... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

योजना है नगर विन्यास की

गांधी पुतले के चारों तरफ

बाउंड्री डाल

अजायब घर के शिलान्यास की

वैसे

अजीब है

पूरा ये शहर

फिर क्या जरूरत

बने यहां अजायब घर ....?

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कुछ ज़िंदा नमूने,

तरह-तरह

विषैले साँप,

जो डसते नहीं

बस काटते हैं

ख़ास मौको पर

फुफकारते ,

डांटते हैं

बतौर उदाहरण ये

अधिकारी कहलाते हैं

ढोल ....नाकामी के

सरकारी अनुदान पर...

बाबाओं के नाम से देखो , कैसे सबको लूट रहे ।

भर चूका है पाप का घड़ा, अब तो भांडा फूट रहे ।

भोली भाली जनता को , अपने वश में करते हैं ।

अपने को भगवान बताकर, अपनी जेबें भरते हैं ।

लच्छेदार प्रवचन देकर, लोगों को खूब रिझाते हैं ।

गुरु मंत्र का नाम बताकर, अपनी जाल बिछाते हैं।

आलीशान बंगलों में रहकर, बाबा का ढोंग...

August 29, 2017

आज हम है कल तेरी बारी आजाने को,

तब लोग नही होंगे, यह बात बताने को।

हम अपनी शौहरत में मगरूर है,

नहीं मानते यह बात समझाने को।।

इन्सानियत ही धर्म है,

और क्या धर्म है बतलाने को।

पूरी-पूरी रात गरीबी में,

बहुत कम वस्त्रों में घूमती स्त्रियाँ देखी है हमने।

शोर क्यों मचाते हो,

शौहरत की खातिर दो कपङे उतारे जाने को।।

इ...

आकाश में लय होती रोशन

चंद्रमा की वो शीतल चांदनी

संगीतमय बजती हुई बांसुरी

बादलों की वो पावन रागिनी

कानों में गूंजती मधुर विणा वादिनी 

रात्रि के पहलू में मुझे समेट जाती है

फिर मुझे पल पल तेरी याद आती है

मेरे अंतर्मन को भीगा जाती है

हृदय की गति जैसे और तेज़ बढ़ जाती है

पल पल मुझे तब यूँ तड़पाती है

तेरी जिव्हा पर जब...

हम ना जाने क्यूँ  हरे-भरे, ये वृक्ष न बन सके 

मानवता में हम इनके, समकक्ष न बन सके

पत्थर के बदले फल देते, फकीर संत न बन सके

विष पीकर श्वासामृत देते, नीलकंठ न बन सके  

किसी जीवन के पतझड़ में, बसंत न बन सके

और प्यार के फूलों का, मकरंद न बन सके

जलती उजाले में ढलती, शमा न बन सके

और किसी मासूम भूल की, क्षमा...

अरे बावरे
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भौर सुहानी
कहे कहानी


सुखी रहे
हर इंसानी
सूरज सबका
चंदा सबका
बाँट न सकते
हिस्सा नभ का
छोड़ जायेगा
तोड़ जायेगा
बंधन सारे
अरे बावरे...
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जो खेता है
बिन पानी के 
नाव हमारी
कभी विचारी
खोजा उसमें
जिसमें लय सब
समझेगा कब
तेरा जीवन 
कृपा है उसकी
हर पत्ता हिलता
कृपा से जिसकी
आस पास ह...

वो उस आईने की तरह

मेरे कमरे में रहता है...

जहाँ भी जाऊ मुझे देखता है...

मैं हंस दूँ तो वो भी हंस देता है...

और रो दूँ तो उसकी आँखें भी भर आती हैं...

जो कभी खामोश रहूँ...

तो चुप चाप मुझे ताकता है...

और जो मैं उससे मुह फेर लूँ...

तब भी मुझे देखता रहता है...

बड़ा अनोखा सा नाता है उससे...

जैसे भी मैं चाहुँ वैसे रह...

एक पाठशाला का वार्षिकोत्सव था। मैं भी वहाँ बुलाया गया था। वहाँ के प्रधान अध्यापक का

एकमात्र पुत्र, जिसकी अवस्था आठ वर्ष की थी, बड़े लाड़ से नुमाइश में मिस्टर हादी के कोल्हू की

तरह दिखाया जा रहा था। उसका मुंह पीला था, आँखें सफेद थीं, दृष्टि भूमि से उठती नहीं थी।

प्रश्न पूछे जा रहे थे। उनका वह उत्तर दे र...

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