... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

ई-मेल में सूचनाएं, पत्रिका व कहानी पाने के लिये सब्स्क्राइब करें (यह निःशुल्क है)

ज्योति-पर्व दीवाली

सांझ ढली दीप जले आया है ज्योति-पर्व/

दियना जलाओ री, आओ सखि आओ री//

स्वर्ग और नर्क की दुहरी दण्डनीति हिन्दू जन-मानस को कर्म के पथ पर हमेशा ही अंकुश लिए साधती रही है. जिजीविषा भोग-लिप्सा का ईंधन बनकर हमारी बुद्धि

को ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए सदियों से उद्दीप्त करती रही है. इन सबके बीच या...

किस्सा उस समय का है जब शहर ने अंगड़ाई नहीं ली थी. बस अपने में सकुचाया और सिमटा हुआ रहता था. ठण्डी सड़कों में जगह जगह झरने बहते, जहां स्कूली बच्चे और राहगीर अंजुली भर भर पानी पीते. मुख्य बाजार में बहुत कम आदमी नजर आते. गर्मियों में गिने चुने लोग मैदानों से आते जिन्हें सैलानी नहीं कहा जाता था. कुछ मेमें...

शरद भार्गव ने भीतर की दुनिया अचानक जगमगा उठी. इंतज़ार का एक असमंजस जो वह पिछले चार दिनों से झेल रहा था वह एक खुशनुमा हलचल में बदल गया. उसके हाथ में अभी अभी कुरियर से आया एक लिफाफा था, जिसने उसे यकायक जयपुर से उधमपुर पहुंचा दिया था...

लिफ़ाफ़े में ‘बनिहाल क्लब’ का पत्र था, यानी वहां उसे बतौर विशेष अतिथि...

इस लिये समाज के लोग अगर अलग आवाज़ों में बात करें तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है.आए दिन लोग अपने पक्ष की बात सामने रखते हैं, बड़ी सरगर्मी से, दिल की गहराईयों से अपनी बात निकाल कर पेश करते हैं, ज़ोरों-शोरों से, हथेलियाँ ठोंक-ठोंककर ...

फिर भी बस अपना दृष्टिकोण बताते हैं. सही हैं या ग़लत, ये सवाल उठ...

Please reload

eKalpana literary magazine

​​Contact & Social Media -

ekalpanasubmit@gmail.com

सभी रचनाएं
ekalpanasubmit@gmail.com पर भेजें
Please reload

Please reload