• दिलीप कुमार

मिट्ठा


कमला बड़ी देर तक कमरे में निढाल पड़ी रही फिर उसे न जाने क्या सूझी कि वो उठकर बाहर चली आयी। उसने दुर्गेश से कहा ‘‘मुझे छत पर ले चलो दुर्गेश’’।

दुर्गेश ने हैरानी से कहा ‘‘अभी टाइम है धूप ढलने में’’।

कमला ने दांत पीसते हुए सख्ती से कहा ‘‘ले चलता है कि चाहता है कि मैं गिर पड़ जाऊँ’’।

दुर्गेश ने भी सख्ती से कहा, ‘‘मम्मी छत पर कौन सा अमृत बरस रहा है जो तू अभी जाकर पी लेगी और अमर हो जायेगी। बाद में जान जायेंगे तो पापा और बड़कऊ हमको ही ताना देंगे।’’

कमला ने सीढ़ियों पर खुद चढ़ने का उपक्रम किया तो दुर्गेश जान गया कि उसकी माँ अब मानेगी नहीं। वो भुनभुनाते हुए आया और सहारा देते हुए कमला को छत तक पहुँचा दिया। कमला छत के एक कोने पर बैठ गयी, वहाँ थोड़ी सी छांह थी वहीं उसने दीवार पर टेक भी लगा लिया। उसने उचटे हुए मन से शून्य में देखना शुरू किया। सामने आम का वहीं पुराना पेड़ था जो चालीस बरस पहले था। पेड़ पर दो तोते बैठे थे जो रह-रहकर बेवजह एक दूसरे को चोंच मार रहे थे। कमला उन्हें एकटक देखे जा रही थी वो पक्षी एक दूसरे पर हमलावर होते फुदककर दूसरी डाल पर जाते। मगर फिर लौटकर उसी शाख पर आ जाते और रह-रहकर लड़ते। कमला ने ध्यान से देखा कि वो दोनों शायद किसी फल के लिये लड़ रहे हों मगर पेड़ तो फल विहीन था। पक्षी भोजन और प्रजनन के लिये ही आमतौर पर लड़ते हैं वरना नहीं लड़ते हैं। लेकिन वो क्यों लड़ी थी अपने पति करमवीर से? वहां ना भोजन की समस्या थी ना प्रजनन की। उसके घर में तब अन्न भी था और बच्चे भी। परिवार के पास खेती भी थी और पति की छोटी सी नौकरी भी।

ये हिन्दी सिनेमा में शोले फिल्म की धूमधड़ाके का साल था। जीवनस्तर उसका भी वैसे ही था जैसे पूरे गांव का था। अपने घर में उसी का राज था जिसमें उसकी बेटी नीलम और बेटा विक्की भी रहते थे और साथ में रहता था उसका मेहरमटका पति। जो सबको हुजूर, साहब, सरकार, मालिक कहा करता था जबकि ब्राह्मण बहुल गांव में उनकी जाति ही सर्वोच्च थी। कमला का जीवन ससुराल में मायके की तुलना में काफी बेहतर चल रहा था। मायके में चार-भाई-बहनों में उसके पिता की मामूली कमाई और बोरिंग करने का रोजगार जीने-खाने से कहीं ज्यादा न था। गांव में ही कमला की पांचवी तक की प्राइमरी में पढ़ाई हुई थी जो चिट्ठी-पत्री के इल्म तक महदूद थी तो वाकई कमला चिट्ठी लिखने से ज्यादा कुछ सीख भी न पायी थी। अठारह बरस की होते-होते उसका विवाह उसकी बुआ के गांव में कर दिया गया। बुआ ने इस शादी की काफी वकालत की थी और एक तरह अड़कर ये विवाह करवाया था। करमवीर घर का अकेला छांड़ और बाप नकुल सेन। करमवीर की मां का देहांत कुछ साल पहले हो गया था। सो, न सास, न ननद, न देवर, न जेठ। एक ससुर वो भी कमाउ बोरिंग का मिस्त्री। कमला को गांव में आकर पता लगा कि उसकी बुआ अपनी मांग में सिंदूर तो अपने पति के नाम का लगाती थी मगर पत्नी धर्म का निर्वाह किसी और के भी साथ कर रही थीं। बुआ की ही ताकीद पर कमला का विवाह करमवीर के साथ हो गया था। करमवीर के क और कमला के क अक्षर की समानता की वजह से वर-कन्या के तमाम गुण मिले थे। वाकई गुण खूब मिले थे क्योंकि करमवीर में कई स्त्रियोचित गुण विद्यमान थे। विवाह के बाद कमला को उसके इन गुणों का पता लगा कि माता विहीन करमवीर वत्सलता और ममता भी तलाशता है सिर्फ कामुकता नहीं। दिन-रात वो कमला के इर्द-गिर्द ही मंड़राता रहता था। करमवीर जंगलात महकमें में मुंशी था। लेकिन वो कर्म का वीर नहीं था अपितु बातों का वीर था। बातों में करमवीर बिल्कुल चाशनी की तरह था जिधर से चखो उधर से मीठा। इतनी लच्छेदार बातें करता था कि मध्ययुग के दरबारी कवि भी पनाह मांगे। निंदा किसी की नहीं, मुंह पर तारीफ और कसीदे मन भर-भर के गढ़ता रहता था। जंगलात महकमें में संविदा के मुंशी की नौकरी में कोई उज्र न था करमवीर ड्यूटी करता या न करता। साहब लोग उसे ड्यूटी से तो नहीं निकालते थे मगर उसकी आधी से ज्यादा तनख्वाह खुद रख लेते थे। जंगल की नौकरी तो ऐसी थी कि जितना कुंआ खोदो उतना पानी पियो। अगर आदमी मौजूद है तो वो जो खुद चुराकर बेच ले वो उसका और संस्थागत चोरी में हर मौजूद शख्स को जो हिस्सा मिलना था वो मिलता था भले ही वो छोटा सा क्यों न हो। वैसे भी उसकी लफ्फाजी से महकमें के लोगों के लिये उसका होना या न होना दोनों बराबर थे। इधर गांव में तमाम लोगों का अनुमान था कि करमवीर या तो समलैंगिक है या नपुंसक। ये अनुमान बहुतेरों का था गवाही किसी की नहीं। करमवीर का बाप उसके घर में पडे़ रहने को लेकर बेपरवाह था। उसका मानना था कि अभी नई-नई शादी है बाल-बच्चे हो जायेंगे तो काम पर जरूर जायेगा। नकुलसेन भी पांच कोस दूर जाकर जंगल में साहबों के हाथ-पांव जोड़ आते कि करमवीर का रोजगार क्या रहे। ब्राह्मण का विरोध कोई भी कर सकता है मगर वहीं ब्राह्मण जब विनीत होकर याचना करे तो किसी हिन्दू धर्म को मानने वाले को उसकी बात टालना बहुत मुश्किल होता है। आनन्द के दिन कितनी जल्दी बीत जाते हैं किसी को पता ही नहीं लगता।

पांच वर्षों में कमला की गोद दो बार हरी हुई पहले लड़की नीलम और बाद में लड़का विक्की। अब तक ये बात कमला बहुतों से सुन चुकी थी और जवाब देते-देते थक चुकी थी कि उसका पति मिट्ठा नहीं है। मिट्ठा अवधी में एक प्रचलित शब्द है जो बहुतेरे मायनों में प्रयोग होता है। अगर किसी पुरूष को मिट्ठा कहा जाता है तो इसलिये कि उसमें पुरूषार्थ या मर्दानगी की कमी है। ये पुरूषार्थ और नपुंसकता के बीच फिफ्टी-फिफ्टी वाला सेतु था। कमला को बच्चे हुए तो कई लोगों को शक-सुबहा था कि ये करमवीर की संताने हैं या किसी और की। गांव के बूढे़-बुढ़ियों का अनुमान था कि ये बच्चे शायद करमवीर के पिता नकुलसेन से हुए हों। मगर जैसे-जैसे बच्चों का रंग-रूप निकला वे बिल्कुल करमवीर के फोटोकापी थे। बच्चों का रंग-रूप देखकर लोगों का भ्रम दूर हो गया। कुछ प्रश्नों के जवाब जब मनुष्य देते देते थक जाता है और लोग नहीं सुनते, कुदरत उन सवालों के जवाब बड़ी सहजता से दे देती है।

विवाह के आठवें वर्ष में करमवीर का बाप नकुलसेन बोरिंग करते-करते उसकी मशीनरी की दुर्घटना में अपने प्राण गंवा बैठा। तब नीलम छः बरस की थी और विक्की तीन बरस का। ये कहर नाजिल हुआ तो उस घर की चूलें हिल गयी। करमवीर को उसके वालिद की मृत्यु के सबब दस हजार रूपये भी हासिल हुए। ये मदद उसके बाप के साथ के मिस्त्रियों और व्यापारियों ने की थी।

दस हजार रूपये एक बड़ी रकम थी इस समय हिन्दी में प्यार झुकता नहीं नाम की कोई फिल्म धूम मचाये हुई थी। जब तक रूपये रहे करमवीर घर से नहीं हिला। कुछ के वर्षों में जब रूपये खत्म हो गये तो तमाम परेशानियां सामने आयीं। घर में पहले अभाव हुआ फिर फांके की नौबत आ गयी। पंद्रह बीघे की खेती थी लेकिन खेती श्रम से ही फलती है लफ्फाज और मिट्ठा करमवीर की बातों से नहीं। उसके पास न तो कर्मठता थी न उद्यमशीलता। खान-पान, रहन-सहन वैसे ही रखा, पैसा खर्चता तो रहा मगर आया कहीं से नहीं। कमला एक ऐसे घर से ऐसे घर में आयी थी जहां रोज पैसा आता था। उसके पिता भी बोरिंग मैकेनिक थे और ससुर भी। जिस घर में रोज पैसा आता हो चाहे थोड़ा सा ही उस घर की रोज-रोज की दुश्वारियां भी कटती जाती थीं। अब छमाही पर फसल मिलती थीं वो भी आधा या तिहाई। धान या गेंहूं ही मिलता था वो भी बटाई पर। करमवीर खेतों की ओर तक न जाता था सो बटाईदार आधे से ज्यादा खेतों में ही चुरा लिया करते थे और जो कुछ बचता उसे फसल उठने पर आधा-आधा कर लेते थे। इतनी बड़ी खेती भी नहीं थी कि एक छमाही की बटाई फसल के साथ पूरे घर का खान-पान और घर खर्च निकल सके। कमला, करमवीर से बहुत कहती कि ड्यूटी चले जाओ वो जाता भी तो दो चार घंटे में भाग आता। घर में दूध-सब्जी के लाले हो गये सिर्फ धान-गेहूँ में जो बने वो बना लो और फिर उसी को बेचकर खिर्ची-मिर्ची ले आओ। अभाव बढ़ रहे थे, घर की हर बचत स्वाहा हो रही थी मगर जीवन तो चल रहा था।

मगर अचानक आये एक वज्रपात ने कमला की दुनिया ही उजाड़ दी। ऐसे ही कठिन समय में भादौं के महीने में चारो ओर अथाह जल राशि भरी थी। नदी, ताल, नौखान सब लबालब भरे थे। विक्की अलसुबह शौच के लिये निकला तो कमला ने उसे लोटा लेकर जाने की ताकीद की, कि बरसाती पानी के प्रयोग से फोड़ा-फुंसी निकलता है विक्की निकला तो कई घंटों तक नहीं लौटा। कमला खाना बना रही थी तभी रोती बिलखती नीलम आयी कि विक्की स्कूल के कुएं में डूब गया है। गांव भर उधर ही भागा। कुआं यूं तो काफी गहरा था मगर लगातार बरसात से पानी का जलस्तर काफी ऊपर आ गया था। फिर भी कुएं की जगत से पानी की सतह बारह-तेरह फुट नीचे थी। विक्की की लाश उसी में फूली हुई उतराई थी। कमला बदहवास सी पहुँची और उसने कुंए में छलांग लगा दी। कुंए में इतना पानी था कि हाथी भी डूब जाये। कमला विक्की को देखकर कूद तो पड़ी मगर वो खुद डूबने लगी। उसने बहुत हाथ-पांव मारे अंततः वो भी पानी के तल में चली गयी। कई कुशल तैराक भी कुंए में कूदे। रस्सी और चारपाई के सहारे कमला और विक्की कुंए से निकाले गये। विक्की तो मर चुका था कमला भी बहुत सारा पानी पी गयी थी और बेहोश थी। कमला को लाद-फांद कर अस्पताल पहुंचाया गया। उसके तन की, मन की तकलीफें इतनी ज्यादा थीं कि वो हफ्तों अस्पताल में रही बदहवास, विक्षिप्त और अनमनी। कमला जीने की इच्छा को मार चुकी थी वो बस दिन रात रोती ही रहती थी। ये दुख उस घर पर बहुत भारी गुजरा। कुल का दीपक बुझ चुका था। घर में दुख था, शून्य था, उदासी थी दिन-भर लोग रोते-बिलखते रहते थे। ये दुख कमला और करमवीर दोनों को खाये जा रहा था।

नीलम अभी बच्ची थी और बचपन का कोई दुख स्थायी नहीं होता। नीलम स्कूल चली जाती और करमवीर ड्यूटी तो कमला को घर करने को दौड़ता। उसे खुदकशी के तमाम इल्हाम होते। मगर भूख और भविष्य की सोच मनुष्य के जीवित रहने की घड़ी ठोस वजह होती है। पांच खण्डों में बंटा हुआ उसका घर था जिसमें कई पीढ़ियों के फरीकैन थे। पांच खण्डों में एक में करमवीर का निवास था बाकी चार हिस्सों में दूसरों के परिवार रहते थे। उसी के एक खण्ड में बड़कऊ भी रहता था। बड़कऊ जो करमवीर का भतीजा लगता था न सगा न चचेरा मगर था तो उसी पट्टीदारी का रक्त। उनके घर एक थे मगर वे एक ही घराने के नहीं थे। जिस रास्ते से लोगों का निकास था उसके बगल में ही एक नल था। नल के पास ही ईंटे घेर दी गयी थीं। कमला वहीं पर नहा लिया करती थी। मुख्य द्वार पर जब कोई साड़ी या जनाना वस्त्र लटका दिया जाता था तो ये एक सिग्नल था कि कोई स्त्री नहा रही है उतनी देर तक उधर पुरुषों और बालकों के गुजरने की मनाही होती थी। ईंटे तीन तरफ से घिरी थीं सिर्फ एक तरफ से दो फुट का निकास था जो नल से पानी लेने हेतु खुला था। एक दिन कमला दोपहर में नहा रही थी। उस दिन उसे बाल धुलना था। बड़ी देर तक वो अपने बालों को मलती रही और झुकाकर धुलती रही। अपने कपडे़ उसने ब्लाउज, पेटीकोट और अंगिया नल पर रखे थे। जो ईंटों के त्रिकोण से बाहर थे। उसके बदन पर नाममात्र के गीले कपडे़ थे। स्नान के बाद उसने त्रिकोण के रास्ते से बाहर जाने का प्रयास किया तो सामने एक विषधर फन काढे़ बैठा था। कमला को काटो तो खून नहीं। सांप खासा लम्बा और जहरीली प्रजाति का था। नागराज जिन्हें फेटारा भी कहा जाता है, रास्ता रोके जीभ लपलपा रहे थे। ईंट का त्रिकोण सिर्फ ईंट रखकर बनाया गया था ईंट चिन कर नहीं। उस पर चढ़ने की गुंजाइश हर्गिज न थी। कहाँ जाती कमला? फिर लाज के भी तो तकाजे थे। बदन पर कपड़े नाममात्र ही थे। उसने चिल्लाना शुरू किया। बड़ी देर तक पुकारने पर कोई भी नहीं आया। ऐसे खुले गुसलखाने में औरतें उसी वक्त नहाती थीं जब घर और आसपास किसी पुरुष के होने की उम्मीद ना हो। बड़ी देर तक कमला चिल्लाती रही और सांप उसी तरह फन काढे़ जीभ लपलपाता रहा। कमला को लगा अब उसकी मृत्यु निश्चित है। उसने अपने तन के इकलौते और गीले वस्त्र निचोड़ कर हाथ में ले लिया। पेटीकोट लम्बा था कमला ने सोचा वैसे तो सांप को मार पाना असंभव है पर यदि सांप ने आगे बढ़कर हमला किया तो वो पेटीकोट सांप के मुंह पर फेंक देगी और सांप जब कपडे़ में उलझ जायेगा तो वो उसे ईंटों से कुचल देगी। एक हाथ में ईंट और दूसरे हाथ में पेटीकोट लिये वो अपने देवता-पितरों का सुमिरन कर रही थी मगर आज उसे अपनी मृत्यु निश्चित जान पड़ रही थी। मगर न तो सांप टस से मस हो रहा था न ही कमला। ‘‘आई उधर से’’ किसी पुरुष का स्वर सुनाई पड़ा जो इस बात की टोह ले रहा था कि कोई नहा तो नहीं रहा है क्योंकि उसे वहाँ से गुजरना है। ये हरिमोहन था जो उसी पांच खण्डी घर का एक सदस्य था जो उसे अंटी कहा करता था। हरिमोहन को घर एवं गांव में बड़कउ भी कहा जाता था।

कमला ने कातर स्वर में कहा ‘‘हरिमोहन, सांप बैठा है सामने। डस लेगा मुझे किसी तरह मेरे प्राण बचाओ।’’

हरिमोहन ने ईंटों की दीवार के उस पार से पूछा तो कमला ने पूरी बात और लोकेशन बतायी। ये भी बताया कि किसी और को न बुलाना और न बताना क्योंकि उसके शरीर पर कपड़े नाममात्र ही है। उसने अपने एक हाथ में ईंट और दूसरे हाथ में गीले पेटीकोट होने की भी बात बतायी। हरिमोहन ने उसे उसी अवस्था में बैठे रहने को कहा। कुछ ही मिनटों में हरिमोहन ने भाले से सांप को पीछे से छेदकर झुका दिया और गुप्ती से उसकी गर्दन काट दी। कमला ये सब देखकर बहुत भयाक्रान्त हो गयी और जड़ हो गयी। उसे तन ढकने का भी होश न रहा। कटता, संघर्ष करता, छटपटाता और दम तोड़ता सांप देखकर उसकी रूह फना हो गयी। वो जिस अवस्था में बैठी थी वहीं फ्रीज हो गयी बिल्कुल। सांप को मारने के बाद उसे फेंकने चला गया हरिमोहन। वो लौटा तो उसने देखा कि कमला अब भी उसी तरह पेटीकोट और ईंट पकडे़ बैठी है। हरिमोहन ने नल पर से उठाकर कमला के कपडे़ उसे दिये और हाथ से सहारा देकर उठाया। हरिमोहन की मदद से कमला ने यंत्रवत कपडे़ पहने और उसे सहारा देकर कमरे में लाया। कमला बड़ी देर तक भयाक्रान्त रही और हरिमोहन बड़ी देर तक कमरे के दरवाजे के बाहर बैठा रहा। दोनों ही खासे असहज थे। कमला जानती थी कि अब उसके शरीर का कोई हिस्सा हरिमोहन से छुपा हुआ नहीं रहा, उसके मन में बड़ा हाहाकार था कि जिसने प्राण बचाये लाज की झीनी चादर भी उसी के समक्ष तार-तार हो गयी अब बाकी क्या रहा। उधर हरिमोहन भी कमरे के बाहर बैठा विचलित होता रहा कि जिस हाल में उसने कमला को देखा था उसके बाद उसका दिलो दिमाग उसके वश में नहीं था।

अट्ठाइस साल की कमला और उन्नीस साल के हरिमोहन इस असमंजस से तब तक जूझते रहे जब तक नीलम स्कूल से पढ़कर वापस नहीं आ गयी। हरिमोहन पूरा दिन उस बरामदे में ही पड़ा रहा उसने अपने सारे काम मुल्तवी कर दिये। कमला ने उसे चाय और खाना दिया। हरिमोहन गया नहीं और कमला ने उसे जाने को कहा नहीं। फिर तो ये रोज का शगल हो गया। हरिमोहन, नीलम के स्कूल जाते ही आ जाता वहीं चाय-पानी वहीं खाना। दोनों एक दूसरे से नजरे न मिला पाते मगर रहते थे दोनों एक दूसरे के आस-पास ही। कमला अपने घर-बाहर के कामों के लिये अक्सर उसे बुलवा लेती और हरिमोहन अपने सारे काम छोड़कर कमला के इर्द-गिर्द ही मंड़राता रहता था। गांव में एक भी पक्का शौचालय नहीं था इसी साल देश में इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी। अंधेरा होते ही शौच के लिये जाना उनके मिलन का सबसे मुफीद वक्त होता था। करमवीर अब जंगल से दूसरे-तीसरे ही लौटता था। नीलम सो जाती थी तो हरिमोहन रात-बिरात भी आ जाता थां उनका घर अंदर से भले बंटा था मगर बाहर से एक ही था। नीलम बच्ची थी, बिस्कुट और टाफी से ही खुश हो जाती थी मगर गांव इस मसले पर सुलग रहा था। अचानक कमला ने एक युक्ति निकाली उसने करमवीर को इस बात के लिये राजी कर लिया कि पशुओं के बाडे़ में जब पशु ही नहीं हैं तो क्यों ना एक ढाबली में किराना की दुकान खोल ली जाये। अव्वल तो इससे घर में चार पैसे आयेंगे और दूसरे वो नीलम के स्कूल चले जाने के बाद अकेली पड़ जाती है और विक्की को याद करके रोती रहती है। दुकान खुलने से वो मसरूफ रहेगी और विक्की की याद से छुटकारा भी मिला देगा। विक्की वाला इमोशनल कार्ड काम कर गया और कुछ ही दिनों में पशुवाडे़ के इकलौते कमरे के बाहर ढाबली रखा दी गयी। ढाबली पान-तमाखू और बाकी गृहस्थी की खिर्ची-मिर्ची से गुलजार थी। किराना की ढाबली खोलना इस गांव के लोगों का एक बड़ा ही प्रिय शगल था। ऐसी ढबलियां अक्सर छठे-छमाही किसी न किसी घर में खुलती थी और फिर अगली छमाही तक बंद भी हो जाती थीं। औरत ने दुकान खोली तो चल निकली। पान-तमाखू और नैनसुख के तलबगार दिन भर पहुंचने लगे। गांव में उसके आगे हरिमोहन के चर्चे दबे-हुए चल ही रहे थे। सो गांव के तमाम रंड़ुआ-छंड़ुआ पान-तमाखू के बहाने भाग्य आजमाने कमला की दुकान पर मंडराते रहते थे। अब पूरा दिन कमला दुकान करती थी और नीलम घर-स्कूल-दुकान में उलझी रहती थी। इसी बीच जंगल महकमें में दरख्तों की छंटाई के साथ मुलाजिमों की भी छंटाई हो गयी जिसमें करमवीर भी छंट गया। पुरूष के लिये बेरोजगार होना हमेशा जिल्लत का सबब रहा है। सो उस जिल्लत से बचने के लिये करमवीर जंगल में ही पड़ा रहता था। जलौनी लकड़ी, शहद बेचकर गुजारा हो जाता था उसका। इधर हरिमोहन पास के शहर से थोक में सौदा ला-लेकर देता और कमला उसे बेचती रहती। धीरे-धीरे पूंजी बन रही थी। दुकान चल निकली और साथ में चल निकले उनके संबंधों के चर्चे। कमला अब हरिमोहन को बड़कऊ कहती थी और बड़कऊ हे, हो, कहकर कमला को संबोधित करता था ताकि अंटी कहने के अपराधबोध से बचा रहे। करमवीर मुस्तकिल तरीके से जंगल में ही रहता था और फसल बंटवाने या किसी खास वजह से ही गांव आता था। नीलम भी इन सबके बीच बड़ी हो रही थी, सब देख-सुन और समझ भी रही थी। करमवीर ने कमला को बहुत समझाया पर वो टस से मस न हुई। कमला को दुकान बंद करने की चेतावनी मिली तो ढाबली खिसकाकर हरिमोहन के हिस्से में रखवा दी गयी। उनके घर जुडे़ हुए थे तो पशु-बाडे़ भी जुडे़ हुए थे। तीन भाइयों की चार बीघे वाली खेती वाले हरिमोहन को तमाम वर देखुआ देखकर लौट चुके थे। किसी ने हरिमोहन का विवाह करने का साहस नहीं किया। कई साल तक ये खेलमखेला चलता रहा। गांव कब तक चुप बैठता, बदनामी बढ़ रही थी। कमला पर एक दो बार करमवीर ने सख्ती की और हाथ उठाया तो हरिमोहन लाठी लेकर खड़ा हो गया। कमला जो खर्चा-अनाज करमवीर से लेती थी वो भी बंद। जिन्दगी की गाड़ी इन्हीं हिचकोलों के साथ बढ़ रही थी। नीलम तब जीवन के पंद्रह वसंत पूरे कर चुकी थी। जब वो गांव में रिश्तेदारी में आये हुए एक लड़के के साथ शारीरिक संसर्ग करते हुए अपने ही घर में पकड़ी गयी थी। नीलम निश्चिन्त थी कि मां दुकान पर है और पिता जंगल में। उसे ऐसा करते देखा तो हरिमोहन के छोटे भाई ब्रजमोहन ने जो कि नीलम के पूर