... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

धधक रही है किसकी छाती ,आक्रोश में कौन उबला  है

कौन पसीना गिरवी रखता ,किसका खूँ दिनरात जला है

वो किसान जो खेत- खलिहान ,लेकर आता है हरियाली

तब मनती है गाँव-शहर में ,होली  ईद और  दीवाली

उसमे  ईश्वर  भगवान वही  ,अन्न सब को उपलब्ध कराता

एक निवाले की खातिर तो ,बंधा रहता रिश्ता -नाता

एक निवाला खा...

 

हाँ आज मैं निराश हूँ 

हताश हूँ... उदास हूँ... 

लोगों की हंसी का पात्र हूँ 

क्योंकि मैं बेरोजगार हूँ !

मेरी असफलताओं का रोज-रोज मजाक बनता है 

अपने-परायों से 

खाता हूँ तरह-तरह के ताने... 

उलाहने... 

मेरी पढ़ाई-लिखाई की डिग्रियां 

अब महज रह गईं हैं कागज के टुकडे 

और इनके साथ ही मेरे सपने हैं सिकुडे |

किन्तु मैं...

मामूली हैं मगर बहुत खास है...
बचपन से जुड़ी वे यादें
वो छिप  छिप कर फिल्मों के पोस्टर देखना
मगर मोहल्ले के किसी भी बड़े को देखते ही भाग निकलना
सिनेमा के टिकट बेचने वालों का वह कोलाहल
और कड़ी मशक्कत से हासिल टिकट लेकर
किसी विजेता की तरह पहली पंक्ति में बैठ कर फिल्में देखना
बचपन की भीषण गर्मियों में श...

    दंगा अपने पूरे शबाब पर था. सरकारी दफ़्तर, इमारतें, गाड़ियां धू धू कर जल रहीं थीं. दुकानों पर ताले पड़ गये थे. बाज़ारों में सन्नाटा पसरा था. सड़कों पर जली हुई सरकारी बसों के टायर टहल रहे थे और कार-मोटरों के परखच्चे मंडरा रहे थे. भले ही कर्फ़्यू का ऐलान हो चुका था, फ़िर भी पुलिसिया गश्त, लाशों के सड़ते गो...

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