... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

आज तक समझ नहीं आया, ये मौलिक रचना क्या होती है!

     भाषा-संस्कृति विभाग में था तो सम्मेलन होने पर लेखक-कवियों को पत्र भेजे जातेः ‘‘कृपया अपनी अप्रकाशित, अप्रसारित और मौलिक रचना का पाठ करें.......आप समारोह में कवि के रूप में आमन्त्रित हैं।’’

    लगता, साहित्यकार बंधु अभी किसी और रूप में...

बहुत छोटी उम्र में उसे बड़ी समझ आ गई।

    लैहणू हलवाई का बिगड़ा हुआ छोकरा जिद्द करने लगा, वह अपना मिठाई का पुश्तैनी धंधा छोड़ नामी लेखक बनेगा। यूं तो उसके दादा भी आशूकवि थे। मिठाई तौलती बार तलत महमूद की गाई ग़ज़ल ‘‘जलते हैं जिसके लिए तेरी आंखों के दीये’’ गाते हुए अपनी शायरी कर बैठते ‘‘तलते हैं जिसके लिए,...

"वैसे तो सभी कागज़ के टुकड़े ही होते हैं ... एपायंटमेंट, प्रोमोशन, डिमोशन, ट्रांस्फर, ज्ञापन और कारण बताओ नोटिस आदि. कागज़ों में जीता है, कागज़ों में ही मरता है सरकारी आदमी. कागज़ों में कागज़ों के लिए ही जीता है, कागज़ों के लिए ही मरता है..."

हदे निगाह तक अन्धेरे से गुजरते हुए

ट्रेन फुंकारती और धड़धड़ाती हुई आई. एक अजगर की तरह. धड़धड़ाहट जमीन के नीचे से जाती हुई. जैसे भूकम्प के समय धरती के नीचे हिलती हुई एक लहर सी दूर तक निकल जाती है. उसके पैरों तले सरसराहट सी हुई जो दिमाग से जा टकराई.....अभी कोई अपने में खोया भीतर चला जा रहा तो......... कंपक...

वरिष्ठ कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ को हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी द्वारा ‘‘शिखर सम्मान-2016’’ प्रदान किया गया है। यह सम्मान वशिष्ठ को साहित्य के क्षेत्र में आजीवन उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया गया है।

    28 मार्च को स्थानीय हॉलीडे होम सभागार में एक गरिमापूर्ण और शालीन समारोह में प्रदेश के मुख्य मन्त्री...

किस्सा उस समय का है जब शहर ने अंगड़ाई नहीं ली थी. बस अपने में सकुचाया और सिमटा हुआ रहता था. ठण्डी सड़कों में जगह जगह झरने बहते, जहां स्कूली बच्चे और राहगीर अंजुली भर भर पानी पीते. मुख्य बाजार में बहुत कम आदमी नजर आते. गर्मियों में गिने चुने लोग मैदानों से आते जिन्हें सैलानी नहीं कहा जाता था. कुछ मेमें...

    अचानक छोटे से रोशनदान से झरने की तरह एक लाट फूटी और कमरे के बीचोंबीच कोने तक फैल गई। कमरे में नीम अंधेरा था। रोशनी की बूंदें जममग चमकने लगीं। रोशनी के उस झरने में पानी की छोटी छोटी बूंदों की तरह अनेक धूल कण किलबिलाने लगे। धूल कणों को सजीव करती वह धूप की लाट जैसे कमरे में गड़ गई। पहले यहां कुछ दिख...

लगा, जैसे मैं जा रहा हूं ... वही कद ,वही काठी, चालढाल; सब वही. टेढ़ी गर्दन, उलझे बाल, लटके गाल, खुली पेंट, ढीला कोट, बढ़ा पेट, कन्धे पर लटका ख़ाली झोला, चाल वही मस्तमौला. उंगलियों पर कुछ गिनना, गर्दन का पैण्डुलम की तरह हिलना, उचक-उचक कर चलना, बार-बार हाथ मलना ... अरे! मैं ही तो हूँ.

कई बार वह अपने को...

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