• अंकुश्री

एक और मंगरा



सोमरी आटो भाड़ा के लिये बीस रुपये का नोट पल्ले में बांध रही थी. तभी उसका पति मंगरा पीछे से आकर नोट झपट लिया. गांव की कई महिलाएं और लड़कियां घर से निकल कर आटो की ओर बढ़ चुकी थी. बिना रुपया लिये आटो वाला बैठाता नहीं था. सोमरी गिड़गिड़ाई, ‘‘नोट दे देउ !’’

मंगरा बिना कुछ सुने घर से निकल गया. उसके पैर लड़खड़ा रहे थे. दस कदम जाने में वह दो बार गिरते-गिरते बचा था. कल रात वह कुछ खाया नहीं था, पीकर लुढ़क गया था. सुबह-सुबह कुछ खाने की कौन कहे, बिना मुंह-हाथ धोये पीने चला गया.

पीकर मंगरा का गिर जाना और जबरदस्ती पैसा लेकर फिर पीने चले जाना सोमरी के लिये नई बात नहीं थी. कोठरी में ताला लगा कर वह चली गयी. पड़ोसन बिरसी से उधार लेकर आटो भाड़ा दे दी.

जंगल पहुंच कर सभी इधर-उधर फैल कर पत्ता तोड़ने लगीं. सोमरी को उस दिन बहुत अच्छे पत्ते मिल गये. प्लास्टिक के दो बड़े बोरों में उसने पत्तों को कस-कस कर भर लिया. आटो में बैठने के बाद वह सोचने लगी कि मंगरा यदि एक बोतल का पैसा ले लेगा तब भी दो दिनों के भात-तियेन का इंतजाम अच्छा से हो जायेगा.

मंगरा की एक विशेषता थी कि वह जिन्दगी भर कुछ कमाया नहीं था. सोमरी कमा कर लाती थी और मंगरा पीता था. मंगरा ही क्यों? बुधुवा, लाढू, महेश, शनिचरा, डेन्जर, एतवा आदि गांव के करीब सभी मर्दों की हालत यही थी. औरत कमाती थी और मर्द पीता था. शायद ही कोई घर था, जो मर्द की कमाई से चलता हो. कुछ मर्द काम पर जाते भी थे तो रोज-रोज नहीं. एक दिन काम किया, कमाई हुई तो उधर से ही पीते-खाते घर आ गये और फिर काम पर जाना बंद. पीने का पैसा रहने तक रोज सुबह-शाम, दिन-रात पीता था. एक दिन की कमाई से दो-तीन दिनों की पिलाई हो जाती थी. औरत जो कमा कर लाती, उससे घर में भोजन बनता. मर्द खाया तो खाया नहीं तो पीकर लुढ़क गया. जो मर्द काम पर नहीं जाता, अपनी औरत से लड़-झगड़ कर पैसे ले लेता और पीकर लुढ़क जाता. प्रायः घर-घर की यही स्थिति थी. औरत की कमाई और मर्द की पिलाई.

पीने के बाद कौन कहां लुढ़क जायेगा यह नहीं कहा जा सकता. मगर एक बात जरूर थी कि जिसके घर में बैठ कर लोग पीते थे, वहां कोई नहीं लुढ़कता था. लाख नशा में रहने पर भी इस बात का वे खयाल रखते थे. पीने के बाद सड़क पर, गली में, पेड़ तले, घर-आंगन कहीं भी लुढ़क जाने की स्वतंत्रता थी. पीकर गिरने के बाद किसी को होश नहीं रहता है? कुत्ता भी पेशाब कर दे तो पता नहीं चलता. मंगरा एक दिन पीकर आ रहा था. गली में सूअर के पैखाने पर गिरा तो उसी पर सिर रख कर इत्मीनान से सो गया. गांव की नाली में तो कितने लोग पीकर गिर चुके थे.

जो मर्द पीकर गिरे-पड़े रहते थे, उन्हें कोई नहीं देखता-पूछता था. बात यह भी थी कि देखे कौन? पूछे कौन? पीने वाले पीने में व्यस्त थे. जो काम पर गये होते, वे देख नहीं पाते थे. सबकी औरतें कमाने गयी होतीं. जो औरतें किसी लाचारी से काम पर नहीं गयी होतीं या पत्तल बना रही होती थीं, वह दूसरे मर्द को हाथ क्यों लगावे? पीकर गिरने के बाद जब कुछ होश आता था तो वे गिरते-पड़ते अपने घर जाने की कोशिश करते थे.

गांव का सरकारी विद्यालय खेत के तरफ बागीचा में था. गांव में होते हुए भी वह गांव से बाहर लगता था. विद्यालय खुलने से पहले कई बच्चे वहां पहुंच जाते थे. जो बच्चे थोड़े बड़े थे, वे प्रायः समय पर या उसके बाद विद्यालय पहुंचते थे. कुछ छोटे बच्चे भी विलंब से विद्यालय आते थे. लेकिन गांव के सभी बच्चे विद्यालय आते जरूर थे.

विद्यालय जाना इसलिये भी जरूरी था क्योंकि वहां दिन का भर पेट खाना मिल जाता था. बच्चे दुबारे ले-लेकर खाना खाते थे. विद्यालय जाने का दूसरा लाभ पोशाक का था. दो जोड़ा पोशाक मिल जाने से देह पर कपड़ा मुअस्सर हो जाता था. किताब और बैग आदि मिलता ही था, आठवीं कक्षा में चले जाने पर साइकिल भी मिल जाती थी.

साइकिल यानी अपनी सवारी. जहां चाहें, जब चाहें, चले गये. घर में साइकिल रहने से कहीं जाने-आने के लिये दूसरे पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. साइकिल का सबसे बड़ा लाभ गांव के मध्य विद्यालय की पढ़ाई पूरी करके उच्च विद्यालय जाने के लिये एक बड़ा और अच्छा संसाधन मिल जाना था. साइकिल रहने से उच्च विद्यालय की दूरी अखड़ती नहीं और दूरी के कारण पढ़ाई बाधित नहीं हो पाती.

सोमरी की एक बेटी थी. उसका नाम था रिंकी. जब वह आठवीं कक्षा में गयी तो तीन-चार महीने बीतते-बीतते उसे विद्यालय से साइकिल मिल गयी. वह सुबह-सुबह चाय और टोस्ट खाकर विद्यालय चली जाती थी. दिन का खाना विद्यालय में खा लेती थी और रात का खाना सोमरी बना देती थी. रात के खाने में भात और तियेन अधिक बनाती थी. तियेन में लौकी या कुम्हरा का अधिक प्रचलन था. लौकी और कुम्हरे का लत्तर छप्पर पर फैल कर खूब फलता था. पौधे की जड़ बकरियों से बचा देने भर से सब्जी की कमी नहीं होने पाती थी. कुम्हरा रोपने से एक लाभ और होता था कि लत्तर सूख जाने के बाद भी उसका फल काफी दिनों तक छप्पर पर पड़ा रहता था.

कभी-कभी वह मुर्गा या अण्डा भी बना लिया करती थी. जिस दिन मुर्गा या अण्डा बनता था मंगरा उस दिन ठीक से खाना खाता था. अण्डा बनना तो बहुत बाद में शुरू हुआ. पहले खस्सी या मुर्गा का मांस ही बनता था. मछली भी वह खूब चाव से खाता था. पहले स्थिति ऐसी थी कि बिना शिकार के मंगरा खाना नहीं खाता था. खाना, पीना और पड़े रहना यही उसकी फितरत थी.

मंगरा का बाप भी यही करता था. बाप-दादे का खेत था, बेच-बेच कर खूब खाया और पीया. जब वह पीने बैठता था तो पीते ही रहता था. रोज पीते-पीते इतना पी गया कि पता चला कि वह शराब क्या पीता था, शराब ही उसको पी गयी. खा-पीकर रात में सोया तो सुबह उठा ही नहीं. मरने के बाद लोग कह रहे थे कि उसको भूत पकड़ लिया था. किसी ने कहा कि पेट में गोला हो गया था. कम उम्र में ही मर जाने के कारण वह अपने हिस्से का खेत पूरी तरह बेच नहीं पाया था, कुछ बच गया था.

बचा हुआ खेत मंगरा ने बेचना शुरू किया. वह ऐसे समुदाय से था जिसके खेत की कीमत कम मिलती थी और सभी लोग उसका खेत खरीद भी नहीं सकते थे, उसी के समुदाय के लोग उसका खेत खरीद सकते थे. उसके समुदाय में खेत बेचने वाले बहुत थे और खरीदने वाले कम. इसलिये खेत बेचने वाले को औने-पौने भाव मिल पाता था. अंग्रेजी हुकूमत द्वारा खेत-जमीन बेचने के लिये बनाया गया नियम उस समुदाय वालों के लिये अभिशाप था. मगर उनके नेता लोग उस नियम को वरदान बता कर अपने नेतृत्व की शक्ति को भुना रहे थे.

जब खेत बिकता था तो घर में कुछ दिनों तक उत्सव का माहौल रहता था. दो दिन, चार दिन, दस दिन और कभी-कभी महीनों तक घर में शिकार बनता और दारू का दौर चलता. मंगरा तो पीता ही था, अपने साथियों को भी वह पिलाता-खिलाता था. उसके हाथ में पैसा आते उसके दोस्तों और हितैषियों की संख्या बढ़ जाती थी. दूर के कुछ रिश्तेदार भी सप्ताह-दस दिन की मेहमानी करने आ जाते थे. उसके समुदाय में मेहमानी की परम्परा बहुत जोर थी. कई-कई दिनों तक अपना काम छोड़ कर लोग मेहमानी और मेजबानी में लगे रहते थे.

खेत बेच कर जब पैसा आता था तो घर के बच्चे भी चटखारे ले-लेकर खाते थे. उन्हें इससे मतलब नहीं था कि पैसा कहां से आया है और कब तक चलेगा. सभी खाते थे तो वे भी खाते थे. ऐसी बात नहीं थी कि जानने-समझने की उनकी उम्र नहीं थी. वे समझना नहीं चाहते थे. खाने-पीने में जितनी मौज-मस्ती मिलती है, पारिवारिक बातों के अंदर झांकने में उतनी नहीं मिलती. जब घर में उत्सव-सा माहौल रहता था तो बच्चे कई दिनों तक विद्यालय नहीं जाते थे. उस समय सोमरी भी काम करने नहीं जाती थी. घर में जब बाहर के लोग आ-आकर खा-पी रहे हों तो वह कमाने क्यों जाये?सोमरी शिकार के साथ कभी-कभी थोड़ा पी भी लिया करती थी. वैसे उसे नियमित पीने की आदत नहीं थी. हां, खैनी वह नियमित रूप से खाती थी.

जब तक खेत था, घर की स्थिति उत्साहपूर्ण बनी हुई थी. खाने-पीने की भले कोई सीमा नहीं हो, मगर खेत की सीमा थी. धीरे-धीरे सारा खेत बीक गया. उसके बाद फांकामस्ती शुरू हो गयी. मंगरा को भले अपने पीने की चिंता थी, मगर सोमरी को परिवार को खिलाने की चिंता सताने लगी थी. उसे पता था कि मंगरा कुछ नहीं करेगा. औने-पौने भाव में खेत बेचना और मिले हुए पैसे को खा-पी जाने के अलावा उसने कभी कुछ किया ही नहीं था.

पास-पड़ोस की महिलाएं रेजा का काम करती थी. सोमरी भी उन्हीं महिलाओं के साथ काम के लिये जाने लगी. सप्ताह भर में ही घर की स्थिति सुधर गयी. घर में दाने-दाने के जो लाले पड़े हुए थे, वह स्थिति बदल गयी. महीने भर में देह पर कपड़े-लत्ते भी होने लगे. उसके बाद सोमरी को बच्चों की पढ़ाई की चिंता शुरू हो गयी. उसने अपने दोनों बच्चों रिंकी और बिजला को सरकारी विद्यालय में डाल दी. सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था. तभी एक घटना घट गयी.

उस दिन शनिवार था. रेजा-कुलियों को साप्ताहिक भुगतान मिलता था. ठेकेदार रजिस्टर पर नोट करके सबको भुगतान कर रहा था. सोमरी की बारी आने में अभी देर थी. तभी ठेकेदार ने उसे एक काम सौंप दिया. उसने कहा, ‘‘वहां रास्ते में बालू पड़ा है, समेट दो !’’

सोमरी बालू समेटने लगी. सोची थी कि दो-चार कुदाल चलाने से बालू समेटा जायेगा. मगर जब समेटने लगी तो समय लग गया. काम पूरा कर वह ठेकेदार के पास खड़ी हो गयी. तब तक सभी मजदूर जा चुके थे. ठेकेदार के हाथ में भुगतान का रुपया था. मगर उसकी नज़र सोमरी पर थी. वह बोला, ‘‘तुम्हारा कितना हुआ?’’

‘‘हम का जानब? रउरे जोड़ के दे देउ !’’

‘‘तुम दो दिन देर से आयी थी.’’ ठेकेदार ने कहा, ‘‘मगर उसका पैसा नहीं काट रहे हैं.’’ यह सुन कर सोमरी की बड़ी-बड़ी आंखों में खुशी झांकने लगी और उसके सलोने चेहरे पर चमक आ गयी.

‘‘अभी जो बालू हटायी है, उसका भी पैसा जोड़ देते हैं.’’ ठेकेदार यह कहते हुए सोमरी का हाथ पकड़ कर बगल वाली कुर्सी पर बैठा दिया.

‘‘देर हो जाहे, कचिया दे दो, हम घरे जाब.’’ सोमरी यह कहती हुई कुर्सी से उठ खड़ी हुई. ठेकेदार हाथ का रुपया टेबुल पर रख कर अपना मुंह सोमरी के मुंह से रगड़ने लगा. सोमरी को इसका आभास हो गया था, वह सावधान थी. झट से टेबुल पर से रुपया उठायी और भाग खड़ी हुई. बगल की सड़क पर लोग आ-जा रहे थे. ठेकेदार ने कोई जोर-जबरदस्ती करना उचित नहीं समझा.

सोमरी तेज कदमों से चली जा रही थी. जल्दी-जल्दी चलने से वह हांफने लगी थी. अंधेरा हो चुका था, दूर जाना था. वह भागती-हांफती घर आकर ही रूकी. वह बहुत घबरा हुई थी. यह सोचती हुई घर आयी थी कि ठेकेदार वाली बात मंगरा को बता देगी. मगर मंगरा पीकर ढ़क था. खाट पर आधा लटका हुआ पड़ा था. बच्चे इतने बड़े नहीं थे कि उन्हें मन की बात बताती. मन की बात वह मन में ही पचा गयी.

अगले दिन सोमरी काम पर नहीं गयी. दूसरे दिन भी वह घर में ही रही. जब शाम हुई तो पांच घर बाद वाली रेजा फूलमणी उसके यहां आयी और बोली कि ठेकेदार उसे काम पर बुलाया है. वह सोची कि फूलमणी को उस दिन की घटना के बारे में बता दे. मगर कुछ सोच कर वह चुप रह गयी. फूलमणी मन ही मन कुछ जोड़ने लगी. उस दिन ठेकेदार द्वारा देर तक सोमरी को काम के बहाने रोकना और तबीयत ठीकठाक रहने पर भी उसका काम पर नहीं जाना. सोमरी के बिना बताये ही फूलमणी माजरा समझ गयी थी. वह ठेकेदार को जानती थी. बल्कि परसो जब ठेकेदार ने सोमरी को काम के लिये रोका था तो वह जानबूझ कर वहां से जल्दी-जल्दी खिसक गयी थी.

उस दिन सोमरी को एक सप्ताह की मजदूरी मिली थी, इसलिये उसे करीब दो सप्ताह के भोजन की चिंता नहीं थी. भोजन का सारा सामान लाकर घर में रख दी. लेकिन उसके बाद क्या होगा. उसे अभी से यह चिंता सताने लगी थी. गांव की कुइली, मिरगा, बुधनी, मंजू, शनिचरी और दूसरी कई महिलाएं पत्तल बनाती थीं. सुबह-सुबह जंगल जाकर पत्ता लाती थी. दूसरे दिन पत्तल तैयार कर उसके अगले दिन बाजार में बेच आती थी. कुछ महिलाएं सिर्फ जंगल जाती थीं और वहां से सखुआ का पत्ता लाकर गांव की दूसरी महिलाओं को बेच देती थी. जो पत्ता खरीदती थी, वह जंगल नहीं जाती थी या कभी-कभी जाती थी. पत्ता मिल जाने के बाद दिन-दिन भर पत्तल और दोना बनाने का काम करती थी. दूसरे दिन उसे शहर ले जाती थी. कुछ महिलाएं सिर्फ बना-बनाया पत्तल-दोना गांव में खरीद कर शहर में बेच आती थी. हालांकि बना-बनाया सारा पत्तल-दोना गांव में ही किसी को बेचने का धंधा बहुत कम होता था, ना के बराबर. जो शहर जाने की स्थिति में नहीं रहती थी, वही गांव में अपनी सहिया को पत्तल बेचती थी.

गांव की महिलाओं के साथ बैठ कर सोमरी भी पत्तल-दोना बनाना शुरू कर दी. धीरे-धीरे जब हाथ साफ हो गया तो पत्ता लाने के लिये वह भी जंगल जाने लगी. वह शहर जाकर पत्तल-दोना भी बेचने लगी. पत्तल के काम में उसका मन लग गया था. उस धंधा की आमदनी से भी वह खुश थी. पति की खर्चीली आदत के कारण वह फालतू खर्च नहीं करती थी. बहुत ही किफायती ढंग से परिवार चलाती थी. उसे संतोष था कि परिवार की गाड़ी पटरी पर आ गयी है.

सोमरी ने बेटी रिंकी को सरकारी विद्यालय में ही रहने दिया. और बेटा बिजला का नाम वहां से कटवा कर मिशन स्कूल में लिखवा दिया. गांव के बगल वाली काली सड़क पर बिजला के स्कूल की बस आती थी. वह पांचवी कक्षा में था और रिंकी आठवीं कक्षा में. पढ़ाई में दोनों ठीक थे.

रिंकी जैसे-जैसे बड़ी होती जा रही थी, उसके दोस्तों की संख्या बढ़ती जा रही थी. विद्यालय में उसके कई दोस्त हो गये थे. दोस्तों में लड़के थें और लड़कियां भी. लेकिन रोशन उसका विशेष दोस्त बन गया था. दोनों विद्यालय में साथ-साथ रहते थे. कक्षा में भी रिंकी की बगल वाली पंक्ति में रोशन बैठता था. सच कहा जाये तो रिंकी ही रोशन के पीछे पड़ी रहती थी. कक्षा से लेकर परिसर तक और छुट्टी होने पर बाहर भी दोनों आपस में खूब बात करते थे. बात का न तो कोई विषय होता था और न शुरूआत या अंत. एक दिन तो ऐसा हुआ कि बात करते-करते समय का बोध ही नहीं हुआ. काफी देर रात बितने पर वह घर पहुंची थी.

सोमरी जंगल से आकर रिंकी की राह देख रही थी. ‘‘सहिया घरे जाय रहियउ’’ कहते हुए घर में घुस कर वह अपने काम में लग गयी. उसके बाद वह अक्सर देर से आने लगी. सोमरी भी अपने काम में लगी रहती थी. रिंकी का जाना-आना वह नहीं देख पाती थी. गांव की महिला हो या सयानी लड़की, देर होने पर उससे कोई नहीं पूछता था कि वह कहां गयी थी या क्यों देर हुई. ‘‘बेरा डुबेक पहिले आ जाल कर.’’ इससे अधिक कोई कुछ नहीं बोलता था. उसके गांव में ही क्यों, सभी गांवों में यह परम्परा जैसी थी. मर्द पीकर पड़ा रहता था और महिलाएं और लड़कियां काम करती थीं. ऐसे में कौन पूछे, किससे पूछे?

रिंकी के गांव की एक भाभी थी. भाभी के मैके वाले गांव में रिंकी की एक सहेली बन गयी थी, जिसका नाम जया था. एक दिन विद्यालय से रिंकी निकल कर रोशन के साथ हटिया गयी हुई थी. साप्ताहिक हाट में वह ढुसका खाने बैठी ही थी कि उसकी नज़र जया पर पड़ गयी. जया भी उसे देख ली थी. हाट-बाजार, मेला-ठेला में उसे जया से अक्सर भेंट हो जाया करती थी. तीनों ने मिल कर ढुसका खाया. बातचीत में काफी देर हो गयी तो रिंकी जया के घर ठहर गयी.

जया की मां कमाने के लिये दिल्ली गयी हुई थी. वह बचपन से ही दिल्ली में रहती थी. शादी-विवाह और आने-जाने तक ही गांव से उसका नाता था. जया का बाप घर में था, मगर वह नशा में धुत्त एक तरफ पड़ा हुआ था. जया कब आयी और उसके साथ और कौन आया इसका उसे कोई इल्म नहीं था. रिंकी रात में वहीं ठहर गयी. दूसरे दिन वहीं से विद्यालय गयी और छुट्टी होने पर शाम को अपने घर. उसके बाद वह जब-तब जया के घर जाने लगी. दो-दो, तीन-तीन दिन उसी के घर से विद्यालय जाती-आती थी. कभी-कभी रोशन भी विद्यालय से रिंकी के साथ जया के घर आ जाता था और बातचीत करते-करते काफी रात गये अपने घर जाता था.

एक बार रिंकी तीन दिनों तक घर नहीं आयी. सोमरी जंगल से लौटते समय सोचती आ रही थी कि आज वह घर आ गयी होगी. मगर घर पहुंचने पर देखी कि रिंकी नहीं आयी है. बिजला को भी रिंकी के बारे में कुछ पता नहीं था. उस दिन सोमरी खा-खिला कर सो गयी. दूसरे दिन वह जंगल नहीं जाकर विद्यालय पहुंच गयी. वह विद्यालय के बाहर खड़ी थी. वहीं रिंकी की कक्षा की शूचिता मिल गयी. वह मिलते ही पूरी बात बता दी, ‘‘रोशन और रिंकी तीन दिनों से विद्यालय से अनुपस्थित है.’’ उसने आगे बताया, ‘‘रवि लोहरा कह रहा था कि रिंकी परसो ही रोशन के घर में ढूक गयी है.’’

सोमरी समझ गयी कि रिंकी का रोशन के यहां ढुकू-ढुका हो गया है. यह विवाह का ही एक ढंग है, जिसमें बिना किसी रस्म आदायगी के लड़का के यहां लड़की रहने लगती है और उनका वैवाहिक जीवन शुरू हो जाता है. रिंकी के बारे में सुन कर सोमरी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ. मन में कुछ बातें आयीं, कुछ प्रश्न उठे. मगर वह किसी को कुछ बतायी नहीं और अपने घर आकर पत्तल बनाने में लग गयी.

रोज सबेरे-सबेरे जंगल या बाजार जाने और देर से आने से बिजला घर में अकेले पड़ जाता था. बेटा को दिन-दिन भर अकेले छोड़ कर बाहर रहना सोमरी को ठीक नहीं लग रहा था. उसने एक काम किया. वह बिजला को स्कूल के होस्टल में डाल दी. इसमें काफी खर्च हो गया और उसका हाथ खाली हो गया. फिर भी सोमरी खुश थी कि बेटे का अकेलापन दूर हो गया और उसकी पढ़ाई भी ठीक हो जायेगी.

सोमरी सुबह-सुबह शहर जा रही थी. दो दिनों का पत्तल-दोना जमा हो गया था. उसे प्लास्टिक के बोरे में भर कर माथे पर लेकर निकल ही रही थी कि मंगरा सामने आ गया, ‘‘दे, बीस टका दे.’’

उस दिन सोमरी के पास सिर्फ बीस रुपया ही था. जो वह टेम्पो भाड़ा के लिये पल्लू में बांध कर रखी हुई थी. पल्लू में बंधा रुपया मंगरा खोल लिया. वह अब भी लड़खड़ा रहा था. सोमरी माथे का बोझा उतार कर नीचे रख दी और लड़खड़ाते हुए मंगरा को पकड़ कर बिछावन पर ले गयी. उसका चेहरा पीला पड़ गया था और फुला हुआ भी था. उसके पैर भी फूल गये थे. उसको लेटाती हुई बोली, ‘‘एखन सुस्ता ! सांझ कर पतरी बेचकर घुरेक बेरा मुरगी लेते लानबउ. एखन ई बीस टका दे दे, भाड़ा कर पइसा हउ.’’ मंगरा मान गया और लेटे-लेटे बीस का नोट सोमरी की ओर बढ़ा दिया.

सोमरी पत्तल का बोझा माथे पर रख ली. यह बोलते हुए, ‘‘कलवा राखल हे, खाय लेबे !’’ वह बाहर निकल गयी. गांव के सीवाना पर टेम्पो खड़ा था. पत्तल के कई बोरे उस पर लद चुके थे. ड्राइवर टेम्पो की छत पर जाकर सोमरी का बोरा भी चढ़ा दिया. उसका बोरा अंतिम था. उसके बाद उसने रस्सी से सभी बोरों को बांध कर टेम्पो डेली मार्केट के पास ले जाकर रोक दिया.

थाना के गेट के बगल में सोमरी अपना पत्तल सजा कर रख दी. उस दिन शनिवार था. काली मंदिर के पास लोग भिखारियों को खिचड़ी खिलाते थे. इसलिये पत्तल और दोने जल्दी ही बीक गये. वह खर्ची के कुछ सामान खरीद कर मुर्गा-दुकान पर गयी. दो आदमी के लिये तीन पाव का एक मुर्गा तौलवा ली. घर ले जाकर काटने-बनाने से मांस अधिक निकलता है. इसलिये जिन्दा मुर्गा झोला में डाल ली.

टेम्पो से उतर कर सभी महिलाएं एक साथ गांव में आ गयीं. उसी समय मुखिया की मंहगी नई चार-चकवा गाड़ी बगल से गुजरी तो सभी उसे देखने लगीं. मुखिया पढ़ा-लिखा नहीं था, सिर्फ हस्ताक्षर करना सीख कर ठेप्पा छाप कहलाने से बच गया था. चार सौ किलो मीटर दूर का एक आदमी उसके काम में सहायता करता था. वह जहां मुहर लगा देता था, मुखिया वहीं हस्ताक्षर कर देता था. वह हमेशा शराब के नशे में रहता था. मुखिया बनने के बाद वह देशी सस्ता ठर्रा नहीं, विदेशी मंहगी शराब पीने लगा था.

मुखिया की गाड़ी आंखों से ओझल हो जाने पर सभी महिलाएं अपने-अपने घर की ओर चल पड़ीं. सोमरी भी अपने घर की ओर बढ़ गयी. वह खुश थी कि बहुत दिनों के बाद आज मुर्गा बना कर मंगरा को खिलायेगी. घर से बाहर मिट्टी की दीवार से बना अहाता था, जो आंगन के काम आता था. बांस की ठठरी हटा कर वह हाथ का झोला आंगन में एक तरफ रख दी. चारों तरफ घुप्प अंधेरा था. वह टटोलते हुए कोठरी में जाकर ताखा पर रखा दीया जला दी.

दीये की रोशनी में उसने देखा. सामने का बिछावन खाली था. दीया हाथ में लिये वह आंगन में चली गयी. मंगरा दिखायी नहीं दिया. आंगन की बायीं ओर कोठरी के बगल में पेशाबखाना था. वह देखी कि मंगरा वहीं गिरा हुआ है. उसकी पीठ इस ओर थी. दीया एक तरफ रख कर वह मंगरा को उठाने लगी. जैसे ही उसके कंधे पर हाथ रख कर अपनी ओर खींची कि वह पलट कर चित्त हो गया. सोमरी समझ गयी कि मंगरा - - -. उसकी छाती पर अपना सिर रख कर वह जोर-जोर से रोने लगी.

बात तुरंत पूरे गांव में फैल गयी. देखते-देखते आंगन में लोगों की भीड़ जमा हो गयी. मुखिया भी पहुंच गया. वह सोमरी के हाथ में अंतिम संस्कार के लिये कुछ रुपये थमा कर जाने लगा. उसके पैर लड़खड़ा रहे थे. दो लोगों ने उसे पकड़ कर गाड़ी में बैठाया. आंगन में जुटी भीड़ में आकर किसी ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’ भीड़ में से ही किसी ने जवाब दिया, ‘‘एक और मंगरा मर गया.’’

आंगन में रखा सोमरी का झोला गिर हुआ था और उसमें से मुर्गा निकल कर अंधेरे में कहीं चला गया था. मुर्गे की जान बच गयी, क्योंकि मंगरा मर गया था.


 

लेखक अंकुश्री – परिचय






अंकुश्री

जन्म 1.1 1954 (सारण, बिहार)

योग्यता एम०ए० (हिंदी)

लेखन आरंभ १९६८

प्रकाशन शुरू १९७१ से वन, वन्यप्राणी, पर्यावरण, बालोपयोगी आदि विषयों पर विभिन्न विधाओं में देश भर की पत्र-पत्रिकाओं में चार हजार से अधिक रचनाएँ लगातार प्रकाशित

झारखण्ड सरकार द्वारा सितम्बर, २०१३ में हिंदी सेवी सरकारी सेवक सम्मान से सम्मानितण्

झारखण्ड सरकार की पांचवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में पर्यावरण विषयक बालकथा एतवा २०१६ में सम्मिलितण्

हमारे वन्यप्राणी (१९८७ बालसाहित्य), हमारे पक्षी (१९९१ बालसाहित्य) सागर के तिनके (२००६ लघुकथा संकलन), नगाड़ा (२०१२ बालसाहित्य), पेड़ (२०१२ बालसाहित्य), हमसे है पर्यावरण (२०१५ बालसाहित्य) पुस्तकें प्रकाशित

करीब चार दर्ज़न सम्पादित संकलनों में लघुकथाएंए बालकथाएं और कहानियां प्रकाशित

वन अधिकारी श्री पंकज श्रीवास्तव की पुस्तकें कैद के ६४ दिन (२०१०) और देख अपनी ओर (२०१६) का संपादन

चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह आरोही के ५४ नाटकों के संकलन आरोही रचनावली.२ (२०१८) का संपादन

करीब दर्जन भर अभिनन्दन ग्रंथों में रचनाएँ प्रकाशित

आकाशवाणी से १९८१ से कहानियां, बालकथाएं, लघुकथाएं, बाल निबंध एवं अन्य रचनाओं का प्रसारण

सारिका द्वारा आयोजित सर्वभाषा कहानी एवं लघुकथा प्रतियोगिता-१९८४ में लघुकथा रेज़ा कुली को तृतीय पुरस्कार प्राप्त

संपर्क - ८ प्रेस कॉलोनी, सिदरौल, नामकुम, रांची.८३४०१०

मो 8809972549 / 6204946844

Email : ankushreehindiwriter@gmail.com

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