... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

जगमग रोशन हो हर घर

मिले नव आशा 

खील-बतासा 

दीपोत्सव का त्यौहार 

पावनपर्व दीपावली |

फसलों से महका है परिवेश 

कृषक भाग्य जगे 

नई उमंग, नई तरंग 

थोड़े से पटाखे 

बस थोड़ी सी आतिशबाजी 

दीपोत्सव का त्यौहार 

पावनपर्व दीपावली |

प्यार-स्नेह से मिलो गले 

बहे मंद-मंद शीतल समीर 

करो नव सृजन देती यही संदेश 

नूतन संकल्प लेकर मन...

जमाने भर का दर्द 

समेटे हुए हूँ अपने भीतर 

बेहिसाब शिकायतें हैं उनसे 

पर कह कुछ नहीं रहा उनसे 

कर रहा हूँ शिकायत 

सिर्फ अपनी ही परछाई से... 

मैं नहीं चाहता कोई बरबाद हो ?

मैं हमेशा से ही आबाद का समर्थक रहा हूँ 

तो भला कैसे, किसी को गिरा सकता हूँ ?

मैं आस्तीन में छुपा कोई सांप नहीं ?

मैं हूँ एक खुली किताब 

मेरे...

चरखी दादरी | हरियाणा प्रांत की प्रगतिशील साहित्यिक संस्था निर्मला स्मृति साहित्यिक समिति - चरखी दादरी द्वारा सरस्वती विद्या विहार के सभागार में एक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया | कार्यक्रम में देश-विदेश के एक सौ एक कलमकारों को सम्मानित किया गया | इसी कड़ी में जनपद आगरा निवासी मुकेश कुमार ऋषि वर्मा...

आगरा | सॉल्ट एण्ड पेपर रेस्टोरेन्ट (आगरा) में मुकेश कुमार ऋषि वर्मा द्वारा रचित तीसरी काव्य पुस्तक - काव्यदीप का विमोचन शशि स्वरुप, एकता जैन, डॉ. शशीपाल वर्मा, अवधेश कुमार निषाद, राकेश वर्मा, मोहर सिंह आदि साहित्य - कला जगत से जुड़े प्रतिष्ठित महानुभावों के करकमलों से किया गया |

‘काव्य दीप’ रवीना प्र...

फुदक-फुदक कर नाचती चिड़िया, 

दाना चुंगकर उड़ जाती चिड़िया |

हरी-भरी सुंदर बगिया में, 

मीठे-मीठे गीत सुनाती चिड़िया |

अपने मिश्रीघुले बोलों से 

बच्चों का मन चहकाती चिड़िया |

नित मिल-जुल कर आती,

आपस में नहीं झगड़ती चिड़िया |

प्रेमभाव से रहना सिखलाती, 

बहुत बड़ी सीख देती नन्हीं चिड़िया |

तरह-तरह के रुप-रंग वाली,...

नशा जो किया 

फिरे भीख मांगता

घर बर्वाद |

रिश्वतखोरी

भरे घड़ा पाप का 

डर काल से |

मारे उबाल 

भारत में अब भी 

व्यक्ति की जात |

वो जी रहे हैं 

शोषण सहकर 

भूख मारके |

कैसा विकास 

गरीब हाशिए पे 

गाँव निराश |

नोट खाकर 

श्रीमान् मालामाल 

जन बेहाल |

देश के नेता 

जहर उगलते 

राज करते |

चारों तरफ 

मचा है हाहाकार 

जन लाचार |

धुआँ निकल...

हिंदी हिंद की शान है, 

भारतदेश की पहचान है |

शुद्ध-सरल प्रगति की भाषा -

हिंदी हिंद की जान है ||

आओ साथी सपने सजायें, 

हिंदी को एक नई पहचान दिलायें |

हृदयों के सारे भेद मिटाकर -

हम सब हिंदीमय हो जायें ||

हिंदी की व्यथा सुनो सब जन, 

क्यों भेद बनाये हैं मन-मन ?

सब भेद मिटाकर कदम बढ़ायें साथ-साथ, 

विश्व में हमें त...

शब्दों का जाल बुनना 

मुझे नहीं आता 

मेरी क्या मजाल 

कलम चलाने की 

बस हृदय में कुलबुलाती है 

पीड़ा कुछ अपनी 

तो कुछ परायों की 

और मैं चल पड़ता हूँ

धधकते अंगारों पर 

जब रुकता हूँ तो 

खड़ा रहता हूँ 

फुंकारती नदी के किनारे पर 

जो पल-पल कट रहा है 

अन्दर ही अन्दर 

और मुझे तैरना नहीं आता |

फिर भी मैं साँसें समेटकर 

ले रहा...

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