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मैं हूँ एक मील का पत्थर

जीवन-पथ का अटल साक्षी, मैं हूँ एक मील का पत्थर 

देख रहा जीवन-धारा को, जाने कब से बैठा तट पर

मैं हूँ एक मील का पत्थर

रात और दिन के पंखों से, उड़ते हुए समय को देखा 

जाने क्या-क्या बदला पर ना बदली कुछ हाथों की रेखा 

कडवे सच से आँख मूँदकर, सिर्फ ऊपरी चमक-दमक को

जाने क्यूँ समझे विकास के,...

किआ करूँ -डा अमरजीत टांडा

क्या करूँ अकेला हूँ न तेरे बग़ैर
उल्फत-ए-जीस्त थी एक
वो भी खो बैठा हूँ यहीं कहीं-
अब अरमाँ-ए-उम्मीद के साथ मुहब्बत को सुलाया है-
लाश सी बन गई है परछाई-ए-मंजिल -

नाशाद-ए-शाम रोये तो किस के गल लग कर
गुलशुदा शम्मा में कब आती है रक्स-ए-उमंग

सीने की परतों में कोई याद सी तो है
मग़र सु...

दो पुरुष थे. दोनों ही आपस में घनिष्ठ मित्र थे. दोनों ही शादीशुदा थे और उनकी पत्नियां भी आपस में मित्र थीं. उन सभी का एक दूसरे के घर में आना-जाना था.

दोनों पुरुष अलग-अलग ऑफिस में कार्य करते थे, परन्तु दोनों बिना नागा शाम को मिला करते थे. एक दूसरे से सुख-दुःख की बातें करते और फिर अपने-अपने घर चले जाते.

...

इतना अँधेरा था रात तेरा चेहरा दिखाती रही
ग़म-ए-काँटे इतने तेरी याद फिर सताती रही

मंजिल आवारा सी थी दिल ढूँढ़ते ना मिले
चुप चाप ऐसी में बादल-ए-चुनड़ी उड़ाती रही

बेबाक थी आग जली मेरी चिखा में शाम ढले
अहद-ए-मफहूम खड़ी दूर पवन जलाती रही

लोग बना लेते हैं उम्र-ए-मकान महीनों में
उम्र भर वो खामोशी-ए-महल बनाती रही

शो...

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