... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

एक चारपाई 
पर पड़े बिस्तर को 
इस तरह सहेज कर रखा है किसी ने 
जैसे बना दिया हो
कमरे में ही स्मारक कोई |

बिछी चादर 
पर पड़ी सिलवटें
सुना रहीं थी दास्ताँ 


किसी गुजरी 
सुनहरी चांदनी रात की |

दो आँखें 
ऐसी कातर नज़रों से 
एकटक निहार रही हैं
तकिये पर लगी 
लार की कुछ बूंदों के निशान !

जैसे 
अमृत की बूंदे 
गिर गय...

आज का पूरा वयस्क समुदाय एक प्रकार की बीमारी या यूँ कहें महामारी से ग्रस्त है | ये बीमारी है कुछ नया, कुछ अलग, कुछ हटकर करने की | और इस रोग को बढ़ावा देने का काम करती हैं सोशल नेटवर्किंग साइट्स | कहने को तो ये नेटवर्किंग साइट्स हैं पर इनपर होने वाली एक - एक पोस्ट उन किशोर - किशोरियों को चिढ़ाता है जिनक...

बाल दिवस पर ...

रोशनी और रोहित क्रमशः कक्षा ६ और ८ में पढ़ते हैं. आज भी अपने पापा की बाइक पर बैठ कर स्कूल जा रहे हैं. उनको बताया गया है कि आज स्कूल में फंक्शन होंगे और बच्चों के लिए मस्ती के कई आयोजन होंगे. रोज मुँह लटकाकर स्कूल जाने वाले दोनों बच्चों का चेहरा आज इतना खिला था कि उनको न तो आज जगाने की...

किस अदा से नवाजा है या रब तूने उनको,

के जख्म देकर पूछते हैं - हाल कैसा है ?

कुफ्र में ही हमने गुजारे हैं अपने दिन,

अब सोचते हैं तुझसे ये सवाल कैसा है ?

आशिकमिजाज़ी नहीं परवाज-ए-इश्क़ है,

हासिल हों वो हमें ये ख़याल कैसा है ?

सोहबत में रहे उनकी दो पल को आज फिर,

मयस्सर है उनकी क़ुर्बत फिर मलाल कैसा है ?

मेरा नाम न...

ऐ जिन्दगी !

जितना मुझको तू समझे है, उससे भी आसान हूँ मैं,

थोड़ा-सा परेशान दिखे हूँ, थोड़ा-सा परेशान हूँ मैं !!

न तुमसा चंचल-कोमल हूँ, न ही तुझसा महान हूँ मैं..

पर जितना मासूम दिखे तू , उतना ही नादान हूँ मैं !!

तेरे रस्ते, तेरी गलियाँ, कुछ दिन का मेहमान हूँ मैं,

राही हूँ; बस ये जानू मैं, मंजिल से अंजान हूँ म...

दीपावली करीब आ रही थी और बाज़ार में खरीददारों की भीड़ भी बढ़ती जा रही थी पर इस भीड़ का अधिकांश भाग जा रहा था शॉपिंग मॉल की तरफ ; आर्गनाइज्ड रिटेल स्टोर की तरफ ।

दीपावली में खुशियाँ बाँटिये, प्यार बाँटिये जैसे संदेशों वाले मैसेज व्हाट्सएप्प पर प्रसारित करने वाले लोगों ने भी जब कदम रखा तो किसी न किसी बड़े ब...

मंजिल न थी कोई जब

हर राह पे मंजिल दिखती थी

अब मंजिल मालूम है मुझको

पर रस्ते भटकाते हैं ।

जिस रास्ते पे सब चलते थे

उसपरचलने को जो हुआ

'लीक वही नहीं' कहते

कुछ अग्रज आ जाते हैं ।

'प्रेम पथिक' मैं जितना चलता,

उतना ही आनन्द मिला,

पर संशय के बादल हरदम

क्यूँ प्रीत गगन में छाते हैं?

तुम चलते हो, मैं चलता हूँ,

ये जग चलता...

ऐ भारत के अमर सपूतों तुम्हें नमन,

ऐ भारत के उद्धारक गण तुम्हे नमन ।।

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