... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

लेखक परिचय

देवी नागरानी

                      

इल्म की रोशनी में खुद की पहचान

अपनी ही पहचान पाने की राहों पर आदम जैसे कोई झाड़ झाँखर हो गए हैं, यहाँ से उखाड़े, वहाँ रोंप दिये गए-दिल रोता है, सिसकता है और मुझसे यह सवाल करता है : आज़ादी क्या है?
इस अक्षर की नक्काशी कर आओ क़ैद की दीवारों पर, और फिर पूछो इसका मतलब
लोहे की सलाखों के पीछे क़ैद आज़ादी के उन परवानों से !

ऐसा ही कुछ परिचय मेरा भी है. पहले वहां, फिर कहीं और अब यहाँ हूँ. विभाजन के पहले १९४१ में कराची (तब भारत) में पैदा हुई, १९४७ में विभाजन के उपरांत अनेकों पड़ावों को पार करते हुए दक्षिण भारत में हैदराबाद में परिवार के साथ बसी. इल्म की पाठशाला में दाखिला ली. स्कूल, फिर कॉलेज जैसे हर कोई पढ़ता है- न कुछ नया न कुछ पुराना. उसी इल्म की शिक्षा से शिक्षिका का दौर शुरु हुआ, पहले मुंबई, फिर शिकागो, और अंत में न्यू जर्सी.

          हर बार मेरा नया जन्म हुआ, नया सूरज उगा और उसी रोशनी में अपने भीतर की उस देवी से परिचित हुई.

यही तो जीवन है. हर नए पड़ाव से उखड़ने और बसने में समय तो लगता है. इसी दौरान कुछ सीखा कुछ सिखाया- कुछ के लिए मैं मायस्त्रा (मास्टरनी) बनी, कुछ मेरे गुरु बन गए.

गज़ल मेरी महबूब विधा है जो चराग-ए-दिल से दिल से दिल तक दस्तक देती हुई लौ दर्दे-दिल की को जगा गई. इस साल 2017 फरवरी में ग़ज़ल संग्रह सहन-ए-दिल मंज़रे आम पर होगा और उम्मीद करती हूँ कि इस आगाज़ का अंत शायद दीवान-ए-दिल से हो, जिसकी ग़ज़लें मैं रोज उधेड़ती हूँ, रोज़ बुनती हूँ.

अनबुझी प्यास रूह की है ग़ज़ल

खुश्क होंठों की तिश्नगी है ग़ज़ल

न नर्म अहसास मुझको देती है

धूप में चांदनी लगी है ग़ज़ल

          शब्द के सुर ताल पर शब्द थिरकते रहे, ग़ज़ल खुद को अभिव्यक्त करने के लिए झूमती रही, गाती रही और गुनगुनाती रही.

फिक्र क्या, बहार क्या, क्या ग़ज़ल गीत क्या मैं  तो  शब्दों  के  मोती  सजाती   रही

अगर यह साथ न होती तो तन्हाइयां और गहरी होती. बस कलम मेरी तन्हाइयों का साथी और ग़ज़ल मेरी सखी! इनके संग सफ़र करते मेरे भीतर की नारी ने थापोड़े झेलने के बाद बसना, निखरना और महकना सीख लिया है. अब कभी गध्य लिखना शुरू करती हूँ तो पद्य का स्वरूप उसमें से झांकता हुआ नज़र आता है. यह भी लेखन कला का एक अंश है..

इस नए परिचय के प्रयास का श्रेय मुक्ताजी को जाता है. उनकी पाठशाला में कुछ नया जो सीखना था.. !

आपकी अपनी

देवे नागरानी

dnangrani@gmail.com