यदि हम बच गए 

तो भी क्या वाकई बचे रह पाएंगे

मंच पर मृत्यु का दृश्य सजा है 

एक-एक कर कम होते जा रहे 

कांधा लगाने वाले और रोने वाले भी 

गिनती के पात्र हैं और नेपथ्य में सूत्रधार

नाट्यशाला के दर्शक भी तो 

एक-एक कर लुढ़क रहे देखो 

मौत का डर हर तरफ है

भूख से या बीमारी से 

दोनों हालात एक जैसे हैं

जीवित लोग जिनके घरों...

तुमने पूछा तो यूँ पाँव थम से गए 

हम तो चलते रहे मगर अब थक गए 

पहले भी  करते थे कितना सफ़र

राह में मुश्किलें आ ही जाती थीं 

पांव ज़ख्मी हुए, धूप भी लग रही

प्यास भी लग रही, भूख भी लग रही

हाँफते-हाँफते, फिर भी चलते रहे

ये सफ़र खत्म हो या कि हम न रहें

हम जिन्हें अब किसी को ज़रूरत नहीं

कितना बेकार सा है हमारा वजूद 

ज़ि...

यह छप्पन साल का इंसान जो आज 

पढ़ रहा है, लिख रहा है, सुन रहा है 

उसे तुमने आकार दिया था माँ वरना

ज़माने में इतनी मुहब्बतें कहाँ मिल पातीं

मैं तुम्हारी चाहतों का मुजस्समां हूँ

चाहूँ फिर भी कड़ुवाहटें दूर भागती हैं 

कितनी शीरनी भर दी थी तुमने मुझमें

अदब-आदाब, लबो-लहज़ा सभी कुछ

तुम्हीं से मिला, तभी तो जो बयान करता...

आँखें नहीं देख पातीं दूर की चीजें

बेशक दूर में रौशनी भी है और जीवन भी

आँखों से दीखता है सिर्फ अगला पग

उसके बाद फिर अगला पग 

इससे ज्यादा देखने से दुखती हैं आँखें

जिस्म से ज्यादा दुखने वाली आंखों का सच

पथराई पिंडलियाँ और लहूलुहान तलवों को पता है

हर बार लगता है हिम्मत देगी जवाब 

हर बार कम होती है एक पग दूरी

मत...

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