... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

लेखक परिचय

प्रत्यूष गुलेरी

9 जून, 1947 को गुलेर  जि़ला कांगड़ा हिमाचल प्रदेश में राजपुरोहित कीर्तिधर शर्मा गुलेरी के जन्म। हिंदी के अमर कथाकार चंद्रधर शर्मा गुलेरी के वंशज होने का गौरव। चचेरे दादा थे।

पिताजी की निजी पुस्तकों की अल्मारी से गुलेरी जी की अमर कहानियां व प्रेमचंद की बहुत सारी कहानियां मानसरोबर से लड़कपन में पढ़ लीं

उपन्यास चंद्रकांता संतति और भूतनाथ भी उल्टे पलटे पर उनमें मन नहीं रमा।

अग्रज पीयूष गुलेरी को लिखता देखकर मैं और अनुज गिरिधर योगेश्वर भी उसी राह पर चल पढ़े।पहली कहानी जो अब याद आता है पिता के चचेरे भाई शशिधर शर्मा के अचानक  गुजर जाने पर लिखी आठबीं में पढ़ते। उन्हें हम शशि भापा बुलाते थे। उनसे हम बच्चे बेहद प्यार करते थे।

मैट्रिक व प्रभाकर करते हुए अन्य कथाकारों में जैनेंद्र, अश्क, जयशंकर प्रसाद, मोहन राकेश, रांगेय राघव और यशपाल आदि की कहानियों ने भी आकार्षित किया।

जालंधर से छपने वाले दैनिक पत्रों व होश्यारपुर से छपने वाली पत्रिकाएं विश्वज्योति में प्रारंभिक कहानियां छपने पर उत्साह बढ़ा। अध्यापकी में प्राईवेट पढ़ते हुए एम ए, पी-एच.डी की और कालेज़ में पढ़ाना शुरु कर दिया।

1980 में स्मृति" नाम से कहानियों का संपादन किया। फिर 1987 में" अपनी अपनी अनकही" कहानी संग्रह और 2005 में लौट आओ पापा" कहानी संग्रह छपे। कहानियां ओर लघुकथाएं जब देश की नामी पत्रिकाओं में छपने लगीं तो लिखने पढ़ने को और पंख लगे और नया आकाश भी मिला। पहचान मिलने से खुशी हुई। "भेड़", "अपनी अपनी अनकही", "लौट आओ पापा","उगे हुए पंख"और "अकथ कहानी प्रेम की"पत्रिकाओं में छप कर खास चर्चा का कारण बनीं।
अब यह लिखी कहानी "हम भी छड़े ही हैं" कोई नया प्रयोग तो नहीं पर यह ऐसी कहानी ज़रूर है जिसे बार-बार पढ़ने का जी करेगा। कहानी में प्रेम और रोमांस कभी कहानी को बासी नहीं होने देते।यही ऐसे तत्व हैं जो कहानी को जीवंत और शाश्वत बनाते हैं, ऐसा मेरा मानना है।प्रेम बासना नहीं उपजाता।प्रेम तड़पाता है उम्र भर के लिए।रुलाता भी है प्रेम।प्राप्त न होने पर भी अपने प्रिय की खैर मांगता है।हर उम्र के पाठक और सामान्य को तरंगित करता है।

मेरी हाल में लिखी दो कहानियों "अकथ कहानी प्रेम की"और"हम भी छड़े ही हैं" पर कोई फिल्म बनाने की सोचे तो चकित नहीं होऊंगा। दोनों कहानियों का नायक मेरे साथ-साथ है।
उस पर कहानी लिखना आसान नहीं था वह भी तब जब वह खुद भी कहानियां बुनता हो।सबसे बेहद खुश
वह होगा, मेरी मां सत्यावती गुलेरी व धर्मपत्नी कुसुम गुलेरी जो पहली श्रोता रही हैं।मेरी कोशिश कहां तक कामयाब रही है यह तो सुधी पाठकजन जानें।पढ़ाने का सफ़र बहुत पहले समाप्त हो चुका है,पर लिखने-पढ़ने का सफ़र जारी है तब तक जब तक प्राण हैं।
पुरस्कारों में साहित्य अकादेमी का"भाषा सम्मान"2007, उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान का "सौहार्द सम्मान"2015 व हिमाचल अकादमी पुरस्कार 1996 प्रमुख हैं।

आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन में न्यूयार्क में प्रतिभागिता स्मरणीय!