... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

सम्पादक का कोना

6 मार्च 2017

कुछ कहानीकार भगवान की नेमत से अच्छा लिखते हैं, पैदा ही ऐसे हुए होते हैं, कुछ अपनी तीव्र इच्छा-वश लिखना सीखते हैं और अच्छा लिख पाते हैं. लेकिन हर कहानी अच्छी, काफ़ी चिंतन और कड़ी मेहनत के बाद ही बन पाती है.

कहानीकार अच्छी कहानी लिख भी ले, उसे कामयाब कहलाने के लिये ये आवश्यक है कि उसकी कहानी के कदरदान भी हों, उसे पढ़ने वाले भी हों.

हमारी समझ से जो कहानीकार सही मायने में अपनी कहानी को मान्यता प्राप्त करवाना चाहते हैं, उन्हे ऐसे माहौल को बढ़ावा देने में समर्थन देना चाहिये जिसमें पाठक अच्छा पढ़ने की दिलचस्पी रखें, साथ में ऐसा करने के लिये समय निकाल पाएँ. इससे भी ज़्यादा ये ज़रूरी है कि कहानीकार खुद अन्य समकालीन कहानीकारों को भी पढ़ें, और अगर उनके काम पसंद आएँ तो अपने मित्रों में और सोशल मीडिया में उनकी चर्चा करें. उल्टे, हमने तो बस कहानीकारों को अपने ही काम को बार-बार पढ़ते हुए, अपने ही काम में मुग्ध हुए देखा है.

हमारे ख्याल से कहानीकारों की ये मी-ओनली स्ट्रैटिजी बेहद अदूरदर्शी, किसी के काम न आने वाली स्ट्रैटिजी है.

यही वजह है कि हम हर स्वीकृत कहानी के कहानीकार को बधाई-पत्र में अन्य समकालीन लेखकों की कृतियों को पढ़ने के लिये समय निकालने की सलाह दे रहे हैं.

 

ई-कल्पना में प्रकाशित करने के लिये कहानी के चयन की जब बात आती है तो हम उसे बस एक कसौटी पर रखते हैं – पाठक की कहानी से क्या माँग है?

तो पाठक कहानी से क्या चाहता है?

यही न कि कुछ पलों के लिये वो उसे हकीकत से दूर ले जाए, किसी और जगह, किसी अद्भुत जगह, जहाँ हो सके तो उसकी मुलाकात मनमोहक लोगों से हो ...

या वो कुछ ऐसा सामाजिक उद्धार प्रस्तुत करे जिससे पाठक का कुंठित संसार तरंगित हो उठे ...

या वो उसे जम कर हँसाए, उसका मनोरंजन करे.

पाठक चाहता है कि कहानी में उसकी मुलाकात ऐसे किरदारों से हो, जिनमें, हाँ, दोष हों – आखिर, नुक्स किस में नहीं होते – लेकिन शानदार भी वे खूब हों. ऐसे किरदार जो चाहें भयावनी स्थिति देख कर झिझकें, जिन्हें आम इंसान की तरह सांसारिक इच्छाएँ और आकांक्षाएँ कुछ कर पड़ने का ड्राइव दें, लेकिन उन्हें पाठक को हंसाना भी आए, वे उसे रुला भी पाएँ. और अगर उन काल्पनिक किरदारों में, रोचक और ठोस किस्म के दो-एक, पाठक के दोस्त बन पाएँ, तो वो कहानी तो तुरंत के तुरंत एक अलग लेवल पर ही चढ़ सकती है.

लेकिन पाठक की सबसे कठिन माँग कहानी के कथानक से होती है. वो कथानक ही क्या जो हीरो को छू ही न पाए. कथानक को तो नायक को झंकझोरना आना चाहिये, उसे चाहिये कि वो नायक को ऐसा हिलाए, ऐसा पकाए कि शुरुआत में जो महज़ एक हीरो था, अंत तक पहुँचते पहुँचते हीरा दिखने लगे.

आने वाले दिनों, हफ़्तों और महीनों में आशा करते हैं हम ऐसी ही कहानियाँ प्रस्तुत कर पाएँ

       - मुक्ता सिंह-ज़ौक्की