गनपत कई दिनों से पीछे पड़ा था, गुरुदेव हमको भी कुछ व्यंग्य–संग लिखना-पढ़ना सिखला दो| हम जो लिख के लाते हैं, आप उस पर नजर भी नहीं मारते?

मैंने कहा गनपत, व्यंग्य लिखना बहुत आसान है, इसमें बस ‘आत्म-चिंतन’ की जरूरत होती है, जो सामान्य दिखता है उसके उलट क्या हैं? परदे के पीछे का रहस्य क्या है? ये समझ लो, एक...

भरोसे का आदमी ढूढते मुझे साढ़े सन्तावन साल गुजर गए|कोई मिलता नहीं | मार्निग वाक् वालो से मैंने चर्चा की वे कहने लगे यादव जी....  'लगे रहो'.... | उनके 'लगे-रहो' में मुझे मुन्ना-भाई का स्वाद आने लगा | मैंने सोचा गनपत हमेशा कटाक्ष में बोलता है | उसकी बातों के तह में किसी पहेली की तरह घुसना पड़ता है |
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आसमान से गिरते हुए मैंने बहुतों को देखा है ,मगर किसी मुहावरे माफिक खजूर में लटका किसी को नहीं पाया ....| एक तो अपने इलाके में दूर-दूर तक खजूर के पेड़ नहीं ,दूजा आसमान को छूने वाले  आर्मस्ट्रांग  नहीं |
किसी काम को वाजिब अंजाम देने के लिए आर्म का स्ट्रांग  होना बहुत जरूरी साधन है ऐसा हमारे गुरूज...

September 29, 2019

वो भी खाने कमाने निकले 

सौ- सौ जिनके  ठिकाने निकले 

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हवा बदनाम वही करते जो  

लगा कर आग  बुझाने निकले 

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जितने सौदों में हाथ लगाते 

उनके कई फसाने निकले 

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रिदा अभी ये खूब चलेगी 

पैबन्द जरा लगाने निकले 

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नाकामी से वे क्या घिरते 

कामयाब घराने निकले 

#

पांच साल की जिन्दा कौमे

गली-गली चिल्लाने निकले 

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