... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

ईश्‍वरी बाबू ने जब अपने नौकर को निकाला तो उसे एक तरह से सम्मान विदाई कह सकते हैं। बल्कि यही क्‍यों यह कहिए कि उसके पुर्नरोजगार की व्यवस्था करवा दी। नौकर कोई तेरह-चौदह साल का था। उम्र ज्यादा नहीं थी लेकिन शक्‍ल-सूरत से परिपक्व एवं कद-काठी में ज्यादा दिखता था। अब ये लोग ऐसे ही होते हैं। फिर उनकी बेटी...

भाँय-भाँय करते स्‍टेशन पर उतर कर यू.डी. का मन नाना प्रकार की दुश्चिन्‍ताओं से घिर गया। कहाँ शहर में प्‍लेटफार्म पर पाँव रखने की जगह नहीं मिलती है और यहाँ चिरई का एक पूत तक नहीं नजर आ रहा हे। तेज धूप चुभ रही थी। गाँव यहाँ से तीस-चालीस किलोमीटर दूर तो होगा ही। न कोई सवारी न साधन। कैसे पहॅुँचेगा। एक ऑट...

बाढ़ का पानी अब उतरने लगा था. जो नुकसान होना था वह हो चुका. ढ़ोर-ड़ंगर की लाशें, चौपट फसलें, मकान और सड़कों पर बिखरा मलबा विभीषिका की दास्‍तान सुना रहे थे. पशु-धन, फसलों और मकानों के अलावा मानव जीवन की भी हानि हुई थी. बॉध टूट गया था. तन जैसे गलित व्रण के कारण जरा से स्‍पर्श से सिहर उठता है वैसे ही त...

        बचपन में हर चीज अच्छी लगती है. कोई एक टॉफी दे दे तो मजा आ जाता है. थोड़ी सी मिठाई मिल जाए तो क्या कहने. इसके लिए ललचाई आँखें कब से माँ को निहारती रहती हैं. चोरी से किसी के पेड़ के फल तोड़कर खाना भी सुहाना लगता था. खेत से गन्ने तोड़कर रस चूसना या पढ़ाई के समय दोस्तों के साथ बाहर उधम मचाना एक...

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अब हम ई-कल्पना जनवरी 2020 कहानी प्रतियोगिता के लिये कहानियाँ स्वीकार कर रहे हैं. कहानियाँ 1500 से 6000 शब्द तक की हों. कहानियाँ 15 दिसम्बर 2019 तक स्वीकार की जाएँगीं.
पुरस्कार राशि -
प्रथम चुनी ₹ 3000
द्वितीय चुनी ₹ 2000
तीसरी चुनी कहानी ₹ 1000
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