... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

लेखक परिचय

आकाश हिन्दुजा

मेरा जन्म एवं शुरुआती अध्ययन छत्तीसगढ़ के एक छोटे से कस्बे रतनपुर में हुआ। जैसा कि कस्बे में रहने वाले बहुत से मध्यम वर्गीय परिवारों के साथ होता है, हमारा परिवार भी बेहतरी की तलाश में शहर आ गया- बिलासपुर शहर।  नया शहर होने का एक असर ये हुआ कि ज्यादा दोस्त न होने की वजह से मैं अपना ज़्यादातर समय घर में बैठकर किताबें पढ़ते गुजारता। तब मुझे आर. के. नारायण बेहद पसंद थे। आज से कुछ सालों पहले तक बिलासपुर में पुस्तक मेले लगा करते थे  और लगभग हर पुस्तक मेले में मेरे पिता मुझे ले जाते। मैंने अपना पहला उपन्यास इन्ही में से किसी मेले में खरीदा था- गोदान। शायद मुंशी जी की रचनाएं ही थी कि जिनकी वजह से मेरा साहित्य की ओर रुझान बढ़ा।

लिखने की शुरुआत डायरी से ही हुई। डायरी में कहानियां और कवितायें लिखता। लिखता तो सिर्फ अपने ही लिए था पर मन में एक दबी-छुपी चाह भी थी कि कभी किसी रचना को तारीफ़ मिल जाए। अब भी लिखने के बाद यही सोच रहती है कि किसी एक व्यक्ति को मेरी रचना पसंद आ जाए.. कोई एक कह दे कि तुमने जो लिखा मैंने सब समझ लिया है। इसीलिए हर जगह-हर प्लेटफॉर्म में मौका तलाशता रहता हूँ। खैर, बाद में कॉलेज समारोहों के लिए भी कुछ चीज़े लिखी जिन्हें अपने स्तर पर खूब प्रसंशा मिली। पत्र/पत्रिका की बात करें तो ई-कल्पना में ही मेरी पहली कहानी “ईयरफोन” छपी थी, जिसकी वजह से लिखने की काफी हिम्मत आई। हमेशा छपते रहना मुश्किल होता है इसलिए मैं अपने ब्लॉग दायरा  के ज़रिये भी लिखता हूँ। ख़ास कर कवितायें।

मैं लिखता हूँ क्यूंकि मुझे लगता है कि खुद को ज़ाहिर करने का मेरे पास इससे बेहतर कोई साधन नहीं और खुद में रह जाने से बुरा इस दुनिया में कुछ भी नहीं। कहानियों के अलावा आगे चलकर मैं फिल्मों के लिए स्क्रीनप्ले लिखना चाहता हूँ । पर चूँकि मैं अभी नया हूँ और अपने लेखन के प्रति बहुत आश्वस्त नहीं हूँ, इसलिए सिर्फ लेखन ही करूं, ऐसा नहीं सोचा। इसलिए फ़िलहाल कंप्यूटर एप्लिकेशन की पढाई और बाद में उसी में नौकरी की तलाश रहेगी।

अंत किसी को पता नहीं होता। हो सकता है किसी दिन साहित्य में एक बड़ा नाम कमाऊं, हो सकता है किसी दिन एक सफल स्क्रीन-लेखक बन जाऊं, या ये भी हो सकता है कि सॉफ्टवेयर की नौकरी करते-करते खुद ही एक प्रोग्राम बन जाऊं। अंत किसी को पता नहीं होता, इसीलिए मुझे कहानियाँ लिखना इतना पसंद है। ऐसे में एक कहानीकार जो स्वयं कितने ही अंतर्द्वंद्व- अंतर्विरोधों में उलझा हो, अपनी कहानियों का अंत सुलझा रहा होता है और उन चंद लम्हों के लिए अपनी कहानी भुला देता है।

बहरहाल, लिखने का प्रयास जारी रहेगा।

-आकाश हिन्दुजा