अंधेरा घिरे काफी वक्त हो गया था। बाजार में कुछ देर तक लोगबाग खरीदारी करते रहे। फिर यहाँ की रौनक उजड़ने लगी। रिहायशी इलाकों के बीच बने पार्को में बैठने और टहलने वाले भी एक-एक करके घर जाने लगे। नुक्कड़ों पर चाय के स्‍टॉल जरूर अभी गुलजार थे। कुछ शौकीन किस्म के लोग मजमा लगाए हुए थे। शहर की मुख्य सड़कों पर अभी भी गाड़ियाँ कभी-कभार गुजर जाती थीं। वैसे तो इस शहर की आबादी दस लाख से ज्यादा थी पर यहाँ के ज्यादातर बाशिंदों का मिजाज कस्‍बाई था। महंगी कारों को रास्‍ता बनाने के लिए गाय-भैसों के बीच से गुजरना पड़ता था। राधे ने अभी कुछ देर पहले नुक्‍कड़ के टी स्‍टॉल पर चाय पी थी। दरअसल वह खाना चाहता था। तेज भूख लगी थी। लेकिन जेब में इतने नोट नहीं थे कि गाँव जाने के किराए का भी बंदोबस्त हो जाए और पेट की जठरागिनी भी कर ले। इसलिए मामले को टाल रहा था। बस कल सुबह तक की बात है। मालिक कुछ न कुछ उधार दे देगा। तब वह पहली गाड़ी से निकल जाएगा। आखिर इतने दिन वहाँ काम किया है। इतना भरोसा तो करेगा ही। इंसानियत भी कोई चीज है। लेकिन इंसानियत का ख्‍याल आते ही उसका यह भरोसा डगमगाने लगा। किसके लिए इसका नाम ले बैठा। इतनी ही इंसानियत होती तो हर बात पर मजदूरी नहीं काटता। जब मैकू का पैर हादसे में कट गया था तो मालिक ने मामले को औने-पौने दाम देकर रफा-दफा करवाया था। कानून के हिसाब से लाखों मिलने चाहिए थे लेकिन मिले कितने..! खैर छोड़ो। कल वह उससे पैसे जरूर माँगेगा।

सड़क पर चलते हुए उसे काफी समय हो गया था। पाँव थक रहे थे। कहीं बैठकर कुछ भोजन-पानी की आवश्यकता बड़ी शिद्दत से अनुभव कर रहा था। वह पेट की क्षुधा से जूझने लगा। सड़क के किनारे स्थित ढाबे में पकती तंदूरी रोटी की महक ने मनोवेगों को तीव्र कर दिया। चलो जो होगा देखा जाएगा। मेहनत करने वाला खाएगा नहीं तो कैसे जीएगा। चार रोटी और दाल से काम चल जाएगा। मेज पर खाते लोगों की भीड़ थी। राधे एक कोने में जगह पाने में सफल रहा। वह बैठा ही था कि एक आदमी सामने आकर ठसक से पसर गया। वहाँ से अभी-अभी कोई खाकर उठा था। जूठे बर्तन पड़े थे।

''अरे भई कहाँ मर गए। गर्मागर्म रोटी और मटन दो।'' वह आदमी जोर से चिल्लाया। राधे को बड़ा अजीब लगा। उसकी रोटी और दाल आ गयी थी। उसने खाना शुरु कर दिया। एक बार सोचा कि आलू-मटर की सब्जी भी मँगा ले। लेकिन टाल गया। जेब का आखिरी सिक्का निकाल देना कहाँ की समझदारी है। खाते हुए उसे अनिर्वचनीय आनन्द मिल रहा था। तभी सामने बैठे व्यक्ति ने मौज में कुर्सी पर दोनों हाथ पीछे कर जँभाई ली और अपना पैर उसके घुटने से टकरा दिया। राधे सहसा अचकचा गया। खाते हुए उसने आँखें तरेर कर उसे घूरा। पर वह अनजान बना उसी मुद्रा में पड़ा रहा। बड़ा बदतमीज है। वह झगड़ा नहीं करना चाहता था अतः खाने में मशगूल रहा। ऐसे ऐरे-गैरे आते रहते हैं। अपनी गाढ़ी कमाई के खाने के आनन्द से क्‍यों वंचित रहे। थोड़ी देर में सामने वाले का खाना आ गया। मटन की खुशबू पूरे मेज पर व्याप्त हो गयी। उसे अब तक दाल-रोटी का स्‍वाद बहुत बढ़िया लग रहा था परंतु गोश्‍त को देखकर इस आनन्द पर आंशिक रुप से पानी फिर गया। उस आदमी ने मक्खन की टिकिया अलग से मँगवा कर रोटी पर लगायी। सलाद भी पहले से मौजूद था। बढ़ी हुई दाढ़ी-मूँछ वाले उस व्यक्ति का हुलिया एक छँटे हुए बदमाश की भाँति था। अच्छा हुआ उसके पाँव लगने पर कुछ नहीं कहा वरना क्‍या पता कि चाकू-छुरा निकाल ले। कनखियों से उसके खाने को देखकर वह शेष भोजन समाप्त करने लगा।

'अरे भाई जरा गोश्‍त चखो। मजेदार जायका है।'' सहसा उस आदमी ने उसे सम्‍बोधित करके कहा। एक अनजान आदमी का यह प्रस्ताव उसे हैरान कर गया। ''नहीं बस जी, पेट भर गया।'' राधे ने कहा।

''तुम तो उस्‍ताद परायों जैसा बोल रहे हो।'' वह बेहद बेतकल्‍लुफी से बोला। ''लो एकाध बोटी चखो। गोश्‍त तो खाते होगे?'' उसने चम्मच से गोश्‍त के दो टुकड़े निकाल कर उसकी थाली में डाल दिया। वह हाथ से रोकना चाहता था परंतु यह सब त्वरित गति से हो गया। ''आप तो..।'' वह संकोच में था।

''खाओ प्यारे। अपना-पराया क्‍या होता है?'' आदमी का स्वभाव अभी आश्चर्यजनक रुप से मृदुल था। विश्वास नहीं हो रहा था कि वह ढाबे वालों से कितने कड़क अंदाज में पेश आया था। वह अब संकोच को तिलां‍जलि देकर रोटी के साथ गोश्‍त लपेटकर खाने लगा।

''मेरा नाम राजा उस्‍ताद है।'' सामने वाले ने स्‍वयमेव अपना परिचय देना प्रारम्भ किया। ''राजा घरवालों का रखा नाम है। उस्‍ताद चार लोगों ने अपना जलवा देखकर रख दिया। यहाँ से चाकू फेंकूँ तो दरवाजे पर खड़ा अच्छा भला आदमी ढेर हो जाएगा।'' वह हाथ से दूरी बताता हुआ बोला। राधे घबरा गया। न जाने किस आदमी से पाला पड़ गया। लेकिन फिर सब सामान्‍य हो गया। राजा उस्‍ताद ने तंदूरी चिकन भी ऑर्डर किया। मक्‍खन लगी और रोटियाँ आ गयी‍। कुछ समय पहले तक पेट भर जाने की बात करने वाला राधे इत्मीनान से राजा के साथ चिकन और मक्‍खनयुक्‍त तंदूरी रोटियाँ खा रहा था। एक अजनबी की अप्रत्याशित उदारता को कई पहलुओं से विश्लेषण करने की बजाए वह जीभ के वश में हो गया था।

खाना खत्म करने के पश्चात राजा ने बिल भरा। राधे ने अपनी दाल-रोटी का दाम अदा किया। ढाबे के लड़के को खिदमत के एवज में दस-दस के दो नोट देने के बाद राजा ने काउन्‍टर पर रखे सौंफ को मुठ्ठी में भर लिया। वह भी संकोच करते हुए एक चम्मच सौंफ लेकर चबाने लगा। बाहर निकल कर उसे राजा से विदा लेते हुए अफसोस व झिझक होने लगी। क्‍या कहे। कैसे शुक्रिया अदा करे। पर राजा ने सारा माहौल बदल दिया। ''जरा मेरे साथ चल यार। थोड़ी तफरीह करते हैं।'' उसे लगा कि खाना खाने के बाद उसे घूमने की आदत है। चलो एक चक्कर लगा लेने में हर्ज नहीं है। मुँह से सीटी बजाता हुआ राजा आसपास से गुजरते को लोगों अंधेरे में भी आँखें तरेर कर गौर से देखता। चलते-चलते अनायास ही राजा एक गली में मुड़ गया। अनजान जगह पाकर राधे ने संकोच छोड़कर कहा,''भई अब मैं तो निकलता हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद।''

''अजी धन्यवाद को गोली मारिए। थोड़ा टहलने से तुम काले नहीं हो जाओगे।'' वह उसके कन्‍धे को पकड़कर आगे धकेलने लगा। उसने अपना कन्‍धा छुड़ाकर अनिच्छा जाहिर की। परंतु साथ चलता रहा। ''रात बहुत हो गयी है। इतने अंधेरे में किधर जा रहे हो राजा उस्‍ताद।'' अंत में झक मारकर उसे बोलना पड़ा। ''इधर सब अपने लोग हैं। डर किस बात का..।'' वह अपने पैर के पंजों पर भालू की भाँति झूमता हुआ एक फिल्मी गाना गाने लगा।

सहसा राजा उस्‍ताद को कुछ ध्‍यान आया। ''चलो तुम्हें एक बढ़िया जगह ले चलता हूँ। घबराने की कोई जरूरत नहीं है। यह अपना इलाका है।'' वह उसका हाथ थामे एक मकान के सामने रुक गया। दरवाजा खटखटाने पर थोड़ी देर बाद अन्दर से कुछ बड़बड़ाने की आवाज आयी। ''कौन है?'' एक कर्कश स्वर गूँजा।

''दरवाजा खोलो हम तुम्हारे द्वार खड़े हैं।'' राजा ने मुँह में उंगली घुमाते हुए हाँक लगायी। एक दागदार चेहरे वाले इंसान ने किवाड़ खोला। हल्की पीली रोशनी में राधे ने देखा कि उस आदमी का चेहरा असंख्य उत्कीर्ण चिन्ह वाले सिलबट्टा सद्दश्‍य था। राजा को देखकर वह सम्मान से पीछे हो गया। ''अरे गुरुदेव आप इस वक्‍त?  कैसे रास्ता भटक गए?''

''हम इस वक्त ही शिकार पर निकलते हैं।‍'' वह अन्दर आ गया। ''सब ठीक है ना? कुछ पीने-पिलाने का बंदोबस्त करो वरना हम कहीं और की राह पकड़े।''

''जरा सांस तो लो। अभी सारा इंतजाम होता है।'' राधे ने देखा कि अधेड़ अवस्था का मध्यम कद वाला मनुष्य कुछ देर बाद शराब की बोतल, नमकीन, कटे प्‍याज इत्यादि लेकर हाजिर हो गया। ''चलो दोस्त भोग लगाते हैं।''

राजा शुरु हो गया। उसने एक गिलास बनाकर राधे को भी थमायी। पहला घूंट हलक के नीचे उतारने पर उसे ऐसा लगा कि बर्फी के धोखे में मुँह में साबुन डाल लिया है। ''आराम से पी भाई। यहाँ की दारु तेज होती है।'' राजा शान से बैठ कर आसव का पान कर रहा था।

''राजा उस्‍ताद तू सच्‍चा यार है।'' थोड़ा सरूर चढ़ने पर राधे बोला। इस पर राजा हो-हो करके अभद्रतापूर्वक हँसने लगा। जिस व्यक्ति की मुखाकृति पत्थर पर उत्कीर्ण निशान की तरह थी वह शायद उन दोनों का एक दूसरे का पुराना परिचित समझ रहा था। कमरे में एक अजीब सी शराब, धूल, गंदे चादर-तकिए आदि की मिश्रित गंध व्याप्त थी। खिड़की पर टँगा परदा इतना चिकट हो चुका था कि किसी वृक्ष की छाल का भ्रम दे रहा था। राधे को भूल कर दोनों पूर्व परिचित किसी विषय पर गहन विमर्श करने लगे। यह विमर्श निरंतर विकट होता जा रहा था। उसने ध्‍यान दिया कि राजा ने उस आदमी को कुछ सामान बेचा था। उसकी कीमत आज वसूलनी थी। दाम को लेकर द्वन्द्व चल रहा था। अन्त में उस व्यक्ति ने बिस्तर के गद्दे के नीचे से चन्द नोट राजा के हवाले किए। वे पुन: पीने लगे जैसे उनके मध्य कोई विवाद कभी था ही नहीं।

''अगली बार कोई खालिस चीज लाना।'' आदमी ने सिगरेट का पैकेट खोला। ''जरूर सारा शहर तेरे खानदान की जागीर है। यह सब काम जान हथेली पर लेकर होता है।'' राजा भी सिगरेट सुलगाने लगा। वातावरण में तीनों के सिगरेट से निकलते धुँए ने धुन्‍ध सा दृश्य प्रस्तुत कर दिया। 

''उस्‍ताद खाना खाओ। आज यही आराम फरमाओ।'' उस आदमी ने मेजबान के नाते पेशकश की।

      '''खाना खाकर आया हूँ। आराम हराम है। दारु पीकर निकलूँगा। जरूरी काम है।'' राजा तनिक भी नशे में नहीं दिख रहा था। वे दोनों एक दूसरे को अपने-अपने धंधे के बारे में तथा औरतों के विषय में विभिन्न प्रकार के किस्से सुना रहे थे। चटपटी चटनी की भाँति इन कहानियों का रसास्‍वादन करते हुए वे मदिरापान में निमग्न थे। बीच-बीच में जोर से दाद देकर, एक दूसरे पर लुढ़क कर वे एक दूसरे को परस्पर सुनाए जा रहे आख्यान को बहुरेखीय ही नहीं अपितु बहुध्‍वन्‍यात्‍मक भी बना रहे थे। पतझड़ में वृक्ष जिस प्रकार संकोच त्‍याग कर अनावृत हो जाता है उसी तरह राधे अपनी घरेलू चिन्ताओं व कामकाज सम्बन्धी दुश्‍चिंताओं का रेखाचित्र उनके सम्मुख उकेरने को उद्यत हो उठा।  धैर्य एवं रुचि के साथ श्रवण करने के उपरान्त राजा ने उसके कंधे पर एक धौल जमाया। ''नाहक दुबला मत हो भाई। इस दुनिया में चतुर सुजान अपना हिस्सा वसूल कर मानेगा और घोंचू टापता रह जाएगा। इंसानों की छोड़ो। ऊपर बैठे सारे देवता भी निठल्ले होते हैं। जैसे ही कोई बड़ा राक्षस सेना लेकर आता है तो स्वर्ग छोड़कर भाग खड़े होते हैं।'' राधे को लगने लगा कि सामान्य नश्वर प्राणी जैविक प्रक्रिया के विभिन्न स्तरों को पार करता हुआ एक दिन नष्ट हो जाएगा। इसलिए राजा के दर्शन में उसे दम दिखने लगा। बेफ्रिकी भरा जीवन कोई स्वतः स्फूर्त वस्तु न होकर एक सचेत कलात्मक निर्मिति होती है। 

वे पुन: सड़क पर पैदल चल रहे थे। रात काफी हो चली थी। कहीं-कहीं स्‍ट्रीट लाइट जल रही थीं वरना ज्यादातर रास्ते में अंधकार का साम्राज्य था। दूर कहीं से पुलिस वैन नजर आयी। राजा किसी जलचर की तरह अंधकार के समुद्र में डुबकी मार गया। राधे को कुछ समझ में नहीं आया कि वह कहाँ गया। जब वैन निकल गयी तो कहीं से वह किंकर्तव्‍यविमूढ़ खड़े राधे के कंधे पर पीछे से थपकी देकर हाजिर हो गया। चकाचौंध करने वाली रोशनी में परछाई नहीं रहती है। इंसान की परछाई के लिए धुँधलापन जरूरी है। ''मुझे रेलवे स्‍टेशन पर रात बितानी है। सुबह की ट्रेन है।'' आखिर राधे ने बेचैन होकर यथार्थ बयान किया। टिकट के पैसे नहीं बचे हैं। समझ में नहीं आता कि क्या करूँ। लम्बा सफर है। बेटिकट पकड़ा गया तो जेल भी हो सकती है। जेब में थोड़ी माया मौजूद हो तो घरवाले प्रसन्न होंगे। उनकी भी कुछ अपेक्षाएँ हैं।

राजा पहली बार गंभीर हुआ। आँख मिचमिचाकर कुछ पल सोचने के बाद बोला। ''फिक्र मत करो बाबूजी। तुम राजा उस्‍ताद के साथ हो जो सारा शहर जेब में लिए घूमता है। कुछ करता हूँ।''

''पहले तो वापस चलो।..मैं सारी रात घूमता नहीं रहूंगा।'' वह खीझ रहा था। इसलिए उसके आश्वासन को भी गंभीरता से नहीं लिया। यह कमबख़्त खुद को क्‍या समझता है। खिला-पिला कर उसे अपना स्‍वामिभक्‍त अनुचर बना लेगा। भौतिक दारिद्र्य को वह मानसिक दासता में परिवर्तित नहीं होने देगा।

दूर से एक बस आती दिखी। राजा ने हाथ का इशारा दिया। बस आगे स्‍टैण्‍ड पर जाकर रुकी। ''जान हथेली पर रखकर भागो प्यारे।'' राजा दौड़ लगाते हुए चिल्लाया। बस के चलते न चलते वह चढ़ गया। राधे पीछे से आ रहा था। ''अबे हट बे। देखता नहीं कोई चढ़ रहा है।'' राजा ने एक यात्री से डपटते हुए कहा। वह यात्री इस अप्रत्याशित व्यवहार पर हैरान हो गया। ''क्‍यों चिल्ला रहे हो।''

''अरे बड़ा लाट साहब बनता है। बस से उतार कर तेरी आरती उतारू क्‍या?'' राजा उससे भिड़ने को हो गया। तब तक वह भी बस में चढ़ गया था। ''जाने दो राजा उस्‍ताद।'' उसने बीच-बचाव किया। राजा सीधे बस के आगे के हिस्से में पहुँच गया। भीड़ को चीरते और लोगों को खामखाह धकेलते हुए जो उसे बेहद नाराजगी से घूर रहे थे। वह भी उसके द्वारा बनाए रास्ते का लाभ उठाकर आगे बढ़ गया।

''यह बस रेलवे स्‍टेशन जाती है ना?'' राधे ने एक यात्री से पूछा।

''नहीं जी किसने कह दिया।'' वह यात्री झुँझलाया। ''यह कहीं और जा रही है।''‍

उसे बड़ा गुस्‍सा  आया। इस राजा ने खामखाह की दौड़ तो ऐसे लगवायी मानो सीधे स्‍टेशन ही पहुँच रहे हैं।

''इस बस को रुकवाओ।'' वह हड़बड़ाकर राजा से बोला।

''हाँ तो हम उतर ही रहे हैं।'' उसने संतुलित स्वर में उत्तर दिया। कोई हड़बड़ी नहीं थी। राधे को बेहद गुस्सा आ रहा था।

''लो यार इसे पकड़ना।'' राजा ने उसकी हथेली में कुछ ठूस दिया। एक मुलायम सी गुलगुली चीज थी। राजा आगे के दरवाजे पर खड़ा हो गया। अगले स्‍टैण्‍ड पर बस के रुकते न रुकते राजा फुर्ती से उतर गया। वह भी उसके पीछे उतरा।

''यह क्‍या है?'' उसने पूछते हुए मुठ्ठी खोली। अरे यह तो पर्स है।

राजा ने पर्स उसके हाथ से लेकर उसे खोला।

''जरा यह देखो कि माल कितना है।''

अन्दर हजार-पाँच सौ के चंद नोटों के साथ सौ-सौ के भी कई नोट थे। राजा ने उसे और खंगाला। एकाध फोटो और कार्ड भी मिले। नकदी रखने के बाद उसने पर्स को नाली के हवाले किया।

''हाँ तो तुम कह रहे थे कि रास्‍ते का किराया चाहिए। यह पकड़ो।'' उसने पाँच सौ के एक नोट के साथ सौ के दो नोट उसे थमाए। राधे की मुखाकृति पर तनाव उभरा। कैसे यह पैसा रख ले। वे अत्यन्त संकोच व संशय में था। अन्‍ततोगत्‍वा उसके चेहरे पर ऐसा भाव प्रकट हुआ जो शब्दातीत था। रुपए उसने पकड़ लिए।

राजा हँसने लगा। पेट की आग और जीवन की क्षुद्र लालसाओं की त्रिज्‍या से उकेरे गए अपने वृत्त की परिक्रमा करते सारे इंसान भूख और लालच के सामने एक समान आचरण करते हैं। ''यार अभी से स्‍टेशन पर जाकर तू क्‍या करेगा? टांग पसार कर सोएगा। सो तो ट्रेन में भी कर सकता है। रात अपनी है। चल किसी दूसरी बस पकड़ते हैं।''

''ना रहने दो।''

राधे अब तक नोट रूपी उन आंधी के आम को जेब के हवाले कर चुका था। एक खाली ऑटो को रोककर वह फौरन उसपर बैठ गया।

''स्‍टेशन चलना है।'' ऑटो चल दी। उसने पीछे पलटकर राजा उस्‍ताद की ओर देखा तक नहीं। राजा कुछ देर ऑटो को देखता रहा। प्रेतात्‍माएँ और मर्त्‍य-जन सामान्‍यत: एक-दूस‍रे की दुनिया में हस्‍तक्षेप नहीं करते हैं। परंतु एकाध दुलर्भ अवसरों पर दो ग्रहों की भाँति एक दूसरे के सामने आ जाते हैं। राजा ने जेब से सिगरेट निकालकर सुलगाने का उपक्रम प्रारम्‍भ किया।

''जौ भर नाता गाड़ी भर आशनाई से अच्‍छा है। अपने गिरोह का आदमी ऐसा कतई नहीं कर सकता था।''

वह हाथ झटकता हुआ बड़बड़ाया और मुड़कर एक अंधेरी गली में ओझल हो गया।

मनीष कुमार सिंह

विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं यथा-हंस,नया ज्ञानोदय, कथादेश,समकालीन भारतीय साहित्‍य,साक्षात्‍कार,पाखी, दैनिक भास्‍कर, नयी दुनिया, नवनीत, शुभ तारिका, अक्षरपर्व,लमही, कथाक्रम, परिकथा, शब्‍दयोग, ‍इत्‍यादि में कहानियॉ प्रकाशित। सात कहानी-संग्रह ‘आखिरकार’(2009),’धर्मसंकट’(2009), ‘अतीतजीवी’(2011),‘वामन अवतार’(2013), ‘आत्‍मविश्‍वास’ (2014), ‘सांझी छत’ (2017) और ‘विषयान्‍तर’ (2017) और एक उपन्‍यास ‘ऑंगन वाला घर’ (2017) प्रकाशित। ‘कथा देश’ के अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता 2015 में लघुकथा ‘शरीफों का मुहल्‍ला’ पुरुस्‍कृत।

भारत सरकार, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में प्रथम श्रेणी अधिकारी के रूप में कार्यरत।

विस्तृत रचनात्मक बायो

लिखने की शुरुआत पढ़ने से होती है। मुझे पढ़ने का ऐसा शौक था कि बचपन में चाचाजी द्वारा खरीदी गई मॅूँगफली की पुड़िया को खोलकर पढ़ने लगता था। वह अक्‍सर किसी रोचक उपन्‍यास का एक पन्‍ना निकलता। उसे पढ़कर पूरी किताब पढ़ने की ललक उठती। खीझ और अफसोस दोनों एक साथ होता कि किसने इस किताब को कबाड़ी के हाथ बेच दिया जिसे चिथड़े-चिथड़े करके मूँगफली बेचने के लिए इस्‍तेमाल किया जा रहा है। विश्‍वविद्यालय के दिनों में लगा कि जो पढ़ता हूँ कुछ वैसा ही खुद लिख सकता हूँ। बल्कि कुछ अच्‍छा....।

विद्रुपता व तमाम वैमनस्‍य के बावजूद सौहार्द के बचे रेशे को दर्शाना मेरे लेखन का प्रमुख विषय है। शहरों के फ्लैटनुमा घरों का जीवन, बिना आँगन, छत व दालान के आवास मनुष्‍य को एक अलग किस्‍म का प्राणी बना रहे हैं। आत्‍मीयता विहीन माहौल में स्‍नायुओं को जैसे पर्याप्‍त ऑक्‍सीजन नहीं मिल पा रहा है। खुले जगह की कमी, गौरेयों का न दिखना, अजनबीपन, रिश्‍ते की शादी-ब्‍याह में जाने की परम्‍परा का खात्‍मा, बड़े सलीके से इंसानी
रिश्‍ते के तार को खाता जा रहा है। ऐसे अनजाने माहौल में ऊपर से सामान्‍य दिखने वाला दरअसल इंसान अन्‍दर ही अन्‍दर रुआँसा हो जाता है।

अब रहा सवाल अपनी लेखनी के द्वारा समाज को जगाने, शोषितों के पक्ष में आवाज उठाने आदि का तो, स्‍पष्‍ट कहूँ कि यह अनायास ही रचना में आ जाए तो ठीक। अन्‍यथा सुनियोजित ढंग से ऐसा करना मेरा उद्देश्‍य नहीं रहा। रचना में उपेक्षित व‍ तिरस्‍कृत पात्र मुख्‍य रुप से आए हैं। शोषण के विरुद्ध प्रतिवाद है परन्‍तु किसी नारे या वाद के तहत नहीं।

 लेखक एक ही समय में गुमनाम और मशहूर दोनों होता है। वह खुद को सिकंदर और
हारा हुआ दोनों महसूस करता है। शोहरत पाकर शायद स्वयं को जमीन से चार अंगुल ऊँचा समझता है लेकिन दरअसल होता वह अज्ञात कुलशील का ही है। घर-समाज में इज्जत बहुत हद तक वित्तीय स्थिति और सम्पर्क-सम्पन्नता पर निर्भर करती है। कार्यस्थल पर पद आपके कद को निर्धारित करता है। घर-बाहर की जिम्‍मेवारियाँ निभाते और जीविकोपार्जन करता लेखक उतना ही साधारण और सामान्‍य होता है जितना कोई भी अपने लौकिक उपक्रमों में होता है। हाँ, लिखते वक्त उसकी मनस्थिति औरों से अलग एवं विशिष्‍ट अवश्य होती है। एक पल के लिए वह अपने लेखन पर गर्वित, प्रफुल्लित तो अगले पल कुंठा व अवसाद में डूब जाता है। ये विपरीत मनस्थितियाँ धूप-छाँव की तरह आती-जाती हैं।

दुनिया भर की बातें देखने-निरखने-परखने, पढ़ने और चिन्तन-मनन के बाद भी लिखने के लिए भाव व विचार नहीं आ पाते। आ जाए तो लिखते वक्त साथ छोड़ देते हैं। किसी तरह लिखने के बाद प्रायः ऐसा लगता है कि पूरी तैयारी के साथ नहीं लिखा गया। कथानक स्पष्ट नहीं कर हुआ, पात्रों का चरित्र उभारने में कसर रह गयी है या बाकी सब तो ठीक है पर अंत रचना के विकास के अनुरूप नहीं हुआ। एक सीमा और समय के बाद रचना लेखक से स्वतंत्र हो जाती है। शायद बोल पाती तो कहती कि उसे किसी और के द्वारा बेहतर लिखा जा सकता था।

 मनीष कुमार सिंह
एफ-2,/273,वैशाली,गाजियाबाद,
उत्‍तर प्रदेश। पिन-201010
09868140022
ईमेल:manishkumarsingh513@gmail.com

अंधेरे की परछाइयाँ

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