... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

वक्त भी कितना अजीब होता है...

ये उसको भी बदल देता है,

जो दिल के सबसे करीब होता है.

कभी बिन मांगे दे देता है सब कुछ,

कभी मांगकर भी कुछ न नसीब होता है.

वक्त भी कितना अजीब होता है...

दिन का उजाला हो या रात का अंधेरा,

हर घड़ी, हर पहर होता वक्त का पहरा,

जिसे चाहते हैं दिल से उसका अलग ही होता है रैनबसेरा,

इस रंग बद...

कुछ चेहरे होते हैं ऐसे जो नजरों से उतर जाते हैं,

बंदिशों की बेड़ियों की तरह दिल में घर कर जाते हैं.

भूलना चाहे मन उन्हें फिर भी जहन से मगर कहाँ जाते हैं,

नाम भी नहीं लेते उनका फिर भी नजरों के सामने आ ही जाते हैं.

कुछ चेहरे होते हैं ऐसे जो नजरों से उतर जाते हैं,

बंदिशों की बेड़ियों की तरह दिल में घर कर जाते...

वैज्ञानिक परेशान थे। यान दुल्हन की तरह सज धज कर चांद पर जाने को तैयार था, पर उन्हें यान में चांद पर किसे भेजा जाए, ऐसा महापुरुष ढूंढे नहीं मिल रहा था। उन्होंने उन देशों की सरकारों से भी संपर्क किया जिन्होंने अपने बंदे अपने यान में चांद पर भेजे थे। पर उन देशों की सरकारों ने हमारी तकनीकी पर अविश्वास क...

(ताटंक छंद)

देख रही है बैठी चिड़िया,  कैसे अब रह पायेंगे ।
काट रहे सब पेड़ों को तो , कैसे भोजन खायेंगे ।।

नहीं रही हरियाली अब तो , केवल ठूँठ सहारा है ।
भूख प्यास में तड़प रहे हम , कोई नहीं हमारा है ।।

काट दिये सब पेड़ों को तो , कैसे नीड़ बनायेंगे ।
उजड़ गया है घर भी अपना , बच्चे कहाँ सुलायेंगे ।।

चीं...

पसीना झर रहा झरने की तरह 

जिस्म तर, कपड़े हैं तर 

दिन को मक्खियां 

और रात को मच्छर 

कैसे सहें इस उमस का कहर ?

अमीरों ने लगाईं एसियां घरों में 

लेते मजे गर्मी में सर्दी का 

पूछो रामू से, श्यामू से 

कैसे गुजरती हैं रातें उमस भरीं ?

खड़ा था धनुआ मालिक के पास 

आ रही थी जिस्म के मैल की बू 

मालिक गुर्राया, दूर खड़े...

एक दिन मैं

जैव-खाद में बदल जाऊँ

और मुझे खेतों में

हरी फ़सल उगाने के लिए

डालें किसान

एक दिन मैं

सूखी लकड़ी बन जाऊँ

और मुझे ईंधन के लिए

काट कर ले जाएँ

लकड़हारों के मेहनती हाथ

एक दिन मैं

भूखे पेट और

बहती नाक वाले

बच्चों के लिए

चूल्हे की आग

तवे की रोटी

मुँह का कौर

बन जाऊँ

———————-0———————

 सुशांत सुप्रिय

A-5001 ,

गौड़ ग्रीन...

कामगार औरतों के

स्तनों में

पर्याप्त दूध नहीं उतरता

मुरझाए फूल-से

मिट्टी में लोटते रहते हैं

उनके नंगे बच्चे

उनके पूनम का चाँद

झुलसी रोटी-सा होता है

उनकी दिशाओं में

भरा होता है

एक मूक हाहाकार

उनके सभी भगवान

पत्थर हो गए होते हैं

ख़ामोश दीये-सा जलता है

उनका प्रवासी तन-मन

फ़्लाइ-ओवरों से लेकर

गगनचुम्बी इमारतों तक के

बनने...

फटे-पुराने चिथड़े कपड़े, काली होती चमड़ी, आंखों में कीचड, पैरों में बिवाइयां। उसका यही रूप था। वो एक भिखारी था जो रुपा के घर के बाहर खड़ा, आर्द्रस्वर में बार-बार, निरीह स्वर में कह रहा था, ‘‘माई ! कुछ खाने को दे दो। कई दिनों से भूखा हूं। तेरे बाल-बच्चे जिएं माई।’’ कहकर वो याचना भरी निगाहों से द्वार की ओ...

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