... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

अरुणा ताई, यह नाम आज शहर में किसी परिचय का मोहताज नहीं था। वह आज इतनी बड़ी राजनैतिक दल की फायरब्रांड लीडर कहलाती थी। वैसे उन्हे फायरमाऊथ कहना ज़्यादा उचित लगता। ज़ाहिर है उनकी ज़बान आग उगलती थी। और यही आग बढ़कर लोगों के दिलों में पहुंचती। और लोग इससे चार्ज हो जाते। नौजवान इनसे खास प्रभावित रहा करते। लेकि...

October 19, 2019

रोल-नंबर दस?

किसी अनजान आदमी को स्वाभाविक ही प्रश्न उठे कि मैं रोल-नंबर नौ भूल ही गया, टीचर को ठीक से गिनती भी आती नहीं! लेकिन मुझे या मेरे वर्गखंड के बच्चों को इस बात का जरा भी आश्चर्य नहीं हो सकता। क्योंकि आठ के बाद हमेशा दस नंबर ही बोलना था। नौ नंबर तो विक्रम का था। और उसका नंबर मैं बोलूं या ना बो...

ईश्‍वरी बाबू ने जब अपने नौकर को निकाला तो उसे एक तरह से सम्मान विदाई कह सकते हैं। बल्कि यही क्‍यों यह कहिए कि उसके पुर्नरोजगार की व्यवस्था करवा दी। नौकर कोई तेरह-चौदह साल का था। उम्र ज्यादा नहीं थी लेकिन शक्‍ल-सूरत से परिपक्व एवं कद-काठी में ज्यादा दिखता था। अब ये लोग ऐसे ही होते हैं। फिर उनकी बेटी...

October 16, 2019

मेरी जिन्दगी की सबसे ज्यादा प्रिय चीजों में,  बासी परांठा, दालमोठ-चाय और बालकनी का यह कोना शुमार है। जब भी मैं उदास होती हूँ या फिर बहुत खुश...... किसी से फोन पर बात करनी हो या चुपचाप ग़ालिब की ग़ज़ल आबिदा परवीन की आवाज़ में सुननी हो ....... मैं अपनी बालकनी के इसी कोने में आ दुबकती हूँ, फिर मुझे चाहिए ....

December 23, 2018

हर दिन जब मैं कॉमन गैराज में गाड़ी पार्क करता हूँ, अक्सर एक खिड़की पर जाकर मेरी नज़र टिक जाती है। वह खिड़की  हाउस नंबर 302 की रसोई या जिसे आज की भाषा में हम किचेन कहते हैं, की लगती है क्योंकि मुझे गैस का चूल्हा भी दिखाई पड़ता है। गैराज की सतह से किचन की सतह लगभग तीन सीढ़ी की ऊंचाई पर होगी इसलिए मुझे किचन...

     

      ‘मैं अमर होना चाहता हूँ और मौत को किसी सूरत में भी क़बूल नहीं करूँगा...’ वह अकसर अपनी दिली ख़्वाहिश का इज़हार करता.

      मैं उसकी बेतुकी बातों को हंसी में उड़ाते हुए छेड़-छाड़ के लहज़े में जवाब देता - ‘अगर तुम अनश्वर दुनिया की ख़्वाहिश रखते हो तो आबे-हयात...

दिव्या अपनी अलमारी में काफी देर से कुछ ढूंढ रही थी कि शिखा ने आवाज दी.

"सुबह से क्या ढूंढ रह हो? क्या खो गया है?

"माँ आपने मेरी हिस्ट्री की किताब देखी क्या?,काफी दिनों से ढूंढ रही हूँ, मिल नहीं रही है.”

"अरे तुमने ही रखी होगी ,मुझे तो तुम अपने कमरे में आने ही नहीं देती.”

दिव्या गुस्से से – “ओके थैंक्स!...

 चिड़िया की चहक वाली कॉल-बेल की आवाज़ मेरे मन में एक रस-सा घोल जाती थी - कोई आया  के शब्दों से मेरा अंतर भी चहक उठता था. ऐसा नहीं था की मुझे किसी विशेष का इंतज़ार होता हो. यह बेल तो बस घर की नीरवता को भंग करती थी. इसीलिए मुझे उसके चहकने का इंतज़ार रहता. घर में था ही कौन - मैं, पापा व हमारा पुराना नौकर र...

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