार्थी (बाल उपन्यास), 2014, सरस्वती विहार प्रकाशन, नोएडा

  • बेंजामिल फ़्रैंकलिन (बाल उपन्यास), 2014, सरस्वती विहार प्रकाशन, नोएडा

  • शांति के लिए शिक्षा, अनुवाद, 2003, युनेस्को

  • शिशु भारती, दो भाग, रूसी विद्यार्थियों के लिए पाठ्य पुस्तकें, 2001, जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केंद्र, भारतीय राजदूतावास, मॉस्को

  • हिंदी-रूसी वार्तालाप गाइड, 2001, जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केंद्र, भारतीय राजदूतावास, मॉस्को

  • हिंदी-रूसी शब्दकोश, 1999, जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केंद्र, भारतीय राजदूतावास, मॉस्को

  • पुश्किन की कविताएँ, 1999, जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केंद्र, भारतीय राजदूतावास, मॉस्को

  • मरजेंसी वार्ड (व्यंग्य संकलन), 1998, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली

  • आप कौन (नाटक), 1997, साहित्य अमृत, नई दिल्ली

  • मुक्त शिक्षा का परिचय, 1996, नेशनल ओपन स्कूल, नई दिल्ली

  • भुजिया होटल (नाटक), 1995, पराग प्रकाशन, नई दिल्ली

  • त्रुटियाँ – विश्लेषण और सुधार (भाषाविज्ञान), 1989, अनुभव प्रकाशन, नई दिल्ली

  • परसाई की पारसाई (साहित्यालोचन), 1989, पराग प्रकाशन, नई दिल्ली

  • बातूनी बटुआ (बाल कथाएँ), 1987, पराग प्रकाशन, नई दिल्ली

  • पद के दावेदार (व्यंग्य संकलन), 1984, पराग प्रकाशन, नई दिल्ली

 

विदेश यात्राएँ - जर्मनी, सिंगापुर, अमेरिका, रूस, न्यूज़ी लैंड, दुबई आदि देशों का शैक्षिक भ्रमण

संपर्क

सी-205, सुपरटेक इकोसिटी, सेक्टर 137, नोएडा – 201305

मो. 9687639855, ईमेल – drajeshk@yahoo.com

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