गाँव में मेरे घर के ठीक सामने गुलकंदी देवी का घर, इनके तीन बेटे नाती भरा पूरा परिवार था इनके यहाँ लकड़ी का काम होता था। कालांतर में बिजली का काम भी होने लगा था।

गुलकंदी देवी बहुत ऊंचा सुनती थी इसलिए हम सभी बच्चे उन्हें बहरी दादी ही कहते थे। बहरी दादी की उस समय उम्र रही होगी करीब पिचहत्तर, छिहत्तर, कद...

गाँव के समीप नाले की पटरी के ठीक किनारे एक खंडहर धर्मशाला थी, जिसे कभी शंकर नाम के ब्राह्मण ने बनवाया था। इस लिए उसे शंकर वाली धर्मशाला भी कहते थे। खँडहर मे सिर्फ एक  कोठरी ही बची थी जिसके ऊपर अभी छत थी। यह कोठरी मुश्किल से 10 फुट लंबी और 10 फुट चौड़ी होगी इसी मे रहते थे सन्यासी बाबा बृक्तानंद।

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