• राकेश भ्रमर

दो मित्र


दो पुरुष थे. दोनों ही आपस में घनिष्ठ मित्र थे. दोनों ही शादीशुदा थे और उनकी पत्नियां भी आपस में मित्र थीं. उन सभी का एक दूसरे के घर में आना-जाना था.

दोनों पुरुष अलग-अलग ऑफिस में कार्य करते थे, परन्तु दोनों बिना नागा शाम को मिला करते थे. एक दूसरे से सुख-दुःख की बातें करते और फिर अपने-अपने घर चले जाते.

एक दिन ‘अ’ बहुत उदास था, परन्तु उसने अपने मन की बात अपने मित्र ‘ब’ से नहीं कही. ‘ब’ ने भांप लिया कि ‘अ’ के मन के अंदर कोई द्वन्द्व चल रहा था. उसने पूछ लिया, ‘‘क्या बात है मित्र? तुम कुछ उदास लग रहे हो? कोई परेशानी है? मुझे बताओ.’’

‘‘हां, मित्र, मेरी उदासी का कारण है, परन्तु उसका कोई हल नहीं है.’’

‘‘फिर भी बताने लायक हो तो बता दो.’’ ‘ब’ ने आग्रह किया.

‘‘बताने लायक तो है, परन्तु सुनकर तुम भी दुःखी और उदास हो जाओगे.’’

‘‘तो क्या हुआ? तुम्हारा मन हल्का हो जाएगा.’’

‘‘ठीक है. तो सुनो. मेरा तबादला असम में हो गया है. अगले महीने ही जाकर वहां ज्वाइन करना है.’’ ‘अ’ ने बताया.

सचमुच यह दुःखदायी खबर थी, परन्तु नौकरी का मामला था. ‘ब’ ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपलक ‘अ’ को देखता रहा.

‘अ’ ने आगे कहा, ‘‘परेशानी यह है कि मैं पत्नी को अपने साथ नहीं ले जा सकता. वहां सरकारी क्वार्टर नहीं हैं. पहले जाकर कोई किराये का मकान ढूंढ़ना पड़ेगा, तभी पत्नी को ले जा सकता हूं.’’

‘‘तो क्या करोगे?’’ ‘ब’ ने विवशता से पूछा.

‘असम में ज्वाइन तो करना ही पड़ेगा. पत्नी यहां अकेली रहेगी.’’ ‘अ’ के मां-बाप नहीं थे.

‘‘तो पत्नी को उसके मायके छोड़ दो.’’ ‘ब’ ने सुझाव दिया.

‘‘हां, यह बात ठीक है. मैं पत्नी से पूछता हूं.’’

रात में सोने के वक्त ‘अ’ ने अपने तबादले के बारे में बताया, तो उसकी पत्नी ‘स’ के चेहरे पर शिकन तक न आई. उसने सहजता से कहा, ‘‘नौकरी में यह तो चलता ही है. चले जाओ.’’

‘‘परन्तु मुझे अकेले जाना पड़ेगा. तुम यहां अकेली रह लोगी?’’

‘‘क्यों नहीं? मैं कोई बच्ची हूं?’’ उसने लापरवाही से कंधे उचकाए.

‘‘परन्तु....?’’ ‘अ’ ने संकोच से कहा, ‘‘तुम अकेली कैसे रहोगी? कुछ दिनों के लिए मां के घर चली जाओ.’’

‘स’ ने तत्काल कहा, ‘‘मैं मां के घर नहीं जाऊंगी. मुझे अकेले रहने में कोई परेशानी नहीं है. आप मेरी चिन्ता छोड़कर काम की चिन्ता करो. जब मुझे ले जाओगे, मैं आ जाऊंगी.’’

‘अ’ को ‘स’ के आत्मविश्वास पर गर्व नहीं था. दरअसल वह चिन्तित इस बात से था कि उसकी पत्नी चंचल स्वभाव की थी. उसे घूमने-फिरने का शौक था. हर किसी से दोस्ती गांठ लेती थी. उसके बहुत सारे पुरुष मित्र थे. उनसे वह फेसबुक और व्हाट्सएप पर चैटिंग करती रहती थी. कई बार उसने मना किया, परन्तु वह मानती नहीं थी. आंख के सामने वह पत्नी को काफी हद तक नियंत्रण में रख सकता था. उसके न रहने पर वह क्या कुछ न कर बैठे? किसी के साथ उसका चक्कर चल गया तो.....इसी बात को लेकर वह चिन्तित था. अकेली औरत, खूंटे से छूटे जानवर की तरह होती है. पता नहीं किस खेत में मुंह मारने लगे.

‘स’ को ‘अ’ की चिन्ता से कोई लेना-देना नहीं था. उसने उसे विश्वास दिला दिया कि वह बड़े आराम से अकेली रह लेगी. ‘अ’ को उसकी बात माननी पड़ी.

असम रवाना होने के पहले उसने अपने मित्र ‘ब’ से कहा, ‘‘मित्र, मैं रात की गाड़ी से गुवाहाटी के लिए रवाना हो रहा हूं. तुम मेरे घर का ख्याल रखना. ‘स’ को कोई परेशानी न हो.’’

‘‘मित्र, तुम निश्चिन्त होकर जाओ. मैं भाभी का ध्यान रखूंगा. उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी. तुम अपना ध्यान रखना. जल्दी लौटने की कोशिश करना.’’ ‘ब’ ने ‘अ’ को आश्वस्त किया.

‘‘नई पोस्टिंग पर इतनी जल्दी छुट्टी कहां मिलेगी. फिर भी जब संभव होगा, मैं आऊंगा. तुम भी अपना ख्याल रखना.’’ ‘अ’ ने उदास मन से कहा.

रात को ‘अ’ को स्टेशन पर छोड़ने ‘ब’ गया. बिछड़ते समय दोनों की आंखों में आंसू थे. बिछोह की पीड़ा से उनके हृदय कराह रहे थे, गला भर आया था और इसी हालत में दोनों एक दूसरे से विदा हुए.

‘अ’ चला गया, तो ‘स’ पूरी तरह से आजाद हो गयी.

‘ब’ फोन पर ‘स’ के हाल-चाल पूछता, तो वह बेमन से जवाब देती. फिर भी ‘ब’ इसे अपना कर्तव्य समझता, क्योंकि ‘अ’ उससे अपनी पत्नी का ख्याल रखने को कह गया था. एक सप्ताह बाद उसने सोचा कि ‘स’ से मिलकर उसके हाल-चाल पता करे. वह उसके घर चला गया, परन्तु घर पर ताला लटका हुआ था. उसने हताश भाव से इधर-उधर देखा. कहीं कोई दिखाई नहीं दिया, किससे पूछता कि ‘स’ कहां गयी थी. उसने ‘स’ को फोन मिलाया, तो वह बंद मिला.

वह निराश भाव से घर चला आया, परन्तु उसने यह बात ‘अ’ को नहीं बताई. वह दुःखी हो जाता. उसकी समझ में स्वयं नहीं आ रहा था कि शाम के वक्त ‘स’ कहां गयी होगी? क्या पता अपनी मां के यहां चली गयी हो, या किसी सहेली के यहां? यह असंभव नहीं था. वह अकेली रहती थी. सारा दिन घर में अकेली रहने से वह ऊब जाती होगी.

‘अ’ भी प्रतिदिन फोन पर ‘स’ से बात करता था. उसे ‘स’ हमेशा प्रसन्न मन मिली. ‘ब’ भी ‘अ’ को ‘स’ के बारे में बताता रहता था कि वह ठीक तरह से है, परन्तु उसके घर से गायब होने की बात उसने ‘ब’ से छिपा रखी थी. किसी प्रकार का संशय पैदा करने का उसका मकसद नहीं था. जब तक सही बात का पता न हो, उसे मन के अंदर ही रखना चाहिए. उसने ‘स’ से भी कभी नहीं पूछा कि फलां दिन शाम को वह कहां गयी थी.

इसी तरह दिन गुजर रहे थे.

कुछ दिन बात ‘ब’ ने तय किया कि उस दिन वह फिर ‘स’ के यहां जाएगा और प्रत्यक्ष रूप से उसके हाल-चाल पता करेगा. इस बार वह कुछ देरी से घर पहुंचा. उस दिन ‘स’ घर में ही थी. जब उसने दरवाजे की घंटी बजाई, तो अन्दर उसे कुछ असाधारण हलचल महसूस हुई, जैसे घर के अंदर कई लोग हों.

कुछ देर बाद ‘स’ ने दरवाजा खोला, तो सामने ‘ब’ को देखकर सकपका गई, फिर अपने चेहरे के भावों को सामान्य करती हुई बोली, ‘‘आप भाई साहब, इतनी रात को...? कोई काम था क्या?’’

‘‘नहीं, बस ऐसे ही मन हुआ कि आपसे मिलकर कुशल-क्षेम पूछ लूं.’’ कहते हुए उसने अन्दर घुसने का प्रयास किया, तो ‘स’ उसके आगे खड़ी हो गयी. तेज आवाज में बोली, ‘‘भाई साहब, मैं ठीक हूं. अभी मेरी कुछ सहेलियां आई हुई हैं. आप फिर कभी आइएगा.’’ और उसने दरवाजा बंद करने का उपक्रम किया.

‘ब’ कुछ सकपका गया. थोड़ा अपमानित भी महसूस किया. उसने ध्यान से कान लगाया, तो अंदर से किसी महिला की आवाज़ नहीं सुनाई पड़ी, परन्तु कुछ पुरुष जोर-जोर से बातें करने में लगे हुए थे. उसने एक बार तीखी दृष्टि से ‘स’ को देखा और फिर उसकी प्रतिक्रिया देखे बिना वापस मुड़ पड़ा.

उसके मन में तरह-तरह के विचार आ रहे थे. ‘स’ के चरित्र के बारे में उसे संदेह नहीं था, परन्तु एक अकेली औरत रात के वक्त अपने घर में पर-पुरुष को बुलाए, तो इसमें किसी संदेह की गुंजाइश नहीं रहती थी कि वह कौन सा गुल खिला रही थी.

‘अ’ घर से दूर था और उसकी पत्नी यहां अकेली पर-पुरुषों के साथ रंगरेलियां मना रही थी. यह कितनी पीड़ादायक बात थी, यह ‘ब’ महसूस कर रहा था, परन्तु जब ‘अ’ को पता चलेगा, तो उसे कैसा लगेगा? उसका तो दिल ही टूट जाएगा और नारी जाति पर से उसका विश्वास चकनाचूर हो जाएगा. वह क्या करे? क्या ‘अ’ को ‘स’ की करतूत बता दे, या वह अपने तक ही इस बात को सीमित रखे. ‘अ’ बेचारा अकेले परेशान होगा. पत्नी की करतूतों के बारे में जानकर कहीं आत्महत्या न कर ले या गुस्से में आकर पत्नी के साथ ही न कुछ कर बैठे.

‘ब’ दिल का बहुत भला था. वह किसी का नुकसान नहीं चाहता था, न ‘अ’ का, न ‘स’ का न किसी गैर का. ‘अ’ और ‘स’ तो उसके अपने थे. उनका बुरा वह कैसे सोच सकता था? उसने तय किया कि ‘अ’ को ‘स’ की कोई बात नहीं बताएगा. अगली बार जब उसने ‘अ’ को फोन किया, तो बस इतना कहा-

‘‘मित्र, आप कब तक आ रहे हो? भाभी यहां परेशान हैं. आप उनको जल्दी अपने साथ ले जाओ.’’

‘‘परेशान है. मुझे तो उसने ऐसा कुछ नहीं बताया.’’

‘‘वह आपको परेशान नहीं करना चाहती होगी, परन्तु एक पत्नी पति से दूर अकेले रहे, तो उसे परेशानी होती ही है. आप को क्वार्टर मिला कि नहीं?’’

‘‘हां, क्वार्टर तो मिल गया, परन्तु छुट्टी नहीं मिल रही.’’

‘‘पत्नी को लाने के लिए तो छुट्टी मिल सकती है.’’

‘‘हां, परन्तु आने-जाने में चार दिन लग जाते हैं. मैं चाहता हूं, कुछ दिन बाद आऊं तो ज्यादा दिन की छुट्टी मिल जाएगी.’’

‘‘आप कम-ज्यादा के चक्कर में मत पड़ो. जितनी जल्दी हो सके, आकर भाभी को अपने साथ ले जाओ.’’

‘‘ठीक है, देखता हूं.’’

परन्तु ‘अ’ अगले एक महीने तक नहीं आया. ‘ब’ परेशान हो गया. वह लगभग रोज ‘अ’ के घर की तरफ जाता, बाहर से ही पता करता. ‘स’ की रंगरेलियों में कोई कमी नहीं आई थी, बल्कि बढ़ती ही जा रही थीं. वह बहुत मानसिक उलझन में था. साफ-साफ अपने दोस्त को बताने की हिम्मत नहीं हो रही थी. ‘स’ उसकी बात सुनती नहीं थी. क्या करे वह? उसने एक दिन ठान ली कि ‘स’ से बात करेगा. उसे समझाने का प्रयास करेगा. सोचकर एक दिन शाम को वह ‘स’ से मिलने के लिए निकल पड़ा.

रात का अंधेरा घिर आया था. चारों तरफ बिजली का प्रकाश फैला हुआ था. बस से उतरकर वह पैदल ही ‘अ’ के घर की तरफ चला. उसके घर के बाहर सन्नाटा था, परन्तु अन्दर रोशनी थी. आज अपेक्षाकृत घर के अंदर शांति थी. उसने घर की घंटी बजाई, परन्तु शायद घंटी खराब थी. अन्दर कोई आवाज नहीं आई. उसने दरवाजा खटखटाने के लिए हाथ बढ़ाया तो लगा कि दरवाजा अन्दर से बंद नहीं था. उसके मन के अंदर किसी चोर ने सिर उठाया. उसके हाथ रुक गये. सोचा, चुपचाप चलकर देखे तो सही अन्दर क्या हो रहा था? ‘स’ क्या कर रही थी और उसने दरवाजा बन्द क्यों नहीं किया था. इतनी लापरवाह तो वह नहीं थी, परन्तु मनुष्य जब दुष्कर्म करता है, तो उसके दुष्कर्मों को देखने के लिए बहुत सारे लोग तत्पर रहते हैं और ऐसे बहुत से दरवाजे खुल जाते हैं जहां से मनुष्य के दुष्कर्मों को देखा जा सकता था.

घर के अन्दर भी सन्नाटा था, परन्तु एक कमरे से कुछ फुसफुसाहट की आवाजें आ रही थीं. वह दबे पांव उस कमरे की तरफ बढ़ा. दरवाजे पर कान लगाकर सुना-आवाजों से ही पता चल गया कि अन्दर कोई स्त्री और पुरुष हैं और वह दोनों रतिक्रिया में व्यस्त थे. वह गुस्से से भर उठा. इतना बड़ा पाप....और इस तरह खुलेआम...किसी की कोई परवाह नहीं. अन्दर-बाहर के सभी दरवाजे खुले पड़े थे और वह इस तरह कामक्रिया में रत थे, जैसे कोई हवन-पूजन कर रहे हों.

उसने धड़ाम से दरवाजा खोला. अन्दर का दृश्य देखकर शर्म से उसका ही सिर नीचा हो गया. उसका दोस्त ‘अ’ यह सब देखता, तो या तो वह उन दोनों को मार डालता, या शर्म से स्वयं आत्महत्या कर लेता. परन्तु ‘ब’ ऐसा कुछ नहीं कर सकता था. वह कुछ देर तक आहत सा खड़ा रहा, तब तक स्त्री और पुरुष संभल चुके थे. पुरुष ने अपने कपड़े पहन लिये थे, परन्तु स्त्री ने केवल अपने ऊपर चादर डाल ली थी. पुरुष वहां से खिसकने लगा. वह चाहकर भी उसे नहीं रोक सका. बस एक बार स्त्री को देखा, जैसे अपने किए की माफी मांग रहा हो, परन्तु ‘स’ के चेहरे पर क्रोध के लक्षण उभरने लगे थे. उसने उसके आनन्द में बाधा जो उत्पन्न की थी.

‘‘यह क्या है? तुम घर के अन्दर कैसे घुसे?’’ ‘स’ ने लगभग चीखते हुए कहा.

अनजाना पुरुष तबतक बाहर जा चुका था. उसने लगभग घिघियाते हुए कहा, ‘‘घर का दरवाजा खुला हुआ था.’’

‘‘फिर भी तुम आवाज दे सकते थे. मैं किसी भी दशा में हो सकती थी, इसका तुम्हें कोई ख्याल नहीं आया.’’

उसने स्वयं देखा था कि ‘स’ किस अवस्था में थी. उसे कहने की आवश्यकता नहीं थी, परन्तु अन्दर ही अन्दर वह अपराध-भाव से ग्रस्त हो गया. उसने सिर झुकाकर कहा, ‘‘मैं माफी चाहता हूं.’’

‘‘इसकी सजा तुम्हें मिलेगी. मैं तुम्हें छोड़ूंगी नहीं.’’ वह और जोर से चीखी. ‘ब’ ने वहां रुकना उचित नहीं समझा. वह बात को बढ़ाना नहीं चाहता था.

बाहर निकलकर उसने ‘अ’ को फोन किया, ‘‘भाभी बहुत बीमार हैं. तुम तुरन्त आ जाओ.’’

‘‘अच्छा!’’ उसने बस इतना ही कहा.

‘ब’ ने यह बात किसी को नहीं बताई. अपनी पत्नी को भी नहीं. दिन-रात अपने मित्र और उसकी पत्नी के बारे में सोचता रहता. सोच के अतिरेक में वह स्वयं मानसिक रूप से बीमार हो गया. उसने अपने ऑफिस से कुछ दिन की छुट्टी ले ली और घर पर आराम करने लगा. उसके मन की व्यथा वह स्वयं सह रहा था. किसी से नहीं कहा, परन्तु मन ही मन अवसाद सहने से वह बहुत कमजोर सा हो गया. उसकी पत्नी ‘द’ ने इस बात को महसूस किया. परन्तु ‘ब’ उसे भी कुछ नहीं बताता था. इस बीच उसके मित्र का न तो उसके पास फोन आया, न कोई खबर कि वह शहर लौटकर आया था या नहीं.

कुछ दिन बीत गये. रात का समय था. वह पत्नी के साथ कमरे में लेटा था. नींद उसकी आंखों से दूर थी. उसे लग रहा था, आज कुछ अनहोनी होनेवाली थी. रह-रहकर शंका के बादल उसके मन के आकाश में घुमड़ रहे थे. ‘द’ भी उसकी उदासी को लेकर परेशान थी.

बोली, ‘‘न तो आप ठीक से खाना खाते हो, न अपनी परेशानी किसी को बताते हो. आखिर ऐसी क्या बात हो गयी?’’

‘‘तुम नहीं समझोगी?’’