• ओमप्रकाश कश्यप

बचपन के कुछ बिंब - एक दादा का दृष्टिकोण

बालक हमारे भविष्य का प्रतिनिधि है. आने वाले समाज का विवेक. इसलिए जरूरी है कि उसकी नैसर्गिक जिज्ञासा बनी रहे. उसके लिए किया क्या जाए? इसका उत्तर प्रायः हमारे पास नहीं होता. परंपरा और संस्कृति के दबाव में हम जो करते हैं, वह अकसर विपरीत परिणाम देने वाला होता है. शायद इसलिए कि हम बालक को जरूरत से ज्यादा ‘बालक’ समझते हैं. दूसरी ओर बालक कदम-कदम पर संकेत करता है कि वह व्यक्तित्व के स्तर पर स्वतंत्र है. मगर उनपर हम ध्यान नहीं देते. पूर्वाग्रहों के कारण नजरंदाज करते जाते हैं. अब ईशान को ही लें. उसने जीवन का तीसरा वर्ष अभी-अभी पार किया है. अपने आस-पास की चीजों के साथ-साथ वह मानवीय संवेदनाओं को भी पकड़ने लगा है. फिर भी हमारे लिए वह महज बच्चा है; और पांच-सात वर्ष बीतने के बाद भी बच्चा ही रहेगा. उस समय तक रहेगा जब तक वह हमें खुद को बालक न समझने के लिए बाध्य न कर दे. उन दिनों तक संभव है वह स्कूल जाने लगे. किसी प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में अव्वल आकर ऐसी सफलता अर्जित करे, जिसे हम कभी प्राप्त नहीं पाए हों. तब भी हमारे लिए वह बच्चा ही रहेगा. इसलिए कि हम बड़े अपने बड़प्पन की भावना से अलग नहीं हो पाते. मेहमानों के आगे हम बालक की चपलता की प्रशंसा करते हैं. बुद्धिमत्ता को सराहते हैं. लेकिन बालक के स्वतंत्र विवेक या उसकी संभावना को प्रायः नजरंदाज करते जाते हैं.

चलिए हम ईशान की ही बात करते हैं. अपनी मासूम अदाओं से वह हमेशा हमारा मन मोहता रहता है. उसकी चपलता पर हमारा वात्सल्य उमड़-उमड़ आता है. हमारे आसपास हो तो प्रत्येक को यही भ्रम होता है कि हम उसे खिलाते-बहलाते हैं. सच तो यह है कि वह हमें खिलाता-बहलाता है. हम उसके सहारे नहीं, बल्कि वह हमारा सहारा है. पूरा घर उसकी इच्छा पर, संकेत पर कठपुतली जैसा व्यवहार करता है. लेकिन बात जब विवेक की हो, स्वतंत्र फैसला करने की हो, तब हम नहीं मानते कि वह अपने स्तर पर कोई फैसला करने में सक्षम है. अपनी इच्छा से वह नहाना भी चाहे तो सर्दी-जुखाम की आशंका पूरे परिवार पर सवार हो जाती है. ‘राजा बेटा’ वह तभी कहला सकता है जब सुबह उठने से रात को बिस्तर पर जाने तक बड़ों की इच्छा का पालन करे. बजाय वह करने के जो उसे अच्छा लगता है, वे सभी काम करे जो माता-पिता और अभिभावकों को सुहाते हैं.

ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें बालक के विवेक पर चर्चा करना बचकानापन लग सकता है. उनमें से कुछ वे भी होंगे जो बालसाहित्य को दोयम दर्जे का मानते हैं. ऐसे लोगों की मदद के लिए आगे कुछ कच्चे-पक्के, परंतु सच्चे दृश्य हैं, जिन्हें रचनात्मकता की दृष्टि थोड़ा बदला गया है—

हर दिन शाम होते-होते मैं दफ्तर से घर पहुंचकर घंटी बजाता हूं. परिवार के बड़े सदस्यों को पीछे छोड़ता हुआ वह ऊपर रैलिंग पर आ जाता है. वहीं से गूंज उठती है उसकी आवाज—‘दादू.’

फिर तो दरवाजा खुलते ही गोद में आने की जिद. मैं कपड़े बदल लेना चाहता हूं, वह नहीं सुनता. अपना अधिकार जताते हुए कहता है—

‘दादू ऊपर चलो.’

‘चलेंगे, कपड़े तो बदल...?’

‘नईं, कुछ दिखाना है...’ वह बात बीच ही में काट देता है.

‘अच्छा जूते उतार लें, तब चलेंगे.’

‘नईं, तुम्हें अब्बी कुछ दिखाना है.’

‘ठीक है, चलो.’ बात मनवा लेना उसे आता है.

छत पर पहुंचे. दीपावली करीब थी. केवल चार दिन शेष. घर रोशनी से दमकने लगे थे. लग यही रहा था कि वह झिलमिलाती रोशनी की ओर आकर्षित है. उसी के बारे में कुछ बताना चाहता है.

‘दादू वह देखो....’ उसने एक दरवाजे पर लटकी लड़ियों की ओर इशारा किया.

‘बहुत शानदार, चलो कपड़े बदलकर दुबारा आएंगे.’

‘नईं, अबी और देखना है....’ उसने छत पर डटे रहने का संकेत किया—

‘दादू उधर चलो....’ मुझे कोफ्त-सी हुई. लड़ियां तो बाद में भी देखी जा सकती हैं. कम से कम जूते तो उतारने दिए होते. शायद उसने मेरे मन की हलचल परख ली थी—

‘चलो नीचे चलते हैं....’ वह एकाएक बोला. मुझे अच्छा लगा. साथ लेकर जीने की ओर बढ़ा ही था कि एकाएक पलट गया. मानो कुछ अजूबा देख लिया हो—

‘दादू वह देखो...’ उसने एक घर के आगे दमकते बल्वों की ओर इशारा किया. मुझे भी अपनी गर्दन उस दिशा में मोड़नी पड़ी.

यह करीब-करीब रोज का किस्सा है. बात उसके एक कौतूहल से शुरू होती है, दूसरे पर समाप्त.

बालक के मन में जीवन का उल्लास होता है. उसे वह अपने आप तक सीमित नहीं रखना चाहता. किसी भी चीज को खुद तक सीमित रखना उसका स्वभाव भी नहीं है. सरल होने के कारण ही वह प्रकृति के सर्वाधिक निकट होता है. जो केवल देना जानती है. सभ्यता और संस्कृति के नाम पर बड़े ही बालक को जोड़ना-जुटाना सिखाते हैं. सरलमना बालक बार-बार हमें जीवन जोड़ता है. हमें हमारे नैराश्य और बौद्धिक जड़ता से बाहर निकालना चाहता है. लेकिन हम अपने सिवाय बाकी दुनिया से, जब तक हमारा कोई मतलब न हो, लगभग उकताए हुए होते हैं. इसलिए हम या तो बहुत चिंतित होते हैं, अथवा बेपरवाह. कटु यथार्थ हमारे जीवन के सपने, उमंगे, उल्लास आदि सब छीन लेता है. इस कमी के चलते कई बार अच्छी चीजें भी निगाह से छूट जाती हैं. ऐसी चीजें जो हमारी ऊब और उकताहट कम करने में सहायक हो सकती हैं, उनकी ओर से उदासीन हो आगे बढ़ जाने की हमें आदत-सी पड़ जाती है—

‘दादू उधर चलो.’ ईशान ने मेरा मुंह पकड़कर मोड़ दिया. मुझे उसी ओर मुड़ना पड़ा.

‘दादू सेलो टेप गिर गई.’ वह पड़ोसी की छत की ओर झांकते हुए कहता है. पड़ोसी बाहर रहते हैं. नीचे अंधेरा पसरा हुआ है.

‘कोई बात नहीं बेटा. नई ला देंगे.’

‘मैं देखना चाहता हूं, दिखाओ.’

ईशान के साथ-साथ मैंने भी नीचे की ओर झांका. अंधेरे में सिवाय सफेद से बिंदू के कुछ नजर न आया. मगर ईशान की नजर माशा-अल्लाह. अचानक वह चीख पड़ा—‘वो पड़ी दादू.’

‘ठीक है, दिन में उठा लेंगे. अब चलते हैं.’ मैं उसे लेकर सीढ़ियों की ओर बढ़ा. पर उसका मन बेचैन था—‘दादू सेलो टेप देखनी है....’ उसका स्वर गंभीर था. मानो कुछ सुनिश्चित कर लेना चाहता हो—

‘अभी तो देखी थी....’

‘दुबारा देखनी है....’ मैं उसे लेकर दुबारा मुंडेर की ओर गया. झांककर देखा, अंधेरे में वही सफेद बिंदू झलक रहा था.

‘दादू टेप गिर गई....’

‘कोई बात नहीं. नई ले आएंगे.’ मैं जीने की ओर बढ़ा.

‘दादू, सेलो टेप गिर गई.’ बात उसके दिमाग से उतर ही नहीं रही थी.

बालक अपनी सफलता-असफलता के प्रति बड़ों से ज्यादा सजग होता है. असफलता को सफलता में बदलने के लिए वह बार-बार प्रयास करता है. इतनी बार जितना हम उसके बारे में उतना सोच भी नहीं पाते. कई बार बालक के प्रयास को बचपना कहकर महत्त्वहीन बना देते हैं. बड़े प्रायः बालक के आगे उपदेशनुमा शब्दों में प्रयास की महत्ता का बखान करते हैं. उसे बड़े-बड़े उपदेश दिए जाते हैं. न जाने कितने ग्रंथ इस विषय पर लिखे गए हैं. परंतु बिना हिम्मत हारे लगातार प्रयत्नरत रहना बालक का नैसर्गिक गुण है. किसी को उसे सिखाना नहीं पड़ता. अपने कदमों चलने से पहले वह बार-बार गिरता-पड़ता है. चोट भी खाता है, मगर गिरने-पड़ने या चोटों के डर से प्रयास करना नहीं छोड़ता. कोई सिखाए या न सिखाए बालक अपने आप चलना सीख ही जाता है. बड़ा होने पर यदि वह प्रयास से कतरा रहा है तो अवश्य ही उसकी शिक्षा-दीक्षा में कुछ कमी है. हमने बालक को समझने या समझाने में भूल की है. कुल मिलाकर बचपन के सहज-स्वाभाविक गुणों को, समाजीकरण के नाम पर उससे छीन लिया गया है.

कुछ देर बाद मैं ईशान को लेकर नीचे आ गया. ईशान का चाचा घर में लड़ी लगाने के काम में जुटा था. यह पहला अवसर था जब चार दिन पहले से घर में दीपावली के लिए रोशनी का खास इंतजाम किया जा रहा था. ईशान का अतिरेकी उत्साह जो ठहरा. दीवाली के महीना-भर पहले से वह कल्पनाएं बुनने लगा था. लड़ियां, धमाके, फुलझड़ियां सब उसकी लंबी फेहरिश्त में थे. गोदी से उतरते ही वह अपने चाचा के पास दौड़ गया. मेरे पहुंचने से पहले भी वे रोशनी के इंतजाम में जुटे थे. साथ मिलकर लड़ियां टंगवाई थीं. अब केवल कंदील लगाया जाना शेष था. ईशान दौड़-दौड़कर अपने चाचा की मदद कर रहा था.

‘ईशू, सेलो टेप देना.’ चाचा ने आवाज दी.

ईशू ने कुछ नहीं कहा. चाचा ने दूसरी बार कहा. फिर शांत. अपनी जगह से हिला तक नहीं. आखिर उसके चाचा स्टूल से उतरे. सेलोटेप की खोज में यहां से वहां, अलमारियां झांकने लगे. तब ईशान उनके पीछे पहुंचा—‘चाचा....चाचा!’

‘क्या है?’

‘सेलोटेप निशा दीदी की छत पर पड़ी है....’

‘वहां कैसे पहुंची?’

‘मैं तो खेल रहा था, सेलो टेप निशा दीदी की छत पर जा पड़ी.

‘अच्छा....’

‘गलती से जा पड़ी चाचा....’

‘किसी गलती से...’

‘मेरी, और किसकी?’ उस समय उसके चेहरे की मासूमियत देखने लायक थी. याद आया, बालक झूठ नहीं जानता. बड़े ही उसे झूठ बोलना सिखाते हैं. वह झूठ या तो किसी के कहने पर बोलता है, अथवा तब जब सच बोलने पर दंड मिलने का अंदेशा हो.

‘कोई बात नहीं, नई ले आएंगे.’ चाचा ने हंसकर कहा था. वह दौड़ता हुआ मेरे पास पहुंचा—

‘दादू ऊपर चलो.’

‘अब क्या है?’

‘मुझे लाइटें देखनी हैं.’ दिमाग का बोझ हट जाने से वह पूरे उत्साह में था.

कई बार बालक की चुस्ती, फुर्ती, उसकी मासूम बातचीत बड़ों को बड़े अभाव की पूर्ति जैसी लगती हैं. इसलिए वे बच्चों के साथ बने रहना चाहते हैं. ताकि उनकी मस्ती, उनके सपनों और उमंगों का एक हिस्सा उधार ले सकें. या उन यादों में जी सकें जो उम्र की उठान के समय उनके साथ थीं. उसे गोदी में उठा लेने के अलावा मेरे पास कोई चारा न था—‘ठीक है, किस ओर देखनी है?’

‘दादू उधर देखो.’ अंधेरा बढ़ने से लाइटों की चमक बढ़ गई थी. उसपर तरह-तरह की सजावट. वह छत के इस कोने से उस कोने तक मुझे घुमाता रहा. कभी यहां तो कभी वहां.

‘दादू उस ओर चलो.’ कहकर वह मुझे फिर छत के उसी किनारे की ओर ले आया. और नीचे झांकता हुआ बोला—‘दादू, सेलो टेप गिर गई, वहां...’ उसने धीरे से कहा. तीन साल के बच्चे को खेल-खेल में सेलो टेप नीचे गिर जाने का गहरा एहसास था. अपनी गलती भी वह मान चुका है. फिर भी वह बार-बार स्वीकारता है.

क्या हम बड़े अपनी गलती कभी स्वीकार करते हैं. उल्टे गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिश में लगे होते हैं. बालक हमारी देखा-देखी ही बड़ा बनता है. धीरे-धीरे वह सब सीख जाता है, जिसे बड़े दुनियादारी कहते हैं.

बड़े बालक से उसका बचपन ही नहीं, उसकी पवित्रता भी छीन लेते हैं. बालक के पालन-पोषण की कितनी बड़ी कीमत वसूलते हैं हम बड़े.

कभी-कभी लगता है, हम बच्चे ही हमारे सच्चे गुरु हो सकते हैं. पर हम मानें तब न!

(अक्टूबर 31, 2013)

छोटे से छोटा बालक बड़ों से ज्यादा जिज्ञासु होता है. बड़े अनुभव में बड़े होते हैं, जिज्ञासा में छोटे. ज्ञानार्जन के प्रति उनका दृष्टिकोण उपयोगितावादी होता है. वे अकसर सोचते हैं कि जितना जरूरी था, उतना सीख चुके. जो उपयोगी नहीं, उसे सीखना भी जरूरी नहीं. बालक केवल सीखने पर ध्यान देता है. उसकी जरूरत पर कभी विचार नहीं करता. इसलिए उसके जीवन का प्रत्येक पल कौतूहल-भरा होता है. बड़ों की जिज्ञासा युवावस्था पार करते-करते दम तोड़ने लगती है. इसलिए बालक और बड़े की भेंट केवल उम्र की भिन्न दहलीजों पर खड़े व्यक्तियों की मुलाकात नहीं होती. वह अतीव जिज्ञासु और मरणासन्न जिज्ञासा वाले दो प्राणियों जो भिन्न मनोदिशा में जीते हैं—की मुलाकात होती है. पहला दुनिया को एक ही झटके में समझ लेना चाहता है. दूसरा निरंतर संघर्ष और जीवन के थपेड़ों के बीच आस-निराश में झूल रहा होता है. पहले के बाद पास अगाध-अनगिनत सपने होते हैं, उम्मीदें होती हैं. और उन्हें प्राप्त करने का भरपूर उल्लास होता है. दूसरे की उम्मीदें और उल्लास यथार्थ की पथरीली जमीन पर मुरझा चले होते हैं.