"शायद यही एक कसूर ..." पंकज त्रिवेदी की कविता - 2


ज़िंदगी की

प्रत्येक अनचाही घटनाओं के

साँचे में वो खुद को

ढाल रहा था...

लोग भी चाहते थे -

वो हमेशा उन्हीं साँचों में

फँसा रहे...

कभी अपनी मर्ज़ी से

खुद को ढालने न पाएं

उनकी कोई निजी पहचान

कभी न बना पाएं...

क्योंकि -

उनके पास न सत्ता थी,

न धन था और न थी खरीदी हुई

शोहरत !

उनका कुसूर था -

वो संस्कारी था, नॉन करप्ट था

सरल था, सहनशील था और

संवेदनशील था !

शायद

यही एक कसूर ..हर बात पर भारी था ||

*

|| पंकज त्रिवेदी ||

संपर्क- पंकज त्रिवेदी

"ॐ", गोकुलपार्क सोसायटी, 80 फ़ीट रोड, सुरेन्द्र नगर, गुजरात - 363002 मोबाईल : 096625-14007 vishwagatha@gmail.com

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