... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

विभिन्न  विचारधारा के कुत्ते

      कुत्ते की विचारधारा को करीब से जानने का जिन सौभाग्यशाली पुरुषों की गिनती की जा सकती है उनमे से एक मैं भी हूँ.

      मेरे पुराने जन्म के अच्छे कर्म थे कि मुझे कुत्ता पालने का शौक हुआ.

हुआ यूँ कि किसी धार्मिक प्रवचन में दिशा-भटके ब्राम्हण की टाइम-पास वाणी मेरे कानो में पड़ी. भक्त जनों! इस संसार में कुत्ता से अधिक वफादार कोई प्राणी नहीं ....

बस ,इस सूत्र वाक्य  के चलते कुत्ता पालना निश्चित हो गया. ब्राम्हण ने अतिरिक्त ऊर्जा स्वरूप ,धर्मराज युधिष्ठिर का स-कुत्ता,  इंद्र के दरबार में प्रवेश से मना कर दिये जाने वाले  प्रसंग को सुना कर मेरे कुत्ता पालन की सोच को अनिर्वायता की शर्तों में ला दिया .

      वे सुना रहे थे कि कैसे एक कुत्ता महाराज युधिष्ठिर के साथ ज़मीन से चलकर स्वर्ग की सीढ़ियों तक आया. चूँकि महाराज ने एक-एक कर अपने भाइयों, पत्नी को स्वर्ग गमन राह में मरते-बिछुड़ते देखा था अतः स-तर्क , महाराज ने उसे दुत्कारने से ना कह दिया.

बेशक उनके  स्वर्ग-प्रवेश वीजा निषेधित हो जावे. उन्होंने परावह  नहीं की.  किसी टिकितार्थी भांति, वे जिद में थे. तब स्वयं परीक्षा लेने वाले परीक्षक ,जो कुत्ते के भेष में साक्षात 'यमराज' के अवतार थे , प्रगट हुए.

      उन दिनों परीक्षा लेने का अलग विधान था. शायद तब के , परीक्षार्थी  को शर्ट  की बाहों, पेण्ट के चोर-पाकेट में चिट रखने की व्यवस्था के, ईजाद होने का इल्म नहीं था.

आपकी तटस्थता को परखा जाता था. आप हरिश्चंद्र हैं तो कहाँ तक टिकते हैं यही देखा जाता था. महाराज की तटस्थता सिद्ध हुई. उनके मृत पत्नी -भाइयों को स-शरीर स्वर्ग प्रवेश मिला, ऐसा पढ़ने को मिलता है.

      इस दृष्टान्त की खूबी और सार से, कुत्ता के एक संस्कारित  सामाजिक प्राणी होने की हैसियत का, महाभारत कालीन सभ्यता से समय से प्रभाव, लक्षित होता है.

      ‘कुत्ता’ कहने मात्र से जो केवल, गली के खजैलो भर को याद करते हैं या ,आप द रिकार्ड कुछ लोग, मोहल्ले के बदजुबान लडको, उठाईगिरी करने वालों ,चंदा उगाहीदारों और कुछ स्थानीय किस्म के नेताओं से कर लेते हैं ,ये अलग बात है. उन सबों को इस  सीमित सोच के दायरे में, एक बारगी फिट हुए वायरस को निकाल दुरुस्त कराने की सलाह है.शायद ,उन्होंने इनमे से किसी किस्म के, कभी कुत्ता पाल के नहीं देखा है.

 

      मेरे और मेरे परिवार का कुत्ता-बैर एक जमाने में सारे पड़ौसी जानते थे. हम लोग उस घर का पानी पीना भी पसन्द नहीं करते थे , जहाँ कुत्तो को, किचन तक हर चीज सुघने की खुली आजादी हो.

  दो एक जान पहचान वालो के घर जाना करीब-करीब इसी वास्ते बन्द था. उनके घर में बने हर डिश में कुत्ते के बाल तैरते होने का अनजाना भय व्याप्त रहता था. हम सेंटर टेबल में उनके सजाये चीजों में से, केवल मार्केट डिब्बा बन्द मिठाई-मिक्सचर से काम चला लेते. वे आग्रह करते ,नीतू ने ये गाजर का हलुआ बनाया है ,हम कहते डाइबिटीज है. ज़रा छोले भटूरे ट्राई करें, हम बोलते डाक्टर ने मना किया है.

      उनका कुत्ता हमें करीब से सूंघ कर निकल जाता ,हम खुद को सोफे में जितना समेट सकते थे समेट लेते.

हमारे लिए सामने परोसे व्यंजनों का स्वाद, मेजबान के  टामी- सामी द्वारा समय समय पर सूंघकर चल देने से , हमारे संकोच को ऊर्जा मिलती. संकोच को ऊर्जा मिलाने का इसके अलावा कोई प्रसंग कहीं आज तक वर्णित नहीं है. इस  बहाने हम  लज्जित होने से बच जाते. हम मेजबान को पशोपश से उबारने के लिए डाइटिंग-योगा पर बहस की शुरुआत करते. यही एक सब्जेक्ट आजकल राजनीति के बाद सबसे ज्यादा चलन में है. जिसमे आसानी से सभी भाग लेते हैं. मेजबान जब फिनिशिंग लाइन टच करने नीयत से  सौफ के डिब्बे को खोलने लगता है ,हम राहत की सांस लेते कि खाद्य आपूर्ति संस्थान की सेवाएं एक कुत्ता  पालक घर में सफलता के साथ ,चलो सम्पन्न हुई.

 

      हम शिष्टाचारवश ,उन्हें सपत्नीक घर आने का न्योता देते,जिसे पर  वे सहर्ष तैयार मिलते ,वे कार  में डागी सहित किसी दिन आने की कहते तो उनके आगमन दिन पर नदारद होने के बहाने तलाशते रहते. मन में विचार आता कि देखो हमने एक टुकड़ा बिस्किट का क्या तोड़ा ये हमारे संस्कार को हिलाने आ रहे हैं. इन प्रसंगों को दबी जुबान से इधर-उधर सुनाने का ख़तरा मोल लिया तो भाइयों ने उलटे मुझे कुत्ता प्रेमी बना के दम लेने की सोच ली.

 

      हमे बहुतो ने सलाह दी ,आप चिड़चिड़े हो रहे हैं ,कुत्ता पाल लीजिये. ये बी पी को कंट्रोल करता है. आपकी डाइटिंग प्रेक्टिस हो जाती है , तरी में तैरते बाल का ध्यान हो आए तो खाना वैसे ही हराम हो जाता है .

      ये घर में सफाई दो तीन-बार करवा लेता है. सुबह इनको टहलाने के कारण आपकी मार्निग-वाक की बाध्यता  बन जाती है. धीरे-धीरे ‘हिडन-फेक्ट’ पर ध्यान जाने लगा. मैंने फिर अपनी दबी जुबान को खोला . अपने किसी दोस्त को अच्छी नस्ल का मिले तो दिलाने की फरमाइश कर दी. वे जैसे इसी सिग्नल की आड़ में बैठे थे ,तपाक से डाबरमैन वाली नस्ल की  थमा गए. उनके रहने-खाने की थ्योरी बता गए.

हमारा किचन में प्रवेश-बाधा के संशय वाले  प्रश्न पर, उन्होंने कहा, ये तो संस्कार हैं ,जैसा आप डालें ......

हमने संस्कार डालने का बीड़ा उठा लिया.

      पूरे दो- घण्टे हम संस्कार डालने में खर्च करने लगे . क्या अच्छा है, क्या बुरा है रोज समझाते. हमारी बात पूरी तन्मयता से सुनता . कई निर्देशों का पालन करना सीख गया. हिंदी में बैठो ,अंग्रेजी में सिट दोनों समझ लेता है. उसके द्विभाषिक होने से मेहमानों पर रॉब भी खूब जमता है. सीसेन नाम रखा है. सीज़न सिट ,बोलने में भी रिस्पांस बखूबी देता है.

उसे घुमाने ले जाते समय फर्क महसूस होने लगा है. गली के कुत्तों से नाहक डर का जो फितूर था ,कोसो दूर हो गया है. उनके विचारधारा और सीजन के विचारधारा में जमीन आसमान का फर्क दिखता है.

      गोस्वामी जी ने, इस सन्दर्भ में कदापि  न कहा हो, मगर ये कथन कि "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखि तीन तैसी " मुझे उसमे अच्छे संस्कारों के गुण नजर आने लगे हैं. रास्ते में जितने मंदिर- देवालय दीखते हैं ,वो आप ही आप कुकियाने लगता है. इसे यूँ कहे कि मेरे हर मंदिर के सामने माथा-नवाने का उसमे स्वाभाविक असर होने लगा है.

      इसे देख कभी-कभी  मैं सोचता हूँ ,काश दुनिया के तमाम कुत्तों की तकदीर लिखने का मुझे ठेका मिला होता .....