... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

लेखक परिचय

सुशील यादव

                                             आदमी कुछ भूलता नहीं.....

 

      एक देहात नुमा शहर अपना नया आकार ले रहा था. दुर्ग शहर से दस किलोमीटर के फासले पर भिलाई की जमीन में स्टील प्लांट की नीव रखी जा रही थी तब उम्र लगभग आठ -दस साल की थी.

उन दिनों  पालक का बच्चों पर निगरानी - पास कहीं खेल रहा होगा - के हिसाब से, नहीं के बराबर होती थी. तब हमउम्र लड़को के साथ पैदल लंबी-लंबी सड़के नाप लिया करते थे. जेब में दुअन्नी भी नहीं होती, और दो आने वाली फ़िल्म की लंबी लाइन को  गौर से देखा करते. हमारे  कस्बे-नुमा शहर में भारी तादात में ‘रशियन’, जिनके सहयोग और देखरेख में  स्टील प्लांट का काम चलता था, गले में कैमरा लटकाये घूमते थे. सब्जी मार्केट में उन गुलाबी चेहरों को साबुत  गाजर-मूली को खाते देखते तो उनके गोरे होने का कुछ अंदाजा बाल-मन में घर कर बैठता.  घर में वही फरमाइश करते तो महीने में दो एक बार बाबूजी ला देते. मूली के तीखेपन को चखते ही  रशियन को लानत भेजते, पता नहीं वे कैसे खाते हो. वे हेल्थ कांशस  रहे हों, इसका इल्म अब जाकर हुआ. वे फोटो खींचने में माहिर ... हम किसी न किसी बहाने उनको प्रोवोक करते कि उनके किसी क्लिक में आ जाएँ. पता नहीं रूस में किस जगह फिकी होगी उस दौरान की हमारी तस्वीरें?

स्कूल जाने के दिनों में घूमने की आजादी के साथ 'एक सायकल' कभी-कभार  जुड़ जाता. घर में पांच-छह लोगो के बीच एकलौते सायकल का होना फक्र का सबब था. किसी सन्डे बड़े भाई को  जब सायकल को धोते, हवा भरते और आइल देने के उपक्रम में देखता तो हमे पता चल जाता कि वे भिलाई पिक्चर जाने की जुगाड़ में हैं. हम घर में बता देंगे की आड़ में पीछे पड़ जाते, वे  दोस्तों सहित हमे शामिल कर लेते. पिक्चर देख के आओ और स्टोरी किसी को न सुनाओ, ये बात उन दिनों हजम नही होती थी लिहाजा ट्रेलर बताते -बताते कब पिक्चर देख लेने की पोल खुल जाती पता नहीं चलता. जो डांट पड़ती तो दुबक के किताबे खोल लेते.              

उन बेफिक्री के दिनों में ज्यादा पढाई सिर्फ डांट खाने की वजह से हो पाती थी. ये तो अच्छा रहा कि खूब उधम किये, खूब डांट पड़ी और कुछ पढ़ लिए.

पढाई में उन दिनों लगता रहा, कोई कॉम्पिटीशन नहीं था . हम लोगो का एम्बीशन घर की माली हालत को देखते हुए, एवरेज रहता. टीचर पिताजी और तीन भाइयों का उसी लाइन में एक के बाद एक चले जाना, हमारे प्रेरणा स्रोत के जनक बनते जा रहे थे. ग्रेजुएशन करते समय कुछ तरक्की पसन्द दोस्तों की संगत मिल गई जिसने सोचने की दिशा को मोड़ सा दिया. अनेक में से एक ने खुल कर चुनौतियों से जूझने, अपने आप को हर जगह साबित करने और जो हक़ है उसे छीन के लेने का मन्त्र सा फूंक  दिया. बृजमोहन तुझे आज बरसों बाद याद कर रहा हूँ. क्षमा.

उसने पढ़ने का हुनर दिया. हमने अपना फार्मूला फिट किया,अक्टूबर तक खूब मस्ती, फिर प्रतिदिन टेबल में बैठने का अभ्यास ... पहले दिन आधा घण्टा, फिर  पीछे हर दिन केवल पाँच मिनट अभ्यास के दायरे को बढाना ... इस धुन ने कई दोस्तों की लाइफ स्टाइल में अहम रोल निभाया. खुद के लिए एक डायरी लिखी और ईमानदारी से अपने किये को लिखा. पूरा सिलेबस हर सब्जेक्ट को शुरू से आखिरी तक लाइन दर लाइन पढ़ा होता था. दोस्त रिजल्ट वाले दिन, जो किसी दूसरे शहर के अखबार प्रकाशकों से  घण्टों टेलीफोन  पर पूछताछ कर बताते थे. मुझे मेरा रिजल्ट जानने न देते. तू तो पास है, वाला लेबल चिपका देते थे.

      बेरोजगारी के गर्दिश वाले दो-तीन साल भी झेले. कुछ  जुगाड़, कुछ लक, कुछ इत्तिफाक से,  रोजगार दफ्तर से बुलावा आया. सेंट्रल एक्साइज में इंसेक्टर के पद पर चुन लिए गए. शहर का देहातनुमा चेहरा तब भी नहीं बदला था. किसी परिचित ने इस मोहकमे का नाम तब नहीं सुना था. तंबाखू से जुड़ा है, अल्बत्ता कोई ज्यादा पढा-लिखा इस विभाग की तस्दीक कर  लेता था.

      पढ़ने की आदत, सच कहूँ  तो गुलशन नन्दा के उपन्यासों से, इब्ने शफी की जासूसी कथाओं से आरंभ हुई. बेरोजगारी के दिनों में एक प्राइवेट आर्ट  कालेज की लाइब्रेरी में पार्ट-टाइम काम  मिला. वहाँ प्रिसिपल के लड़के को घण्टे भर साइंस सब्जेक्ट में पढ़ाना और  मुझे सिर्फ पढ़ना होता था. पसन्द की कई  चीजें वहां  पढ़ने को मिली.

 

    लिखने के दिन शुरू ही हुए थे कि सर्विस की वजह से न ज्यादा लिखा न छपवाया. बस विगत चार सालों में रोज जम के पढ़ा और लिखा. जिसकी बदौलत आज इस बायोपिक के कुछ क्षण लिखने बैठ गया. इस मुकाम तक पहुचने के लिए नेट को पूरा श्रेय देता हूँ.

इधर चार सालों में कादंबिनी, सरिता, मुक्त प्राची सरीखे स्थापित मैगजीन तथा गद्यकोश, रचनाकार, साहित्य शिल्पी, साहित्यकुंज, हिंदी समय, सृजनगाथा, वेबवार्ता जैसी मैगजीन में रचनाएं प्रकाशित हुई. नेट पर एक आन-लाइन किताब शिष्टाचार के बहाने श्री सुमन घई जी के सहयोग से पुस्तक बाजार डट काम पर प्रकाशित है.  

 

मुझे लगता है , साहित्य बिरादरी में पाँव रहने लायक मैंने थोड़ी सी जगह बना ली है.

 

 सुशील यादव

दुर्ग छत्तीसगढ़

RETD FROM VADOADARA,GUJ. AS DY. COMMISSIONER,

susyadav444@gmail.com