... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

September 14, 2019

अपने शहर में हिंदी पखवाड़ा पूरे उफान पर तो हिंदी में भी न लिखने वाला पूरे तूफान पर। 

अंग्रेजी की चपेट से जो हिंदी के लेखक जैसे तैसे बचे हुए थे, वे अब मनमाफिक हिंदी पाखवाड़े की चपेट में थे। जिस ओर मन हो रहा था वे उस ओर बह रहे थे। कविता के नाम पर जो उनका मन कर रहा था, पूरे होशोहवास में कह रहे थे।

 साल भर...

September 8, 2019

यह किस्सा उसके बाद का है जब अवैध धंधों और संबंधों के अनगिनत तमगों के विजेता इंस्पेक्टर मातादीन चांद प्रशासन के आग्रह पर उनके पुलिस विभाग में क्रांतिकारी सुधार लाने के इरादे से पुलिस सेवा आदान प्रदान कार्यक्रम के तहत अपनी सरकार द्वारा डेपुटेशन पर चांद भेजे गए थे और चंद दिनों में ही उन्होंने वहां के प...

वैज्ञानिक परेशान थे। यान दुल्हन की तरह सज धज कर चांद पर जाने को तैयार था, पर उन्हें यान में चांद पर किसे भेजा जाए, ऐसा महापुरुष ढूंढे नहीं मिल रहा था। उन्होंने उन देशों की सरकारों से भी संपर्क किया जिन्होंने अपने बंदे अपने यान में चांद पर भेजे थे। पर उन देशों की सरकारों ने हमारी तकनीकी पर अविश्वास क...

वे गुजरे तो युगों से बनी एक और परंपरा को तोड़ते गुजरे। अच्छा तो खैर उन्होंने किसीका सपने में भी नहीं किया था, पर अपना सब बुरा किया भी यहीं छोड़ गए पर साथ में मरते हुए बीवी का गिफ्ट दिया मोबाइल जरूर साथ ले गए ताकि बीवी का डर मरने के बाद भी उनमें बना रहे, कम से कम सात जन्म तक । इस उम्मीद के साथ कि तीन त...

 

बीजी के जाने से पहले हम छह सदस्य थे इस घर के। मैं, मेरी पत्नी, बाबूजी बीजी और दो बच्चे ,किट्टी और चीनू। यह घर बाबूजी ने ईंट ईंट सींच कर बनाया है, बीजी ने इस घर को बनाने के लिए पैसा पैसा दांत के नीचे दबा दबा कर जोड़ा है। घर बनाने के लिए दोनों ने पता नहीं अपने पेट को कितना मोसा होगा? डेढ़ साल पहले मैं...

December 5, 2017

पता नहीं कब इस जगह पर दो खड्डों का मिलन हुआ होगा?  यहां दो खड्डों का मिलन तो हो गया पर दो जातियों का मिलन आज तक नहीं हो पाया. घराटियों से कोस भर दूर होने के बाद भी  बजिए बजिए ही रहे और घराटी घराटी ही. साहस और दुस्साहस दोनों अपनी- अपनी जगह. जात की सीमाएं देशों की सीमाओं से भी कठोर होती हैं. कदम- कदम...

एक बार पुनः उनकी दया से नया- नया साहब बन कृतार्थ हुआ था।

इतिहास गवाह है कि आदमी अपनी लियाकत से कम, किसीकी दया से ही अधिक ऊपर उठता है। और कई बार तो इतना ऊपर उठ जाता है कि फिर नीचे मुड़कर नहीं देखता।  अगर फुर्सत में जरा गौर से सोचा जाए तो मालूम हो जाएगा कि  मेहनत पर दया हर युग में हावी होती रही है।  मेह...

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