... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

October 26, 2019

रोशन करो तुम इस जग को इतना 

कोई दर तिमिर से ढका रह न पाए 

 दीपों की माला सजे द्वार सबके  

 अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए 

स्नेह से पूरित हो जीवन की बाती 

द्वेषों की आँधी बुझाने न पाए 

सुरीली हो सरगम सुप्रीत इतनी 

वितृष्णा के स्वर इसमें मिलने न पाएं 

निर्मल हो यह मन नदिया के जैसे 

सागर सा ख़ारा यह...

गुज़रे समय की
जो लकीरें रह गयीं 
आज भी आकर 
विगत की बन्द गठरी खोलकर 

भाव विव्हल चेतना को 
हैं जगा जातीं निरन्तर 

साज़ झंकृत हैं प्रणय के 
रागिनी बजती ह्रदय में 

गुज़रता प्रति पल समय 
ज्यों नीर सरिता बह रहा 
परछाई सुःख-दुःख देखता 
कद ज़िंदगी का घट रहा 
एक नन्ही कंकड़ी 
बिखरा गयी साया तलक़ 

नीर बहता ही गया
मिलन...


नील, पीत, हरित रंग 
हुलसित हिलोर संग 
होली के ढोल बाजें 
फागुनी बयार में 

कोयल की कूक मधुर 

मुदित मन उमंग आज 

पिचकारी तेज धार 
रंग की बौछार डार 
नाज़-नखरे छोड़ चली 
प्रिय को मलने गुलाल 

मन के गलियारों में 
धूम खूब मची आज 

मेघा भिगोए गए 
रात ही समूच धरा 
आनन्द विभोर हुई
चूनर छिटकाए हरा

टेसू के फूल खिले 
होल...

लोलुप्सा का मन सागर गहरा, सुषुप्त रही आध्यात्म की गीता 
धूल भरी आँधी सा यौवन,  चट आया और पट था रीता 
तेरी-मेरी करता सब जन, मोह-माया के जाल में फंसता 
इच्छाओं की गठरी भारी,  कुंठाओं का आँगन बढ़ता 

पतझड़ में ज्यों पात हैं झड़ते, तैसे ही जीवन का ढलना 
बुद्धि के वृत  वातायन से, झाँक रहा अंतर का को...

औरत

संघर्षों की पोटली को सर पर थामे 
माँ, बेटी और पत्नि की भूमिका निभाती 
सुःख-दुःख की परछाइयों को जीवन्तता से लाँघती 
साहसी औरत 
जो कभी,
रहती थी चारदीवारी में 
आज ! बन्द किवाड़ों को धकेल बाहर आ खड़ी है 

अपनों के सपनों को पल्लू में बाँधे 
कल के कर्णधारों को गोद में दुलारती 

अपनी मुठ्ठी में उनके भवि...

पाँखुरों से स्वप्न झरते, नेत्र अश्रु मेह बरसे 
भीगता है मन धरा सा, पर प्यास रहती है अधूरी 


चाह कर कुछ कह न पायी, पीर मन की मन रही 
अधर खुलते-फड़फड़ाते,
बात रहती है अधूरी

प्रेम सागर बह रहा, निरख तट पुलकित हुआ 
स्पर्श करती लहर उसको, पर आस रहती है अधूरी 


स्नेह नयना भर गए, मन प्रेम बाती जल उठी 
आसक्त है उसम...

प्रिय साथियों,

आज़ादी की सालगिरह पर 

अपना यह गीत आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ। 

सादर,

कुसुम वीर

kusumvir@gmail.com

​​

आज़ादी साकार करें  

​​उन वीरों के नाम आज हम 

धरती पर जाकर लिख दें 
जिनके शोणित से मिली हमें  
वह आज़ादी साकार करें  

आज़ादी की सालगिरह पर 
मन मेरा यह सोच रहा 
सत्तर सालों की...

औरत 

संघर्षों की पोटली को सर पर थामे 
माँ, बेटी और पत्नि की भूमिका निभाती 
सुःख-दुःख की परछाइयों को जीवन्तता से लाँघती 
साहसी औरत 
जो कभी,
रहती थी चारदीवारी में 
आज ! बन्द किवाड़ों को धकेल बाहर आ खड़ी है 

अपनों के सपनों को पल्लू में बाँधे 
कल के कर्णधारों को गोद में दुलारती 

अपनी मुठ्ठी में उनके भवि...

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