दोपहर का समय था। संजय शुक्ला अपनी कुर्सी पर बैठे हुए पुस्तक पढ़ रहे थे। दोपहर के समय बैठक में अपनी आराम-कुर्सी पर बैठकर पुस्तक पढ़ना उनका शौक था। इसलिए आज भी वे अपने पाठक-धर्म का निर्वाह कर रहे थे। अचानक उनके कानों में एक परिचित आवाज ने दस्तक दी- ‘‘शुक्ला जी! नमस्कार।’’ सुनते ही शुक्ला जी के नेत्र आवा...

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