धूल-भरे रास्ते उस पर जेठ की तिलमिलाती गर्मी को सहते, मजदूरों का कारवां बढ़ा जा रहा है, अपने गंतव्य की ओर। मजदूरों का ये कारवां अंत में चलते-चलते रुक जाता है, एक हरे-भरे बरगद के नीचे, जिसकी लाल-गुलाबी नवल किसलय मन को मोह रही थी। उसकी गहरे हरे पत्तों की घनी छाँव और आकर्षित करती लम्बी-लम्बी जटायें मानो...

                     

 दोपहर का समय, फिर भी हल्की-हल्की धूप खिली है। फाल्गुन का उत्सव, होली का दिन चारों ओर धूम-धम्क्कड़ ढोल-नगाडों के साथ नाचती-गाती युवकों की मंडली जोर-जोर से चिल्लाती –“होली है। - बु...

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