• उर्मिला शुक्ल

अरुण ये मधुमय देश हमारा

‘अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवात्मा हिमालयो नाम नागाधिराज:. पूर्वापरौ तोयनिधि वगाहा स्थित: पृथिव इव मानदंड:’.

कालिदास के इस कथन के आलोक में देखें, तो देश का भौगोलिक विस्तार और अधिक ठहरता है. कालिदास के युग में भारत की भौगोलिक सीमा में हिंदु कुश, ईरान का पठार और बर्मा (म्यामार) के भी कुछ हिस्से शामिल होते मगर आज विश्व के भौगोलिक इसे नहीं स्वीकारते. फिर भी भारत के हिस्से में आने वाला हिमालय का यह हिस्सा हमें गर्व से भर देने के लिए पर्याप्त है. इस हिमालय की छह श्रेणियाँ हैं, जो पामीर के पठार से अपना उठाव लेती हुई पूर्व की ओर बढ़ती चली जाती हैं.इसी श्रृंखला में एवरेस्ट है जिसे फतह करने की चाह विश्व का हर पर्वतारोही करता है. इसी में वह जोरकुल झील है, जिससे चार बड़ी नदिया निकल कर सोना उगलने वाली जमीन को सींचती हैं. इसी के तटव्रती क्षेत्र में केसर के वो खेत हैं, जिनकी क्यारियों में लोटकर विक्रमादित्य के घोड़ों ने अपने अयाल लाल किये थे. इसी झील के पूर्वी किनारे से ब्रह्मपुत्र का उदगम है, जिसके प्रवाह में कामरूप का जादू है. लोक कथाएं यहाँ की स्त्रियों को ऐसी जादूगरनी निरुपित करती हैं, जो अपने मनचाहे पुरुष को भेड़ा लेने की क्षमता रखती हैं.


हिमालय इहलौकिक होते हुए भी परलौकिक आनंद का स्रोत रहा है, यही कारण है कि ऋषि मुनियों के साथ ही यह साहित्यकारों को भी बहुत प्रिय रहा है. हिंदी साहित्य में हिमालय की पर्याप्त उपस्थिति नजर आती है. छायावाद के दो आधार स्तंभों जयशंकर प्रसाद और सुमित्रानंदन पंत की रचनाएं हिमालय को आधार बनाकर साहित्य जगत में एक अलग मुकाम बनाती हैं.सुमित्रानंदन पंत का तो जन्म ही हिमालय की गोद में हुआ और उनके कवित्व को प्रकृति का वरदान मिला ;मगर संस्कृत साहित्य में हिमालय का जो स्वरूप उभरा है, वह अन्यत्र नहीं है. संस्कृत साहित्य के विद्वानों ने अपनी रचनाओं में हिमालय का विविध रूपी वर्णन किया है ; मगर हिमालय को अपनी लेखनी में उतार लेने का श्रेय कालिदास को ही है. उन्हें हिमालय इतना अभिभूत करता है कि वे अपने ग्रंथों में बार–बार हिमालय की ओर जाते हैं और उनका ‘मेघदूतम’? उसका विस्तार तो हिमालय से लेकर सुदूर छत्तीसगढ़ तक विस्तारित होता चला आता है और सरगुजा में रामगढ़ की पहाड़ी पर ठहराव लेता है. यहीं से विरही यक्ष अपनी प्रियतमा को संदेश भेजता है. मैं जब भी रामगढ़ की उस पहाड़ी पर घुमड़ते मेघों को देखती, तो मेरा मन अलकापुरी की ओर उड़ने लगता.शायद कल्पना की इसी उड़ान के चलते मैं हिमालय की ओर खिंचती रही और पश्चिमी हिमालय की कई–कई यात्रायें कीं ;मगर पूर्वोत्तर की ओर जाना नहीं हो पाया. मैं मन को समझाती ‘धीरज धरो, ऐसा अवसर जरूर आएगा,जब तुम्हारी यह अभिलाषा पूरी होगी.और अवसर आया फरवरी दो हजार बीस में, जब चीन के ईजाद किए करोना का भय दुनिया भर में अपने पैर पसार चुका था. मुझे अरुणाचल जाना था, जिसकी सीमा करोना के जन्मदाता देश की सीमाओं से जुड़ती थी. सो लोगों ने डराया. डर भी लगा.डरने वाली बात तो थी ही ;मगर फिर सोचा जो भी होगा देखा जायेगा और चल पड़ी पूर्वोत्तर की ओर.पूर्वोत्तर जो भारत में होकर भी, भारत से अलग सा है. भाषा–भूषा और खान–पान ही नहीं, लोगों के डील–डौल और उनकी गढ़न भी शेष भारतीयों से एकदम अलग है. मैंने पढ़ा था कि भारत में अनेकता में भी एकता है. सो उसी अनेकता में एकता की डोर थामे मैं बढ़ चली उस ओर, जहाँ सात बहनें एक दूसरे का हाथ थामे खड़ी हैं.

यात्रा प्रारंभ हुई कामख्या एक्सप्रेस से. कोलकाता सब जाना पहचाना था, मगर उसके आगे कभी जाना हुआ नहीं.सो उस अनजानी राह को निहारने की चाह थी ; मगर हावड़ा से आगे बढ़ते ही सूर्य देव ने विदा ले ली और सारा मंजर स्याह परदे में लिपट गया ; मगर बर्धमान आते–आते ट्रेन के भीतर का नजारा बदलने लगा था. चाय, पान रजनीगन्धा, खिलौने, इलेक्ट्रानिक सामानों के साथ-साथ गमछे, चादर और रोटी सब्जी वाले भी डिब्बे में फेरी लगाने लगे थे. उनकी तादात इतनी अधिक थी कि लग रहा था, जैसे हम एसी डिब्बे में नहीं रेल्वे प्लेटफार्म पर बैठे हों. बाकी चीजों का बिकना नया नहीं था ;मगर गमछे, चादर और रोटी–सब्जी का बिकना! बेचने वाले एक टोकरी में रोटी और भगोने में सब्जी लिए लगातार फेरी लगा रहे थे. पूरा खाना तो हर स्टेशन पर और हर रूट पर मिलता है ; मगर रोटी–सब्जी का यूँ बिकना एक नया अनुभव था.

सुबह हुई.अब ऊँची–नीची पहाड़ियाँ, केले के पेड़ों से आच्छादित हरियर धरती बता रही थी कि गाड़ी आसाम में प्रवेश कर रही है. ‘आसाम‘ यह नामकरण कैसे हुआ, इसमें भी कई मत हैं. कुछ विद्वान् इसे संस्कृत के ‘अस्म‘ का अपभ्रंश मानते हैं, जिसका अर्थ है आसमान. कुछ का मानना है कि इसका वास्तविक नाम ‘अहोम‘ है जो कालान्तर में असम हो गया और अंग्रेजी के चलते आसाम कहलाने लगा. एक और खास बात है, असम पर अंग्रेजों से पहले किसी विदेशी का शासन नहीं रहा. मुगलों ने बार–बार कोशिश की आक्रमण किये ; मगर वे परास्त हुए. गुवाहाटी से कुछ किलोमीटर दूर स्थित कामख्या स्टेशन. गुवाहाटी की अनावश्यक भीड़ से बचकर कामख्या मंदिर तक पहुँचना आसान बनता है यह स्टेशन. गाड़ी की मंजिल भी यहीं तक थी. यहाँ से मुझे नाहर लुगुन (अरुणाचल )जाना था. यह गाड़ी रात में थी. सो मेरे पास पूरा दिन था.

असम यानि कामरूप क्षेत्र. यानि काम और रूप का संगम. इस विषय में कई दंत कथाएँ मिलती हैं. एक कथा महाभारत काल से भी जुड़ती है. इसके अनुसार कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध यहाँ की एक युवती उषा के रूप सौंदर्य पर मुग्ध हो गये थे ;मगर असम की जनश्रुति के अनुसार उषा अनिरुद्ध पर मोहित हो गयी थी और उसने उनका हरण कर लिया था.यह कथा लोक में ‘कुमार हरण‘ के नाम से ख्यात है ;मगर मुझे अनिरुद्ध के मोहित होने वाली कथा ज्यादा सटीक लगती है.कारण कामरूप तो यहाँ की स्त्रियों के सौन्दर्य और इनके अटूट प्रेम के लिए ही ख्यात रहा है. यह माना जाता रहा है कि यहाँ की स्त्रियाँ अपने रूप सौंदर्य के साथ–साथ जादू भी जानती हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोक मानस में तो यह सदियों तक पैठा रहा कि यहाँ की स्त्रियाँ मोहनी जानती हैं और अपने मोह में फाँस कर पुरुषों को भेड़ बना लेती हैं. भेड़ यानि जो बिना तर्क, बिना विरोध के सर झुका कर आदेश का पालन करे. तभी तो पूरबी स्त्रियाँ अपने पतियों से कामरूप न जाने की सौगंध लिया करती थीं. तन्त्र–मन्त्र वाले जादू का तो मुझे नहीं पता ; मगर रूप के जादू की मैं भी कायल हूँ. रूप सौंदर्य में आकर्षण तो होता ही है और रूप के साथ जब स्नेह की गलबहिंयाँ हो, तो उस जादू की काट कहाँ. स्नेह में भेड़ तो क्या, कुछ भी बना जा सकता है. मुझे देवियाँ बहुत अच्छी लगती हैं. कारण जो काम देवता नहीं कर पाये उसे उन्होंने कर दिखाया. उनका साहस मुझमें आत्मबल भरता है.मैं उनकी भक्त हूँ यह कहने में मुझे कोई गुरेज नहीं. कामाख्या के प्रति मेरा आकर्षण कुछ ज्यादा रहा है. देवी होने बाद भी वे मुझे साधारण स्त्री के अधिक करीब लगती हैं. शायद वे पहली देवी हैं जिनकी माहवारी को भी लोक स्वीकृति मिली है. इसे अम्बुबाची उत्सव के रूप में मनाया जाता है. इन दिनों में कुंड का पानी लाल हो जाता है. सो सबसे पहले कामख्या की ओर प्रस्थान किया.

मेरे मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि सभी देवियाँ पहाड़ों पर ही क्यों रहती हैं. क्या यह उनका निर्वासन है या खुद उनका एकान्तिक चयन. कामख्या देवी भी नीलांचल नाम की ऊँची पहाड़ी पर विराजमान हैं. मंदिर परिसर में पुलिस की मौजूदगी व्यवस्था भी बनाती है और डंडे भी चलाती है. उस दिन कोई वीआईपी आने वाला था सो वहाँ पुलिस ही पुलिस नज़र आ रही थी. आम लोगों के लिए प्रवेश वर्जित था. मैंने एक अधिकारी से अपनी स्थिति बताई कि मेरे पास कुछ ही घंटे है. देर तक वे पसोपेश में रहे, फिर जाने की इजाजत दे दी. अन्य मंदिरों की तरह प्रसाद लेने का आग्रह करते दुकानदार अपनी दुकानों के बाहर खड़े थे. दुकानों में मेवा और मिठाई के छोटे–बड़े डिब्बे सजे हुए थे. मैं मंदिरों में कभी भी प्रसाद नहीं चढ़ाती. इस विषय में मेरे अपने विचार हैं कि जो ईश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का पालनहार है. जिसका दिया ही हम पाते हैं, उसे भला हम क्या दे सकते हैं. सो मंदिरों में सिर्फ पुष्प अर्पित करने का नियम सा लिया है. वैसे तो मैं अज्ञेय की कविता ‘साम्राज्ञी का नैवेद्य दान ‘ की समर्थक हूँ – “हे महाबुद्ध! मैं मंदिर में आयी हूँ रीते हाथ. फूल मैं ला न सकी. ओरों का संग्रह, तेरे योग्य न होता.”

मगर मंदिरों में मैं फूल चढ़ाती हूँ. कारण यहाँ फूल गरीब को रोजी–रोटी देते हैं. जब हम नींद में डूबे सुखद सपने बुनते हैं, तब छोटे–छोटे बच्चे अपनी सुखद नीद को त्याग कर भोरे–भोरे उठ कर फूल तोड़ने जाते हैं, तो उनके इन फूलों को न चढ़ाना भी तो अपराध है. सो मैंने फूलों का एक दोना खरीदा और आगे बढ़ चली. कामाख्या के विशाल परिसर में प्रवेश करते ही एक प्राचीन गुंबदाकार मंदिर नजर आया, पूछने पर पता चला वही मुख्य मंदिर है. कुछ आगे बढ़ने पर एक लंबी कतार नजर आयी. ‘ इस कतार में लग कर तो कई घंटे लग जायेंगे ‘. भारत के कई मंदिरों में टिकट लेकर वीआईपी दर्शन की व्यवस्था रहती है. यहाँ भी थी. समय कम था, तो सोचा टिकट लेकर एक दिन के लिए वीआई बन लिया जाय. एक पुलिस कर्मी से पूछा टिकट कहाँ मिलेगी, तो उसने उसी लाइन की ओर इशारा किया, जिसे छोड़कर मैं बाहर आई थी. आश्चर्य हुआ टिकट के लिए इतनी लंबी लाइन ! तो बिना टिकट वाली लाइन कितनी लंबी होगी ?


मैंने देखा परिसर में कई पंडित अपने जजमानों की सेवा में संलग्न थे. गेरुआ धोती,जनेऊ और देवी के नामों वाली चादर ओढ़े वे उनके लिए पूजा की विशेष सामग्री उपलब्ध करवा रहे थे. उनके साथ – साथ चलते हुए निरंतर मंत्रोचार कर रहे थे. इस तरह पंडितों को साथ लेकर दर्शन करने वाले ये लोग अपने विशेष होने के अहं में डूबकर, साधारण लोगों से एकदम अलग थलग खड़े थे. उनके लिए शायद कोई विशेष द्वार रहा होगा, जिसके खुलने की प्रतीक्षा में वे बार – बार अपने पंडित से कुछ पूछते और उसके जवाब पाकर, एक ऊबी हुई आश्वस्ति से भर उठते. इस परिसर की और एक खासयित थी, जो इस परिसर को अलगा रही थी. इस परिसर में बड़े–बड़े बकरे थे. उनकी ऊँचाई मझोले बछड़ों जितनी थी. मैंने इतने बड़े बकरे कभी नहीं देखे थे. वे वहाँ स्वच्छंद घूम ही नहीं रहे थे, लोगों के हाथों से प्रसाद और फूल भी छीन कर खा रहे थे. बाद में पता चला ये बकरे देवी के नाम पर छोड़े हुए बकरे हैं. मैंने सुना था कि कामख्या में मंदिर में प्रतिदिन बकरे की बलि चढ़ती है और देवी को सबसे पहले बकरे का ताजा खून चढ़ाया जाता है ; मगर इन्हें यूँ स्वच्छंद छोड़ दिया जाता है यह नहीं मालूम था. ये बकरे टिकट के लिए कतार में खड़े लोगों में भय भी जगा रहे थे.

चैनल गेट खोलकर दस–दस लोगों छोड़ा जा रहा था.लगभग डेढ़ घंटे के बाद मुझे उस गर्भगृह में प्रवेश करने का मौका मिला. सामने कामख्या देवी की प्रतिकृति थी जहाँ पुष्प और अन्य चढ़ावे चढ़ाया जाना था.वहीं से होकर एक सँकरी गली से नीचे जाकर एक कुंड के बीच में कामख्या देवी की पिंडी है. वहाँ सीधे –सीधे जाया जा सकता था; मगर पुजारी लोगों को घूमकर जाने को निर्देशित कर रहे थे. चूँकि वे पंडित थे, तो उन्हें स्त्रियों को छूने का तो लाइसेंस मिला हुआ था.सो वे उन्हें पकड़–पकड़ धकिया रहे थे. मैंने इस तरह धकियाने विरोध किया, तो मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने कोई अपराध किया हो. गर्भगृह में बहुत साधरण सी रौशनी थी.उस रौशनी में मैंने देखा देवी की पिंडी पर ढेरों फूल मालायें लदी हुई थीं.सो दर्शन के नाम पर फूल मालाओं का दर्शन ही करना पड़ा. फिर वहाँ बैठे पंडित जी के कहने पर कुंड के जल को स्पर्श किया और बाहर निकल आयी. बाहर अगर, धूप और दीप प्रज्ज्वलन की अलग व्यवस्था थी. जिन लोगों ने नारियल चढाये थे, वे बाहर प्रागण में नारियल फोड़कर प्रसाद बाँट रहे थे. इस परिसर में कामाख्या के आलावा मातंगी, बगोला, धूमावती, तारा, कमला, भैरवी, चिनमासा भुवनेश्वरी, त्रिपुर सुंदरी, काली, के ये दसो रूप प्रतिस्थापित हैं. कुछ लोग उस बड़े कुंड की ओर जा रहे थे, जिसका जल देवी की पिंडी वाले कुंड में जाता हैं ;मगर कैसे और किधर से यह एक रहस्य ही है.यूँ भी प्रकृति को पूरी तरह जान लेने की तमाम कोशिशों के बाद भी मनुष्य उसे जान कहाँ पाया है. स्वच्छ जलवाला एक मझोला जलकुंड देखकर मन प्रसन्न हुआ. उस जलकुंड के ऊपर की सीढ़ियों पर छोटे–बड़े मेमने बँधे हुए थे, जिन्हें लोग छूकर दान कर रहे थे, ठीक उसी तरह जिस तरह इलाहाबाद और बनारस के गंगा घाट पर बछिया का दान किया जाता है. कुछ लोग बलि के लिए अपने साथ मेमने भी लेकर आये थे. उन मेमनों को देखकर दुःख हुआ. फिर बकरीद पर बिकते ढेरों बकरे आँखों में उभरने लगे.’ इस इक्कीसवीं सदी में भी यह जीव हत्या ! क्या इसे बंद नहीं करना चाहिए?’ सोचते हुए मैं लौट रही थी.

मंदिर से बाहर निकलते ही “ सीड केला ! सीड केला खाइए.“ की आवाज से कदम ठिठके. पूछने पर बेचने वाले बताया कि इस केले में बीज हैं, जिन्हें चबाकर खाया जा सकता है. कुछ लोग बड़े चाव से उस केले को खा रहे थे. मैं पहली बार सुन रही थी कि केले में बीज भी होता है. देखा उन केलों को, जो रूप रंग और आकृति में कुछ अलग थे. आम देसी केलों ( बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मिलने वाली केली ) से कुछ बड़े, कुछ अधिक मोटे और चपटे. केले वाले ने इसरार किया ‘ बहुत सुवाद है.खाके तो देखिए. “ वहीं खड़ी एक एक महिला ने उस की केले की तारीफ़ की, तो मैंने एक केला खरीद लिया. दस रूपये का एक केला. सामान्य केले से अधिक था उसका दाम ;मगर वह सामान्य तो था नहीं और इस जमाने में दस रूपये भी बहुत अधिक नहीं लगते. उसे खाया तो पहले कौर के साथ ही छै सात बीज मुँह में आ गये.हाथ में लेकर देखा, तो ये बीज पालक के बीज के आकार से कुछ बड़े थे. दूसरे कौर में उन्हें चबाकर खाया.केला बहुत मीठा था और उसे बीजों के साथ चबाकर खाना अच्छा लग रहा था. एक नया अनुभव था.

गुवाहाटी में कामख्या के साथ ही ब्रह्मपुत्र भी मेरे आकर्षण में शामिल रहा है, मैंने सुना और पढ़ा था कि भारत की नदियों ( स्त्री लिंगी ) में कुछ नद ( पुल्लिंग) भी हैं, जिनमें ब्रह्मपुत्र प्रमुख है. इसका उदगम तिब्बत में कैलास पर्वत के निकट स्थित यांगजांग झील है. तिब्बत से लेकर बांग्लादेश तक के अपने लंबे सफर में इसे कई नामों से जाना जाता है.तिब्बत में इसे यरलुंग साम्पो, अरुणाचल में सियांग और दिहांग, आसाम में ब्रह्मपुत्र कहा जाने वाला यह नद बांग्लादेश में पहुँचते ही नदी बनकर जमुना कहलाने लगता है.फिर वह जमुना गंगा की धारा में विलीन होकर बंगाल की खाड़ी में समा जाती है. जब मैंने ब्रह्मपुत्र को देखा, तो देखती ही रह गयी. चौड़ा रेतीला किनारा और मीलों तक फैला उसका चौड़ा पाट. निगाहें हद तक जल का असीम विस्तार. कहते हैं ब्रह्मपुत्र का सबसे चौड़ा, लगभग दस किलोमीटर चौड़ा पाट आसाम में ही है. अरुणाचल में दो भागों में बँट जाने वाली इसकी दोनों धारायें आसाम में फिर एक हो जाती हैं और मांजुली जैसे सुंदर द्वीप का निर्माण करती हैं. किसी नदी में बना यह एकमात्र द्वीप है. मन में अज्ञेय की कविता ‘ नदी के द्वीप ‘ उभर आयी ‘.क्या इस कविता की कल्पना का आधार मांजुली ही है ? फिर मैंने देखा ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे मीलों तक छोटे–बड़े मोटर बोट खड़े हुए थे. कहा जाता है किसी जमाने में जब ब्रह्मपुत्र पर कोई पुल नहीं बना था, तब आसाम, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश पहुँचने के लिए ब्रह्मपुत्र ही एक मात्र सहारा था. इसकी गहराई अधिक होने के कारण इसमें बड़े–बड़े स्टीमर आसानी से चला करते थे. अभी भी छोटे बड़े कई स्टीमर और मोटर बोट खड़े हुए थे. मुझे मेरे ऑटो वाले ने सरकारी जेट्टी पर छोड़ा था. वहाँ से उमानन्द के लिए सरकार के द्वारा संचालित स्टीमर मिलता है. किराया बीस रूपये प्रति व्यक्ति.टिकट खिड़की अभी बंद थी और वहाँ बहुत से लोग स्टीमर की प्रतीक्षा में बैठे हुए थे. दूर–दूर फैले जल विस्तार को दो भागों में बाँटता एक लंबा बाँध सा नजर आ रहा था ; मगर वह कृत्रिम नहीं प्राकृतिक था और कुछ आगे जाकर विलीन हो गया था. बाँई और देखा, तो कुछ दूरी पर जल राशि के बीचो बीच एक हरी भरी पहाड़ी नजर आयी. हमें वहीं जाना था. मैंने देखा ब्रह्मपुत्र के जल में लहरें नहीं थीं.उसमें एक ठहराव सा नजर आ रहा था. कुछ देर बाद स्टीमर आता दिखाई पड़ा, तो जेट्टी पर हलचल बढ़ी. टिकट खिड़की खुली, तो टिकट लेकर स्टीमर पर सवार हुए. नीचे बैठने के लिए कुर्सियाँ रखी हुई थीं ; मगर कुछ लोग छत पर जा रहे थे.मैंने भी उस जलयात्रा के लिए छत को चुना. छत पर बैठने की कोई व्यवस्था नहीं थी ; मगर ब्रह्मपुत्र का विहंगम दृश्य, तो वहीं से नजर आता.सो इतना कष्ट उठाना तो लाजिमी था.


स्टीमर आगे बढ़ा तो उस ठहरे हुए पानी में कुछ हलचल हुई. अब स्टीमर से बनती लहरों के आलावा भी छोटी–छोटी जल लहरियाँ नजर आने लगी थीं, जिनसे भान हुआ कि हम प्रवाह के विपरित दिशा की ओर बढ़ रहे थे. कुछ ही देर में हम उस पीकाक पहाड़ी के नीचे थे, जिस पर उमानन्द मंदिर है. हमारे यहाँ देवी दर्शन के बाद भैरव दर्शन की परम्परा है. माना जाता है कि उमानंद मंदिर में विराजमान शिव ही कामाख्या के भैरव हैं. इसलिए जो कामाख्या का दर्शन करते हैं वे उमानंद के दर्शन भी करते हैं ; मगर मुझे तो ब्रह्मपुत्र का आकर्षण यहाँ खींच लाया था. ब्रह्मपुत्र की क्रोड़ में बना यह एक प्राचीन शिव मंदिर है. ऊँची – ऊँची सीढियों की चढ़ाई थका देती है ; मगर ऊपर पहुँच कर ब्रह्मपुत्र का विहंगम दृश्य देखकर सारी थकन उड़न छू. चारों ओर अपार जलराशि और पिकाक की हरी भरी पहाड़ी पर चलते पवन के झोंके, मन को बाँध लेते है, लगता है कि बस इस सौंदर्य को निहारते ही रहो. एक पूरा दिन गुजारने वाली जगह है. सुबह से शाम तक ब्रम्हपुत्र के बदलते रूप रँग को देखना एक सुखद अनुभव होता होगा ; मगर यह अनुभव हमारे हिस्से में नहीं था. फिर भी जो था, जितना था अनुपम था. अब आकाश में लालिमा उतर आई थी. मैंने देखा भुवन भास्कर अब अस्ताचल गामी हो रहे थे. फिर कुछ ही देर में जो दृश्य उभरा उसने ब्रह्मपुत्र के लोहित नाम को साकार कर दिया था. (ब्रह्मपुत्र में लोहित नदी के संगम के बाद इसे लोहित नाम से भी पुकारा जाता है ) जल से बादल तक फैला वह लाल वितान एक सम्मोहन रच रहा था और उस सम्मोहन में बंधी मैं अपलक निहार रही थी उसे. फिर उस लालिमा के कोने पर एक स्लेटी पट्टी सी उभरी और फ़ैलती चली गयी.मंदिर से आती घंटा ध्वनि ने मंदिर की याद दिलायी. वहाँ पहुँचने के लिए अभी और बहुत सी सीढ़ियाँ चढ़नी शेष थीं. सो वहाँ पहुँचते–पहुँचते आरती ख़त्म हो चुकी थी. वैदिक धर्म में शिव संहारकर्ता कहलाते हैं और लोक में आदर्श प्रेम, एकनिष्ठ पति ;तभी तो उनके जैसे पति की कामना में कुँवारी लडकियाँ उन्हें पूजती हैं. शिव मुझे भी बहुत प्रिय हैं. उनका प्रेमी रूप मुझे भाता है. संध्या का स्लेटी आँचल अब स्याह हो रहा था.मंदिर के इस ऊपरी प्रांगण से ब्रह्मपुत्र का विहंगम रूप देखना भी किसी स्वप्नलोक में विचरण से कम नहीं था. मन तो कर रहा था कि वक्त ठहर जाय और हम भी ; मगर न तो वक्त ठहरता है और न ही इंसान.सो सायरन बजा. आखिर बोट चलने को तैयार थी. लौटती बोट में भी मैंने ऊपर की मंजिल चुनी और जल को स्याह, स्याह और स्याह होते देखती रही. बोट जैसे जैसे किनारे की ओर बढ़ी रौशनी की झिलमिल उभरने लगी और बोट जेट्टी पर जा लगी.

सड़क पर आये तो रिक्शे वालों ने आ घेरा. रिक्शे पर बैठना अच्छा नहीं लगता ; मगर जब भी कोई रिक्शावाला इसरार करता है.मैं उसके रिक्शे पर जरूर बैठती हूँ. बिना किसी मोलभाव के.आज भी एक रिक्शेवाला इसरार कर रहा था. सो मैं उसके रिक्शे में बैठ गयी. रास्ते में उससे बातें करती रही. उसकी बोली ने बताया कि वह बिहार से है. उसका परिवार पूर्णिया में रहता है. वह साल में दो बार घर जाता है, खेतों की बोउनी और छठ के पर.

”एक दिन में कितना कमा लेते हो.” मैंने पूछा

“ कभू दू सौ, त कभू तीन सो. फेर परब म ढेर कमाई होखे पाँच छोह सौ.”

पूर्वी प्रदेश के पुरुष हमेशा से कलकत्ता और असम आते रहे है.उत्तर प्रदेश का यह लोकगीत – “ झुलनिया का लागा धक्का बलम कलकत्ता पहुँच गये. “ इसे प्रमाणित करता है. रोजी - मजूरी के लिए अपने परिवार को गाँव में छोड़कर कमाने के लिए आना आज भी बदस्तूर जारी है. इस कोरोना काल में आज जब मैं यह संसमरण लिख रही हूँ, तो उसका चेहरा आँखों में झूल रहा है. क्या कर रहा होगा वह. क्या अपने घर लौट गया होगा या फिर अपनी कुठरिया में भूखा–प्यासा अकेला पड़ा होगा.

असम जाया जाय और भूपेन हजारिका याद न आयें ऐसा संभव ही नहीं है. उन्हें रुदाली के गीत ‘दिल हूम हूम करे’ ने ख्याति जरूर दिलाई ; मगर उन्हें पहचान दी “एक कली दो पत्तियाँ” ने. इस गीत में लिपटी असम की खुश्बू ने उन्हें असमिया गायक बनाकर फिल्म नगरी मुम्बई में ही नहीं पूरे देश में ख्यात कर किया. असम सरकार ने भी अपने गायक को मान देते हुए, उनके नाम पर एक भव्य स्मारक बनवाया है. मेरी इच्छा तो थी कि वहाँ अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करूँ ; मगर उसके बंद होने का समय हो गया था. सो उसे फिर कभी पर छोड़कर मैंने बाजार घूमने का सोचा और रिक्शेवाले से बाजार ले चलने को कहा.

बाजार में आकर्षण का केंद्र थीं यहाँ की मेखला चादर साड़ियाँ.उमानंद जाते समय बोट पर मैंने गौर किया था, कुछ महिलाओं ने मेखला चादर पहन रखा था.उम्र दराज महिलाओं ने तो पारंपरिक तरीके से पहना हुआ था, जो पहनने के बाद साड़ी की तरह लगती हैं ; मगर साड़ी नहीं हैं. इसे पहनने का तरीका भी एकदम अलग है. कुछ कुछ लहँगा की तरह ; मगर नई पीढ़ी ने उसे और खूबसूरत ओर कलात्मक रूप दे दिया था. मेखला में जो दुप्पटा था उसे किनारे में फुँदना लगाकर उसे तिकोने – तिकोने मोड़ देकर और सुंदर बना लिया था. रिक्शे वाले ने असम सिल्क के शो रूम के पास छोड़ दिया. यहाँ कई शो रूम थे जिनके शो केश में मूगा सिल्क की मेखला चादर को प्रददर्शित किया गया था. जो दुकाने छोटी थीं, उनके बाहर ये हैंगर पर लटक रही थीं. बहुत सी दुकाने थीं ;मगर उन तक पहुँचने की राह अवरुद्ध. सड़क किनारे कारों की पार्किंग ने दुकानों तक पहुँचने की जगह ही नहीं छोड़ी थी. दो कारों के बीच की जगह से ही दुकानों तक जाया जा सकता था, मगर फुटपाथ के नीचे की सारी जगह पान के पीकों से भरी हुई. यहाँ पान संस्कृति अपने चरम पर है इसका प्रमाण था यह. जैसे–जैसे दुकान तक पहुँचना हुआ. एक से एक सुंदर मेखला चादर ; मगर दाम जेब से बाहर. आठ हजार से शुरु होकर पचास हजार तक. कीमत बटुये पर भारी पड़ती.सो मन को समझाया ‘ क्या करना है इसे लेकर. कितना पहन पायेंगे इसे.’ सो खरीदा तो नहीं ; मगर कई दुकानों में घूम–घूम कर मेखला और असम सिल्क की साड़ियाँ देखीं. फिर असम के हस्त शिल्प की बारी आई. चाय छन्नी से लेकर पर्स तक सब बाँस से बने हुए. बाँस के



पर्स पर मन अटक ही गया, मन को बहुत मनाया ; मगर उसकी जिद! सो एक पर्स ले ही लिया. गाड़ी का समय भी हो रहा था. रास्ते के लिए खाना पैक करवाया और उस दिन के अपने डेरे की की ओर रवाना हुई. उस दिन हमारा डेरा एक घर में था और संयोंग से वे पति–पत्नी दोनों ही शिक्षक थे. भरा–पूरा परिवार था. बूढ़ी माँ और दो प्यारे बच्चे. उन्होंने खाने पर आमंत्रित किया, तो कुछ न नुकुर के बाद राजी हुई. न नुकुर भी इसलिए कि वे खाने का पैसा लेने को तैयार नहीं थे. यह भी एक संयोग ही था कि यह परिवार असमिया ब्राह्मण था.असम के भोजन में भी भात ही प्रमुख है. सो खाने में दाल–भात और बैगन की सब्जी थी. बातचीत शुरु हुई, तो उन्होंने बताया कि यहाँ के ब्राह्मण यूँ तो निरामिष हैं ; मगर बकरे का माँस खाते हैं. कारण? कामाख्या में बकरे की बलि दी जाती है, तो उसे प्रसाद माना जाता है. बहुत देर तक बातें हुईं. फिर आने के वादे के साथ उनसे विदा ली.


गोहाटी से नाहरलुगुन के लिए इंटरसिटी एक्सप्रेस से सफर शुरु हुआ. रात का समय था, तो बाहर का दृश्य अँधेरे की चादर में सिमटा हुआ था ; मगर गूगल जानकारी दे रहा था कि ट्रेन कहाँ से होकर गुजर रही है. गूगल के अनुसार हमारी ट्रेन टी स्टेट यानि चाय बगानों के करीब से भी गुजरी ; मगर अँधेरे के कारण कुछ भी भासित नहीं हुआ. यह गाड़ी अलसभोर यानि चार बजे नाह्ररलुगुन पहुँचती थी. सो आँख बंद करके अपने को नींद के हवाले करना ही उचित था. गाड़ी नाहरलुगुन तक ही जाती थी.फिर भी रात भर चिंता रही कि कहीं समय से नींद न टूटी तो? मन ही मन मनाती रही कि गाड़ी लेट हो जाय ; मगर अपने ठीक समय पर प्लेटफार्म पर जा खड़ी हुई.

नाहरलुगुन स्टेशन अभी कुछ समय पहले ही बना था. यह एक छोटा सा स्टेशन है, जहाँ गिनती की गाड़ियाँ ही आती हैं.सो सोया हुआ प्लेटफार्म गहरी नींद से अचानक जागा.गाड़ी के चलने का अंदेसा नहीं था.सो लोग बड़े इत्मीनान से उतर रहे थे. इस गाड़ी को रात में फिर गोहाटी जाना था.सो यहाँ सिर्फ उतरने वाले लोग ही थे. धीरे–धीरे प्लेटफार्म खाली हो गया. सब अपने–अपने गन्तव्य की ओर रवाना हो चुके थे और मैं? मुझे तो ईटा नगर जाना था. इंतजार था उजाले का. कुछ रौशनी हो, तो आगे बढ़ें. सुना था बालअरुण अपना पहला कदम अरुणाचल में ही रखते हैं. मुझे उन कदमों की प्रतीक्षा थी और सचमुच कुछ ही देर में उजास फ़ैल गयी.इतनी उजास कि सब कुछ भासित हो उठा. इतनी जल्दी इतनी उजास ! चकित सी नजरों से घड़ी की ओर देखा, साढ़े चार ही बजे थे. आसमान बादलों से आच्छादित था, तो बालअरुण की अरुणिमा तो नहीं बिखरी ;मगर उजाला इतना अधिक था कि आगे की यात्रा पर निकला जा सकता था.सो मैं प्लेटफार्म से निर्गम द्वार की ओर बढ़ चली.


हिमालय की तराई में बसा ईटानगर एक खूबसूरत शहर है. यूँ तो यह पूरा शहर ही खूबसूरत है ; मगर इस खूबसूरत शहर में बहुत कुछ ऐसा है, जिसे देखे बिना अरुणाचल की यात्रा सम्पूर्ण नहीं होती.अरुणाचल की राजधानी ईटानगर का नाम यहाँ के प्रसिद्ध ईटा किले पर है. इसे देखना जरूरी है, क्योंकि इसे देखने का अर्थ इतिहास की आँख से अरुणाचल का मूल्यांकन करना है.यहाँ से कुछ दूरी पर है गंगा झील. गंगा नदी के नाम से अभिहित यह झील बहुत विशाल नहीं है.यह एक छोटी सी झील है; मगर इसकी खुबसूरती को बढ़ाते हैं, इसके आस पास के जंगल. तरह-तरह के पेड़ पौधों और वन्य जीवों से भरे इस जंगल में वन भैसे तो सहज ही दिख जाते हैं. इसके आलावा यहाँ एक बौद्ध मन्दिर भी है. तिब्बती शैली में बना यह मंदिर भी सामान्य मंदिरों जैसा ही है ; मगर यहाँ से नजर आता ईटानगर का विहंगम दृश्य इसे विशेष बना देता है. इसकी एक विशेषता और भी है, वह है इसके परिसर में स्थित संग्रहालय. देश के प्रथम प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम पर बना यह संग्रहालय अपने भीतर अरुणाचल की जनजातीय संस्कृति को सहेजे हुए है. अरुणाचल एक जनजातीय प्रदेश है. यहाँ निशि जनजाति बसती है.

इस जनजाति की सबसे बड़ी विशेषता है, इसने अपनी पहचान बरकरार रखी है. जनजातियों को इसाई या हिंदू धर्म में दीक्षित करने के दौर में, अगर कोई जनजाति अपने को बचा लेती है, तो यह उसकी विशेषता ही कही जाएगी. धर्मांतरण कोई बहुत बुरी चीज नहीं है. जिस धर्म को स्वीकारने का मन हो उसे स्वीकार लेने में कोई बुराई नहीं है ;मगर इससे वह संस्कृति छीजती चली जाती है, जो उसके पूर्वजों की थाती है. व्यक्ति अपनी संस्कृति से कटता चला जाता है. निशि जनजाति ने अपनी संस्कृति को इस छीजन ने बचा रखा है. ऐसा नहीं है कि अरुणाचल की इस जनजाति में धर्मांतरण बिल्कुल भी नहीं हुआ; मगर अन्यों के मुकाबले बहुत ही कम.यही कारण है इनकी अपनी विशेषयाएँ अक्षुण हैं. कुछ जनजातीय लोग यह मानते हैं कि अगर उन्होंने धर्मांतरण न किया होता, तो वे आज गरीबी और जहालत में जीने को मजबूर होते. निशि जनजाति अपने विकास और समृद्धि में उनकी इस अवधारणा को तोड़ती है. बिना धर्मांतरण के उच्च शिक्षित हैं. बड़े–बड़े पदों पर हैं.

किसी प्रदेश या देश की मेरी यात्रा में वहाँ का विश्वविद्यालय स्वत: जुड़ जाता है.सो ईटानगर तक जाने के बाद भी मैं यहाँ के राजीव विश्वविद्यालय (दोई मुख) ईटानगर न जाती ऐसा हो ही नहीं सकता था.सो अगले दिन मैं विश्वविद्यालय की ओर रवाना हुई. एक खूबसूरत पहाड़ी पर प्रकृति की क्रोड़ में अवस्थित यह विश्वविद्यालय अपनी प्राकृतिक सुषमा के लिए ख्यात है. निर्जुली और रुद्राक्ष के पेड़ों से घिरा परिसर एक हरियर द्वीप का आभास देता है. यहाँ मेरी मुलाकात ‘ मौन होंठ मुखर ह्रदय ’ (असमिया उपन्यास ) के लेखक येशे दोरजी थोंग्छी से हुई. इस उपन्यास के लिए इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल भी मिल चुका है. सुखद आश्चर्य तो यह था कि वे भी मुझे जानते थे. उन्होंने मेरी कहानी ‘फूल गोदना के’ का जिक्र किया. कोई वरिष्ठ लेखक अगर आपकी अदना सी कहानी को याद रखे, तो यह ख़ुशी की बात तो होती ही है. उनसे देर तक बातें हुईं. शेष पूर्वोत्तर राज्यों की तरह यहाँ भी अधिकाँश प्राध्यापक उत्तर प्रदेश और बिहार से ही हैं ;मगर हिंदी विभाग के कुछ प्राध्यापक स्थानीय भी हैं. एक सुखद बात यह कि पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की तरह अरुणाचल में हिंदी विरोधी माहोल नहीं है. यहाँ के लोगों में हिंदी के प्रति अनुराग है.यहीं मेरी मुलाकात यालाम से हुई. ये हिंदी विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं.

यालाम अरुणाचल की निशि जनजाति से हैं.मेरी इच्छा थी कि मैं अरुणाचल के किसी आदिवासी परिवार से मिलूँ.सो मैंने अपनी यह इच्छा जाहिर की. वे इसके लिए सहर्ष तैयार हो गयीं. चूँकि मेंरे पास समय की कमी थी, इसलिए उन्होंने मुझे अपने गाँव मिडपू ले जाना उचित समझा.



विश्वविद्यालय की पहाड़ी से नीचे उतरते ही निर्जुली है. निर्जुली से कुछ आगे है मिडपू. इस गाँव के बीच से होकर बहती है परे नदी. इसका पाट इतना चौड़ा है कि लगता ही नहीं यह कोई पहाड़ी नदी है. चौड़े पाट वाली इस नदी पर एक पुल बना है. आप सोचेंगे यह कौन सी बड़ी बात है, पुल लगभग सभी नदियों पर होता हैं. हाँ पुल सभी नदियों पर होता है ;मगर ऐसा पुल नहीं. इस पुल में दूसरे पुलों की तरह कोई आधार स्तंभ नहीं है. न किनारों पर और न ही बीच में. ऋषिकेश में गंगा पर बने लक्ष्मण झूले जैसा है यह ; मगर लक्ष्मण झूला इससे बहुत चौड़ा है और पक्की सड़क की तरह है उस पर चलने पर झूले के हिलने का जरा–जरा सा अहसास होता है और यह झूला? जरा-जरा अहसास नहीं कराता, अपनी पूरी शिद्दत से हिलता है. लोहे की छड़ों और लोहे की चादर मात्र से बना यह एक संकरा सा पुल है. यह इतना संकरा है कि इससे होकर आना–जाना दोनों एक साथ नहीं हो सकता. कार और आटो रिक्शा जैसे वाहन तो जा ही नहीं सकते. मोटर सायकल जरूर आती-जाती है ; मगर एक बार में केवल एक ही. रास्ता वन-वे है. इस पर पैदल चलने पर भी पूरा पुल हिलता है. ऐसे में जब कोई मोटर सायकल गुजरती है, तो यह जूड़ी–ताप ( मलेरिया ) के मरीज की तरह काँपने लगता है. दोनों किनारों पर ढालू होता हुआ यह पुल नदी के किनारे की धरती का ही आधार लेता है. यूँ तो पुल पर दोनों ओर काफी ऊँची जाली लगी है. मगर फिर भी डर लगता है. इस पुल से नदी को पार करना, कुछ-कुछ भय और रोमाँच से गुजरना था.

शाम होने वाली थी. निस्तेज होता सूर्य ढीली चाल से अपने घर लौटने को उतावला था. ऐसे में उसकी पीताभ किरणें नदी के सौंदर्य को और बढ़ा रही थीं. दूर से नजर आती हिमालय की चोटियाँ, नदी का निर्मल जल और आस-पास बिखरी हरियाली, भय को बेधकर मन में हुलास भरने लगी और मैं पुल के बीचोबीच खड़ी हो गयी. देर तक निहारती रही उस सौंदर्य को. पुल से उतर कर कुछ दूर चलने पर एक बाड़ा सा नजर आया, जिसके बाहर सूअर किल्लोल कर रहे थे. केले के गाछ के नीचे मुर्गियाँ चारा खोजने में तल्लीन थीं. हमने भीतर प्रवेश किया, तो बकरी की बाड़ नजर आयी, जिसमें बकरी और उसके मेमने बँधे थे और उसके सामने एक दो मंजिला मकान था. जिसके बाहर गेंदे की सघन झाड़ियाँ थीं जिनमें गहरे लाल रंग में पीली – पीली धारियों वाले ( चंदैनी गेंदा ) ढेर सारे फूल खिले थे.यालाम ने आवाज दी, तो एक स्त्री बाहर आई, परिचय हुआ.उनका नाम अमिता था. वे असम से थीं और यहाँ उनकी ससुराल थी.

उनके साथ हम उस मकान के उपरी हिस्से में गये. सामने की ओर बैठक थी, जो चारों से खुली थी. मकान के सामने बड़े–बड़े खेत थे, जिनकी फसल कट चुकी थी.धान यहाँ की मुख्य फसल है. यहाँ से हिमालय की हरी- भरी चोटियाँ नजर आ रही थीं. सामने टेबल पर एक पनडब्बा रखा था, जिसमें कच्ची सुपारी और पान रखे हुए थे.एकदम नीरव शांति थी. यहाँ से सारा नजारा इतना मोहक लग रहा था कि मन कर रहा था कि वहीं बसेरा कर लूँ. मैंने उनसे उनसे अपने मन की बात कही तो उन्होंने कहा – “हाँ !जरूर. ज्यादा नहीं तो आज तो रुक ही जाइए.” ;मगर चाहते हुए भी रुक पाना संभव कहाँ था. हम जब भी कहीं बाहर जाते हैं, तो हर दिन का प्लान बना कर जाते हैं. सो उसी रात मुझे मेघालय की ओर प्रस्थान करना था.मेरे पास कुछ घंटे ही थे. सो मैं उस प्राकृतिक सुषमा को निहार रही थी. घर के पीछे की ओर बड़ी सी बाड़ी थी, जिसमें सुपारी के दरख्त थे. उन्होंने चाय बनाने का उपक्रम किया, तो मैंने विनम्रता पूर्वक कहा कि मैं चाय नहीं पीती. फिर उन्होंने ग्रीन टी के लिए आग्रह किया. मैं ग्रीन टी भी नहीं पीती. मुझे उसका कड़वापन बिलकुल अच्छा नहीं लगता ; मगर कैसे दोबारा इंकार कैसे करती. सो कुछ नहीं कहा. वे ग्रीन टी ले ले आयीं और सच कहूँ दूर – दूर तक फैली उस प्राकृतिक सुषमा में डूबते हुए, कडवी ग्रीन टी भी उतनी कड़वी नहीं लगी थी.

उन्होंने चाय के बाद पान के लिए आग्रह किया. पान का डिब्बा तो सामने ही रखा था. पान का एक पत्ता और सुपारी का टुकड़ा मेंरी ओर बढ़ाया, तो मैंने गौर से देखा उस पनडिब्बे में पान के पत्ते और कच्ची सुपारी के टुकड़े ही थे. हमारे इधर की तरह कत्था और चूना नहीं था. पान खाया, तो पान का कसैला स्वाद मुँह में घुलने लगा. मकान से कुछ दूरी पर बाँस और लकड़ी से बनी एक झोपडी थी ; मगर वह जमीन पर नहीं बनी थी. जमीन पर मोटी–मोटी लकड़ियों को आधार देकर उससे पाँच–छै फीट ऊपर बाँस का धरातल बनाया गया था. मैंने उसके बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि वो अनाज रखने की जगह है. वे मुझे उसे दिखने ले गयीं. लकड़ी की सीढ़ियों से होकर हम उस बाँस की झोपड़ी में पहुँचे. वहाँ बाँस की बनी बड़ी सी धान की कोठी रखी थी. भीतर वाले हिस्से में पकाने के लिए केले के बड़े–बड़े घौदे रखे हुए थे,जिनमें से बहुत से केले पक चुके थे,उन्होंने एक पका केला मुझे दिया. उस केले का स्वाद आज भी जुबाँ पर ठहरा हुआ है. उन्होंने आठ-दस केले एक थैले में डाल लिए. वहाँ बिजली से चलने वाली एक छोटी सी धनकुट्टी भी थी. उन्होंने बताया कि वे धान भी घर में कूटती हैं. पुराने जमाने की स्त्रियाँ भी धान घर में कूटती थीं, मगर बिजली से नहीं, अपने श्रम से. उन्होंने पुरानी ढेंकी भी दिखाई.

उस कोठार से निकलकर हम उनकी बाड़ी में गये. वहाँ रास्ते में एक जगह पाँच छै फीट का मिटटी का चबूतरा जैसा दिखा. उन्होंने बताया वह उनके ससुर की समाधि है. घर के इतने समीप समाधि ! मुझे चकित देख उन्होंने कहा – हमारे यहाँ श्मशान का चलन कभी नहीं रहा. हम आप लोगों की तरह मृतक को श्मशान में नहीं दफनाते. उन्हें अपने करीब, घर की सीमा में ही दफनाते हैं, ताकि वे हमेशा हमारे करीब रहें. हमें उनसे डर नहीं लगता. अभी तक मैं यह मान कर चल रही थी कि अन्य आदिवासियों की तरह वे ईसाई ही होंगी ;मगर ईसाईयों में तो कब्रिस्तान का चलन है. सो मैंने पूछा –

“आप हिंदू हैं.”

नहीं हम आदिवासी हैं. हमारा आदिवासी धर्म है. प्रकृति हमारी देवी,ईश्वर जो भी कहिए, सब वही है. हमने न तो ईसाई धर्म को अपनाया और न ही हिंदू बने. हमने अपने धर्म और अपनी संस्कृति को जिंदा रखा.”

मैंने गौर किया यह कहते हुए उनके चेहरे पर एक गर्वित चमक उभर आई थी. सचमुच यह गर्व की ही बात थी कि जब ईसाई मिशनरियों ने पूरे देश में धर्म परिवर्तन का एक अभियान सा चला रखा था. उनके समानांतर हिन्दू घर्म भी घर वापसी में संलग्न था,तब अपने धर्म और संस्कृति को बचा ले जाना आसान तो नहीं रहा होगा. हम कुछ आगे बढ़े तो खेत के बड़े हिस्से में सरसों की पीली छटा बिखरी हुई थी. उससे कुछ आगे चलकर गोभी, मूली ( लाल वाली ), बैगन, लौकी और वैसे ही छोटे – छोटे टमाटर लगे हुए जैसे हमारे बस्तर में होते हैं. उन्होंने ढेर सारी सब्जियाँ तोड़ीं. मुझसे कहा कि मैं अपने साथ ले जाऊँ; मगर मुझे तो अभी और कई दिन तक यात्रा में रहना था. सो उन्हें अपनी परेशानी बताई.फिर भी उन्होंने कुछ केले और मूली एक बैग में डालकर दी.जब हम वहाँ से चलने लगे तो यालाम मैडम ने गेंदे का एक फूल तोड़कर मेरे कान में लगा दिया, बिलकुल वैसे ही जैसे आदिवासी स्त्रियाँ लगाती हैं. फिर हम लौट चले. एक बार फिर उसी झूलते हुए पुल से गुजरना हुआ.मगर अबकी डर बिलकुल नहीं लगा.

लौटते हुए कुछ देर के लिए यालाम मैडम के घर रुकना हुआ. उनके यहाँ निशि जनजाति की विशेष रसोई घर देखने का अवसर मिला. बाँस का बना यह रसोई घर आकार में बहुत बड़ा था. जिस तरह आनाज का कोठार बनाया गया था, बिलकुल उसी तरह जमीन से सात आठ फीट ऊपर बाँस का धरातल बना हुआ था. इस रसोई घर के बीचोबीच एक जगह थी जहाँ आग जल रही थी.उसके ठीक ऊपर एक पात्र लटका हुआ था.उन्होंने बताया कि इसे माँस भूनने के लिए उपयोग किया जता है. हम देर तक बैठे बातें करते रहे. फिर मैं लौट चली थी. कुछ घंटों की इस ग्राम्य यात्रा ने मुझे बहुत समृद्ध किया था. रात नौ बजे की ट्रेन थी. गोमटो स्टेशन वहाँ से करीब था.सो वहीं से ट्रेन पकड़ने का सोचा और स्टेशन की ओर बढ़ चली.

 


उर्मिला शुक्ल जन्म - 20 - 9 - 19 62

शिक्षा - एम ए ,पी एच डी ,डी लिट्

लेखन - कहानी , उपन्यास ,कविता , ग़ज़ल ,समीक्षा और यात्रा संस्मरण। छत्तीसगढ़ी और हिंदी में लेखन।

प्रकाशन हिंदी - कहानी संग्रह - 1 अपने अपने मोर्चे पर ,- प्रकाशक- विद्या साहित्य संस्थान इलाहबाद। 2 फूल कुँवर तुम जागती रहना - नमन प्रकाशन 2015 दिल्ली 3 मैं,फूलमती और हिजड़े नमन प्रकाशन 2015

साझा कहानी संग्रह -1 बीसवीं सदी की महिला कथाकारों की कहानियाँ नामक संग्रह नमन प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित दस खंडों में प्रकाशित। नवें भाग में कहानी गोदना के फूल प्रकाशित।

2 कलमकार फाउण्डेशन दिल्ली द्वारा 2015 में अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत कहानियाँ । इस संग्रह में कहानी -सल्फी का पेड़ नहीं औरत प्रकाशित-प्रकाशक-श्री साहित्य प्रकाशन दिल्ली।

3 हंस -सिर्फ कहानियाँ सिर्फ महिलायें अगस्त 2013 कहानी बँसवा फुलाइल मोरे अँगना प्रकाशित और चर्चित।

4 -कथा मध्य प्रदेश 4 खंडों में प्रकाशित मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के कथाकारों के संग्रह में 4 भाग में नहीं रहना देश बिराने प्रकाशित।

कविता संग्रह - इक्कीसवीं सदी के द्वार पर (मुहीम प्रकाशन हापुड़ 2001 )

समीक्षा - 1 छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में नारी - चेतना से विमर्श तक (वैभव प्रकाशन रायपुर), 2 हिंदी कहानी में छत्तीसगढ़ी संस्कृति (वैभव प्रकाशन रायपुर )।3 हिंदी कहानी का बदलता स्वरूप (नमन प्रकाशन दिल्ली ),

3 हिंदी कहानियों वस्तुगत परिवर्त


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