• मुक्ता सिंह-ज़ौक्की

लिखिये ... क्योंकि हमारे यहाँ कहानियों की भरमार है

मित्रों और सहेलियों!

ई-कल्पना के मार्च अंक के लिये कहानियों के सबमिशन की खिड़की खुल चुकी है. अगले सात दिनों तक हम अपने सबमिशन मैनेजर के ज़रिये कहानियाँ स्वीकार करते रहेंगे. अपनी सबसे बेहतरीन कहानी हमें भेजिये. चुनी हुई 5 कहानियों को हम अपने पहले अंक (11 मार्च, 2016) में प्रकाशित करेंगे.

अगर आपको लगता है कि आपकी कहानी तैयार नहीं है तो फ़रवरी के महीने में आपको फिर अपनी कहानी पेश करने का मौका मिलेगा.

वैसे, हम ऐसे अद्वितीय देश के रहने वाले हैं जहाँ पर कहानियों की कमी होनी ही नहीं चाहिये. इसकी खूबसूरती का बयान करते-करते कविजन थक कर नहीं देते. पेड़ों में बहारें झूलों की, राहों में कतारें फूलों की, यहाँ हंसता है सावन बालों में, खिलती हैं कलियाँ गालों में ...

हमारे यहाँ जब-जब चाँद अपना सुंदर रूप दिखाता है (और जिन दिनों पूरी तरह गायब रहता है), वो दिन पर्व बन जाता है. मेले लग जाते हैं, ढोल पिटने लगते हैं, नक्शेबाज़ ड्यूड्ज़ धूम मचाने में लग जाते हैं, फ़ैशनेबल लड़कियाँ बन-ठन कर नाचने लगती हैं. हमारा बस चले तो हम हर दिन उत्सव में बदल डालें.

लेकिन एक अच्छी कहानी के लिये महज़ खूबसूरती काफ़ी नहीं होती. कहानी में संघर्ष या कॉन्फ़्लिक्ट होना भी तो बता गए हैं. और संघर्ष की भी हमारे यहाँ कमी नहीं है. इतिहास छोड़ें, वो तो संघर्ष से ही भरा पड़ा है, हमारे देश की बुनियाद भी तो भाईयों की लड़ाई में दबी पड़ी है. उस घर-बटवारे पर कितनी सारी संवेदनशील कहानियाँ लिखी जा चुकी हैं.

आज के दौर में संघर्ष नए तरह के हैं.

कोई आम का स्वाद भुलाना नहीं चाहता और स्ट्राबैरी भी फ़्रिज में देखना चाहता है, इस तरह दो देशों के बीच अटका हुआ है, कहानियाँ ज़रूर ऐसे जनों के आसपास मंडरा रही होंगी.

कौम्पटीशन के दौर में कुछ लक्ष्य के करीब पहुँच पाते हैं, बाकी पीछे रह जाते हैं, इस आपसी स्पर्धा में हर किस्म की कहानियाँ टपकती मिल जाएँगी.

भारतीयों को दुनियावाले भाग्यवादी कह कर भी पुकारते हैं. हम हैं ही ऐसे. किसी के साथ कुछ अकाल हो जाए, या कोई पैदा ही बुरे हाल में हो, हम इतना कह कर रह जाते हैं कि इसके भाग्य में यही लिखा था. हर घर में माँ-बाप अपने बच्चों से कहते हुए दिखते हैं कि बेटा, तुम बस मेहनत करो, फल भगवान के हाथ छोड़ दो. और तो और, बच्चों के जीवन की बागडोर अपने समर्थ हाथों में ले कर उन के जीवन की पूरी की पूरी योजना भी खुद तैयार करने में लगे रहते हैं. ऐसा बाहर दुनिया में क्या है जिस से अपने वीर बेटों और भोली बेटियों को बचा कर रखना चाहते हैं? शायद कहानियाँ!

हम कहना ये चाहते हैं कि कहानी रचने का हुनर तो हमारी डी.ऐन.ए. में घुला होना चाहिये. इसलिये अब सोचना क्या, पैन की तलवार में अच्छी भाषा की स्याही भर कर कूद पड़िये कहानी लिखने के मैदान में. शायद आप कोई जादु भरा करतब दिखा पाएँ. हमें आपकी कहानी का इंतज़ार रहेगा.

मुक्ता सिंह-ज़ौक्की

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