रिक्शेवाले

धीरज कुमार श्रीवास्तव

जून का महीना. सारा शहर भीषण गर्मी से तप रहा था. सूरज चारों तरफ आग उगल रहा था. कोई भी घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. गर्मी में सब की बुरी हालत थी. कभी गर्म हवा के थपेड़े चेहरे को गर्द से भर देते तो कभी धूल-धक्कड़ से बदन पसीने के कारण लथपथ हो उठता था. पसीना बदन से ऐसे चूं रहा था जैसे नल की टोंटी खुल गई हो. बदबू-सी उठने लगी थी बदन से. बड़ी दुर्दशा थी.

ऐसे में चौराहे पर दो रिक्शेवाले अपने माथे पर गीला अंगोछा लपेटे, होंठों में बीड़ी सुलगाये, आते-जाते लोगों को कौतूहल और उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे थे. लेकिन लोग थे भी कहां ? घंटे आध घंटे में कोई रिक्शावाला दिखाई दे जाता था वो भी खाली! दोनों बेसब्री से आंख गड़ाये हुए बैठे थे सवारी के इंतजार में. दोपहर हो गई थी लेकिन अभी तक एक भी सवारी उन दोनों को नहीं मिली थी.

दोनों एक ही टाल में रहते थे. दोनों की झोपड़ी आसपास ही थी. झप्पर से छाई हुई. तभी एक रिक्शेवाले ने उकताकर बीड़ी फूंकते हुए कहा, ‘‘साली, कितनी गर्मी पड़ रही है ! भगवान भी हम गरीबों पर अत्याचार करने से बाज़ नहीं आता. इतनी गर्मी में सवारी निकले भी तो कहां से ! क्या कहता है मेहरू?’’

मेहरू क्या कहता? वो सिर हिलाकर रह गया. दो दिन से उसे भी ठीक से सवारी नहीं मिली थी. उसे भी कुछ सूझ नहीं रहा था. घर से आते वक्त कमली ने कहा था कि आज कुछ न कुछ इंतजाम करके आना होगा. बच्चे को कल से बुखार आ रहा है. ऊपर से घर का सामान भी खत्म हो गया है. कुछ न किया तो भूखे पेट ही सोना पड़ेगा. बच्चे का मासूम चेहरा बार-बार उसकी आंखों के सामने घूम जाता था. मेहरू का ध्यान उसी ओर था जब मंगल ने उससे उक्त बात कही थी.

‘‘गर्मी के मारे कौन साला घर से बाहर निकलेगा. जिसे देखो वही अपने बिल में छुपा होगा.’’ मंगल अपने माथे से पसीना पोंछते हुए मेहरू की तरफ देखकर कहा. बीड़ी बुझने के कगार पर थी. ढेर सारी राख उसके पैरों के पास गिरी हुई थी. बीड़ी को बुझे देखकर उसने दूर फेंक दिया.

‘‘सो तो है.’’ मेहरू सिर हिलाकर बोला और अंगोछे से बदन पोंछने लगा.

‘‘दिन भर बैठे रहो, तब कहीं एकाध सवारी मिलती है. वो भी नजदीक की. साला! कुछ बनता ही नहीं. सब कुछ यहीं उड़ जाता है. पान-बीड़ी में.’’ मंगल ने अपनी किस्मत को कोसना शुरू कर दिया था. आखिर खाली बैठे-बैठे करता भी क्या? सुबह से खाली बैठा था.

मेहरू ने सिर हिलाकर हामी भरी. आखिर क्या कहता? सच ही तो कह रहा था मंगल. गरीबों की किस्मत ही ऐसी है! गर्मी-जाड़ा हो या बरसात. कहीं भी चैन नहीं. बस रिक्शा लेकर सवारी के इंतजार में खड़े रहो. चिलचिलाती धूप में. कड़कड़ाती ठंड में.

मंगल पास आकर मेहरू को झझोरते हुए बोला, ‘‘मेहरू, सुनता है? एक बात कहूं?’’

‘‘झकोरता काहे है, सुनता तो हूं?’’ मेहरू खिसियाया.

मंगल बोला, ‘‘देख, इतनी गर्मी पड़ रही है. कोई सवारी मिलने से रही. अगर देव की कृपा से कोई मिल भी गई तो ऐसा करते हैं यहां हमारे सिवा कोई नहीं है. मैं जो किराया कहूंगा तू भी वही कहना. समझे? सवारी चाहे तुझे मिले या मुझे. ठीक है ? देख, मुकरना नहीं.’’

‘‘ये ठीक नहीं है. मुझसे नहीं होगा.’’ मेहरू बोला. मंगल की चालाकी भरी बात सुनकर उसका मन खिन्न हो उठा था. चाहे जो भी हो लेकिन वो चालाकी नहीं कर सकता. किस्मत से जो मिलेगा उस पर ही संतोष करेगा.

‘‘सब ठीक होगा. बस तुम चुप रहना. तुझे कुछ कहने-सुनने की जरूरत नहीं है. मैं सब देख-सुन लूंगा.’ मंगल ने घुड़की देते हुए समझाया.

मेहरू कुछ न बोला. सिर्फ सिर हिलाकर रह गया. तकरार करने से क्या फायदा था. क्योंकि मंगल वही करेगा जो उसके मन में है. लोगों को परेशान करने का मौका वो छोड़ता नहीं था.

मंगल देर तक रिक्शे में बैठा बड़बड़ाता रहा. काफी समय गुजर गया. कोई सवारी नहीं दिखी. तभी गली के मोड़ से एक सवारी आती हुई दिखायी दी. वो इधर-उधर देखता हुआ तेजी से उनकी तरफ चला आ रहा था. गर्मी के मारे वो परेशान दिखाई दे रहा था. उसके चेहरे से पसीना भरभराकर गिरा जा रहा था. गुस्से में वो बार-बार अपने चेहरे को अंगोछे से रगड़ रहा था. मानो चमड़ी ही नोच कर फेंक देना चाहता हो !

वो मंगल के करीब आकर बोला, ‘‘रमोलाबाग चलोगे?’’

‘‘‘बैठिये. क्यों नहीं चलूंगा.’’ मंगल जल्दी से नीचे उतरता हुआ बोला. वह एक नजर मेहरू पर डाल, अंगोछे से अपने चेहरे पर बह आए पसीने को पोंछ, उस आदमी का चेहरा देखने लगा. मंगल के चेहरे पर दबी-सी एक खुशी थी कि सवारी उसके पास आई थी. अब वो सवारी को किसी भी तरह जाने नहीं देना चाहता था. सवारी को मंगल के पास जाते देखकर मेहरू का चेहरा उतर आया था. मंगल की तरफ देखकर वो फिक्क् से हंस दिया. सवारी को आते देखकर कैसे उसका मन खिल उठा था. इतनी देर में उसने क्या-क्या सोच लिया था कि अब उसके बच्चे की दवाई आ जाएगी. घर में कुछ राशन-पानी भी आ जाएगा. लेकिन ... सवारी तो मंगल के पास चली गई थी. वो चुपचाप मंगल की ओर देखने लगा था.

सवारी कह रही थी, ‘‘कितना लोगे?’’

‘‘जी, रमोलाबाग काफी दूर है. अस्सी लगेंगे.’’ कहकर मंगल सवारी का चेहरा देखने लगा.

‘‘क्या?’’

‘‘जी.’’

सवारी ने मुंह बनाया और बोला, ‘‘पागल हो? इतना लगता है?’’

‘‘बाबूजी, देख रहे हैं कितनी गर्मी पड़ रही है. गर्मी के मारे लोग अपने घरों में दुबके हुए है. बाहर ही नहीं निकल रहे हैं. ऐसे लू-अंधड़ में लोग अपनी जान की परवाह करते हुए घरों में पड़े हैं और एक हम लोग हैं, जो आप लोगों के लिए इतनी गर्मी में खड़े हैं. पता नहीं कब आपको हमारी जरूरत पड़ जाये. सुबह से बैठा हुआ हूं, अभी तक एक भी सवारी नहीं मिली. गर्मी में जान दिए जाते हैं. किराया गलत नहीं मांग रहा हूं.’’

‘‘साठ दूंगा.’’ सवारी ने संशय से देखते हुए कहा. सवारी की गरज़ देखकर मंगल अड़ा, ‘‘नहीं. अस्सी लूंगा. दो-चार कम देना हो तो और बात है. चलना हो तो चलिए, नहीं तो कोई नहीं जाएगा ऐसी गर्मी में अपनी जान देने.’’ कहकर मंगल अपने रिक्शे पर आकर बैठ गया और जे़ब से एक बीड़ी निकालकर, सुलगाते हुए, इधर-उधर देखने लगा. जैसे कुछ हुआ ही न हो.

सवारी का दिमाग भन्ना गया. वो बड़बड़ाते हुए बोला, ‘‘बहुत चर्बी चढ़ गई है! अभी सवारी न मिले तो साले भूखों मरने लगो. गर्मी के मारे और कोई साधन नहीं मिलता इसलिए इतना भाव खा रहे हो. दो-चार खड़े होते तो पता चलता.’’ सवारी ने मेहरू की तरफ देखकर कहा, ‘‘ये तुम चलोगे?’’

मेहरू मंगल का मुंह देखने लगा. उसका वश चलता तो वो उसे साठ क्या पचास-पचपन में ही पहुंचा देता. क्या करे? उसकी समझ में नहीं आ रहा था. कहीं मंगल बुरा न मान जाये?

मंगल से मन-मुटाव न हो इस डर से मेहरू चुप रहा और वही कहा जो मंगल ने कहा था. आज मंगल न होता तो कितना अच्छा होता. मंगल की बात न माने तो राजी-खुशी चल पड़े. कम से कम बच्चे की दवा तो आ ही जाएगी. बेबसी के मारे मेहरू अपने होंठ काटने लगा और मायूसी से सवारी की ओर देखने लगा.

‘‘बाबूजी, बहुत गर्मी है. आप खुद समझदार हैं. अस्सी से कुछ कम दे दीजिएगा. साठ तो बहुत कम है.’’ मेहरू हकलाते हुए बोला. डरा कहीं सवारी उससे भी गुस्सा न हो जाए.

सवारी का पारा चढ़ा हुआ था. वो गुस्से में भरकर बोला ‘‘तुम भी उसकी जबान बोलते हो. आखिर क्यों न बोलो, भाई-बंधु जो हो उसके.’’ गुस्से से जमीन पर गंदा थूकते हुए बोला, ‘‘आखिरी बार पूछ रहा हूं, चलोगे कि नहीं?’’

मंगल बोल पड़ा, ‘‘अरे, काहे को टाइम खोटी करते हैं साहब. जाओ कोई दूसरा देखो. कबसे माथा खराब कर रहे हो.’’ मंगल अपने कान से मैल निकालते हुए बोला. उसके स्वर में हंसी का भाव था.

‘‘कैसी बात करता है बे! बात करने की तमीज़ नहीं है? अभी दो हाथ लगाऊंगा तबीयत ठीक हो जाएगी.’’ सवारी फुफकारा.

‘‘ऐ-ऐ! गाली-गलौज़ न करना. कहे देता हूं. शराफत से कहता हूं चले जाइए. आपके बस का नहीं है जाना. बस पैसा अंटी में दबाकर रखो. खेल-तमाशे में हजारों लुटा दोगे लेकिन किसी बेबस, लाचार को देने में नानी मरती है. अब ये भी नहीं जाएगा. हमारे मुंह लगने की कोशिश न करो, नहीं तो बेकार में ही अपना मुंह चुराते फिरोगे.’’ गुस्से के मारे चेहरा लाल हो आया था मंगल का. फिर धीरे से हंस पड़ा. एक बार तो उसका मन हुआ कि रिक्शे से उतरकर एक चांटा लगा दे. फिर पता नहीं क्या सोचकर बैठा रहा.

‘‘देख लूंगा तुझे. समझ क्या रखा है तूने मुझे.’’ सवारी का चेहरा गुस्से से जल रहा था. उसका वश चलता तो वो मंगल को मारकर गिरा देता लेकिन किसी तरह स्वयं को वश में किए हुए था. छोटे लोगों के मुंह लगने का मतलब खुद को ही बेइज्जत करना था. वो मन मारकर रह गया.

‘‘मैंने क्या किया है बाबूजी, जो इस पचड़े मुझे घसीट रहे हैं.’’ मेहरू डरते-डरते बोला. सोचा कहीं उसकी बात से मंगल नाराज न हो जाए. मेहरू ने बेबसी से मंगल की ओर देखा. वो आराम से बीड़ी के सुट्टे लगा रहा था और सीट पर पैर रखे हुए था. सवारी ने गुस्से से एक नज़र मंगल की ओर देखा फिर इधर-उधर देखा कोई साधन दिखाई नहीं दिया. सड़क सुनसान थी. पेड़-पौधे गर्मी के मारे चीत्कार रहे थे. सवारी भुनभुनाता हुआ कुछ देर खड़ा सोचता रहा.

मेहरू निरीह भाव से देख रहा था. सवारी ने एकबार फिर मेहरू की तरफ देखा और कहा, ‘‘क्या कहते हो ? चलोगे?’’

मेहरू असमंजस में था. क्या करे? उसने मंगल की ओर देखा. वो तन्मयता पूर्वक बीड़ी फूंक रहा था. उसे यकीन था कि मेहरू नहीं जाएगा. वो मन ही मन मज़ा ले रहा था.

मेहरू हाथ आई सवारी को जाने नहीं देना चाहता था. उसने सवारी की तरफ देखा. मेहरू की आंखों में लाचारी थी. सवारी ने देखा फिर बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ गया. मेहरू निराश हो गया. सवारी कुछ दूर जा कर रुक गई. कोई साधन दिखाई नहीं दे रहा था. वो कुछ देर चुपचाप खड़ा सोचता रहा फिर वापस लौट पड़ा.

सवारी को वापस आते देखकर मंगल खुशी से चहकते हुए बोला, ‘‘देखा, वापस आ रहा है. आखिर जाएगा कहां?’’ मंगल संभलकर बैठ गया. मेहरू ने भी देखा. उसके मन में एक सवाल था. वो किसके पास जाएगा ? मंगल से हुई तकरार से उसे कुछ उम्मीद थी. वो बेसब्री से देखने लगा.

सवारी पास आई. दोनों टकटकी लगाए उसे देख रहे थे. मंगल रिक्शे से उतरता हुआ बोला, ‘‘आइए बाबूजी. चलिए, छोड़ देता हूं. आप भी बेकार की बातों में समय खराब करते हैं. अब तक तो पहुंच भी गए होते.’’

सवारी ने उसकी तरफ देखा. फिर मेहरू के रिक्शे पर बैठते हुए बोला, ‘‘मालूम है न कहां चलना है ?’’

‘‘हां-हां, बाबूजी. म-मालूम है.’’ मेहरू को जैसे विश्वास नहीं हुआ कि सवारी उसके रिक्शे पर बैठी है. मारे खुशी से उसकी जबान चिपक गई. मन में दबी-दबी सी खुशी छा गई. चेहरा खिल उठा. आंखों में आंसू आ गए.

मंगल खिसियाया. बोला, ‘‘तू नहीं जाएगा मेहरू.’’

‘‘क्यों, क्यों नहीं जाऊंगा मैं?’’ मेहरू गुस्से से बोला.

‘‘ऐसे ही. देखा नहीं, ये कैसे लड़ रहा था. तू अपने दोस्त की बात नहीं मानेगा?’’ मंगल ने डराने की कोशिश की.

मेहरू ने कहा, ‘‘जो बात हुई थी उस पर मैं अटल था. अब मैं जाता हूं.’’

‘‘मेहरू ...’’ मंगल ने आवाज दी.

मेहरू ने एक नहीं सुनी और रिक्शा लेकर तेजी से चल पड़ा. मंगल गुस्से से मेहरू को जाते हुए देख रहा था और आवाजें लगा रहा था. लेकिन मेहरू ने उसके चीखने-चिल्लाने पर कोई ध्यान नहीं दिया. वो तेजी से रिक्शा ढेलता जा रहा था. वो निश्चिंत था क्योंकि उसने अपना वादा निभा दिया था.

मेहरू को अब गर्मी का अहसास नहीं हो रहा था. वो सोच रहा था अब उसके बच्चे की दवा आ जाएगी. एकाध सवारी और मिल गई तो खाने-पीने का कुछ सामान भी हो जाएगा. ऐसे ही कितनी बातें सोचता हुआ वो तेजी से चला जा रहा था. उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे. इससे पहले उसने कितनी सवारियों को लादा था लेकिन ऐसा सुकून उसे कभी नहीं मिला था. जितना उसे आज मिल रहा था.

सूरज सिर पर आ गया था. गर्मी का तांडव जारी था. सवारी मंगल को गालियां दे रही थी. मेहरू चुपचाप सुन रहा था. वो अपने रिक्शे को जल्दी-जल्दी ढेल रहा था ताकि उसे गंतव्य स्थान पर पहुंचाकर अपने घर की ओर भाग सके. अपने बच्चे को वैद्य या डॉक्टर को दिखा सके.

धीरज श्रीवास्तव

परिचयः
जन्मः 23 अक्टूबर 1976, प्रतापगढ़
भाषाः हिन्दी, अंग्रेजी
विद्याएँः कविता, कहानी, गज़ल, नज़्म, एकांकी/नाटक, उपन्यास
शिक्षाः एम.ए.(दर्षन शास्त्र)

कृतियाँः
गज़़ल संग्रहः कुछ फूल और भी हैं (साझा) सन् 2001
संपादनः हिन्दुस्तान एकादमी, इलाहाबाद
गज़़ल संग्रहः काव्य स्पर्श (साझा) सन् अगस्त 2019 में
संपादनः कवि अनुभव शर्मा द्वारा, दिल्ली
नाटकः गालिब की एक शाम (चयनित) प्रकाषित सन् दिसम्बर 2019
प्रकाशनः प्रतिश्रुति प्रकाषन, कोलकाता
रेडियो नाटकः
1.गालिब की एक शाम (2018)
2.बारिष में कविता (2019)
संपादनः इलाहाबाद आकाषवाणी से प्रसारित

संपर्कः
212/133/12ए, पीताम्बर नगर, तेलियरगंज, इलाहाबाद-211004

फोनः
09616222135
ई-मेलः
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