मिस्टर रमन अग्रवाल लगभग तीन वर्ष बाद अपनी कम्प्यूटर लैब से बाहर आया। सारी रात वह सोया भी नहीं था। फिर भी उसका चेहरा एक अभूतपूर्व सफलता से दैदिप्यमान हो रहा था। उनके पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। तीन वर्षों से वे अपनी खोज में इस प्रकार डूबे थे कि घरवाले उसे सनकी समझने लगे और बाहर के लोग पागल। उनकी बढ़ी...

कभी कभी मन में आता है कि, शांति से पूछूं तुमसे हे भगवान,

हम तो चला रहे थे ज़िन्दगी, कर के बस जैसे तैसे काम,

कुछ गलती हो गई क्या हमसे, कि तुम तो रूठ ही गए भगवान,

बता दीजिये सीधे से कि चाहिए क्या तुमको भगवान..

कहीं कोरोना का क़हर, कहीं अम्फन का त्राहिमाम,

एक तरफ टिड्डो से बचें, तो एक तरफ भवंडर निसर्ग महान,

एक...

घर छोड़ के निकले थे तुम, कुछ काम और नाम बनाने को,
शहर ने बेवक़्त बेबस कर दिया तुम्हे, अपनी किस्मत आज़माने को..

अब घर सुरक्षित जल्दी पहुँचो, वापिस कतई ना आना,
शहरी ज़रूरतमंदो को, अपना हुनर फिर ना दिखाना..

ना छोड़ना अपने परिवार को, किसी और के भरोसे,
नहीं मिलता शहर में कोई, जो प्यार से खाना भी परोसे..

गाँव है...

चलते चलते रुक गया मैं,

रास्ते के पिछले मोड़ पर कुछ आहट सी आ रही थी शायद..

दिन के सन्नाटे में वह मील का पत्थर कुछ कह रहा था,

उसने कई दिनों से कोई हलचल नहीं सुनी थी..

ना कोई गाड़ियों की थरथराहट,

नाही किसी सूखे पत्ते की चरचराहट,

ना कोई बच्चो की टोली,

नाही कोई पंछी की बोली,

ना सामने के खेत में कोई किसान,

ना कोई बर...

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