... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

उसका सच

अलका प्रमोद

लेखक परिचय

मैं ,अलका प्रमोद ने भले ही इलाहाबाद विष्वविद्यालय से वनस्पति विज्ञान में एमएससी किया और जीविकोपार्जन हेतु उ0प्र0 पावर कारपोरेशन विभाग लखनऊ को चुना पर छात्र जीवन में लिखी गई कालेज पत्रिका व आकाशवाणी में प्रकाशित प्रसारित रचनाए सिद्व करतीं हैं मेरे मन में सुप्त रचनाशीलता के बीज की।      जब जीवन के मोड़ पर अचानक  कठोर  धूप से सामना हुआ तो ताप में झुलसते मन को पापा साहित्यकार  श्री कृष्णेष्वर डींगर ने लेखन के लिये प्रेरित किया  । काल के कठोर प्रहारों से विचलित भटकते मन को ठंडक मिली सृजन की छांव में। लगभग वर्ष1992-1993 में पुनः गति पा कर आज तक सतत गतिशील है और जब भी मन व्यथित हुआ है तो सृजनशीलता ने संरक्षण दिया है। प्रथम कहानी मुक्ता पत्रिका में प्रकाशित हुई तब से अभी तक पांच कहानी संग्रह 1.सच क्या था 2.धूप का टुकड़ा 3.समान्तर रेखाएं 4.स्वयं के घेरे 5. रेस का घोड़ा, 6.उपन्यास-.यूं ही राह चलते चलते तथा नौ बाल विज्ञान एवं साहित्य की पुस्तकें 7.नन्हे फरिश्ते 8.. चुलबुल-बुलबुल , 9. अन्तरिक्ष की सैर 10.. मशीनी जिन्न 11.. सौर ऊर्जा और उसके प्रयोग 12..विज्ञान कल से आज तक, 13.मशीनी मानव रोबोट  ,14. चन्द्रशेखर वेंकट रमन, 15.डा0 ए पी जे अब्दुल कलाम , अस्तित्व में आ चुके हैं। जिनके लिये यदा कदा मिलने वाले लगभग 22- 23 पुरस्कारो/ सम्मानों,जिनमें उ0 प्र0 हिन्दी संस्थान के विद्यावती कोकिल जैसे महत्वपूर्ण सम्मान तथा होमी भाभा संस्थान ,दिल्ली प्रेस द्वारा प्रदत्त प्रतिष्ठित पुरस्कार भी सम्मिलित हैं, ने मुझे प्रेात्साहित किया तो मेरी कुछ रचनाओं के अनुवाद और शोध छात्रों द्वारा मेरे रचना संसार पर शोध ने मेंरे आत्मविश्वास में वृद्धि की। द संडे पत्रिका ने सदी की 111 महिला साहित्यकारों मे स्थान दे कर मुझे  कलम को निरंतर चलने के लिये प्रेरित किया ।      मेरे जीवन में प्रायः मन पर हस्ताक्षरित आस-पास की घटनाओं ने मन को उद्वेलित कर कलम उठाने को विवश किया तथा कल्पना के ताने बाने में  गुंथ कर कहानी/ उपन्यास के पात्र अनायास ही आ खड़े हुए । इस प्रकार कहानी और उपन्यास   आकार ग्रहण करते रहे हैं। मन के भावों के संप्रेशण हेतु  कविताओं ने जन्म लिया।    प्रत्येक रचना के जन्म ने मुझे मात्त्व का सुख दिया और हर बार जब रचना प्रकाशित हुई तो लगा मेरी संतान ने सफलता के सोपान चढ़ मुझे गैारवान्वित किया है। हां मेरा यह मानना है कि भले ही सृजन अभिव्यक्ति का माध्यम हो पर वह मात्र तभी तक स्वांतः सुखाय  होता है जब तक डायरी के पन्नों में बन्द रहता है। जब कोई भी रचना पाठकों को समर्पित होती है तो वह समाज की थाती बन जाती है अतः रचनाकार का समाज के प्रति गंभीर दायित्व हो जाता है अतः विधा कोई भी हो विचार यथार्थ हो या कल्पना मेरा यह प्रयास अवश्ष्य रहता है कि मेरी रचना समाज में मनोरंजन के साथ साथ समारात्मकता विस्तारित करे। 

alkapandey8@gmail.com

                बड़की अम्मा की खुशी का पारावार न था। उसके मन का घड़ा जो जीवन के दुख सहते-सहते पूरी तरह सूख चुका था, आज उत्साह से लबालब भर उठा था और छलका जा रहा था। छलकता भी क्यों न बरसों बाद आज उसके बेटे मनोज ने उससे सीधे मुँह बात की थी। वह सुखद क्षण उसकी आँखों के सामने बार-बार आ रहा था। सच तो यह है कि वह स्वयं ही बार-बार उस क्षण को जीना चाह रही थी।

                आज सुबह वह अपने नित्य-क्रिया से निवृत्त हो कर चाय बनाने रसोई में जा ही रही थी कि मनोज उसके लिये चाय का गिलास ले कर उनके पास आया और उन्हें देते हुए बोला ‘‘ अम्मा कुम्भ मेला चलिहौ ?’’

                अम्मा को यकायक अपने कानों पर विश्वास नही हुआ।उन्हे कुछ समझ न आया तो सकपका कर बोली ‘‘ हम आईत रही न तू काहै चाय लेय आयै?’’

मनोज बोला ‘‘अरै अम्मा तुम बहुत चाय बनाय लिहौ ,अब तुम बुढ़ाय गयी हो, बइठो और राम-नाम जपो तुम्हरी बहुरिया काहे बरे है।’’

                अम्मा ने सुनी हुई बात की पुष्टि करने हेतु मनोज को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। मनोज अम्मा के हाथ में चाय पकड़ाता हुआ बोला ‘‘ हाँ तो अम्मा का कहत हो चलिहौ मेला?’’

                अब अम्मा को भरोसा हो गया कि उसका बिटवा उन्हे मेला ले चलने की बात ही कर रहा है। उसे आज मनोज वही वाला नन्हा सा मनोजवा लग रहा था जो रसोई  में रोटी बना रही अम्मा की गोद में आकर बैठ जाता था और मुठ्ठी खोल कर कहता ‘‘ अम्मा कम्पट खइहौ ? ’’

                अम्मा निहाल हो जाती थी। पूरे घर में एक उसका लाल ही तो था जो उसकी चिन्ता करता था नहीं तो सास ,श्वसुर ,पति सभी के लिये वह मात्र एक काम करने वाली परिचारिका ही थी, जिसको काम के बदले सबके खाने के बाद खाना मिल जाता था। अम्मा मनोजवा की बात सुन कर उसको गले लगा कर अपनी बाहों में कस कर बाँध लेती थी। उसके दबाव से घबरा कर नन्हा मनोज निकल भागने को आतुर हो जाता और अम्मा बेटे केे स्नेह में छलके आँसू पोंछने लगती। मनोज समझ न पाताा कि अम्मा रो क्यों रही हैं ,उसने कुछ गलत तो कहा नहीं और रो ही रही हैं तो उसे प्यार क्यों कर रही हैं।

                अम्मा की आँखों में एक बार फिर पहले की तरह ही आँसू आ गये, मनोज उठने लगा तो अम्मा हड़बड़ा गयं कि कहीं उनके आँसुओं को मनोज उनकी ‘ना’ न समझ ले अतः वह तुरंत बोली ‘‘का हमहूं जइबै?’’

मनोज ने कहा ‘‘अऊर का कहि रहै हंय।’’

                अम्मा की आवाज काँपने लगी। वह मन ही मन स्वयं को कोसने लगी ‘ बेकार ही इतने लायक बेटे को बुरा भला कहती थी। वह तो थका-हारा काम से आता है तो बहुरिया के तिरिया चरित्तर  के बहकावे में आ कर उन्हें कुबक बोल देता है नहीं तो मन ही मन तो उसको माने है आखिर खून तो अपना ही है।’

                अम्मा भूल गयी कि मनोज और बहुरिया उसे भरपेट खाना नहीं देते, वह भूल गयी कि महीनों बाद मनोज ने उससे बात की है, वह भूल गयी कि रोज बहुरिया उनसे लड़ती है झूठा-सच्चा इल्जाम लगाती है और बेटा उस पर चिल्लाता गाली बकता और कभी-कभी दो चार हाथ भी लगा देता है।

                कहाँ तो अपने काम करने में भी अम्मा की हिम्मत जवाब दे जाती थी पर आज लंगड़ाती-लंगड़ाती वह अपनी सखी रमिया के द्वार पहुँच गयी। रमिया उसको देख कर खुश हो कर बोली ‘‘अरे अम्मा आज केहुकर मुँह देखि कर उठै रहै कि तुम्हरे दर्सन हुई गयै।’’

                अम्मा खाली मनोज की नहीं पूरे गाँव की अम्मा थी। मालती, दुलहिन, बसेसर की मेहरारू, मनोज की अम्मा जैसे संबोधनों की राह पार करते-करते अब वह केवल अम्मा ही रह गयी थी।

अम्मा बोली ‘‘ बस बहुत दिनन से तोहका आवै की फुरसत ना मिली तो हमही आये गयै ।’’

                रमिया को विश्वास नहीं हुआ कि अम्मा यूँ ही आयी हैं, वह समझ गयी कि कोई न कोई बात जरूर है जो अम्मा उसे सुनाने आयी हैं, कहो आज मनोज ने फिर मारा-पीटा हो या आज बहुरिया ने किसी बात पर लड़ाई करके खाना न दिया हो और पेट की क्षुधा उन्हेें उसके पास खींच लायी हो पर रमिया ने धैर्य रखना ही उचित समझा। उसका अंदाजा गलत नहीं था कुछ ही क्षणों में अम्मा ने पेट में खदबदा रही खबर उगल ही दी। अम्मा हाथ ऊपर करके मनोज को आशीष देते नहीं थक रही थी। यह सुन कर कि अम्मा कुंभ मेले जा रही हैं रमिया को आश्चर्य हुआ कि जो बेटा उन्हे दो जून रोटी नहीं देता आज मेला घुमाने ले जा रहा है। सच तो यह है कि उसके मन में ईर्ष्या की लहर सी उठी, यह बुढ़िया कुंभ मेला देखने जा रही है यहाँ उसके पति ने तो साफ मना कर दिया कि इस बार फसल अच्छी नहीं हुई और उनके पास इतने पैसे नही हैं। पूरे गाँव में शाम तक यह समाचार फैल चुका था कि मनोज कुंभ मेला जा रहा है और उससे भी बड़ी बात यह थी कि वह अम्मा को भी ले जा रहा है। मनोज गाँव का हीरो बन गया था। गाँव के सारे बुजुर्ग उसका उदाहरण दे रहे थे, प्रशंसा कर रहे थे। कल तक जिसे नाकारा समझा जाता था आज आदर्श बेटा बन गया था। अम्मा तो हर घड़ी उसकी तारीफ ही करती रहती। अब न तो उसके पाँव में दर्द हो रहा था न कमजोरी। यहाँ तक कि अपनी झुकी कमर, धँुधली नजर और काँपते हाथों के बावजूद वह चूल्हे में उसके लिये रोटी सेंकने पहुँच गयी और बहुरिया से बोली ‘‘ बिटवा का हमरे हाथ की रोटी सुहावत है जवान लरिका है रोटी मां अम्मा के हाथ का सुआद अइहै तो दुई चार जियादा खाय लेहै।’’

                जाने के चार दिन पहले से ही अम्मा ने एक झोले में अपनी दो धोतियां ब्लाउज आदि सहेज लिया था। जाने वाले दिन तो अम्मा को रात भर नींद ही नहीं आयी। वह बार-बार चैंक कर बैठ जाती कि कहीं ऐसा न हो कि उनकी नींद ही न खुले और गाड़ी छूट जाये।

                अन्ततः वह ,मनोज, मनोज की मेहरारू रजनी और पोता कृष्णा चल दिये स्टेशन की ओर। अम्मा अपना झोला थामे तेज-तेज चलने का प्रयास कर रही थी। स्टेशन पर गाड़ी आयी तो उनका दिल गाड़ी से भी तेज धड़क रहा था। किसी तरह भीड़ में मनोज ने सबको गाड़ी के अन्दर ढकेला। गाड़ी में तिल रखने की भी जगह नहीं थी। जब गाड़ी चली तो अपने आप ही सब कहीं न कहीं धँस गये, गाड़ी के हिलने से सब गाड़ी में उसी तरह समा गये जैसे दाल के डिब्बे को हिलाने से डिब्बे में ऊपर तक भरी दाल समा जाती है। अम्मा, रजनी और कृष्णा को मनोज ने गाड़ी के शौचालय के पास ही बैठा दिया, वह स्वयं दरवाजे का डंडा पकड़ कर खड़ा ही रहा। आज पहली बार अम्मा गाँव से बाहर निकली थी और गाड़ी मैं बैठी थी। जैसे-जैसे गाड़ी आगे जा रही थी अम्मा का मन पीछे भाग रहा था। उसकी आँखो के समक्ष वह दृश्य चलचित्र के समान खिंच गया जब उसकी नयी-नयी शादी हुई थी। एक दिन मनोज के बापू घर आये तो बहुत खुश थे उन्होंने कहा ‘‘तोहरे पाँव बहुत नीक हैं रे।’’

                अम्मा अपने पाँव देखने लगी तो उन्होंने ठठा कर हँसते हुए कहा था ‘‘अरे पगली तोहरे पाँव हमरी देहरी पर परै तो लछमी भी हमरी देहरी देख लिहिन, आज हमका पहरी बार फसल से इतना रूपिया मिला कि सारा पहिले का करजा उतर गवा।’’

बापू ने उसी प्रसन्नता की रौ में कहा था ‘‘ बोल आज तू जो मँगिहै हम देबै।’’

अम्मा ने लजाते-लजाते कहा था ‘‘हमका सहर का मेला दिखाय दो।’’

बापू ने कहा था ‘‘एही बार तो सारा पइसा करजा उतारै मा चला गवा पर अगली फसल  पर तुमका ले जइबै।’’

                पर वह अगली बार कभी नहीं आ पाया। पहले मनोज पेट में आ गया फिर सास बीमार पड़ गयीं ,उसके बाद श्वसुर जी  नहीं रहे और फिर तो उनके जीवन में तूफान ही आ गया, गाँव में मलेरिया फैला और उस काल के ग्रास में मनोज के बापू भी चले गये।

                  मालती के जो पाँव देहरी पर पड़ने से घर में लक्ष्मी आ गयी थी वही पाँव आज अपना और दुधमुँहे बेटे का पेट पालने के लिये घर की देहरी लाँघने को विवश हो गये। अकेली स्त्री बेटा सँभालती कि खेती, धीरे-धीरे सब खेत बिक गये। हार कर घर-घर काम करके उसने बेटे को पाला, उसका विवाह किया। सोचा था कि बहुरिया के आते ही आराम करेगी। पर बहू के रंग-ढंग तो निराले ही थे । बहू तो बहू, मनोज ने भी खरबूजे के समान रंग बदल लिया। वही मनोज जो दिन-रात उसका पल्ला थाम कर पीछे-पीछे डोलता था बड़ा होने पर भी अम्मा से सलाह के बिना काम न करता था अब बहुरिया के पल्लू से जा बँधा। उसका छोटा सा आशियाना जो उसने बरसों पैसा जोड़-जोड़ कर बनाया था बहू के आते ही उसका अपना न रहा। अब तो उसे ऐसा अनुभव होता मानों वह बहू की कृपा पर जी रही है। पता नहीं कौन सा जादू-मंत्र इस जादूगरनी ने फेरा था कि मनोज उससे सीधे मँुह बात करना तो दूर उसकी ओर देखता भी नहीं था। अपने ही घर में वह अवांछित हो गयी थी। 

                 आज जरूर मंदिर वाले भोले नाथ ने उसकी प्रार्थना सुन ली और मनोज के ऊपर से बहुरिया का जादू कम हो गया, तभी तो उसने अम्मा को कुंभ ले जाने का सोचा। तभी रेलगाड़ी एक झटके से रुक गयी और अम्मा की सोच भी। चलती गाड़ी में सोये से यात्री पुनः जाग गये। पहले हम, पहले हम की होड़ में एक-दूसरे को धक्का देते उतरने को सब आतुर हो गये। जब तक अम्मा खड़ी हो पाती न जाने कितने पाँव उसकी गठरी को रौंदते हुए निकल गये। किसी तरह मनोज ने उसे हाथ पकड़ कर उतारा। स्टेशन पर इंसानों का रेला देख कर उसकी आँखे फटी की फटी रह गयीं। मनोज तेजी-तेजी भीड़ में चलने लगा । अम्मा घबड़ा गयी कि कहीं वह छूट न जाये। इसी घबड़ाहट में उसका आँचल सिर से गिर गया पर उसे कहाँ होश था। घबड़ायी अम्मा मनोज और उसकी मेहरारू के पीछे-पीछे स्टेशन से बाहर आयीं। स्टेशन से बाहर दूर तक जाती काली-काली ,चैड़ी सड़कें और उन पर फर्र-फरर्, फर्राटे से दौड़ती गाड़ियाँ देख कर उसने डर कर मनोज का हाथ कस कर थाम लिया। किसी तरह एक मोटर वाले रिक्शा में बैठ कर वह गंगा मैया के किनारे पहुँचीं। गंगा मैया के शीतल जल, मंदिर की घंटी, घाट पर हो रही आरती देख कर मानो उसेे धरती पर ही स्वर्ग के दर्शन हो गये, वह मनोज पर वारी-वारी जा रही थी। उसकी आशीष की कुछ फुहारें रजनी पर भी पड़ रही थीं। गंगा जी में डुबकी लगा कर अम्मा की मानो जन्मों की आकांक्षा पूरी हो गयी थी। वह नहा कर निकली तो मनोज ने कहा ‘‘ अम्मा चलो तुम्हे लेटे हनुमान जी के दरसन कराये दे बड़ी महिमा है उनकी।’’

                अम्मा को तो मानो एक के बाद एक इच्छा पूरी होने पर विश्वास ही नहीं हो रहा था, मन तो उसका दर्षन का तभी से था जब रमिया ने बताया था ‘‘अम्मा कहत हैं कि परयाग मां  लेटे हनुमान बाबा की बहूत बरी मूरत है। हनुमान बाबा आराम से लेटे हैं और भगत लोग उपरै से उनके दरसन करके धन्न हुई जात हैं।’’

                मंदिर में लम्बी लाइन थी अम्मा लाइन में खड़ी थीं बार-बार धक्का लग रहा था । तभी मनोज ने कहा ‘‘ अम्मा तुम दरसन करौ किसना पीछै परा है हम तनिक किसना और तुम्हरी बहुरिया का कुछ खिलाय के आवत हैं।’’

अम्मा घबड़ा गयी उसने कहा ‘‘बिटवा हमहुं चलिबै हमका अकेले ना छेाड़ौ ।’’

मनोज ने खीज कर कहा ‘‘अरे अम्मा तुम तो लरिकन जइसी जिद करै हो देखौ कितना मनई है लाइन मा, जो तुम हटि गयी तो फिर पाछे से लागे का परी। जब तलक तुम मन्दिर के दुआरै पहुँचबौ हम आई जइबै।’’

                अम्मा मनोज की झिड़की खा कर चुप हो गयी। एक घंटा बीत गया, वह पंक्ति में बढ़ते भीड़ के रेले के साथ मन्दिर के अन्दर जाकर बाहर भी आ गयी पर मनोज नहीं आया। घबराहट में न तो उसने ठीक से हनुमान जी के दर्शन किये न मन्नत माँगी। उसका ध्यान तो मनोज में लगा था। जब बहुत देर हो गयी तो उसका धैर्य जवाब देने लगा।

               वह बौरायी सी मनोज को ढूँढने लगी, कभी इधर जाती, कभी उधर। उसकी हालत  देखने वालों को पगली का भ्रम दे रही थी। जो सामने मिलता उसी को पकड़ कर कहती, ‘‘भइया हमरा मनोजवा किधर है बताय दो।’’

  कोई उसका हाथ झटक देता तो कोई दयावान मिल जाता तो कहता ‘‘अम्मा हमको नहीं पता।’’

                एक यात्री को उसकी हालत देख कर दया आयी तो उसने कहा ‘‘ अम्मा इस भीड़ में ऐसे नहीं मिलेगा तुम्हारा मनोजवा पूछताछ केन्द्र जाओ।’’

अम्मा को कुछ आस बँधी उसने कहा ‘‘भइया ई कहाँ है ? राम जी तोहरा भला करैं, हमका पहुँचाय देयो, बस हमरा मनोजवा मिल जाये अउर हमका कछु ना चाही।’’

                वह व्यक्ति दयावान था, उसने अम्मा को पूछताछ केन्द्र पहुँचा दिया। पूछताछ केन्द्र पर बैठे युवक ने उससे उसका नाम पूछा। अम्मा को तो घबड़ाहट में अपना नाम ही नहीं याद आया। बरसों से किसी ने उसे उसके नाम से पुकारा ही कहाँ था। उस युवक ने पूछा ‘‘अम्मा अपने गाँव या घरवाले किसी का नाम तो बताओ जिसे सुन कर वह लोग यहाँ तुम्हें लेने आयें।’’

अम्मा बोली ‘‘बिटवा मनोजवा से कहि देयो कि उकर अम्मा गुहार रही है, ऊ सुनिहै तौ दौरा- दौरा अइहै।’’

युवक ने पूछा ‘‘अम्मा तुम्हारे गाँव का नाम क्या है ?’’

अम्मा ने बताया ‘‘मउअइमा।’’

                मेले में घोषणा होती रही ‘नीली साड़ी पहने मनोज की अम्मा पूछताछ केन्द्र संख्या  छः पर हैं उनके घर वाले उन्हे ले जायें।’ पर रात हो गयी कोई लेने न आया। इस बीच कितने ही खोये लोगों की उद्घोषणा हुई। उनके परिजन आकर लोगों को ले गये। हर बार अम्मा को आशा होती कि अबकी मनोज सुन लेगा और उसे ले जाएगा पर मनोज नहीं आया।

किसी ने कहा ‘‘ अम्मा हमें तो लगता है तुम्हारा बेटा मेले में तुम्हे छोड़ कर चला गया।’’ यह सुन कर अम्मा उस पर बिफर पड़ी। पर जब रात गहराने लगी तो उसका दिल बैठने लगा। उसे उस युवक की कही बात सच लगने लगी। माइक पर रो-रो कर अम्मा बुलाने लगी ‘‘अरे बिटवा आये जाओ, हमरा जिया बइठा जाय रहा है। चाहै हमका एकै जून रोटी देयो पर इहां अकेले न छोड़ो। ’’

                रात का अँधेरा गहराने लगा था मेले की भीड़ छँटने लगी थी। बस बीच-बीच में माइक पर  उसका रूदन अभी भी गूँज रहा था और सुनने वालों का दिल दहला रहा था पर मनोज का अता-पता न था।

                गाँव में हल्ला हो गया कि अम्मा गंगा मैया में नहाते हुए उसी में समा गयी। किसी ने दुख प्रकट किया तो किसी ने उनके भाग्य को सराहा कि कुंभ में गंगा मैया की गोद में शरण पा गयी उसे तो मोक्ष ही मिलेगा।

                मनोज ने अपनी क्षमता से बढ़  कर अम्मा की आत्मा की शांति के लिये पूजा करवायी और गाँव वालों को जिमवाने के लिये बुलाया। गाँव में एक बार फिर उसकी वाह-वाह होने लगी। लोग अम्मा के गुण गाते गरम-गरम पूड़ियां उदरस्थ कर रहे थे। पूड़ी परोस रहा मनोज सकते में आ गया जब उसने सामने किसी अनजान आदमी के साथ अम्मा को खड़े पाया। एक क्षण तो कुछ लोग उन्हे भूत ही मान बैठे फिर फुसफसाहट होने लगी अम्मा लौट आयीं। पूड़ी खाते हाथ वहीं थम गये।

                मनोज तो हतप्रभ खड़ा अम्मा के पाँव पर गिर कर माफी माँगने की सोच ही रहा था कि उसकी बहुरिया की बुद्धि काम कर गयी उसने अम्मा को बाहों में भर कर कहा ‘‘अम्मा उहां तो लोग कहै लागै कि तोहार अम्मा डूब गयीं अरे आगि लगैं उन नासपीटन की जबान का, हमरे बड़े भाग, हमरी जिंदगी भर के पुन्य काम आये गये तुम बच गयीं। ’’

मनोज को अपनी पत्नी की बुद्धि पर पहली बार गर्व हो आया उसने भी तुरंत अम्मा के पाँव छू कर कहा ‘‘ अम्मा हम तुमका कितना ढूँढे हार कर निरास होय के लउट आये। रोय-रोय कर हमरा जी हलकान होय गवा। ऊपर वालै का लाख लाख सुकर है कि तुम आय गयी।’’

फिर अपनी पत्नी से बोला ‘‘अरे किसना की अम्मा जल्दी से पूरी लाओ अम्मा भूखी होहिहैं।’’

    इस बार मनोज में उन्हें बचपन वाला मनोजवा नहीं दिखा। अम्मा नेे जिस गहरी दृष्टि से मनोज को देखा उसमें अविश्वास, पीड़ा, घृणा , क्रोध, दुख, .....बहुत कुछ था और वह भारी कदमों से घर के अन्दर चली गयी। मनोज भी अम्मा की बदली हुई दृष्टि को भाँप गया था और मन ही मन  खैर मना रहा था कि उन्होने उसका सच गाँव वालों के सामने नहीं खोला ।