... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

. रमाकांत शर्मा – संक्षिप्त परिचय

(जन्म तथि-10 मई 1950)

  • शिक्षा – एम.ए. अर्थशास्त्र, एम.कॉम, एलएल.बी, सीएआइआइबी, पीएच.डी(कॉमर्स)

  • पिछले लगभग 40 वर्ष से लेखन कार्य से जुड़े

  • लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां, व्यंग्य, कविताएं, अनुवाद आदि प्रकाशित

  • प्रकाशित कहानी संग्रह –

1.नया लिहाफ

2.अचानक कुछ नहीं होता

3.भीतर दबा सच  

4. सूरत का कॉफी हाउस और अन्य अनमोल कहानियां (अनूदित कहानी संग्रह)

5. कबूतर और कौए (व्यंग्य संग्रह)

  • विश्व की कई श्रेष्ठ कहानियों का हिंदी में अनुवाद

  • रेडियो (मुंबई) पर नियमित रूप से कहानियों का प्रसारण

  • यू.के. कथा कासा कहानी प्रतियोगिता प्रथम पुरस्कार

  • महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी प्रथम पुरस्कार

  • कमलेश्वर स्मृति कहानी पुरस्कार

  • अखिल भारतीय स्तर पर अन्य कई कहानियां पुरस्कृत

  • बैंकिंग विषयों पर हिंदी में संदर्भ साहित्य सृजित करने के लिए महामहिम राष्ट्रपति जी के हाथों पुरस्कृत

  • बैंकिंग और उससे संबंधित विषयों पर हिंदी में प्रकाशित पुस्तकें -वित्तीय समावेशन

-व्यावसायिक संप्रेषण (सीएआइआइबी के पाठ्यक्रम में शामिल) -बैंकिंग-विविध आयाम

-प्रबंधन–विविध आयाम -इस्लामी बैंकिंग और वित्त व्यवस्था -कार्ड बैंकिंग

- बैंकिंग, प्रबंधन आदि विषयों पर प्रोफेशनल पत्र-पत्रिकाओं में लेखों का नियमित प्रकाशन

  • बैंकिंग/अर्थशास्त्र/अभिप्रेरण और राजभाषा आदि विषयों पर बैंकों तथा सरकारी एवं गैर-सरकारी शिक्षण/प्रशिक्षण संस्थानों में व्याख्यान

  • जेजेटी विश्वविद्यालय, राजस्थान में पीएच.डी (वाणिज्य) के गाइड/सुपरवाइज़र के रूप में पंजीकृत

  • भारतीय रिज़र्व बैंक से जनरल मैनेजर के रूप में सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन

  • – 402 – श्रीराम निवास, टट्टा निवासी हाउसिंग सोसायटी, पेस्तम सागर रोड नं. 3, चेंबूर, मुंबई -400089  मोबाइल 9833443274 ईमेल – rks.mun@gmail.com/

जूते की नोक पर

दिनेश बाबू ने कभी किसी की परवाह नहीं की। वे कहा भी करते थे – “जब मैंने अपने बाप की परवाह नहीं की तो किसी और की परवाह क्यों करूं”। हर किसी को जूते की नोक पर रखने का बल उन्हें शायद स्वयं भगवान ने दिया था। खाते-पीते घर में पैदा हुए थे। मां के इतने लाड़ले थे कि वह आंचल बिछाए हमेशा उनके आगे-पीछे दौड़ती रहती। दिनेश बाबू के मुंह से बस कुछ निकल भर जाए, वह उसे पूरा करने के लिए सारे घोड़े खोल देती। यहां तक कि अपने पति से भी भिड़ जाती। जब भी वे कहते – “दिनेश की मां यह लाड़ नहीं, बिगाड़ है”। तो वह हंस कर टाल जाती।

दिनेश बाबू पढ़ने में तो बहुत तेज थे ही, अच्छे कलाकार भी थे। पढ़ाई में हमेशा आगे रहने और छुटपन से ही नाटकों में भाग लेते रहने के कारण उन्हें खूब सराहना मिलती और दोस्तों की मंडली में वे नायक बने रहते। उन्हें इस बात का पूरा गुमान था कि वे सामान्य लोगों से थोड़ा हट कर हैं, उन्हें ईश्वर ने कुछ विशेष करने के लिए इस संसार में भेजा है। उनका कुछ व्यक्तित्व था भी ऐसा कि उनके आसपास के लोग उनसे कुछ दब कर रहते और उन्हें अतिरिक्त सम्मान देते। घर में तो बस कोई उनके सामने कुछ था ही नहीं। बाबूजी जो कुछ भी कहते मां की आड़ में वे उसे कतई अहमियत नहीं देते थे। धीरे-धीरे उनसे उनकी दूरी बढ़ती गई थी। ईश्वर ने उनकी बादशाहत कायम रखने के लिए ही शायद उन्हें कोई भाई नहीं दिया था। एक छोटी बहन थी जो हमेशा उनसे दूरी बनाए रखती क्योंकि उनका प्यार भी बड़े भाई होने के अहम् से ढका रहता।

मेधावी होने के कारण उन्हें अच्छी नौकरी मिल गई थी। उसके बाद तो उनके अहम् को और भी पर लग गए थे। उनका नाटकों में भाग लेना बदस्तूर जारी था। नाटकों में काम करने वाली कई लड़कियां उनके व्यक्तित्व से प्रभावित थीं और उनसे विवाह के सपने पालने लगी थीं। पर, दिनेश बाबू उन्हें दोस्ती तक ही सीमित रखते थे। उन्होंने तय कर लिया था कि वे कभी शादी नहीं करेंगे। उनकी नजर में शादी का मतलब गुलामी था जो उन्हें कतई मंजूर नहीं था। मां भी रो-धो कर हार गई थी, लेकिन इस मुद्दे पर उन्होंने मां की भी नहीं सुनी थी। उन्होंने साफ-साफ कह दिया था – “मां, मैं अपनी जिंदगी को खुल कर जीना चाहता हूं। मैं अपने को किसी भी बंधन में नहीं बंधने दूंगा। मेरी मानो, दादी बनने के सपने देखना बंद कर दो। बच्चों के बच्चों का सुख तुम्हें सजला दे ही देगी। उसके बच्चे तुम्हें नानी कह कर पुकारेंगे, क्या इतना काफी नहीं है”।

अपने तरीके से जिंदगी जीने वाले दिनेश बाबू ने अपने आपको बहुत व्यस्त कर लिया था। ऑफिस छूटते ही वे नाटकों की रिहर्सल के लिए निकल जाते। दोस्तों के साथ गपशप और पीने-पिलाने के दौर में आधी रात कब बीत जाती, उन्हें पता ही नहीं चलता। उन्होंने सोच लिया था कि वे वो सारे काम करके देखेंगे जिन्हें मना किया जाता है। जब संसार में आए हैं तो हर तरह का आनंद लेकर देखेंगे। यही सोच कर उन्होंने सिगरेट पीना, हर तरह का नशा करना और मांसाहारी भोजन करना शुरू कर दिया था। हां, यह सब वे घर से बाहर ही करते थे। उनके घर में तो मांसाहार के नाम पर अंडा भी नहीं आता था। सच कहें तो बाबूजी की अवहेलना करने में उन्हें बड़ा मजा आता, पर हमेशा अपने पक्ष में खड़ी रहने वाली मां को वे जानबूझकर दु:ख नहीं पहुंचाना चाहते थे।

दिनेश बाबू ने ऐसी कई परिपाटियां तोड़ीं जो न जाने कब से उनके घर में और समाज में चली आ रही थीं। यह सब करने में उन्हें अद्भुत सुख की अनुभूति होती। कौन उनके बारे में क्या कह रहा है, इसकी उन्हें न तो कोई परवाह थी और न ही वे उसके बारे में सोचते थे। उन्हें लगता था वे जैसी जिंदगी जीना चाहते थे, वैसी जी रहे थे और किसी की मजाल नहीं थी जो उन्हें ऐसा करने से रोक सके।  पर, इधर उन्हें कुछ दिन से लग रहा था जैसे वे अपने आपे में नहीं थे। विजया नाम की उस लड़की ने उनका जीना हराम कर दिया था। उठते-बैठते, सोते या फिर कुछ भी करते उसका चेहरा उनकी आखों के सामने घूमता रहता। कितनी ही लड़कियां उनके आगे-पीछे घूमती थीं, पर उन्हें कभी भी ऐसा अहसास नहीं हुआ था। उन्हें पता था, वह लड़की भी नजरें बचा-बचा कर उन्हें देखती थी और उनसे बात करने के लिए बहाने खोजती थी। नाटक के रिहर्सल के समय वह उनके साथ काम करते हुए रोमांटिक सीन को जिंदा कर देती। पर, दिनेश बाबू सब कुछ समझते हुए भी अनजान बने रहते। ऐसी कितनी ही लड़कियों को उन्होंने अपने जूते की नोक पर रखा था। इस बार पता नहीं ऐसा क्या हो रहा था कि वह अपने को संभाले नहीं संभाल पा रहे थे। ऊपर से वे कुछ भी दिखा रहे थे, लेकिन अंदर से वे चाहते थे विजया हमेशा उनके सामने बनी रहे।

उस दिन जब रात को नाटक खत्म हुआ तो वे दोस्तों से विदा लेकर घर के लिए चल दिए। वे एक पैर आगे बढ़ाते तो दूसरा पैर वहीं रुक जाता। उन्हें पता था, विजया अभी तक नहीं निकली थी। उनका दिमाग कह रहा था कि उन्हें विजया को कोई भाव नहीं देना है, पर दिल उसे एक नजर देखने के लिए बेचैन किए था। उन्होंने यूं ही पीछे मुड़कर देखा तो उन्हें विजया अपने स्कूटर पर आती नजर आई। वे अपनी जेबें टटोलते हुए इस मुद्रा में उसकी तरफ चलने लगे जैसे ग्रीन रूम में अपनी कोई जरूरी चीज भूल आए हों। विजया ने उनके पास पहुंच कर अपना स्कूटर रोका और पूछा – “कुछ भूल आए हैं क्या दिनेश बाबू? आइये मेरे स्कूटर पर बैठ जाइए मैं आपको लिये चलती हूं”।

“नहीं, नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। लग रहा था अपना पर्स वहीं भूल आया हूं। पर, वह अंदर की जेब में मिल गया है”।

“तो फिर मैं चलूं?” विजया ने कहा।

“तुम्हारी मर्जी है”। दिनेश बाबू ने कंधे उचकाते हुए कहा।

“मेरी मर्जी तो थोड़ी देर समुद्र के किनारे बैठ कर रात में किनारे से टकराती लहरों का आनंद लेने की है, चलेंगे आप?”

इस आकस्मिक निमंत्रण से दिनेश बाबू सकपका गए थे। फिर कुछ सोचते हुए  विजया के स्कूटर की पिछली सीट पर बैठ गए।

कुछ देर बाद वे दोनों समुद्र के किनारे रेत पर बैठे समुद्र की लहरों को तट से टकराते और फिर बिखर कर समुद्र में वापस जाते देख रहे थे। दोनों के दिलों में भी वैसी ही लहरें उठ रही थीं। इन लहरों का उद्वेलन उन्हें बेचैन किए था। पर, दिनेश बाबू अपने प्यार का खुद इजहार करें यह उनकी खुदी को मंजूर नहीं था।

आखिर विजया ने ही अपने मन की बात छेड़ी थी। उसने कहा था – “दिनेश बाबू, मेरे घर में मेरी शादी की बात बहुत जोर-शोर से चल रही है। पर, मैं अपनी पूरी जिंदगी आपके साथ बिताना चाहती हूं। आपकी आंखों में मैंने अपने लिए प्यार महसूस किया है, इसीलिए हिम्मत करके आज यह बात कह रही हूं। बोलो, क्या मुझसे शादी करोगे?”

दिनेश बाबू कुछ क्षण चुप रहे और फिर बोले – “यह सच है कि मैं कुछ समय से तुम्हारे बारे में ऐसा महसूस कर रहा हूं जैसा मैंने कभी किसी लड़की के बारे में महसूस नहीं किया। तुम्हारा साथ पाना चाहता हूं मैं, पर मैं शादी करने और बच्चे पालने के बंधन में नहीं बंधना चाहता”।

“क्या कहना चाहते हो तुम? बिना शादी किए तुम्हारे साथ रहूं मैं? यह मेरे संस्कार में नहीं है, और फिर मैं तो बच्चों के साथ अपना पूरा परिवार चाहती हूं। फिर, समाज नाम की भी तो कोई चीज है”।

“ऐसी-तैसी तुम्हारे समाज की। अगर हम दोनों एक-दूसरे को चाहते हैं तो फिर शादी करके या शादी के बिना साथ रहें इससे क्या फर्क पड़ता है। समाज हमारी कितनी परवाह करता है जो हम समाज की करें। कभी सोचा है, बच्चे होंगे तो क्या हम अपनी जिंदगी अपने तरीके से जी पाएंगे? मैं तो अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना चाहता हूं, बस। हां, तुम्हारा साथ मिलेगा तो मुझे अच्छा लगेगा”।

विजया ने दिनेश बाबू को हैरत से देखा। उन्हें हर तरह समझाने की कोशिश की, पर शीघ्र ही उसे समझ में आ गया कि वह पत्थर से सिर फोड़ रही है। उसने उठते हुए कहा – “अगर आपका मन बदल जाए तो मुझे जरूर बताना। मैं इंतजार करूंगी”।

दिनेश बाबू के जवाब का इंतजार किए बिना विजया वहां से चली गई। दिनेश बाबू कुछ समय वहां वैसे ही बैठे रहे। उन्हें इस बात का मलाल था कि वे विजया को अपने साथ रहने के लिए नहीं मना पाए थे। पर, उन्हें अपने सिद्धांत से समझौता करने का कोई ठोस कारण समझ में नहीं आ रहा था। फिर कोई लड़की उनसे अपनी बात सिर्फ इसलिए मनवा ले कि वह उन्हें अच्छी लगने लगी थी, यह उन्हें कतई मंजूर नहीं था।

नाटकों की रिहर्सल के दौरान वे लगभग रोज ही विजया से मिलते। विजया जितना जरूरी होता, उनसे बात करती। वे अपने स्वभाव के अनुसार यह दिखाने की कोशिश करते कि उन्हें किसी की कोई परवाह नहीं है। लेकिन, उस दिन जब विजया ने उन्हें भरी आंखों से यह बताया कि उसकी शादी तय हो गई है तो उनके दिल में कुछ कसका जरूर, पर उन्होंने उसे हंस कर बधाई दी और कहा था – “तुम बुलाओगी तो तुम्हारी शादी में जरूर आऊंगा”। विजया ने अजीब निगाहों से उन्हें घूरा था और फिर सिर झुका कर तुरंत ही वहां से चली गई थी।

उस दिन के बाद वह उन्हें फिर कभी दिखाई नहीं दी। उनकी नजरें उसे खोजती रहतीं। कुछ दिन बाद उन्हें एक दोस्त से पता चला कि विजया शादी करके किसी दूसरे शहर चली गई है। एक पल को उन्होंने ठगा सा महसूस किया था पर दूसरे ही क्षण अपने सिर को झटका देकर उन्होंने खुद से कहा था – “वह शादी करके चली गई तो आज मेरी जिंदगी से भी चली गई। मैंने कभी किसी की परवाह नहीं की, फिर विजया की ही क्यों करूं।

मां ने समझ लिया था कि वह दिनेश बाबू को शादी के लिए कभी मना नहीं पाएगी। सजला के लिए अच्छा रिश्ता आया तो उन्होंने बिना देर किए उसकी शादी कर दी। शादी के बाद वह जब भी अपने पति के साथ ससुराल से आती तो उसे इस बात का बहुत बुरा लगता कि दिनेश बाबू उसके पति के साथ ज्यादा बातचीत नहीं करते थे और कभी करते भी थे तो उन पर हावी होने और बेवजह नीचा दिखाने का काम करते थे। धीरे-धीरे उनके यहां उसका आना कम होता गया। मां और बाबूजी इस बात को लेकर परेशान रहते, पर दिनेश बाबू को इससे क्या फर्क पड़ता था।

ऑफिस में भी दिनेश बाबू अपने वरिष्ठों से उलझ जाते। उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि कोई भी उन पर हुकुम चलाए। इतने सालों तक वे अपने अच्छे काम की वजह से ही टिके हुए थे। पर, जब से सिन्हा साहब उनके बॉस बन कर आए थे, तब से उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। सिन्हा साहब उनके व्यवहार को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज करने के लिए तैयार नहीं थे कि उनका काम बहुत अच्छा था। उन्होंने दिनेश बाबू से साफ-साफ कह दिया था कि ऑफिस में वही सफल हो सकता है जिसका काम और व्यवहार दोनों ठीक हों। इनमें से एक भी अगर ठीक न हो तो वह अपने लिए खुद कब्र खोद रहा होता है। दिनेश बाबू ने इस कान से सुना था और उस कान से निकाल दिया था। मन ही मन सोचा था, यह सिन्हा अपने आप को समझता क्या है, ऐसे लोगों को मैं अपने जूते की नोक पर रखता आया हूं।

दोनों के बीच फासले बढ़ते गए थे और फिर एक दिन दिनेश बाबू को जोर का झटका धीरे से लगा जब उनके हाथों में उनका ट्रांसफर आर्डर थमा दिया गया। उन्हें तुरंत ही दूसरे शहर में रिपोर्ट करने के लिए कहा गया था। दिनेश बाबू अंदर तक तिलमिला गए थे। बीस सालों तक मेहनत से काम करने का यह सिला मिलना था उन्हें? अगर कोई उनके ऊपर हुकूमत सिर्फ इसलिए चलाना चाहेगा कि वह संयोगवश उसका बॉस था, तो वे इसे कैसे मंजूर कर लेंगे। दूसरे ही दिन उन्होंने वीआरएस के लिए अर्जी दे दी थी। उनके सहयोगियों ने उन्हें बहुत समझाया, पर वे दिनेश बाबू थे, टस से मस नहीं हुए।

बीस वर्ष की सेवा पूरी कर लेने के कारण उनकी वीआरएस की अर्जी मंजूर हो गई। उन्हें एकमुश्त पैसा मिल गया जिसे उन्होंने बैंक में रख दिया ताकि उसके ब्याज से उनकी जरूरतें पूरी होती रहें। अब वे पूरी तरह से नाटकों का अपना शौक पूरा करने में लग गए।

बाबूजी की मौत को वे आसानी से झेल गए। उनसे उन्हें वैसा लगाव कभी रहा भी नहीं, जैसा बाप-बेटे के बीच होता है। पर, उनके जाने के दो साल बाद जब मां भी चली गई तो उन्हें लगा जैसे किसी ने मां को उनसे जबरदस्ती छीन लिया हो।

नाटकों में व्यस्तता के बीच समय किस तेजी से गुजर गया, उन्हें पता ही नहीं चला। बढ़ती उम्र का प्रभाव तो था ही, असमय कुछ भी खाने-पीने की वजह से कई बीमारियों ने उन्हें घेर लिया। अब उनमें इतनी शक्ति नहीं बची थी कि वे लगातार नाटकों में भाग ले सकें। इधर, उनके साथियों की उम्र भी अब उनका साथ नहीं दे रही थी। धीरे-धीरे उनकी नाटक मंडली बिखरती गई। सभी साथी अपने-अपने रास्ते चले गए और फिर एक दिन ऐसा आया जब उनकी पाली-पोसी संस्था से नाटकों का मंचन बिलकुल बंद हो गया और खुले आसमान में उड़ने वाला पंछी, घर के पिंजरे में कैद होकर रह गया।

बीमारी के कारण उनका खुद का बाहर निकलना तभी होता जब कोई मजबूरी होती। नाटक के किसी साथी का कभी कोई फोन आ जाता या फिर कोई साथी भूला-भटका घर चला आता तो उन्हें बहुत अच्छा लगता, उसके आने से उन्हें एक सुकून सा मिलता। फिर धीरे-धीरे यह सिलसिला भी खत्म होता चला गया। वे बहुत जरूरी होने पर ही किसी को फोन करते और उनके पास भी गाहे-बगाहे ही कोई फोन आता। नाटक-मंडली के बिखर जाने के बाद तो उनके मोबाइल फोन ने बजना लगभग बंद ही कर दिया था। खीजकर उन्होंने उसे उठा कर रख दिया। हां, वे टीवी लगातार चलाकर रखते क्योंकि इससे उनका मन लगा रहता था और घर का सूनापन नहीं अखरता था।

बढ़ती उम्र और बीमारियों की वजह से उन्हें चलने-फिरने में परेशानी महसूस होने लगी थी। इसके कारण खाना खाने के लिए हर दिन दूर जाने की उनकी हिम्मत नहीं होती थी। घर के आसपास कोई ऐसी जगह नहीं थी जहां ठीक-ठाक खाना मिलता हो। उन्होंने बहुत कोशिश की कि कोई खाना बनाने वाला मिल जाए, पर उनका स्वभाव पड़ोसियों और आसपास के लोगों के बीच इतना कुख्यात था कि किसी ने भी इसमें उनकी मदद करने की कोशिश नहीं की। किसी से भी हार न मानने वाले दिनेश बाबू ने अब खुद ही घर में खाना बनाना शुरू कर दिया था। खाना जैसा भी बनता हो, पर उनका कुछ समय अवश्य कट जाता।

समय-असमय बिजली का चला जाना कोई असामान्य बात नहीं थी। लेकिन, उस दिन सुबह से ही बिजली गायब थी। न तो वे कुछ पढ़ पा रहे थे और न ही टीवी देख पा रहे थे। टीवी चलता था तो उन्हें ऐसा लगता था जैसे वे अकेले नहीं हैं। पर, घंटों से टीवी न चल पाने के कारण उनमें अकेलापन घर करने लगा था और घबराहट भरने लगी थी। किसी से बात करने के लिए उनका मन तड़पने लगा था। कोई हो जिससे वे बात कर लें। उनकी घबराहट इस सीमा तक बढ़ गई कि वे घर से बाहर निकल कर खड़े हो गए। अंधेरे की वजह से गली में इक्का-दुक्का लोग ही आ-जा रहे थे। उन्हें उनके चेहरे दिखाई नहीं दे रहे थे। थोड़ी ही देर में उन्हें थकान होने लगी और वे वहीं पड़े एक बड़े से पत्थर पर बैठ गए। घबराहट थोड़ी कम हुई तो वे यह सोचने लगे कि आदमी खुद से बातें करके क्यों नहीं जी सकता। क्यों किसी से बात किए बिना उसके अंदर एक बेचैनी भरने लगती है?

वे खुद को समझा नहीं पा रहे थे। तभी पास से गुजरती एक परछाई से उन्होंने पूछ लिया था – “कब आएगी बिजली?”

“मुझे क्या मालूम”। यह संक्षिप्त सा जवाब देकर वह काला साया तेजी से आगे बढ़ गया था।

वे खिसियाए से उठे और घर के अंदर चले गए।  उनकी मन:स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे मोमबत्तियां ढूंढ़ कर जला लें। वे अंधरे में टटोलते हुए अपने पलंग तक पहुंचे और निढ़ाल से पड़ गए। उन्हें लग रहा था, कोई अनजान व्यक्ति ही घर में घुस आए और उनसे थोड़ी देर बात कर ले, नहीं तो उनका दम घुट जाएगा।

घबराहट में वे उठ कर बैठ गए। अंधेरे में उनकी आंखों के सामने कुछ अक्स उभरने लगे। उन्हें लगा जैसे अंधेरी दीवार को चीर कर मां और बाबूजी उनके पास आ खड़े हुए हों और उनके सिर पर प्यार से हाथ रख दिया हो। उनके भीतर न जाने कौन सा बादल उमड़ने लगा। वह बादल आंखों के रास्ते बरसने को ही था कि उन्होंने देखा उस अंधेरी दीवार से निकल कर एक और साया उनकी तरफ तेजी से बढ़ा चला आ रहा है। उन्होंने तुरंत उसे पहचान लिया, वह विजया ही थी। वे भावावेश में उठ खड़े हुए। उसे अब किसी भी कीमत पर जाने नहीं देंगे वे। अपनी बांहों में उसे समेटने के लिए उन्होंने अपने कांपते हाथ उसकी तरफ बढ़ाए ही थे कि कमरा रोशनी से भर गया। बिजली आ गई थी, परछाइयां न जाने कहां खो गई थीं। उनकी बांहें अभी भी फैली हुई थीं और वे अवाक से रोशनी में नहाई उस दीवार को घूरे जा रहे थे।