• दिलीप कुमार

बिल्लो

कमरे में घुसते ही पूर्णिमा ने अपना हैंडबैग मेज पर फेंका और हाथ-मुंह धोने बाथरूम में चली गयी। जून का महीना, समूचा उत्तर भारत लू के थपेड़ों से आग के गोले की मानिंद दहक रहा था। सेहत महकमे का टीकाकरण अभियान चल रहा था। तमाम बच्चे जो सरकारी कागजों में दर्ज थे वे अपने ननिहाल चले गए थे और बहुतेरे बच्चे ननिहाल आये भी थे लेकिन वे कागजों में दर्ज नहीं थे, तो कुल मिलाकर तस्वीर ये थी कि जिनके लिये टीके थे उन्हें लग नहीं सकते थे और जिन्हें टीके लगने थे वो नदारद,जो मौजूद थे उन्हें लग नहीं सकते थे। यही इस देश की विडंबना है कि जो हाजिर है वो फ़ाकिर है।

सुबह साढ़े सात बजे घर से निकली पूर्णिमा दिन के ढाई बजे भूखी प्यासी लौटी। उसके बोतल का पानी कब का खत्म हो चुका था और बाहर के पानी से उसे इंफेक्शन हो जाता था। वो हाथ-मुंह धोकर बाथरूम से बाहर निकली तो उसने एक गिलास पानी पिया और खुद को बिस्तर पर निढाल छोड़ दिया। आंखे मूंदते ही वो मानो किसी और लोक में पहुंच गयी और उसे झपकी आ गयी। कुछ देर बाद कमरे में एक कर्कश आवाज़ से उसकी तंद्रा भंग हुई कि “खाना ना देगी”।

पूर्णिमा के शरीर में तनिक भी ताब ना था। हाथ झूठ हुआ जा रहा था दर्द से, और कमर की चिलकन उसे बेचैन किये हुए थी। वो किचन में गयी और हाँफते-कराहते ढेर सारा मैगी बना लायी। उसके पति अनिरुद्ध ने उसे घूरते हुए डपटा “मारेगी के, मैगी खिला-खिला के”।

पूर्णिमा हाँफते हुए बोली, ”मुझमें जरा भी ताब ना बची है कुछ भी पकाने की। अभी खा लो प्लीज, शाम को बना दूंगी पूरा खाना। मेरे हाथ और कमर में बहुत दर्द है।“

अनिरुद्ध ने उसे खूंखार नजरों से देखा और सर्द स्वर में कहा, “एक हाथ मेरा पड़ जावेगा तो हाथ और कमर दोनों का दर्द ठीक हो जावेगा।”

ये कहते हुए उसने प्लेट भर मैगी अपनी तरफ खींच ली और खाने लगा। उसका बेटा अभिजीत चाव से मैगी खाता रहा और कार्टून देखता रहा टीवी में। पूर्णिमा ने पति से नजरें ना मिलायी और एक कटोरी में मैगी डालकर दूसरे कमरे में आ गई। उसके हाथ और बदन का दर्द अब पूरे शरीर में फैल चुका था। उससे दो निवाले भी ना खाये गए। उसने पेनकिलर खाकर दो गिलास पानी पिया। खाली पेट पानी कलेजे पर तीर की तरह जाकर लगा। बड़ी देर तक वो जल बिन मछली की मानिंद छटपटाती रही। काफी देर बाद उसे जब कुछ आराम मिला तो उसकी आंख लग गई।

नींद की आगोश में उसे कुछ चैन मिलता महसूस हुआ तभी उसने अपने शरीर पर कोई वजनी चीज महसूस हुई। उसने आंख खोली तो देखा कि उसका पति अनिरुद्ध उसके ऊपर छाने की कोशिश कर रहा है। उसने बलपूर्वक अनिरुद्ध को परे ढकेला और उठ बैठी।

वो कराहते हुए बोली, “आप जानते हैं कि पीरियड में हूँ तब भी।“

अनिरुद्ध कुटिलता से मुस्कराते हुए बोला, “प्रोटेक्शन है,”और फिर उसके ऊपर आ गया।

पूर्णिमा फिर बिदककर उससे दूर हो गयी और रुआंसे स्वर में बोली, “मैं मरी जा रही हूँ, मेरे प्राण निकले जा रहे हैं। पूरा बदन टूट रहा है। मुझे बख्श दीजिये आज प्लीज्।”

अनिरुद्ध ने उसे बलपूर्वक अपनी तरफ खींच लिया और उसके मुँह पर हाथ रखते हुए फुसफुसाया, “बेटा सो गया है,चुप भी रह।”

वो छटपटाई और उसकी पकड़ से छूटने का हर सम्भव जतन करने लगी। पूर्णिमा का विरोध प्रबल होते देखकर अनिरुद्ध ने उसे दो-तीन करारे थप्पड जड़े। एक कुंतल पन्द्रह किलो के अनिरुद्ध के भरे हाथ का थप्पड़ खाकर पूर्णिमा के कान झनझना उठे। उसकी कनपटी पर मानों वज्र का प्रहार हुआ हो, बिल्कुल सुन्न पड़ गयी वो। वो निश्चेष्ट पड़ी रही। उसकी आँखों से आंसू झर-झर बहते रहे। अनिरुद्ध उसे नोचता-खसोटता रहा और फिर अंत में उसे रौंदकर-पीसकर अपना अभीष्ट पूरा करके वहाँ से उठकर चला गया।

पूर्णिमा ने ना तो उठने का उपक्रम किया और ना ही कपड़े पहनने का। वो बिलख-बिलख कर रोती रही, बस एक चादर से अपनी लाज को ढक लिया। उसके बदन का दर्द फिर उभर आया था और फिर उसका पोर-पोर दुखने लगा था। वो तय नहीं कर पा रही थी कि उसका तन ज्यादा घायल था या मन। याद आया उसे वो वक्त जहाँ से उसकी जिंदगी ने करवट बदली थी। तब वो ग्यारह-बारह बरस की थी, चौथी क्लास में पढ़ती थी जब बॉर्डर से उसका बाप अपनी नौकरी और एक पांव गंवाकर लौटा था। उससे साल भर छोटी बहन नीलिमा और भाई चंद्रेश भी पढ़ते थे। वे दोनों बहनें सरकारी विद्यालय में पढ़ती थीं और भाई अंग्रेज़ी मीडियम के प्राइवेट स्कूल में जाता था जो कि दोनों बहनों से छोटा था।

घर मे माँ और दादी के अलावा एक गाय भी थी जो उसके परिवार का हिस्सा थी। गाय घर में रहती थी। पूर्णिमा, दादी और उसकी माँ ही गाय की देखभाल करती थीं। गाय का एक वक्त का दूध बिक जाया करता था, उससे रोज के रोज पैसे मिल जाते थे और उस घर के रोजमर्रा की साग-सब्ज़ी का खर्च निकल जाया करता था। घर में अगर अभाव ना था तो कोई भी चीज पर्याप्त भी ना थी। बस जोड़-गांठकर जिंदगी की गाड़ी घिसट रही थी। उसका पिता आया तो थोड़ी सी पूंजी भी लाया था लेकिन सरधना इतनी भी बड़ी जगह नहीं थी कि किसी उद्यम से किसी के जीवन के सब कष्ट दूर हो सकें।

गांव से थोड़ी दूर सड़क के किनारे किराना की दुकान खोल दी गयी। उसके पिता की नौकरी में नियति ने ऐसा कुचक्र रचा कि वो पेंशनविहीन हो गए। गाय के दूध और किराना की से ज़िन्दगी की गाड़ी किसी तरह चल रही थी। चंद्रेश लड़का होने के कारण नाजो अदा से पल रहा था उसे पता था कि वो कुलदीपक है। नीलिमा गोरी और छोटी होने का एडवांटेज ले रही थी, बाकी बचीं दो घरेलू जनाना। फिर ले-देकर पूर्णिमा ही बची जो भूसा, पशु-चारा, घर से दुकान के बीच में दौड़ते-दौड़ते हल्की सांवली से गहरी सांवली हो गई थी।

उसे तन तो लड़की का मिला था, बारंबार इस बात का एहसास भी कराया जाता था कि वो लड़की है मगर उससे सारे काम लड़कों वाले ही लिए जाते थे। अलसुबह ही उठकर माँ और दादी की मदद से गाय का गोबर हटाना और उसे घूरे पर सहेजना। क्योंकि गोबर से उपले बनते थे जो घर में भी इस्तेमाल होते थे और बिकते भी थे। जल्दी-जल्दी दादी की मद्द से दूध निकालना, तैयार होकर साइकिल से पढ़ने जाना और जाते समय होटल पर ताजा दूध पहुंचाना। फिर सरकारी स्कूल में ज्यादा से ज्यादा पढ़ लेने की कोशिश करना क्योंकि ट्यूशन मयसस्सर नहीं था। पढाई से लौटते समय बड़े बाजार से थोक में किराना का सामान खरीदना दुकान के लिये और फिर इस सबके बाद घास मंडी से घास का गट्ठर उठाये लाना वो भी पहले से लदी-फन्दी साइकिल पर। पूर्णिमा घर पहुंचते ही हल्का-फुल्का खाकर खाना या नाश्ता पिता के लिए दुकान पर पहुंचाती और फिर आसपास के घरों और गांवों में किराने का तकादा करने चली जाती। वो तकादे से लौटती तो फिर गाय में उलझ जाती। दो-चार सौ मीटर गायों को घुमा भी देती थी ताकि खूंटे से बंधी-बंधी वो बीमार ना पड़ जाए। फिर दिन ढलते ही गायों को दुहने का उपक्रम चालू हो जाता। शाम का दूध अड़ोस-पड़ोस में ही बिक जाता था। पाई -पाई वसूलना और फिर पाई-पाई का हिसाब रखना, यही उसके जीवन का मूलमंत्र रह गया था। गाय-दूध से निबटती तो खुद पढ़ने बैठ जाती और भाई-बहन को भी पढ़ने बैठा देती और तब तक पढ़ती रहती जब तक उसकी नजरें नींद से बोझिल ना हो जातीं। घर में उसे पहली आवाज़ पूर्णिमा कह कर दी जाती तो दूसरी आवाज़ बिल्लो कहकर ही पुकारी जाती। बिल्लो शब्द से उसे बहुत चिढ़ होती थी इसलिये नहीं कि बिल्लो उसके रंग को लेकर उसे कहा जाता था बल्कि वो बिल्ली, जिससे वो बहुत चिढ़ती थी उससे जुड़ा उसको लगता था। वो बिल्ली, जिससे दूध की रखवाली में बिल्लो घंटों अपलक निगरानी करती थी,और बिल्लो के एक झपकी मारते ही वो बिल्ली उसका दूध गिराकर भाग जाती थी। दूध गिरते ही उसका उस दिन का बजट गड़बड़ हो जाता था। पूर्णिमा को इससे दोहरी खीझ होती थी एक तो धन का नुकसान दूसरे बिल्ली से हार जाने की खीझ। इसीलिये वो जितना बिल्ली से चिढ़ती जाती उतना ही उसे बिल्लो सुनने को मिलता।

उसकी छोटी बहन नीलिमा उससे सिर्फ एक बरस छोटी थी और आयु के इस छोटे अंतर को बहुत बड़ा मानते हुए नीलिमा ने खुद को तमाम जिम्मेदारियों से मुक्त कर रखा था पूर्णिमा के बड़ी होने के सबब। नीलिमा गोरी थी, बाल सुनहरे और कद भी थोड़ा निकला हुआ जबकि पूर्णिमा गहरी सांवली,मझोला कद, दरम्याना शरीर। उसके सर के बाल भी दिन-ब-दिन पतले होते जा रहे थे औऱ उसकी रंगत भी दिन-ब-दिन झुलसती जा रही थी।

इन्हीं संघर्षों से जूझती हुई पूर्णिमा स्कूल से निकलकर कब इंटर कालेज की पढ़ाई पूरा होने की कगार पर पहुँच गई उसे पता ही नहीं चला। पता तो तब चलता जब ज़िन्दगी उसे सांस लेने की फुरसत देती तब ना। जैसे जैसे उसके अंगों का आकार बढ़ता गया वैसे-वैसे बढ़ती गयी उसकी ज़िम्मेदारियाँ और बढ़ते गए समाज के ताने। लोग कहते कि नीलिमा तो अच्छा लड़का पा जावेगी, गोरी है ना। वो ब्याह कर किसी राजकुमार के साथ चली जायेगी और ऐश करेगी मगर पूर्णिमा तो बिल्लो है ना, उसका क्या होगा?

उसके मुँह पर तो उसे जल्दी कोई कुछ ना कहता था पर पीठ पीछे सब उसे बिल्लो ही कहते थे। पूर्णिमा को इस सबकी चिंता ना थी और ना अपने विवाह को लेकर कोई खटका। उसे चिंता थी तो अपने भाई, बहन, पिता और गायों की। उसने अपने आपको पढाई और जिम्मेदारियों की भट्ठी में झोंक दिया था जहाँ उसका तन ही नहीं मन के उल्लास और सपने बहु झुलस चुके थे। घर-दुकान, दूध और पढ़ाई, सरकारी कालेज में गणित-विज्ञान की वो भी बिना ट्यूशन के।

उसने सुन रखा था कि गणित-विज्ञान पढ़ने से नौकरी आसानी से लग जाती है और नौकरी ना भी मिले तो प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने से इन विषयों के ट्यूशन भी खूब निकलते हैं। लाइब्रेरी से इधर-उधर ट्यूशन,कोचिंग पढ़ने वाले लड़के-लड़कियों से मिलकर वो नोट्स बनाती। शहर के सबसे सस्ते फ़ोटो स्टेट की दुकान पर वो नोट्स के फोटो स्टेट करवाती। यथा सम्भव तो तमाम पन्ने वो पैसा बचाने के लिये खुद लिख डालती।

जिंदगी बेशक बहुत बेरहम और मुश्किल थी मगर उससे जंग जारी थी। पूर्णिमा के फौजी बाप ने उसे यही सिखाया था कि अपनी मेरिट पर अपने मोर्चे पर लड़ते रहो, भले ही परिस्थिति कितनी ही विपरीत और विकराल हो और अंजाम कुछ भी हो। उसकी जिंदगी में बाप की दुश्वारियों से लड़ने के अलावा फिलवक्त कोई मकसद ना था। उसका पापा अक्सर उससे प्यार से कहता कि “मैं शय्या पर पड़ा हुआ लक्ष्मण हूँ और तू मेरी हनुमान है बेटी।” तब वो खुद को कुछ कुछ ऐसा ही समझने लगती और जिंदगी की दुश्वारियों से लड़ने की उसमें दुगुनी ताकत आ जाया करती थी, उसे अपने कर्तव्य तब रामकाज नजर आने लगते थे।

पापा से पैसे लेकर पूर्णिमा डाकखाने में दो-दो आरडी जमा करती थी। एक-एक रुपये के लिये डाक खाने के क्लर्क से लेकर बस कंडक्टर तक से जूझना उसकी जिंदगी का हिस्सा था। दो सलवार-कुर्ते और एक पुरानी साइकिल से उसने अपने बचपन से यौवन तक का सफर तय किया। उसके पास दो सलवार-कुर्ते, दो स्वेटर, एक चप्पल और एक ही जोड़ी जूते हुआ करते थे। उसके कालेज के लड़के -लड़कियां ये शर्त लगा कर बता देते थे कि आज पूर्णिमा कौन से कपड़े पहन कर आएगी। ये सब सुनती तो उसकी आत्मा बहुत आहत होती लेकिन वो खुद को तसल्ली देती कि “उसका भी टाइम आयेगा”।

पूर्णिमा कभी भी किसी शादी-विवाह में नहीं जाती थी क्योंकि वहाँ पर या तो उसके कपड़ों की चर्चा होती थी या उसके रंग की। ऐसा नहीं था कि सबकी रंगत उजली ही थी मगर अधिकांश लड़कियां अपने चेहरों पर लिपाई-पुताई करके अपनी असली रंगत ढाँपकर गोरा दिखने का प्रयास करती थीं। कपड़े ना भी हों तो मंगनी भी मिल जाते थे मगर ये सब उसके लिए था जिसके जीवन में ज़िन्दगी को लेकर कोई उत्साह हो, सौंदर्य हो, महत्वपूर्ण दिखने की चाहत हो। पूर्णिमा के लिये तो जीवन एक युद्ध का मोर्चा था जिसमें वो छोटी-छोटी मुठभेड़ रोज जीत रही थी।

भले ही पूर्णिमा के पापा को नींद आ जाती थी मगर पूर्णिमा को नींद रात-रात भर नहीं आती थी इस बात पर कि उसके पापा के दो जवान बेटियां हैं। सब अपनी-अपनी ज़िंदगी जी रहे थे मगर वो अपने मोर्चे पर जिंदगी से लड़ रही थी पूरी मुस्तैदी से और सभी के मोर्चे पर भी थोड़ा-थोड़ा। उसका भाई चंद्रेश क्रिकेट में ही उलझा हुआ था। क्रिकेट खेलना, क्रिकेट देखना और क्रिकेट की बातें करना बस यही उसका जीवन था। लेकिन क्रिकेट का फैशन ही उसने कुबूल किया था, मेहनत नहीं। वो अपने किट, बैग और जूते बदलता रहता। वो दो लीटर दूध पीता, दूध को बेचकर फल खरीदता और खाता, सूखे मेवे खाता और कभी भी सुबह आठ बजे के पहले सो कर ना उठता।

वैसे भी चंद्रेश कभी मेरठ से आगे खेलने नहीं जा पाया मगर उसकी माँ और दादी उस पर बलि-बलि जातीं मानो चंद्रेश, विराट कोहली बन जायेगा और उनकी ज़िंदगी की डगमगाती कश्ती को पार लगा देगा। पूर्णिमा की छोटी बहन नीलिमा ने आर्ट साइड से पढ़ाई करने का निर्णय किया और कताई-बुनाई जैसे आसान विषय को चुना, वो अक्सर अपने सिंगार-पटार में ही उलझी रहती थी। उसका अपने कॉलेज के एक लड़के कामेश से चक्कर भी चल रहा था।

कामेश मशहूर हलवाई लखीराम का बेटा था और सरधना में उसकी खूब चलती हुई दुकान थी। वो नीलिमा के चक्कर में ही कॉलेज आता था, बाकी उसे अपना व्यापार ही सम्भालना था। पूर्णिमा को जब इस चक्कर की खबर लगी तो उसने नीलिमा को बहुत डांटा-फटकारा। घर में सभी ने इस बात का विरोध किया मगर नीलिमा उस लड़के को किसी दम छोड़ने को राजी ना हुई। एकांत में ले जाकर पूर्णिमा ने नीलिमा को घर की इज्ज़त की दुहाई दी तो नीलिमा ने सर्द स्वर में कहा, “दीदी , तू तो बिल्लो है। तुझे तो कोई मिला नहीं, किसी ने तुझे पूछा नहीं तो तू मुझसे जलन रखती है। मैं कामेश से ही शादी करूंगी। वो कमाता-खाता, गोरा चिट्टा है। भले ही मेरी जाति का नहीं है तो क्या गोरा है, कमाऊ है और मेरे पीछे दुम हिलाता फिरता है। यही बहुत है मेरे लिये। घरवाले मानें या ना मानें पर शादी मैं हर हाल में उसी से करूंगी। मेरी चिंता मत करो बस तुम अपनी फिक्र करो। मैं अगर तेरे से पहले इस घर से चली गयी तो तुझे कोई ना पूछेगा। वैसे भी तू यहीं रह और गोबर काढ़। मुझे नहीं रहना इस तबेले में।”

पूर्णिमा अपने को नीलिमा और चंद्रेश का गार्जियन समझती थी मगर नीलिमा के इन शब्द बाणों ने उसका कलेजा छलनी कर दिया था और मान को जमींदोज। उसे लगा कि रोज छोटी छोटी मुठभेड़ जीत रही वो जिंदगी के मोर्चे की जंग हार गयी है। उसके महत्व को भाँपकर घरवालों ने उससे इस विस्फोटक स्थिति में यथास्थिति बनाये रखने का अनुरोध किया जो उसने भारी मन से मान भी लिया। इसी बीच इंटरमीडिएट का रिजल्ट आ चुका था, पूरे कस्बे में उसने टॉप किया था और मेरठ जोन में उसने दूसरा स्थान पाया था। उसका फायदा ये हुआ कि उसे कुछ ट्यूशन मिल गये जो उसकी जिंदगी की दुश्वारियों का खासा कम करने लगे थे।

कालेज में दाखिला हुआ तो अच्छे नम्बरों की बदौलत उसकी बिल्डिंग फीस, विकास शुल्क आदि माफ हो गया।कालेज में उसकी मेधा छुपी ना रह सकी। और इसी कॉलेज के एक विद्यार्थी ने इसकी चर्चा अपने घर पर भी कर दी थी। बीएससी की पढ़ाई के तीसरे साल तक पहुंचते-पहुँचते पूर्णिमा अपने ट्यूशन और कॉलेज में हर साल टॉप करने के बदौलत आस पास के गांवों में मशहूर हो गई थी। पूर्णिमा को ताड़ते रहने वाला युवक अनिरुद्ध लगातार दो वर्षों से एम काम की परीक्षा में फेल हो रहा था। वो पूर्णिमा के पल पल की खबर रख रहा था मगर पूर्णिमा उसे नहीं जानती थी। अनिरुद्ध ने अपना सारा रिसर्च और योजना अपने पिता जीतनलाल को बताई। जीतनलाल झोलाछाप पशु-चिकित्सक के तौर पर अपनी सेवाएं देता था।

जीतनलाल गांव-गांव जाकर पशुओं को टीका लगाता था और थोड़ा बहुत पशुओं का उपचार भी कर लेता था। उसका काम मोटा था मगर बुद्धि मोटी नहीं थी। बैलों का इलाज करते-करते वो जान गया था कि एक बैल उसके घर में भी पल रहा है उसका बेटा अनिरुद्ध। वो अपने बेटे को राजा कहता था और दुनिया उसे अनिरुद्ध के नाम से पुकारती थी मगर समझती उसे बैल ही थी। अनिरुद्ध बुद्धि से बैल था मगर दिखता बिल्कुल भयानक सांड की तरह था जो कि सांड की तरह सिर्फ एकांगी देखता था भोजन, और भोजन, और भोजन फिर कसरत।

पहले तो अनिरुद्ध ख्वाब देखा करता था कि वो इतना गोरा है कि हीरो बन सकता है। मगर किसी नेकबख्त ने उसे सलाह दे दी कि वो भीमकाय देहदशा और बेडौल शारीरिक सौष्ठव से ना सिर्फ डरावना दिखता है बल्कि उसे देखकर वितृष्णा पैदा होती है। फिर अनिरुद्ध ने सोचा कि वो हट्टा-कट्टा है पुलिस में सिपाही बन जायेगा और खूब वसूली करके ऐश करेगा। लेकिन जीवन में एक भी प्रतियोगी लिखित परीक्षा पास ना हो पाने के कारण उसके अरमान धरे के धरे रह गए। गुंडई में भी उसने जाने का प्रयास किया मगर जिस रफ्तार से इलाके के बच्चे-बच्चे में कट्टे का प्रचार-प्रसार हुआ उसमें उसके शारीरिक बल का कोई खास उपयोग ना हो पाया उसमें भी। फिर भी उसे टोल टैक्स पर रख लिया एक ठेकेदार ने। लेकिन एक बार टोल टैक्स की वसूली में उस पर फायर हुआ और वो मरते-मरते बचा तब से उसने गुंडई से तौबा कर ली।

अनिरुद्ध उर्फ राजा सिर्फ शारीरिक बनावट से पुरुष था और बुद्धि से बैल,इस बात की भनक बहुत पहल