... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

लेखक परिचय

प्रमोद यादव

समझ नहीं आ रहा- किस तरह मैं खुद को अभिव्यक्त करूं? अपने समूचे व्यक्तित्व और कृतित्व को ज्यों का त्यों प्रगट कर पाना मुमकिन नहीं. बचपन ठीक ही था,अभावों में नहीं बीता किन्तु कोई ज्यादा उन्नत रहन-सहन भी न था. उन दिनों जीवन का जो लक्ष्य निर्धारित था, वह था-एक नेक इंजीनियर बनने का...

मैट्रिक में अच्छे मार्क्स थे इसलिए चयन भी हुआ पर वक्त के तेवर ठीक न थे, बी.ए. की डिग्री से संतोष करना पड़ा.

सत्तर के दशक में घर पर फोटोग्राफी का माहौल शिखर पर था. कैमरा, लेंस, इन्लार्जर, फ्लड-लाईट्स, डेवलपिंग-प्रिंटिंग, आदि से सहज सामना हुआ. पढ़ाई के साथ-साथ कैमरे की आँख से जीवन के विविध आयामों को देखना शुरू किया तो सब बड़ा ही रोचक लगने लगा. तस्वीरें जब अंचल के ख्यातनाम अखबारों और पत्रिकाओं में छपते तो एक खुशनुमा अनुभूतियों से मन भर जाता. तस्वीरों के साथ फिर शब्द भी जुड़ते गए और यूं लिखने-पढ़ने का सिलसिला चल निकला.

फिर ‘हाबी’ के अनुरूप ही नौकरी मिली . सन 1980 में एशिया के सबसे बड़े स्टील प्लांट ‘भिलाई स्टील प्लांट’ में फोटोग्राफर नियुक्त हुआ. श्वेत-श्याम से लेकर रंगीन चित्रों के दौर को देखा फिर फिल्म कैमरे के बदलते स्वरुप डिजिटल कैमरे के अद्भुत दौर को भी अपनाया और बड़े ही सुकून के साथ 2012 में सेवानिवृत हुआ.

सैकड़ो कथा-लघुकथा और व्यंग विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए. अनेक वेब-मैगजीनों में भी लिखता रहा. पिछले महीने ही पुस्तक बाजार डॉट काम से एक ई-बुक प्रकाशित हुआ है - ‘नेता के आँसू’ जो व्यंग्य-संग्रह है..

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बैकग्राऊंड फ़ोटो श्रेय- श्री प्रमोद यादव