• अंकिता भार्गव

एक सैल्फी प्लीज़



बहुत भीड़ थी प्रर्दशनी गृह में। होनी भी थी आखिर प्रसिद्ध मूर्तिकार भरत खंडेलवाल की मूर्तियों की प्रदर्शनी जो लगी थी। मूर्तियां देखने और खरीदने से ज्यादा तो लोग भरत खंडेलवाल से मिलने के लिए लालायित थे। भरत भी अपने प्रशंसकों से मिल कर खुश था। लोगों के हुजूम के बीच अचानक भरत की नज़र सोनिया पर अटक गई जो बड़ी देर से उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रही थी। सोनिया ने उत्साह से भरत की और हाथ हिलाया और पास ही खड़े अपने किशोर पुत्र के कान में कुछ कहा। वह किशोर तुरंत हरकत में आया और "मामा" कहते हुए भरत की ओर लपका। मामा संबोधन सुन प्रर्दशनी गृह में मौजूद सभी लोग आश्चर्य से भरत की ओर देखने लगे। मगर भरत को कोई आश्चर्य नहीं हो रहा था बल्कि यह संबोधन सुन वह मुस्कुरा दिया। "मामा! मम्मा आपको बहुत याद करती हैं, आपकी बहुत सारी बातें बताती हैं। हम तो आपकी एग्ज़ीबिशन की कबसे राह देख रहे थे। मामा मेरे साथ एक सेल्फी प्लीज़। मैं अपने सारे फ्रैंड्स को दिखाऊंगा! सब जल जाएंगे यह जान कर कि आप मेरे फेवरेट बिट्टू मामा हो।" उस लड़के टुकटुक ने मचलते हुए कहा। भरत ने मुस्कुराते हुए उसके सर पर हाथ फेर दिया। टुकटुक सेल्फी लेता उससे पहले ही सोनिया भी इतराती हुई उन दोनों के बीच आ खड़ी हुई, आखिर उसे भी तो अपनी सहेलियों पर रौब जमाना था। 'मामा' संबोधन प्रदर्शनी गृह से घर तक भरत का पीछा करता रहा और धीरे धीरे उसे अतीत की गलियों में खींच ले गया। उसके कानों में कुछ आवाजें गूंजने लगीं, कुछ जानी पहचानी सी आवाजें- ”आन्टी! आंटी! बिट्टू घर पर है क्या?“ सोनिया ने बिट्टू की मां को आवाज लगाई। ”अरे सोनिया बेटे! आओ! अंदर आओ!“ सोनिया को देख कर राधा ने कहा। ”बहुत दिनों बाद हमारी याद आई बेटे। तुम जरा बैठो मैं तुम्हारे लिए अभी चाय बना कर लाती हूं।“ वह प्यार से बोली, उस समय उनकी आंखों में प्यार की चमक थी। ”नहीं आन्टी मैं अभी नाश्ता कर के आई हूं। मैं तो बस बिट्टू को बुलाने आई थी पर वह तो कहीं दिखाई ही नहीं दे रहा। कहीं बाहर गया है क्या?“ सोनिया की नज़र बिट्टू को ही ढूंढ रही थी। ”अरे इस बिट्टू की तो तुम पूछो ही मत बिटिया। सूरज सर पर चढ आया है और वो है कि अभी भी चादर ताने सो रहा है। मेरी तो क्या कहूं तुम्हारे अंकल भी उसे कई बार आवाज लगा चुके हैं मगर ये सुनता ही नहीं। आज तो लगता है मुझे तुम्हारे अंकल से डांट खिला कर ही मानेगा ये लड़का।“ ”ठीक है आंटी मैं चलती हूं जब बिट्टू जाग जाए तो उसे हमारे घर भेज देना कहना मम्मा बुला रही है।“ राधा आंटी की राम कहानी और लंबी खिंचने से पहले ही सोनिया सर पर पैर रख कर भागी। उसे भय था कि कहीं वह कोई और कहानी शुरू न कर दें। सोनिया को बड़ी कोफ्त होती थी उनकी बातों से ये एक बार बोलना शुरू कर दें तो चुप होने का नाम ही नहीं लेती। वह तो आज भी इनके यहां नहीं आती मगर टुकटुक माना ही नहीं। यह टुकटुक भी न वक्त-बेवक्त किसी भी चीज की जिद पकड़ कर बैठ जाता है और जिद भी ऐसी कि पूछो मत। सुबह-सुबह जिद पकड़ ली कि उसे फुटबॉल खेलना है। सोनिया को उसपर बड़ा गुस्सा आया। सोनिया ने टुकटुक को समझाने की कोशिश भी की पर जब वह नहीं माना तो मां को बिट्टू की याद आ गई और सोनिया को बिट्टू की मां की चिरौरी करने आना पड़ा। वैसे भी टुकटुक के साथ खेलने में बिट्टू का जाता भी क्या है। कौनसा उसने डाक्टरी करनी है, हमेशा खाली ही तो बैठा रहता है। उससे ऐसे काम करवाना मुश्किल भी नहीं है, बस उसकी थोड़ी सी झूठी प्रशंसा कर दो वह खुश हो जाता है। बिट्टू अपनी प्रशंसा सुन कर फूला नहीं समाता। उसका भोलापन याद करके सोनिया के होठों पर मुस्कान आ गई। ”अरे बिट्टू जाग गया बेटे, आ मुंह हाथ धो कर चाय पी ले।“ राधा ने रसोई से ही उसे आवाज दी। फिर उसे सोनिया की बात याद आई तो वह खुद पर ऐसे झुंझलाई मानो उससे कोई बहुत बड़ी गलती हो गई हो। ”अरे बिट्टू सोनिया आई थी, तुझे पूछ रही थी।“ मां के इतना कहते ही बिट्टू एकदम से उठ कर भाग लिया। ”ये समाजसेवी कहां चला दौड़ता हुआ? कहीं आग लगी है क्या?“ बेटे को इस प्रकार भाग कर जाते देख दीनदयाल ने पत्नी से पूछा। ”शुभ-शुभ बोलो जी, सब ठीक है, वो तो जरा पांच नंबर वाले मेहरा साहब के यहां गया है। सोनिया आई थी उसे बुलाने तब तो सो रहा था, अब जागा है तो मैनें उसे भेज दिया।“ राधा ने बताया। ”मेहराजी के यहां क्यों भेज दिया? मुझे समझ नहीं आता कि आखिर वहां ऐसे कौनसे खजाने गड़े हैं जो दोनों मां बेटा भागे चले जाते हो हर रोज़। जानती भी हो कुछ, वीर प्रताप जी ने अपने व्यस्त कार्यक्रम से कितनी मुश्किल से वक्त निकला था। वे कबसे बिट्टू से मिलना चाहते हैं, पर वह मेहराजी के यहां तफरी करने चला गया। तुम दोनों की नादानी की वजह से देख लेना एक दिन उसकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। उस दिन तुम्हारे मेहराजी नहीं आंएगे तुम्हारे बेटे को सहारा देने।“ दीनदयाल ने अपनी भड़ास निकाली। ”गुस्सा ना करो, आता होगा थोड़ी देर में, ले जाना जहां चाहो। कौनसा गिरवी रख लिया है उन्होंने हमारा बेटा, बस कुछ देर को ही तो बुलाया है। जाने क्यों आप उन लोगों से इतना चिढते हो, कितने भले लोग हैं बेचारे। सोनिया की मां अपने बिट्टू की कितनी तारीफ करती हैं। जब भी वह उनके यहां जाता है उसे बिना कुछ खिलाए आने ही नहीं देती।" राधा सोनिया की मां का अपनापन याद करके मगन सी हो गई। ”अच्छा तो ये बात है, वहां खाने को मिलता है इसीलिए तुम दोनों मां बेटा जाते हो वहां दुम हिलाते हुए।“ दीनदयाल ने ताना मारा। इस पर राधा भड़क उठी और बोली, ”प्यार मिलता है इसलिए जाते हैं। हम क्या भिखारी हैं जो किसी के घर खाना मांगने जाएंगे? अरे तुम क्या जानो प्यार क्या होता है? कभी ध्यान दिया है घर परिवार की तरफ! बिट्टू के साथ कभी दो पल प्यार से बात भी की है? बस सारा दिन डांटते ही रहते हो मेरे बच्चे को। बस थोड़ा सा भोला है मेरा बिट्टू, थोड़ा सा नादान है, इसी वजह से ज्यादा पढ-लिख नहीं पाया, इसके अलावा कोई कमी है क्या उसमें? पर नहीं, तुम्हारे लिए तो उससे अधिक निकम्मा और कोई है ही नहीं।“ ”अरे तुम क्या जानो, मेरे बेटे ने जितने मेहराजी के घर में निवाले नहीं खाए होंगे उससे अधिक तो मैंने उनके बच्चों को अपने आंगन में लगे पेड़ के अमरूद खिला दिए। अपने बिट्टू से ज्यादा ममता लुटाई है मैंने उनके बच्चों पर।“ बिल्टू की मां ने आंखों में झलक आंसुओं को अपने पल्लू में समेट लिया। "अरी बावली बच्चों का बचपन कबका पीछे छूट गया। सब बड़े हो गए हैं, अब तुम्हारे अमरूद खाने की चाह किसी को नहीं है। बिट्टू के हमउम्र बच्चे डाक्टर, इंजीनियर बन गए हैं और हमारा बेटा वहीं का वहीं रह गया। ऑटिज्म के चलते हम उसे पढ़ा-लिखा भी न सके। तुम समझती क्यों नहीं अब उन्हें हमारा बिट्टू अपना मित्र नहीं नौकर लगता है जो उनके बच्चे खिलाता है। मानता हूं कि हमारा बेटा ऑटिस्टिक है किन्तु उसके हाथ में हुनर है। हमारा बिट्टू ऐसी मूर्तियां बनाता है कि सब देखते रह जाते हैं। वीर प्रताप जी उसकी बनाई मूर्तियों की बड़ी प्रदर्शनी लगाना चाहते हैं।“ दीनदयाल का स्वर गंभीर हो गया। “सोचो यदि ऐसा हुआ तो कितना नाम होगा हमारे बेटे का। जिस कमी के कारण लोग आज उसका मजाक बनाते है वह जाने कहां छुप जाएगी। पर उसे बात समझ आए तब ना। उसे बिना टके पैसे का नौकर बनना तो मंजूर है पर बाप की बात मानना नहीं। मैं इस दुनिया की भीड़ में बिट्टू का वजूद खोने से बचाने की हर संभव कोशिश कर रहा हूं पर यह लड़का मेरी हर कोशिश को मेरी हार बना रहा है?“ इससे आगे दीनदयाल से कुछ नहीं कहा गया। वो उठ कर बाहर चले गए। बिट्टू की मां खामोश खड़ी उन्हें जाते देखती रही शायद आज पहली बार वह बिट्टू के पापा की बात, उनका दर्द समझ पाई थी। बिट्टू सुबह का गया दिन ढले घर लौटा। मां को उसकी फिक्र खाए जा रही थी। पापा तो कई बार गली के नुक्कड़ तक भी देख आए थे। जब बिट्टू घर आया तो उन दोनों को चैन आया। बिट्टू को देख कर उसके दीनदयाल का गुस्सा उबाल खाने लगा। उनका तो मन किया उसे वहीं दो चांटे लगा दें पर राधा बीच में आ गई। वह भी क्या करे आखिर मां जो ठहरी। मां को दुनियादारी से पहले बच्चे की भूख दिखाई देती है। ‘सुबह का गया अब घर लौटा है थका हारा, जाने कुछ खाया भी होगा कि नहीं।' खाना परोसती मां ने प्यार से बिट्टू के सर सहलाया। मां ने बिट्टू से इतनी देर से आने का कारण पूछा तो उसने बताया, ”टुकटुक बाबा को फुटबॉल खेलना था, कोई और था ही नहीं उनके साथ खेलने के लिए इसलिए बड़ी मां ने हमें बुलाया था। मां आज बड़ी मां ने मुझे बहुत प्यार किया, वो कह रही थी मेरे बिना तो उनका काम ही नहीं चलता।” बिट्टू ने बड़े ही गर्व के साथ कहा, यह सुन कर उसके पिता ने अपना सर पीट लिया। अब तो यह हर रोज की बात हो गई, बिट्टू सुबह जल्दी ही मेहराजी के घर पहुंच जाता, आखिर बड़ी मां ने उसे टुकटुक का दोस्त जो बना दिया था। सारा दिन सोनिया के बेटे टुकटुक को गोद में उठाए फिरता रहता। उसके माता पिता जानते थे कि इस समय उसे कुछ भी समझाने का कोई फायदा नहीं है। यह सब उनके लिए नया भी नहीं था बिट्टू हमेशा से ऐसा ही था, मनमौजी! जो मन में आता वही करता। दीनदयाल ने बिट्टू का भविष्य संवारने की अब तक जितनी भी कोशिश की सब बेकार गई। दीनदयाल को दिन रात बस एक ही चिंता सताती रहती थी कि उनके बाद बिट्टू का क्या होगा, वह कैसे इस स्वार्थी लोगों से भरी दुनिया में अपना अस्तित्व बचा सकेगा। यूं तो मूर्ति कला में माहिर था वह मगर अपने इस हुनर को भी गंभीरता से कहां लेता था। "मां आपने मेरा मूर्ति बनाने का सामान कहां रखा है?" एक दिन बिट्टू ने राधा से पूछा तो उसे आश्चर्य हुआ। "मैं टुकटुक बाबा के लिए उपहार बना रहा हूं।" अब इसके आगे पूछने को कुछ शेष नहीं बचा था। जब उपहार बन कर तैयार हुआ तो बिट्टू के माता पिता दोनों ही उसे देख कर कर आश्चर्यचकित रह गए, बिट्टू ने बहुत खूबसूरत खिलौना बनाया था। अपने माता पिता का सवालिया निगाहों से ताकते देख उसने बताया कि, ”टुकटुक बाबा अपने घर जाकर इससे खेलेंगे तो उन्हें अच्छा लगेगा। कल सोनिया दीदी को जाना है इसलिए मैं ये खिलौना अभी उन्हें दे आता हूं वे इसे संभाल कर रख लेंगी।" ‘सोनिया ससुराल जा रही है! फिर तो मुझे भी उससे मिलने जाना चाहिए। पर मैं उसके लिए उपहार क्या ले कर जाऊं?’ राधा ठोड़ी पर हाथ रख कर सोचने लगी, उसकी लाडली सोनिया बिटिया को दी जाने वाली भेंट तो खास ही होनी चाहिए। उसे ज्यादा देर सोचना नहीं पड़ा, जल्दी ही उसे समझ आ गया कि उसे सोनिया को क्या उपहार देना चाहिए। ”अरे कहां चला मैं भी आती हूं।“ कहती हुई वह भी बिट्टू के साथ हो ली। अपने उत्साह में वह दीनदयाल की आंखों में उतर आई निराशा को भी अनदेखा कर गई। राधा ने सोनिया को प्यार से निहारते हुए अमरूद उसकी ओर बढ़ा दिए पर सोनिया ने मुंह बनाते हुए कहा, ”इसकी क्या जरूरत थी आंटी। हमारे यहां तो फलों की भरमार रहती है" यह सुन कर राधा के मन में कुछ तड़क गया पर फिर भी वह अपने मनोंभाव छुपा कर बड़े ही लाड़ से बोली, ”हां भई मैं अच्छे से जानती हूं हमारी बिटिया बहुत बड़े घर की बहू है पर इनमें आंटी का प्यार मिला है।" सोनिया ने बड़े ही बेमन से अमरूद लेकर एक ओर रख दिए। राधा सोनिया को अपने गले लगाना चाहती थी पर सोनिया की बेरुखी देख कर उसके पैर आगे नहीं बढ सके। ”अरे बिट्टू तू क्या ले आया?" सोनिया की मां ने पूछा। ”बड़ी मां इसमें टुकटुक बाबा के लिए उपहार है। आप उस दिन कह रहीं थीं न कि उनका मेरे बिना मन नहीं लगता, इसीलिए मैंने उनके लिए यह बनाया है। आप देखना वो कितना खुश होंगे इसे देख कर। सोनिया दीदी इसे आप संभाल कर रख लेना।“ बिट्टू ने खुशी से चहकते हुए अखबार में लिपटी मूर्ति सोनिया की ओर बढ़ा दी। ”अरे इसकी क्या जरूरत है, तू खुद ही चला जा न बेटा अपनी दीदी के साथ। करना ही क्या है तुझे वहां जाकर बस टुकटुक के साथ खेलना ही तो है। तू चला जाएगा तो तेरी सोनिया दीदी को भी थोड़ा आराम हो जाएगा।" बड़ी मां ने लाड़ जताया। ”मैं तो चला जाता बड़ी मां, मगर यहां मां-पापा की देखरेख कौन करेगा। आप तो जानती ही हैं उनका भी मेरे बिना मन नहीं लगता।“ ”मेरी बात मान ले राधा! इसे भेज दे सोनिया के साथ। कब तक अपने पल्लू से बांधे रखेगी। सोनिया के साथ जाएगा तो फायदे में रहेगा। दो पैसे भी कमाने लगेगा। यहां तो पूरा दिन गलियों में आवारागर्दी करता रहता है।“ सानिया की मां ने राधा से कहा। ”दाल रोटी का इंतजाम तो हो ही जाता है दीदी इसके लिए हम अपने बेटे को आंख ओझल नहीं करेंगे।“ राधा ने कुछ रूखे से अंदाज में कहा। सोनिया की मां की बात सुन कर वह सन्न रह गई, ये लोग उसके बेटे को नौकर बनाना चाहते हैं। आज उसे अपने पति की बातें समझ आ रहीं थीं। ”बिट्टू मामा ये क्या है?“ टुकटुक ने पूछा जो बाहर से खेल कर लौटा था। ”टुकटुक बाबा ये आपके लिए उपहार है, ये खिलौना मैंने आपके लिए अपने हाथों से बनाया हैं, अब इसके साथ आप अपने घर जाकर खेलना।“ इतना कहते हुए बिट्टू ने वह मूर्ति टुकटुक को पकड़ा दी. "अरे बिट्टू कहीं तू अपनी ही मूर्ति बना कर तो नहीं ले आया न? अगर लाया है तो वापस ले जा, भई दो दो बिट्टू हम नहीं झेल सकते।“ सोनिया ने कुछ इस तरह कहा कि सभी ठहाका मार कर हंस पड़े। बिट्टू और उसकी मां को उनका इस प्रकार हंसना अच्छा नहीं लगा, उस पल उन दोनों के ही मन में कुछ दरक गया। टुकटुक कुछ देर खिलौने को देखता रहा फिर उसने उसे फर्श पर पटक दिया। मूर्ति कई टुकडों में बिखर गई। ”क्या बिट्टू मामा आप भी! मिट्टी के खिलौनों से भी कोई खेलता है क्या? मैं तो रिमोट वाली कार और विडियो गेम्स से खेलता हूं। छी! मम्मा मेरे हाथ गंदे हो गए, मम्मा मेरे हाथ धुलवाओ।“ सोनिया टुकटुक को स्नानघर ले कर गई तो बिट्टू की बड़ी मां रसोई की ओर चल दी, हां, जाते जाते फर्श पर बिखरे मूर्ति के टुकडों की ओर इशारा करते हुए कह गईं, महरी को कहती गई ”विद्या जरा ये कचरा उठा देना। थोड़ी देर में दामादजी आते होंगे, उनके सामने ये सब बुरा लगेगा।“ राधा एक एक करके मूर्ति के टुकडों को अपने आंचल में समेटने लगी। इधर बिट्टू को महसूस हो रहा था मानों ये टुकडे़ खिलौने के नहीं अपितु उसके अपने अस्तित्व के थे जो कि आज इस बड़े से बंगले में खण्ड खण्ड हो गया था। उस रोज़ बिट्टू को पहली बार समझ आया कि दीनदयाल उन्हें क्या समझाने की कोशिश कर रहे थे। और उसी दिन उसने पहली बार यह भी तय किया कि टूटना नहीं है, और न बिखरना है। बल्कि मजबूत होकर ऊपर उठना है इतना ऊपर कि आज जो उसका मज़ाक बना रहे हैं वे ही एक दिन उससे एकबार मिलने पर खुद पर नाज़ करें। उस दिन का बिट्टू का किया प्रण आज पूरा हुआ आज बिट्टू...नहीं...नहीं... भरत खंडेलवाल से लोग एक बार मिलने को तरस रहे थे, वे लोग भी जिनके लिए वह कभी शर्मिंदगी का कारण था। आज वे उसके साथ अपने पुराने संबंधों को याद कर रहे थे।


 

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