• शिव प्रताप पाल

जंगल का नया क़ानून

"नानी नानी, मेरी प्यारी नानी, आज सुनाता हूँ मैं तुम्हे कहानी|"

"अरे वाह रे मेरे बच्चे, आज तू मुझे ही कहानी सुनाएगा| अपनी नानी को कहानी सुनाएगा| फिर तो तू इतिहास बनाएगा| यहाँ तो हमेशा से कहानियाँ सुनाने का परमानेंट ठेका नानी-दादी को ही मिला हुआ है| चल फिर शुरू कर|"

"जी मेरी अच्छी नानी, पर आज मैं तुम्हे सुनाऊंगा बिलकुल नयी कहानी| तो तुम सुनने को तैयार हो न मेरी नानी|"

"चल सुना दे बेटा, ज़माना नया है, उल्टा-पुल्टा भी है, नाती-पोता सुनाएँ और नानी-दादी सुनें| चलो सुनाओ, मगर जैसा कि तुमने कहा, कहानी एकदम नयी होनी चाहिए जो मैंने कभी भी न सुनी हो|"

"ऐसा ही होगा नानी, तुम सुनोगी आज एकदम नयी कहानी| पक्की प्रॉमिस|"

नन्हे दीपू ने अपने गले के बीचो-बीच स्थित उभार को अपने अंगूठे और तर्जनी ऊँगली की सहायता से धीरे से दबाते हुए ये पक्की प्रॉमिस की थी|

दीपू ने कहानी शुरू की –

"सुनो नानी एक बार की बात है एक बहुत बड़ा सा जंगल था उसमे तरह तरह के जीव-जंतु रहा करते थे| जंगल के एक ओर बड़े-बड़े से अनेकों खेत भी थे जिसमे बहुत से किसान मेहनत से खेती किया करते थे| किसान जंगल और उसके जीवों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते थे| और जंगल के जीव भी किसान और उसके परिवार को नुक्सान नहीं पहुंचाते थे|

"जंगल से बहुत दूर जहां पर खेतों की सीमा समाप्त होती थी, वहां से किसानों के घर शुरू होते थे| इस प्रकार जानवर और इंसान अपनी अपनी हद में रहकर खुश रहा करते थे| हाँ ऐसा अक्सर होता था कि जब किसान खेतों में लगातार काम करता था तो उसका परिवार उसके लिए खेतों पर ही रोटियाँ लेकर आया करता था| किसान वहीँ पर खाता था और अक्सर रोटी के टुकड़े या बची हुई रोटियाँ चिड़िया, कौवा, गिलहरी इत्यादि के लिए छोड़ देता था| कई बार तो वह रोटी के टुकड़ों को हाथों में लेकर चिड़िया-कौवों को पुकारता था और वे आकर उनके और उनके बच्चों के हाथों से रोटियाँ लेकर उड़ जाया करते थे| इस प्रकार किसान और उनके परिवार भी खुश और पशु-पक्षी भी खुश रहा करते थे| कुछ समझी मेरी नानी|"

"हाँ मेरे लाल, मेरे दीपू कहानी अच्छी है, आगे सुनाते जाओ|"

"वाह मेरी नानी लो अब आगे की सुनो कहानी| जैसा कि मैंने बताया किसान अक्सर बची रोटियों को छोड़कर चले भी जाते थे यह सोचकर कि कोई भूखा जानवर आकर, उन्हें खाकर, अपनी भूख मिटाएगा|"

"वाह बेटा वाह, आगे सुनाओ|"

"वाह मेरी नानी| लो सुनती जाओ| एक शाम की बात है, किसान का पेट भर चुका था, एक रोटी अभी भी बाकी थी, उसे उसने वहीँ जंगल के किनारे अपने खेत में जानवरों के लिए छोड़ दी| इधर शाम को किसान अपने घर पहुंचा और उधर जंगल से दो जंगली बिल्लियाँ, एक काली और एक सफ़ेद उस रोटी पर एक साथ झपटी, शायद दोनों की नज़र एक दूसरे पर पहले नहीं पड़ी पर रोटी पर दोनों की नज़रें एक साथ पड़ी थी|"

"फिर क्या हुआ|"

"होना क्या था नानी| रोटी छोड़, नूरां-कुश्ती चालू| एक दूसरे पर पंजे से लेकर नोचा-नोची चालू| इस लड़ाई में दोनों थकने लगी थी, पर हार मानना दोनों को मंज़ूर नहीं था, आखिर पापी पेट का सवाल जो था| हार मानने का मतलब भूखा रह जाना भी था| तभी कहीं से अचानक एक बन्दर वहाँ आ पहुंचा| उसने बिल्लियों से पूछा क्या बात है? इस जंगल के पास ये दंगल क्यों हो रहा है?"

"फिर क्या हुआ मेरे राजा बेटे?"

"होना क्या था मेरी प्यारी नानी| बिल्लियों ने सारी घटना विस्तार से बन्दर को बता दी| बन्दर ने कहा – "बेवकूफ बिल्लियों, मेरी मौसियों यूँ लड़ने, कटने, मरने से अच्छा है, रोटी को दोनों बराबर बराबर बाँट लो| दोनों बिल्लियाँ जोर से चिल्लाई, एक तो मुझे इस बिल्ली पर भरोसा नहीं, दूसरे हमें पूरी रोटी चाहिए|"

"बन्दर ने कहा – "मेरी बात मानो पूरी के लिए मत मरो, और रही बात रोटी के बराबर-बराबर बंटवारे की, इसे तो मैं अच्छे से तुम दोनों में बराबर-बराबर बाँट दूँगा|" "बिल्लियों को ये आइडिया पसंद नहीं आया, मगर थकान के कारण उन्होंने, थोड़ा सुस्ता लेना उचित समझा|"

"फिर क्या हुआ बेटा|"

"बताता हूँ नानी, तनिक साँस तो लेने दो, बच्चा हूँ, नानी नहीं हूँ|"

यह कहते हुए दीपू मुस्कुरा दिया था| नानी भी मुस्कुराई – "ले लो साँस, चाहो तो झपकी भी ले लो और चाहो तो नीद भी ले लो|"

"न, न, नानी, कहानी तो मैं तुम्हे, पूरी सुना कर ही दम लूँगा| मेरी यह कहानी अखंड रहेगी| लो सुनो – बन्दर ने जंगल में कहीं से चुराया हुआ एक तराजू छुपा कर रखा था| वह उसे लेकर आया और बोला – "देखो सफ़ेद मौसी और काली मौसी, मेरे पास ये मशीन है - 'मशीने-तराजू' जिससे मैं रोटी को तुम दोनों में बराबर बराबर बाँट सकता हूँ|"

"नानी बोली, वाह दीपू बेटा वाह, भला ये कौन सी नयी कहानी है, यह तो वही पुरानी कहानी शुरू हो गयी, जो मैंने तुम्हे पिछले हफ्ते सुनायी थी, यह कब से नयी कहानी हो गयी, यह तो बहुत पुरानी कहानी है, जो मैंने अपनी दादी से बचपन में सुनी थी, और उन्होंने मुझे बताया था कि इस कहानी को उन्होंने अपनी नानी से सुनी थी| पर मान गयी मैं तुम्हे! अब तक तुमने जो इतनी देर तक मुझे बांधे रखा तो मैं समझी थी कि ज़रूर कोई नयी कहानी सुना रहे हो पर यह तो ........."

"क्या नानी, तुम भी बहुत बोलने लगी हो, पूरी कहानी सुने बगैर कह दिया वही पुरानी कहानी है| अरे पहले सुन तो लो पूरी|"

"नहीं मुझे अब न सुनना| मेरी सुनायी कहानी, मुझे ही सुना भी रहे हो और नयी बता कर उल्लू भी बना रहे हो|"

"नहीं-नहीं नानी, मेरी प्यारी नानी, तुम नहीं हो उल्लुओं की रानी, तुम हो मेरी मम्मी की मम्मी, पर अब थोडा चुप हो जाओ, सुन लो मेरी नयी कहानी|"

"न मेरे दीपू बेटे अब तो, तू फिर से सुन ले, मुझसे आगे की कहानी|"

"नहीं-नहीं, नानी तुमको ही सुननी होगा मेरी नयी कहानी|"

"नहीं नहीं, बिलकुल नहीं दीपू, अब तू मुझसे आगे की सुन|"

"ठीक है मेरी जिद्दी नानी, तुम हो मेरी मम्मी की मम्मी, अपनी धुन की पूरी पक्की, लो अपनी इच्छा पूरी कर लो, अपनी कहानी भी पूरी कर लो| मैं चुप होकर सुनता हूँ अब| थोड़ा सर भी धुनता हूँ अब|"

और नानी को मौका मिल गया था सो नानी शुरू हो गयी – "बन्दर ने रोटी उठाई, उसके दो टुकड़े किये, और एक-एक टुकड़े को तराजू के दोनों टुकडो पर रख कर तोला तो एक पलड़ा थोड़ा भारी प्रतीत हुआ| बन्दर बोला, इधर भार कुछ ज्यादा है, थोड़ा सा कम करना होगा यह कहते हुए उसने उस पलड़े पर रखे रोटी के टुकड़े का एक छोटा सा हिस्सा खा लिया और उसे फिर से पलड़े पर रखा| पर यह क्या, अब दूसरा पलड़ा थोड़ा भारी प्रतीत हो रहा था, सो बन्दर ने इस बार उस पलड़े पर रखी रोटी का टुकड़ा उठाया और उसका भार कम करने के लिए उसका एक छोटा सा हिस्सा खा कर पुनः पलड़े पर रखा| मगर फिर से इस बार पहले वाले पलड़े का भार ज्यादा प्रतीत हुआ| उसने फिर से भार बराबर करने के लिए छोटा सा हिस्सा खाया| और यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा| अंततः पूरी की पूरी रोटी बन्दर के पेट में जा चुकी थी और बिल्लियाँ एक दूसरे का मुंह देखते हुए अपनी अक्ल को मन ही मन कोस रही थी| बन्दर मुस्कुरा कर कहने लगा| अब तो हो गया न बंटवारा| अब तुम दोनों अपने अपने घर को जाओ| मैं भी अब बहुत थक गया हूँ, यह बंटवारा करते करते| मैं भी अब चलता हूँ|"

"आगे क्या हुआ नानी| मेरी प्यारी नानी|"

"हैं अब आगे भला क्या होता| बिल्लियाँ भूखी रह गयी और उनकी अक्ल ठिकाने आ गयी| खेल ख़तम पैसा हज़म|"

"बस हो गयी न खत्म, नानी तुम्हारी ये बरसों पुरानी सड़ी-गली हुई कहानी| अब तो तुम सुन लो मुझसे आगे की नयी कहानी|"

"हैं, ये क्या कह रहा रह तू? तू क्या मुझे कुछ और सुनाने वाला था?"

"और नहीं तो क्या, पर मेरी मम्मी की माँ, तुम कहाँ थी सुनने वाली, तुम तो हमेशा अपनी ही चलाती रहती हो| बच्चा हूँ न, मेरी भला कोई सुनता है कभी? सभी सुनाते हैं अपनी अपनी|"

"न बेटा न, ऐसा मत बोल, चल मुझे माफ़ कर दे| अपनी कहानी पूरी कर ले|"

"न, नानी न, अब मैं नहीं सुनाने वाला| अब जल्दी से सो जा तू, और मुझे भी सोने दे अब|"

"न मेरे राजा बेटे, मेरे नन्हे से दीपक, तू सुना मुझे, मैं सुनूंगी तेरी नयी कहानी| अब तुझे मैं न रोकूंगी|"

"कहा न मैंने, अब मैं नहीं सुनाने वाला, अब तू सो ही जा, मुझको तंग करना बंद कर दे मेरी प्यारी नानी|"

"बेटा फिर तो तू भी जिद्दी ही है, बिल्कुल अपनी माँ की माफ़िक और अपनी माँ की माँ की माफ़िक|"

"नहीं-नहीं, बिल्कुल नहीं| मैं अपने पापा पर गया हूँ, ऐसा मेरी माँ भी कहती है| मैं इतना भी जिद्दी नहीं हूँ| लो नानी तुम भी क्या याद करोगी, सुन लो अब आगे की कहानी – बन्दर की बात सुनकर सफ़ेद बिल्ली बोली – "देखो बन्दर चाचा, अब मैं सुस्ता चुकी हूँ| अब मेरी अक्ल वापस आ गयी| मैं काली बिल्ली से लड़कर खुद फैसला कर लूँगी की रोटी किसकी है और किसको मिलनी चाहिए| हमारे मसले में गैर बिरादरी वालों का आखिर क्या काम? यह सुनकर काली बिल्ली भी बोल पड़ी – हाँ बन्दर चाचा, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना, और बिल्लियों के मसले में बन्दर का आना ठीक नहीं जान पड़ता| आप जाओ यहाँ से हम निपट लेंगे|"

"बन्दर बोला – "अजी वाह जी वाह, बहुत खूब मेरी मौसियों, अगर तुम लड़ना मरना ही चाहती हो तो फिर ठीक है| मगर मैं इसकी इजाज़त कैसे दे सकता हूँ| मुझे कोई ऐरा-गैरा बन्दर समझ रखा है क्या? मैं इस जंगल का क़ाज़ी हूँ| जहाँ भी न्याय अथवा क़ानून व्यवस्था का प्रश्न खड़ा होगा, वहां उसकी व्याख्या करने का अधिकार भी मुझे होगा और फैसला करने का अधिकार भी मुझे ही होगा| यह मामला तो मेरे डाइरेक्ट संज्ञान में है| मैं चुपचाप खड़ा कैसे देख सकता हूँ| तुम्हे शायद मालूम नहीं है कि इस नये ज़माने में इस जंगल में नया कानून चलता है| इसमें अनावश्यक हिंसा का कोई स्थान नहीं है| यहाँ एक दूसरे के प्रति अकारण हिंसा की इजाज़त नहीं दी जा सकती| यहाँ एक जानवर दूसरे जानवर पर केवल उसी दशा में हिंसा कर सकता है, जब दूसरा जानवर उसका भोजन हो, और यह भी तभी क़ानून-सम्मत होगा जब हिंसा करने वाला भूखा हो| वैसे यदि यह मान भी लिया जाय कि यहाँ तुम दोनों ही भूखी हो तो भी तुम दोनों एक दूसरे का नैसर्गिक भोजन नहीं हो, इसलिए तुम्हे एक रोटी के लिए तो आपसी हिंसा की इजाज़त कदापि नहीं दी जा सकती| समझ गयी न पूज्यनीय मौसी जी| और यहाँ बिरादरी और गैर बिरादरीवाद बिल्कुल, न फैलाओ तुम, जंगल के नए कानून के हिसाब से यह गैरकानूनी कृत्य है, और दंडनीय भी है|"

"वाह बेटा दीपू वाह, क्या कहानी है, उत्सुकता बढ़ आ रही है, आगे सुनाओ|"

"वाह नानी अब आया न मज़ा, तो फिर लो अब आगे सुनो - "बन्दर की बात सुनकर बिल्लियों का गुस्सा सातवें आसमान पर था| काली बिल्ली बोली – तो यह बताओ बन्दर चाचा तुम्हे क़ाज़ी किसने बना दिया, कब से बना दिया|" बन्दर बोला – "अरे क़ाज़ी को आखिर इस जंगल में राजा के सिवा और कौन नियुक्त कर सकता है| राजा शेर सिंह ने मुझको क़ाज़ी नियुक्त कर रखा है| यह देखो यह हिज़ हाइनेस द ग्रेट महाराजा ऑफ़ द जंगल – 'शेर सिंह' की दी हुई आधिकारिक मुहर| लो देखो और ठीक से परखो, समझो, और पढ़ लो| देख लो इस पर एक तरफ न्याय के देवता की तस्वीर छपी है, जिसकी दोनों आँख फूटी है तथा दोनों कान बंद हैं और उसके ठीक दूसरी तरफ मेरी तस्वीर के साथ मेरा नाम बन्दर क़ाज़ी भी छपा है| अब अगर ज्यादा चूं-चपड़ की तो समझो खैर नहीं| अभी जोर की आवाज़ निकालकर जंगल पुलिस को बुला लूंगा और तुम दोनों को हिंसा करने के जुर्म में जंगल के नए कानून के मुताबिक़ कम से कम तीन महीने के लिए कारावास में भेज दूँगा|"

"बिल्लियाँ सहम गयीं| काटो तो खून नहीं| उन्होंने मुहर को साफ़ साफ़ देख लिया था| बन्दर सच कह रहा था| काली बिल्ली बोली - क़ाज़ी चाचा आप हमें माफ़ करें| हमें जंगल के नए कानून की जानकारी नहीं थी| हम इस बात से भी अनजान थे कि आप जंगल के क़ाज़ी हो| आज हमें यह जानकर आश्चर्य हुआ पर उससे ज्यादा हर्ष हुआ कि हमारे जंगल ने भी काफी तरक्की कर ली है| हम ज्यादा सभ्य और सुसंस्कृत गएँ हैं| हमारे पास अपनी एक अच्छी न्याय व्यवस्था भी है| अब आप न्याय करें|"

अब बोलने की बारी सफ़ेद ब