• मुक्ता सिंह-ज़ौक्की

बदमाश प्रेत

आई थी हमारे घर में कायस्थों के यहाँ से एक लड़की. शादी क्या थी, फँसा लिया था उसने छुटके बेटे को, वो लओ वाली मैरिज कर के.

बड़ी चिढ़ मचती थी. खून खौल उठता था जब मैडम सामने आती थीं. काम की थीं, ना धाम की. कोई काम करने को कहो, तो ऐसे हौंले-हौंले हाथ-पैर उठातीं, कि छुटका खुद भाग कर हाथ बटाने में लग जाता. छप्पन छुरी थीं सो अलग. कह कर जाती थीं कि हम छत पर कपड़े फैलाने जा रही हैं, मगर जो घंटों-घंटों पड़ोस के लड़कों पर डोरे डाले जाते थे, मैं ना जानूँहूँ क्या?

बस, बहु से मेरी यही टकरार शायद खल गई थी चित्रगुप्त को. बड़ा तंग किया. धम से अपना लजिस्टर सामने रख कर उसने पन्ने पलटना शुरू कर दिया और उँगलियाँ चाटते-चाटते बोला, फिर आ गईं तुम? तुम नहीं सुधरोगी. मुझे तो ये समझ नहीं आ रहा है कि तुम जैसों के साथ किया क्या जाए?

तैश में आ कर उस दिन पानी का अधभरा कलश बहु की ओर दे मारने को जो उठाया, कलश सिर के ऊपर उठ कर पीछे की तरफ़ चलता चला गया, कंधों के नीचे पीठ ऐसे ज़ोर से टूटी कि उसकी 'चटाख' अब तक कानों में गूँज रही है. आवाज़ गले में अटक गई, साँस जो थमी, नीचे की साँस नीचे और ऊपर की साँस ऊपर रह गई, प्राण निकलने के सब रास्ते तो खुल गए थे, सो दिल को उसी वक्त दौरा भी आ गया. वो पल जब मैंने दम तोड़ा बड़ा अपशकुनी था. अपने ही अंगों की बगावत देखनी पड़ी. ऐसा सदमा पहुँचा कि चित्रगुप्त के सामने घिग्घी बंध गई.

वो बड़ी शान से लजिस्टर उलट-पलट रहा था. जीभ से ‘किच’ करके बोला, ना! बड़ा आसान केस है. एक ही जगह बची है तुम्हें भेजने की. देखो तुम्हारे ही घर वाले तुम्हारे बारे में क्या बोल रहे हैं? सुनोगी, तो खुद मानोगी कि मैं जो करने वाला हूँ सही करने वाला हूँ.

मेरी तेरवीं के दिन, मेरे ही पति ने, सब नाते-रिश्तेदारों के सामने मेरे गुण गाने के बजाय, मेरा कोठरी में पड़ा बकस तोड़ खोला था. हरेक चीज़ जो मैंने इत्ते सालों में इकट्ठी की थी, उनके पुराने स्वामियों और स्वामिनियों को माफ़ी समेत लौटाल दी थी. मैंने देखा कि पड़ोसी की मँझली बहु अपनी शादी के दिन खोया हुआ अपनी माँ का दिया हार वापस पा कर फूँटफूँट कर रो रही थी और बार-बार कृतज्ञ-भाव से इनके पैरों को छू कर इन्हें स्वामी-महात्मा बता रही थी. आसमान से ये ढोंग देख कर मेरी आँखों में खून उतर आया. बन्द करो ये नाटक-नौटन्कीबाज़ी! मैं ज़ोर से दहाड़ उठी.

चित्रगुप्त ने गला खँखारा और शुरू हो गए. आत्मा बेचारी तो स्वच्छ चीज़ होती है. वो जो इस पुनरुज्जीवन के चक्कर में फँस गई है, उसका देहांतरण जीव के उसके जीवन में किये गए कर्म तय करते हैं. कर्म ही नहीं साथ में हम ये भी देखते हैं की जीव के कर्मों के पीछे उसकी नीयत क्या थी. तू तो बुरी नीयत से बार-बार लगातार अनगिनत बुरे कर्म किये चलती गई. अब बता, वो शमीम आलम के घर के बनाने के लिये जो ईंटें लाई गईं थीं, वो तेरे बक्से में क्या कर रही थीं? मरने के बाद भी तू अपने परिवार वालों को शर्मिंदा करने से बाज़ नहीं आई.

मुझसे और सुना न गया, किस ने कहा था सबके सामने मेरा बकस खोलने को?

फिर गला खँखार कर उस चित्रगुप्त ने कई पन्ने पलटे और शुरू हो गया. तो ठीक है. मैं अब निर्णय सुनाता हूँ. संसार के चौरासी लाख जलचर, थलचर और नभचरों में तेरे जैसे के लिये कोई जगह नहीं बन सकती है. अरे, तू तो इत्ती खतरनाक है, तुझे तो मैं पेड़ बना कर भी नहीं भेज सकता हूँ. तुझे तो मैं सीधा पाताल लोक भेज रहा हूँ. वहीं जा, हज़ार साल तक सड़. अरे मन तो मेरा तुझे उस पाताल लोक में भेजने को कर रहा है जहाँ से तुझे तैंतीस हज़ार सालों तक मुक्ति ही ना मिले. मगर मेरा ऐसा करना वर्जित है. तू औरत जो है. शुकर मना कि तू इस जन्म में औरत पैदा हुई थी ...

बस मैंने उसकी बातें सुनना ही बन्द कर दिया था. वो अपनी भड़ास जो निकालने में लग गया था, बोले चला जा रहा था.

तभी मैंने इन्द्र के सवारों को गुज़रते देखा. ग्यारह सौ दमकते घोड़े थे जो इन्द्र-देव का महारथ खींचे पृथ्वी की ओर दौड़े जा रहे थे.

वो चित्रगुप्त आँखें मूँदे अपने बाख्यान-बरनन में लगा हुआ था. मैंने झट छलांग लगाई और चढ़ गई महारथ में. लौट आई मानव लोक में! डैनमार्क देश की स्वर्गनुमा कॉपनहैगन नगरी में!

***

मैं खुश. कॉपनहैगन में मेरी नई-ब्याहता पोती, सुष्मा जो रहती थी.

मैं, एक प्रेतनी! माप में रोयेँ की नोक का सिर्फ़ एक बटा दस हज़ारवाँ भाग, बस डाल दिया उसके सिर के अंदर डेरा.

शुरू में इस गज़ब के शहर में पहुँच कर अपना अहोभाग्य ही मनाती रही. चारों तरफ़ लम्बे, सुनहरे बालों वाली जलपरियों समान लड़कियाँ, लम्ब-तड़ंग, गबरू जवान, हंसों से लदे तालाबों वाले हरे-हरे उपवन, मज़बूत खड़े मकान, चौड़ी, मगर खाली सड़कें. धूप हो, पानी बरसे या बरफ़ गिरे, यहाँ के लोगों को अपनी साइकिलें ऐसी प्यारी थीं जैसे पुराने ज़माने के राजपूतों को अपने घोड़े थे.

पता चला कि ये डैनिश लोग इतनी आराम की ज़िन्दगी बिताते थे कि यहाँ के हर दसवें आदमी को शराब की लत लगी होती थी, और हर दूसरा जोड़ा बिना मर-मिटाव के शादी तोड़ देता था. जब मालुम पड़ा कि यहाँ शादियाँ इस वजह से टूटती थीं कि यहाँ की औरतें अपने जीवन काल में अन्य आदमी भी आज़माना चाहती थीं, मैंने तो ताली ही पीट ली. लोग स्वर्ग क्यों जाना चाहते हैं, सीधा यहाँ क्यों नहीं आते, इस अचम्भे में पड़ गई.

***

सुष्मा सुन्दर तो थी ही, लेकिन जब उसकी शादी उस लड़के से तय हुई जो विदेश में इंजिनियर था, तो उसके भाग्य को घर में सब ने सराहा. इसलिये, यहाँ आकर उसे दुःखी देख मैं हैरान हो गई. मुझे पता चला कि वो ऐसे देश में थी जहाँ कि बोली उसके लिये उतनी ही गिटपिट थी जितनी मेरे लिये अंग्रेज़ी, इसलिये पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी वो ना काम कर सकती थी, ना बाहर जा कर लोगों से बातें.

मुझे उस शम्भु – उसके पति – और उसके परिवार वालों पर बड़ा गुस्सा आया. सुष्मा के लिये कई अच्छे रिश्ते आए थे. दो-एक अमरिका के भी थे. मुझे दिखने लगा कि उन लोगों ने हम लोगों की लड़की ले कर हम लोगों को ठग लिया था. यानि कि, हमारे साथ एक घाटे का सौदा हुआ था. मेरे गुस्से का पारा फिर चढ़ गया.

सुष्मा को ज़रूरत थी अपनी ज़िन्दगी को पूरी तरह अपने वश में करने की. मेरी लाड़ली पोती को खुददारी का पाठ सीखने की ज़रूरत थी. वो मर्द है तो क्या हुआ. तेरे पास भी औरत वाले हथयार हैं.

मर्दों की बात से मुझे फिर अपनी तेरवीं के रोज़ अपने पति का रवैया याद आ गया और मर्द को नामर्द कैसे बनाते हैं, ये मैंने सुष्मा को सिखाने की ठान ली.

पहली बात जो सिखाई वो ये कि चाहे कुछ हो जाए, अपने पति की तारीफ़ कभी ना कर. ये पाठ उसे घुट्टी में घोल कर ऐसा पिलाया कि जब कोई इन दोनों से मिलने आता, तो बातचीत के दौरान वो बात को ऐसा घुमाव देती, शुरू हो जाती मेरी लाड़ली अपने पापा की तारीफ़ के पुल बाँधने.

गाड़ी तो मेरे पापा की तरह कोई चला ही नहीं सकता. कैसे नक्शेबाज़ी से चलाते हैं!

एक बार जब शुरू हो जाती, तो बोलती चली जाती, बोलती चली जाती. मेहमान शालीनता से सुनते रहते और दामाद जी का सिर धीरे-धीरे झुकता जाता. सूरजमुखी को पानी यदि मिलना कम हो जाए, तो उसका फूल झुकता जाता है, फिर वो फूल ऐसी तेज़ प्यास से तड़पता है कि अचानक लुड़क जाता है. ठीक वैसे ही दामाद जी भी अपने ससुर की तारीफ़ सुनते-सुनते यकायक लुड़क जाते. सिर को वहीं मेहमान के सामने सुष्मा की गोद में टिका कर कहते, पापा के लिये इतना कुछ और मुझमें तुम्हे एक तारीफ़-लायक चीज़ नहीं दिखती?

मेहमान तक शर्मिंदा हो जाता.

एक सबक और दिया. मैंने उसे याद दिलाया कि तुम औरत हो, यही तुम्हारा सबसे बड़ा हथयार है. कह दो इतना काम बिना नौकर-चाकर के अकेले कैसे होगा?

एक दिन धुलने को इतने कपड़े इकट्ठे हो गए, कि ऑफ़िस जाने से पहले वो शम्भु दूसरे कमरे से चिल्लाया, सुष्मा, मेरी गुलाबी वाली कमीज़ नहीं मिल रही है ... और अगर अंडरवेयर मिल जाता तो ...

उस दिन सुष्मा को मेरा सिखाया हुआ बोलने में दिक्कत हुई फिर भी वो इतना बोल पाई कि वो सब चीज़ें लॉन्ड्री में होंगी. अभी थोड़ी तबियत खराब है, जब ठीक हो जाएगी तो वो लॉन्ड्री कर लेगी.

शम्भु चुपचाप ऑफ़िस चला गया.जब वापस आया तो पूरी लॉन्ड्री की. फिर पिछवाड़े में अरगनी पर कपड़े फैला भी दिये. इस के बाद तो रोज़ ऑफ़िस से लौट कर कपड़े धोना, बाहर फैलाना और सूखने पर उन्हें वापस लाना और तह करके ड्रैसर में अपने-अपने जगह रखना उसका ही काम बन गया. एक कपड़ों की इस्त्री नहीं करता था, ये बात मैंने बड़ी कोशिश करी सुष्मा के ज़हन में डालने की, मगर वो ऐसी गाय थी, उस शम्भु से इस्त्री करने को ना कह सकी.

अक्सर खिड़की से हम दोनों नीचे देखती थीं, वो अरगनी से कपड़े बीनता जाता था, और पड़ोस की और औरतें भी आ कर कपड़े फैलाने या बीनने में लग जातीं, साथ में उस से बतियाती भी थीं. जल्द ही कॉम्पलैक्स की डैनिश औरतों के साथ शम्भु की अच्छी खासी दोस्ती हो गई.

***

जुलाई के एक दिन बड़ी बढ़िया धूप खिली थी. शायद कॉम्प्लैक्स की औरतों को इसी दिन का इंतज़ार था. तितलियों की तरह अपने-अपने फ़्लैटों से बाहर पिछवाड़े में निकल आईं और लगी उतारने ऊपर के अपने सब कपड़े. बदन पर क्रीम मलने के बाद पूरे दो या तीन घंटे लेटी रहीं, वहीं, धूप सेकती रहीं. मुझे खिड़की से ये नज़ारा देख कर बड़ा मज़ा आ रहा था. इस बात पर ध्यान ही नहीं गया कि किस प्रकार मेरी सुष्मा उत्तेजित हो रही थी. गुस्से में वो नीचे उतरी और सारे कपड़े बीन कर ले आई. उस दिन के बाद से कपड़ों का काम उसने फिर अपने ज़िम्मे ले लिया. शम्भु को वो किसी हाल में इन औरतों के पास फटकने नहीं देती थी. समय के साथ ये औरतें सुष्मा की भी सहेलियाँ बन गईं.

नीचे के फ़्लैट में दो पाकिस्तानी भाइयों के परिवार रहते थे. सुष्मा की दोनों भाइयों की बीवियों से भी दोस्ती हो गई. रेहाना और ज़ारा नाम थे इनके. अरगनी रेहाना के बैडरूम के एकदम सामने थी. अक्सर बैडरूम और खिड़की के आसपास डस्टिंग करते हुए एक शलवार कमीज़ पहने लाल बाल वाली डैनिश महिला दिखती. हर बार जब दिखती, मैं सुष्मा पर ज़ोर डालती कि अगर इस वक्त रेहाना दिखे तो वो उससे ये पूछने में ना चूके कि आखिर ये महिला है कौन.

एक दिन रेहाना बाहर निकल कर आ भी गई. उधर फिर वो लाल बाल वाली मैडम दिख रही थीं. इस दफ़ा पर्दे खिसका कर कमरे में रौशनी कर रही थीं. मेरी लाख खलबली मचाने पर भी उस दुष्ट सुष्मा ने दुनिया भर की बातें कर डालीं, मगर मेरी वाली बात नहीं पूछी.

तब तक ज़ारा भी आ गई थी. आते ही पूछ बैठी, वैसे एक साथ हसबैंड के बजाय आपने कैसे कपड़े फैलाने शुरू कर दिये?

पहले तो सुष्मा थोड़ी सहमी. बोली, हमारे यहाँ हम काम बाट कर करते हैं. इसमें ख़राबी क्या है?

उसका इतना कहना था कि रेहाना ने फ़ौरन अपना सुर्रा छोड़ दिया, हाँ-आँ, आपने हसबैन्ड का हाथ बँटाया, इसमें क्या ख़राबी हो सकती है? और ऐसा कहकर दोनों औरतें खिलखिला कर हँसने लगीं.

सुष्मा को उनका हँसना अच्छा नहीं लगा. उसकी नज़र फिर उस लाल बाल वाली महिला पर पड़ी. पूछ लिया, ये आपके कमरे में कौन सफ़ाई कर रही हैं?

खिसियाने की अब इन दोनों की बारी थी. किस मुँह से कहतीं जब पेशावर से ब्याह कर रेहाना कॉपनहैगन आई थी, तो घर में मिया और देवर के अलावा, इन लाल बाल वाली देवी को भी पाया था.

ज़ारा तो चुप रही. अपनी खनकती सी आवाज़ में रेहाना ने ही जवाब दिया, ये तो मेरी आपा हैं.

***

तीसरा सबक जो मैंने सुष्मा को सिखाया वो था ये कि सुन्दर तो तुम हो, लेकिन असली सुन्दरी वो जो अंग-अंग से सुन्दर हो, हर तौर से सुन्दर. जो बात बोले, ऐसे ज़ोर दे कर बोले के सुनने वाले को उसका परम दर्जा महसूस हो. नाक उठा कर बोले. जब बोले मैं लेडी श्री राम कॉलिज की पढ़ी हूँ, तो ये लगे कि सामने मिसेज़ प्रसाद नहीं, वरन् शम्भु नाम के बन्दर के साथ ख़ुद लेडी श्री राम खड़ी हैं.

ज़्यादा खुश ना दीखा कर. थोड़ा चिड़चिड़ाना सीख. मैंने उसके दिमाग ये बात भी डालनी शुरू कर दी. वो पूछेगा, अब क्या हुआ, जानी. तुम उसको जवाब घूर कर देना. ऐसे घूरना कि वो वहीं का वहीं गड़ा रहे. थोड़ा रुक कर ही कहना, दिन भर खुद तो मटरगश्ती करते हो, और मैं घर में पड़े-पड़े सढ़ती रहती हूँ.

उसने ऐसा ही किया. शम्भु ने इस पर भी बड़े प्यार से, जानी-जानू कहकर, उस से कहा, तुम यहाँ की कम्यून द्वारा चलाई गई डैनिश भाषा की क्लासों में क्यों नहीं जाती. कुछ यहाँ की भाषा भी सीख लोगी और नए लोगों से मिलोगी तो मन बहला रहेगा.

इस पर मेरी सुष्मा ने जो जवाब दिया बडा गौरव महसूस किया मैंने.

क्यों? मुफ़्त वाली क्लासें क्यों ज्वॉइन करूँ मैं? क्या मैं किसी गए-गुज़रे ख़ानदान से आई हूँ कि अनपढ़-गँवार इमिग्रैन्ट लोगों के साथ बैठ कर क्लास में जाऊँ? याद रक्खो, मैं लेडी श्री राम की पढ़ी हूँ.

शम्भु की इतनी हैसियत नहीं थी कि सुष्मा को प्राइवेट क्लास के लिये भेज पाता, सो अपना सा मुँह ले कर ऑफ़िस चला गया. सुष्मा ने ये पाठ ठीक से सीख लिया था. अक्सर ऐसे ही तुनक कर बोलती थी.

शम्भु पर भी लगता है इसका असर हुआ. ज़्यादा कमाई वाला, बेहतर काम ढूँढने में लग गया. अमरिका में भी काम की खोज शुरू कर दी.

इधर बिना कुछ कहे, सुष्मा ने कम्यून की क्लासें लेनी शुरू कर दीं. नए दोस्त बनें. जिम भी जाने लगी. जीवन में काफ़ी सुधार आ गया. मगर शम्भु के साथ तुनक-मिज़ाज़ी बरकरार रही.

***

एक बार वो शम्भु के साथ अपने नए डैनिश मित्रों के यहाँ गई. उनके यहाँ के कुत्ते को बड़े प्यार से पुचकारने लगी, उसको दुलारने लगी. फिर एक नज़र शम्भु पर फेंकी. उसे कुत्तों से डर लगता था. दूर, सीधा सा खड़ा था. डैनिश मित्रों ने कहा भी कि हम कुत्ते को बाहर कर देते हैं, तो ज़ोर से सुष्मा बोली, अरे, क्या बात कर रहे हैं? ये हमारा घर है या कुत्ते का? कुत्ता क्यों बाहर जाएगा?

फिर शम्भु पर नज़र फेंक कर ज़ोर से हँसने लगी.

वो देखिये, कैसे पथरा गया है शम्भु?

उस वक्त मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था. मैंने फ़ौरन पास उड़ती मक्खी के बदन में प्रवेश किया और भिन्ना कर अपनी प्यारी सुष्मा के सिर के चारों ओर जयमाला स्वरूप एक बड़ा सा चक्कर बना दिया.

वो समय भी आ गया जब शम्भु पिटा-पिटा सा दीखने लगा था. रोज़ ऑफ़िस जाता, ज़्यादा काम लेने लगा था, देर से वापस आता, चुप सा डरा सा रहता.