उसके गए आधा घंटा हो चुका था। मेरे अंदर का शोर, सैलाब बनकर उमड़ रहा था। दिल दुखों का समंदर बन चुका था। ऊबड़-खाबड़ ख्यालों से सिर भारी हो गया। मुहब्बत की जिल्द-दर-जिल्द रिसने लगी थी। उसकी ठोस मर्दानी आवाज पूरे घर में गूंज रही थी – “सुनैना ! बेबसी से मुहब्बत का दामन आबाद नहीं हुआ करता। मजबूरी मुहब्बत क...

January 2, 2017

प्रिय पाठकों! यह पीढ़ियों से उलझे व शोषित समाज की कथा है. यह एक ऐसी काली मिट्टी की कहानी है जिसकी कोख में अमृत भी है और विष भी. यह एक ऐसी कहानी भी है, जहाँ अतीत वर्तमान का रास्ता रोके खड़ा है. कहानी के अटपटेपन के लिए खुद कहानी और उसका समाज दोषी है. लेखक को दोषी न माना जाए.

बाबा साहेब की प्रतिमा के सा...

मचलते बादल और कुचलते अरमानों से तबाही का जो मंज़र खड़ा हुआ उसे बयाँ नहीं किया जा सकता. क्योंकि तबाही को बयान करने में मन भी तबाह हो जाता है. और हम खाए-पीए, अघाए लोग मन में ख्वाहिशों का समन्दर तो समेट सकते हैं मगर तंज का एक कतरा भी हलक को छील देता है और आखें छलछला जाती हैं.

तीन दिन की लगातार मूसलाधार...

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