... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

मैं नजीब । बैठा हूँ। आख़री सड़क के आख़िरी छोर पर जो एक छोटा सा डब्बा जैसा कुछ दिख रहा है न। वहीँ। उसी डब्बे के अंदर,  कोने में। दुबककर। छिपकर। कोई छुए नही। ऐसे ही पड़े  रहने दें।

उम्र? 

सत्ताईस साल। अब तक नौकरी मिल जानी चाहिए थी। नौकरी की बेचैनी मुझे क्लास आठ से है। आख़िर नौकरी मिलना इतना मु...

सवालों की एक लम्बी फेहरिश्त है

जो तुमसे करने थे मुझे....

तबकी बार तुमने वैसा क्यों किया ?

और पिछली बार

अपनी बात से मुकर क्यों गए ?

पर बारी-बारी

एक--एक सवाल

टूटते गए

जैसे-जैसे तुम दूर हुए

सवालों के जवाब

ढूंढ लिए मैंने....

आज बैठा हूँ

बेहिस

अपने बुने हुए जवाबों के साथ

और तुमसे कुछ नहीं पूछना..... 

चंद्रभान,  जवाहरला...

रायपुर 17 अप्रैल विश्व मैत्री मंच की छत्तीसगढ़ इकाई द्वारा आयोजित वार्षिक अधिवेशन समारोह पूर्वक संपन्न हुआ। नगर के प्रमुख हस्ताक्षर कवियों की उपस्थिति में वरिष्ठ व्यंग्यकार, सद्भावना दर्पण (त्रैमासिक पत्रिका) के संपादक गिरीश पंकज, वरिष्ठ लेखक छत्तीसगढ़ मित्र (त्रैमासिक पत्रिका) के संपादक डॉ सुधीर शर...

जी चाहता है,रख लूँ संजोकर तुझे भी बिटिया

शब्दों में छिपे अर्थ, और

अपनी कविता, कहानियों में गुँथे

भाव और विचारों की तरह।

किन्तु, डरने लगती हूँ यह सोचकर,

नहीं रह पाएगी वहाँ भी सुरक्षित तू

क्योंकि, अब तो विचार ही नहीं

शब्द भी चुराने लगे हैं लोग।

नहीं रख सकती वन-उपवन में छिपाकर तुझे

क्योंकि, कलियों को भी तोड़कर श...

ज़िन्दगी

लंबी साँस है

हवा को सीने में देर तक 

क़ैद करना 

साँसों के दरम्यान 

यादों की 

सुन्दर सी बुनाई 

कभी ठहाका 

कभी मुस्कराहट 

या कभी साँस छोड़ते हुए 

लंबी सी आह !

ज़िन्दगी 

आँखों में तालाब 

बसा लेना है 

ज़िन्दगी 

लमहात को स्पर्श कर पाना है 

ज़िन्दगी 

बेबयाँ  हैं 

कई बार शब्दों से परे है।

चंद्रभान,  जवाहरलाल नेहरू व...

नदी के किनारे

सबेरे सबेरे

ताज़ी  हवा को सीने में भरते हुए

टहलना चाहता हूँ

जीना  चाहता हूँ....

फिर से

बगीचे में

सूखे पत्तों पर

नंगे पाँव

फुदकना चाहता हूँ

घर लौटकर

माँ के  आँचल में दुबकना चाहता हूँ...

फैलना चाहता हूँ

आसमान के ओऱ तक

खेतों के अंत तक

पीपल के पोर पोर में

नदी में घुल जाना चाहता हूँ

हवा बन जाना चाहता हूँ

कई ब...

खाली नींद 

तैर रही 

कासा-ए-निग़ाह में....

इक नींद का वादा  दे दो 

कि अगला ख़्वाब 

मुझ अकेले का न हो 

मैं 

तुम 

सब 

शामिल हों (चंद्रभान)

(कासा=कटोरा )

चंद्रभान,  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के इतिहास अध्ययन केंद्र में प्राचीन इतिहास के शोधार्थी हैं।...

स्वप्न बेचने वाला एक दिन आया एक छोटी नगरी में

सुन्दर - सुन्दर स्वप्न भरे हैं बोला मेरी गठरी में

गली - गली आवाज़ गयी और लोगों ने उसे घेर लिया

लोगों में कौतूहल था – क्या बात सत्य है कुँजड़े की ?

भीड़ इकट्ठी देख देखकर कुंजड़ा मन में हरषाया था

स्वप्न बेचने का अवसर उसने इस नगरी में पाया था

उत्सुकतावश एक व्यक्ति ने...

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