• ई-कल्पना

मेला




अनवर के गराज से उसके घर के रास्ते में ही दुर्गापूजा का मेला लगा था। आते हुये रास्ते में उसने पूजा पंडाल की सजावट और मेले में लगे तरह-तरह के झूलों की रौशनी देखी थी। झूलों पर लगी भक-भुक करने वाली रौशनी की जगर-मगर दूर से ही दिख जाती थी। जी में तो उसके आया था कि दो पल ठहर कर मेले की रौनक़ देख ले। लेकिन उसे याद आया कि कल ही मस्जिद के इमाम ने समझाया था कि इन मुशरिकों के मेले-ठेले से दूर रहना है, उधर शैतान रहते हैं। ऐसे मेले में जाना शिर्क है एवं शिर्क की कितनी तो भयानक सजायेँ उन्होने गिनवाई थी। अल्लाह-पाक आग में झुलसा-झुलसा के जलाएगा। उफ़्फ़ यह सब सोचते ही उसके रोंगटे खड़े हो गए। न जाने कितने हजारों लाखों वर्षों तक कब्र में पड़े रहो फिर गलतियों की सजा के बतौर आग में झुलसना। ना रे बाबा ना .... ऐसे शिर्क से दूर ही रहना।

अनवर की हमेशा कोशिश रहती थी, वह दीन पर कायम रहे और पक्के तौर पर अमल करे।

इमाम का वह बड़ा एहसानमंद रहता था कि कि उसके जरिये उसे इतनी सारी दीनी बातें जानने को मिलती है। अगर इमाम नहीं होते तो उसके जैसे न जाने कितने लगे शिर्क की अंधेरी गुफा में भटकते रहते। दीन की पाक रौशनी में आखिरत को हसीन बनाने का रास्ता इन जैसों के बदौलत ही तो मिल पाता है। वह सोचता। उससे खुद तो कभी पढ़ना लिखना हो नहीं पाता था। हालांकि उसने मखतब से पढ़ाई की थी और कुराने पाक पढ़ सकता था।


दुर्गापूजा का समय होने के कारण अनवर के गराज में ज्यादा काम नहीं था। उसने दुकान जल्दी ही बंद कर दी एवं घर आ गया। घर आकर उसने देखा कि उसका बेटा मोनू रो रहा है और उसकी अम्मी रुखसाना उसे चुप कराने की कोशिश कर रही है। मोनू के साथ अक्सर ऐसा ही होता है, जब उसकी कोई ज़िद पूरी नहीं होती है तो वह रोने लगता है और चुप ही नहीं होता है।

रुखसाना ने बेटे मोनू की शिकायत करते हुये कहा “जरा समझाइए अपने लाड़ले को, बहुत ही बिगड़ैल हो गए हैं। कल से ही ज़िद कर रहे हैं कि दशहरा के मेले में जाएंगे। आज सुबह से कुछ खाया-पिया भी नहीं है”।

अनवर ने बेटे की ओर देखा। वह उसे देखकर और ज़ोरों से सुबकने लगा था। रोते रहने से उसकी आँखें सूज गयी थी। उसे उस नन्ही जान पर दया आई। उसने सोचा बच्चे को समझाया जाये।

उसने प्यार से उसे अपने पास बुलाया। “मेरा राजा बेटा क्या खाएगा? चलो तुम्हें आइसक्रीम दिलवाता हूँ”। उसने बेटे से प्यार से कहा।

“नहीं मुझे कुछ नहीं खाना है। मुझे मेला घूमने जाना है बस”। मोनू ने हाथ पैर पटकते हुये कहा।

मोनू केवल छह साल का था । इसी साल अनवर ने मदरसे में उसका दाखिला करवाया था।

मोनू अनवर का एक ही बच्चा था, जो शादी के काफी अरसे के बाद पैदा हुआ था। वह अपनी पूरी कोशिश करता था कि वह एक अच्छा बाप बन सके और अपने बच्चे को अच्छी परवरिश दे सके।

जब कोई उपाय करके भी मोनू नहीं माना तो अनवर ने तय किया कि उसे बाहर से मेला दिखा कर ले आया जाये।

उसके घर से बमुश्किल आधा किलोमीटर पर ही पंच -मंदिर की बड़ी दुर्गा जी बैठती थी और उसी के बगल में जो खाली मैदान था, वहाँ मेला सजता था।

अनवर ने सोचा “मेला किसी मजहब का होता है क्या? मेला तो पैसे का खेल है। पैसे का मेला । मेले का भला क्या ईमान? उर्स में भी तो कितना बड़ा मेला लगता है?” यही सब सोचकर उसने अपने मन को समझाया।

हालांकि इमाम की बातें उसके मन में गहरे धँसी थी, लेकिन बच्चे की ज़िद और उसके प्रति उसके प्यार ने एक बार इमाम की सीख को पीछे छोड़ दिया।


अनवर मोनू को लेकर मेला स्थल पर पहुँच गया। बाहर से ही उसने देखा सामने एक बहुत ही खूबसूरत पंडाल बना था, जिसके भीतर देवी की मूर्ति स्थापित की गयी थी। लोग पंक्तिबद्ध होकर पंडाल के अंदर प्रवेश कर रहे थे। पंडाल के अंदर जाने के लिए भारी भीड़ थी। उसने उधर देखते ही तौबा किया। जिधर पंडाल था, उसके बगल के मैदान में मेला लगा था।

लाउड स्पीकर पर देवी का कोई गीत बज रहा था। अनवर को लगा इस तरह के गीत को सुनना तो शिर्क होगा उसने अपने गमछे को कस कर सर के चारो तरफ इस तरह बांध लिया जिससे उसका कान ढक गया। गीत की आवाज थोड़ी कम महसूस होने लगी। उसे लगा अब ठीक है।

मोनू उसे खींचता हुआ उधर ले जाने लगा जिधर मेला था।

तभी अचानक उसे एक ज़नानी आवाज़ सुनाई दी । कोई उसे सलाम कह रहा था।

“अस्सलाम अले कुम अनवर भाई”

उसने देखा वह उसकी पड़ोस की शगुफ्ता थी। जो अपने बेटे के साथ बैलून बेच रही थी। शगुफ़्ता उसके मरहूम पड़ोसी ज़ाहिद शेख की बेवा थी। ज़ाहिद जब जिंदा था तो वह घूम-घूम कर हाट-बाज़ार में खिलौने बेचता था। बीमारी से ज़ाहिद के मरने के बाद बेचारी शगुफ़्ता बड़े ही बुरे दिन काट रही थी। चार बेटियों और एक बेटे वाले परिवार के पालन की ज़िम्मेवारी उसके कमजोर कंधों पर आ पड़ी थी। वह आस-पास के घरों में जाकर दाई का काम करती थी। आज दो पैसे ज्यादा कमाने के लिए शगुफ्ता अपने बेटे के साथ इस मेले में बैलून बेच रही थी।

उसने उसे देख कर सिर हिलाया और आगे बढ़ गया।

“अब्बू मुझे बलून लेना है” मोनू ने इसरार किया ।

“अच्छा लौटते हुए ले दूँगा” अनवर ने मोनू को समझाया।

“नहीं मुझे अभी लेना है” मोनू जिद करने लगा

“ठीक है तो फिर बलून लेकर यहीं से हम लौट जाएंगे” अनवर ने सोचा अच्छा अवसर है बलून देकर मोनू को यहीं से लौटा ले जाया जाये।

मोनू इस पर चुप हो गया और मेले की तरफ जाने लगा।


मेले में खूब रौनक थी। तमाम तरह की चीजें बिक रही थी। छोटी-छोटी दर्जनों दुकाने सजी थी। दर्जनो झूले-तमाशे लगे थे। मौत का कुआं भी लगा था। उसने देखा कि उसके मुहल्ले के कुछ लोग भी वहाँ दुकानें लगाए हुये थे। रहीम वहाँ जूते चप्पल की दुकान लगाए हुये था। रफ़ीक़ ने खिलौने की दुकान लगाई थी। खिलौने की दुकान देखकर मोनू मचल गया। वह अनवर से खिलौने खरीद देने की जिद करने लगा। लेकिन अनवर ने सोचा कि मेले में सामान की कीमत ज्यादा होती है। पड़ोसी होने के कारण वह मोल-मोलाई भी नहीं कर पाएगा। इसलिए उसने मोनू की बात का ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ गया।


एक आदमी जो एक ऊँचे मचान पर बैठा था, माइक पर चिल्ला रहा था। अभी थोड़ी देर में यह लड़की, ठीक यही लड़की जिसकी तस्वीर सामने आप देख रहे हैं, यही लड़की नागिन बन जाएगी। आइये, आइये, टिकिट मात्र दस रुपये, दस रुपये .... आइये। आइये बाबू साहब आइये। शो शुरू होने जा रहा है। वह लगातार बोल रहा था। वह बीच-बीच में पुराने फिल्मी गाने बजा देता था। गाने के साथ वह अपना मुंह इस तरह चलाता था मानो वही गाना गा रहा हो। अनवर थोड़ी देर वहीं खड़े रहकर उसे देखता रहा। फिर मोनू उसे खींचकर मौत का कुआँ के तरफ ले गया।

मौत का कुआं वाले ने मोटर साइकल के साइलेंसर के पास माइक लगा दिया था, जिससे ज़ोर ज़ोर से गर-गर करके मोटरसाइकल की आवाज आ रही थी। मौत का कुआं वाले का दावा था कि मौत के कुएं में एक साथ पाँच मोटरसाइकलें एवं दो मारुति कारें दौड़ेगी। अनवर ने सोचा कि यह तमाशा देख लिया जाए। वह टिकिट काउंटर की ओर बढ़ा। एक टिकिट की कीमत थी चालीस रुपये, जो उसे जरूरत से ज्यादा लगी। फिर उसने सोचा कि एक ही टिकिट में अगर बाप बेटे दोनों को जाने दे तो सौदा बुरा नहीं है लेकिन उसने सोचा कि पहले दरयाफ्त कर लिया जाए कि एक टिकिट में दोनों को जाने देगा या नहीं। ऐसा न हो कि एक टिकिट खरीद ले और फिर दोनों को जाने न दे तो पैसे की बरबादी होगी। उसने टिकिट काउंटर वाले से पूछा कि छह साल का बच्चा क्या फ्री जा सकता है? टिकिट वाला जो एक मरियल सा बूढ़ा आदमी था, उसने उसके बच्चे की ओर देखते हुये कहा “नहीं केवल तीन साल तक के बच्चे फ्री में जा सकते हैं”। यह सुनकर उसने मौत का कुआं देखने का विचार त्याग दिया।

उसने सोचा कि मोनू को कोई झूला चढ़वा दे। वह इतने शौक से मेला आया है, ऐसे ही जाएगा तो अच्छा नहीं लगेगा।

एक झूले में लोहे के डंडों के सहारे कई काठ के घोड़े लटकाए गए थे। जिसपर एकसाथ कई सारे बच्चे बैठे थे एवं एक आदमी पुली के सहारे उस झूले को घूमा रहा था। उसने सोचा कि यह अच्छा है, इसमे ज्यादा खतरा भी नहीं है। इसमे मोनू को चढ़वा दिया जाये। टिकिट का दाम भी सस्ता था; एक आदमी के दस रुपये। उसने मोनू से पूछा कि क्या वह इस झूले पर चढ़ेगा? मोनू के हाँ कहने पर उसने उसे एक घोड़े पर चढ़ा दिया और बगल में खड़े होकर उसे देखने लगा।


झूला गोल-गोल घूमने लगा । मोनू जब अनवर के करीब आता , अनवर हाथ हिलाकर अपनी खुशी ज़ाहिर करता। मोनू भी बदले में हाथ हिलाना चाहता था। लेकिन झूले के घूमने से उसे डर लग रहा था इसलिए उसने दोनों हाथों से कसकर घोड़े के डंडे को पकड़ा हुआ था।

इसी बीच अनवर ने देखा कि उसका दोस्त तौफीक भी वहीं खड़ा है। तौफीक अनवर का बचपन का दोस्त था लेकिन वह उसकी तरह दाढ़ी नहीं रखता था और न ही उसे उसने कभी नमाज़ पढ़ते देखा था। कभी-कभी जुम्मे के दिन वो दिख जाए तो दिख जाए। अनवर तौफीक से बातें करने लगा। तौफीक ने बताया कि उसकी बीवी और बच्चे बड़े वाले झूले पर गए है। उसे ऊंचे झूलों पर डर लगता है इसलिए वह नहीं गया। अतः यूं ही घूम रहा है।


तभी अनवर ने देखा कि सामने से इमाम साहब अपने छोटे पोते की अंगुली थामे चले आ रहे हैं। अनवर को अचानक लगा कि वह चोरी करता हुआ पकड़ा गया है। उसने कोशिश की वह वहाँ से हटकर जरा दूर चला जाए ताकि उनकी नज़र से बच सके। लेकिन इमाम साहब भी उधर ही आने लगे। जब बचने का कुछ उपाय नहीं दिखा तो उसने सोचा कि इमाम साहब को सलाम कर लेना चाहिए।

“अस्सलाम अले कुम”

“वाले कुम अस्सलाम”

सब खैरियत तो है अनवर मियाँ? इमाम साहब ने पूछा।

“जी सब आपकी दुआ है” अनवर ने कहा ।

“अयान साहब सुबह से मेला घूमने की जिद कर रहे थे’’। इमाम साहब ने अपने पोते की ओर इशारा करते हुये कहा।

“जी ... जी ... बच्चे अक्सर जिद कर ही देते हैं। छोटे बच्चों को मनाना बहुत मुश्किल काम होता है। मुझे भी अपने मोनू की ज़िद की वजह से आना पड़ा’’। अनवर इस तरह बोल रहा था मानो अपनी सफाई पेश कर रहा हो। हालांकि इमाम साहब उसकी बात पर ज्यादा तवज्जह नहीं देते हुये आगे बढ़ गए थे।

इसके बाद अनवर की नज़र जब झूले पर पड़ी तो वह क्या देखता है कि झूले वाला नए बच्चों को झूले पर बैठा रहा है।

अरे! मोनू किधर गया? वह दौड़कर झूले वाले के पास गया।

अरे भाई ! मेरा बच्चा किधर गया?

अरे साहब कमाल करते हैं आप भी... मैंने तो अभी ही उतारा है सभी बच्चों को। आपको अपने बच्चे का ख्याल रखना चाहिए। झूले वाले ने कहा।


अनवर ने इधर-उधर चारो तरफ नज़र दौड़ायी। पर मोनू का कहीं कुछ अता –पता नहीं था।

या अल्लाह ! ये मोनू किधर चला गया? वह घबराकर मेले में इधर-उधर उसे खोजने लगा पर उसका कहीं कुछ पता नहीं चला।

कहीं मोनू पंडाल के भीतर तो नहीं चला गया? अनवर ने एक पल ठहर कर सोचा। वह थोड़ी देर तक पंडाल से बाहर निकलने वाले रास्ते पर नज़रें टिकाये खड़ा रहा। जो लोग भीतर गए थे वे वहाँ से बाहर निकल रहे थे। पर मोनू का कुछ पता नहीं चला ।

अनवर को झुंझलाहट होने लगी थी।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। उसने सोचा कि तौफीक से पूछना चाहिए पर तब तक तौफीक वहाँ से जा चुका था।

जैसे-जैसे समय बीतने लगा, उसे ज्यादा घबराहट होने लगी। उसे लगा वह अपने होश खो रहा है। या अल्लाह ! एक ही तो औलाद दी तुमने उसे अब कहाँ गुम कर दिया.... ? वह रोने रोने को हो आया।


जरूर मोनू पंडाल के भीतर जाकर मूरतों को देखने में लगा होगा। या अल्लाह ! बच्चे को कुफ़र से बचा । अनवर ने मन ही मन कहा।

उसने सोचा कि यह इमाम की बात नहीं मानने का नतीजा है। इमाम ने उसे ऐसे मेले में आने से मना किया था।

लेकिन फिर उसने सोचा कि इमाम साहब तो खुद ही मेले में घूम रहे हैं और न जाने कितने लोग मेले में घूम रहे हैं, उनके साथ कुछ नहीं हुआ तो उसी के साथ ऐसा कैसे हो सकता है? उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। जब आदमी दुखी या परेशान होता है तो उसकी सोचने समझने की शक्ति क्षीण हो जाती है।


क्या मुझे पंडाल के भीतर जाना चाहिए? अनवर सोचने लगा।

नहीं ... नहीं इन काफिरों के पंडाल में जहां बुतपरस्ती हो रही है वह कैसे जा सकता है?


थोड़ी देर वह वहीं किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रहा। अनवर को मेले की भीड़ भयावह लगने लगी थी। उसे लगा मेला एक साँप में परिवर्तित हो रहा है जो उसके बेटे को निगल जाने वाला है।

पुत्र का मोह सबसे बड़ा होता है। पिता को बच्चे की जिंदगी स्वयं से ज्यादा प्यारी लगती है। वह पुत्र की ज़िंदगी बचाने के लिए अपने प्राण तक उत्सर्ग करने के लिए तैयार हो जाता है है। उसने तय किया कि वह पंडाल के भीतर जाएगा।


अभी वह पंडाल में घुसने की योजना ही बना रहा था कि किसी ने उसका हाथ पकड़ा।

क्या हुआ अनवर भाई , सब खैरियत ? बड़े परेशान दिख रहे हो?

अनवर ने देखा यह दिनेश था, जो कि उसका बहुत पुराना ग्राहक था। वह अपनी गाड़ियाँ अनवर के गराज में ही बनवाता था।


क्या हुआ ? उसने फिर से पूछा ....

अरे भाई क्या बताऊँ , मेरा मोनू .... मेरा मोनू गुम हो गया है .... अनवर के कंठ से बड़ी मुश्किल से बात निकली, लगा कि वह अभी रो देगा।


अच्छा कोई बात नहीं, परेशान न हो। मैं मेला कमिटी का मेम्बर हूँ। चलो सबसे पहले तो मोनू के लिए अनाऊन्समेन्ट करवाता हूँ। मेला में सब जगह सीसीटीवी लगा है, इसलिए तुम बेफिक्र रहो। मोनू कहीं नहीं जाएगा।


वह अनवर को पकड़कर उधर ले गया जिधर एक मंच बना था, जिसपर कुछ लोग कुर्सियाँ लगा कर बैठे हुये थे, वे वहीं से बीच–बीच में मेले में व्यवस्था बनाए रखने की घोषणाएँ कर रहे थे।

शीघ्र ही मंच से घोषणा होने लगी कि एक छह साल का बच्चा जिसका नाम मोनू है मेले मे गुम हो गया है, जिसे भी मिले मंच तक पहुंचाने का कष्ट करें।

समय बीतने के साथ ही अनवर की चिंता बढ़ती जा रही थी। वह इधर –उधर इस आशा में देखता कि कहीं किसी दिशा से कोई मोनू का हाथ पकड़े लिए तो नहीं आ रहा है।

थोड़ी ही देर के बाद उसे शगुफ़्ता आती हुई दिखी।

अनवर लपककर उसकी ओर गया।

“आपने मेरे मोनू को देखा है क्या”? अनवर ने शगुफ़्ता से पूछा ।

वहीं तो बताने आ रही हूँ, अनवर भाई। मंच से उसके गुम खोने की खबर सुन रही थी। चलें . मोनू मेरे पास है।

आपके पास है, चलो चलो ...

थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर अनवर ने देखा मोनू शगुफ्ता के बेटे के पास पीछे एक दीवार से लगकर बैठा है, उसके हाथ में एक बैलून है, जिससे वह खेल रहा है।

उसे लगा उसके प्राण वापस आ गए हों। अपना सारा दर्द , सारी पीड़ा वह क्षणांश में भूल गया। पल भर पहले की सारी त्रासदी अचानक से गायब हो गयी। उसने दौड़ कर मोनू को सीने से लगा लिया।

“तू कहाँ चला गया था मेरे बेटे”? उसने मोनू को चूमते हुए पूछा।

“आप कहाँ चले गए थे अब्बू? मैं आपको खोज रहा था”। मोनू ने बहुत ही भोलेपन से कहा।

अल्लाह का शुक्र है बेटे तू मिल गया। उसने मोनू को सीने से चिपका लिया था। मानो अब कभी उसे अपने से दूर नहीं जाने देगा।

अनवर ने देखा इमाम साहब अपने पोते को लेकर वापस अपने घर की ओर जा रहे हैं।

वह भी अपने बेटे को लेकर घर की ओर चल दिया।


 

लेखक परिचय


1. नाम : नीरज नीर 2. जन्म तिथि : 14.02.1973 3. Mob: 8789263238/ 8797777598 4. Email – neerajcex@gmail.com 5 पता : “आशीर्वाद” बुद्ध विहार, पो ऑ – अशोक नगर राँची – 834002, झारखण्ड 6. रचना संसार : कविता संकलन : (I) जंगल में पागल हाथी और ढोल (ii) पीठ पर रोशनी कथा संकलन : ढुकनी एवं अन्य कहानियाँ 7. वागर्थ, हंस, परिकथा, पाखी, कथादेश, समकालीन भारतीय साहित्य, आजकलनिकट, इंद्रप्रस्थ भारती, , दोआबा, कथाक्रम, गगनाञ्चल, युद्धरत आम आदमी, आधुनिक साहित्य, साहित्यअमृत, वाक्, माटी, लहक, प्राची, वीणा, सोच विचार, नंदन, ककसाड़, कवि कुंभ, विभोम स्वर, परिंदे, समहुत, अक्षरपर्व, सरस्वती सुमन, यथावत, अहा! ज़िंदगी, अट्टाहास, रेवान्त, रचना उत्सव, व्यंग्य यात्रा, दैनिक जागरण के साहित्य वार्षिकांक पुनर्नवा, समकालीन स्पंदन, प्रभातखबर, जनसत्ता, दैनिक भास्कर ....... आदि अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें, कहानियाँ एवं समीक्षाएं प्रकाशित. कुछ बाल कवितायें व बाल कहानियाँ भी प्रकाशित ।

8. राँची विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक 9. सम्मान : (i) प्रथम महेंद्र स्वर्ण साहित्य सम्मान। (ii) सृजनलोक कविता सम्मान’ 2018 (iii) ब्रजेन्द्र मोहन स्मृति साहित्य सम्मान’ 2019 (iv) दो बार प्रतिलिपि लघु कथा सम्मान। (v) अखिल भारतीय कुमुद टिक्कु श्रेष्ठ कहानी पुरस्कार दो बार। (vi) जयशंकर प्रसाद स्मृति सम्मान (vii) सूरज प्रकाश मारवाह साहित्य रत्न अवॉर्ड 2021 10. पंजाबी, ओड़िया, तमिल, नेपाली, मराठी भाषाओं में कविताओं का अनुवाद । 11. आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से नियमित कहानियों एवं कविताओं का प्रसारण। 12. जल, जंगल और जमीन के प्रति गहरी संवेदना रखने वाले रचनाकार के रूप में पहचान।

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