• उर्मिला शुक्ल

अरुण ये मधुमय देश हमारा

‘अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवात्मा हिमालयो नाम नागाधिराज:. पूर्वापरौ तोयनिधि वगाहा स्थित: पृथिव इव मानदंड:’.

कालिदास के इस कथन के आलोक में देखें, तो देश का भौगोलिक विस्तार और अधिक ठहरता है. कालिदास के युग में भारत की भौगोलिक सीमा में हिंदु कुश, ईरान का पठार और बर्मा (म्यामार) के भी कुछ हिस्से शामिल होते मगर आज विश्व के भौगोलिक इसे नहीं स्वीकारते. फिर भी भारत के हिस्से में आने वाला हिमालय का यह हिस्सा हमें गर्व से भर देने के लिए पर्याप्त है. इस हिमालय की छह श्रेणियाँ हैं, जो पामीर के पठार से अपना उठाव लेती हुई पूर्व की ओर बढ़ती चली जाती हैं.इसी श्रृंखला में एवरेस्ट है जिसे फतह करने की चाह विश्व का हर पर्वतारोही करता है. इसी में वह जोरकुल झील है, जिससे चार बड़ी नदिया निकल कर सोना उगलने वाली जमीन को सींचती हैं. इसी के तटव्रती क्षेत्र में केसर के वो खेत हैं, जिनकी क्यारियों में लोटकर विक्रमादित्य के घोड़ों ने अपने अयाल लाल किये थे. इसी झील के पूर्वी किनारे से ब्रह्मपुत्र का उदगम है, जिसके प्रवाह में कामरूप का जादू है. लोक कथाएं यहाँ की स्त्रियों को ऐसी जादूगरनी निरुपित करती हैं, जो अपने मनचाहे पुरुष को भेड़ा लेने की क्षमता रखती हैं.


हिमालय इहलौकिक होते हुए भी परलौकिक आनंद का स्रोत रहा है, यही कारण है कि ऋषि मुनियों के साथ ही यह साहित्यकारों को भी बहुत प्रिय रहा है. हिंदी साहित्य में हिमालय की पर्याप्त उपस्थिति नजर आती है. छायावाद के दो आधार स्तंभों जयशंकर प्रसाद और सुमित्रानंदन पंत की रचनाएं हिमालय को आधार बनाकर साहित्य जगत में एक अलग मुकाम बनाती हैं.सुमित्रानंदन पंत का तो जन्म ही हिमालय की गोद में हुआ और उनके कवित्व को प्रकृति का वरदान मिला ;मगर संस्कृत साहित्य में हिमालय का जो स्वरूप उभरा है, वह अन्यत्र नहीं है. संस्कृत साहित्य के विद्वानों ने अपनी रचनाओं में हिमालय का विविध रूपी वर्णन किया है ; मगर हिमालय को अपनी लेखनी में उतार लेने का श्रेय कालिदास को ही है. उन्हें हिमालय इतना अभिभूत करता है कि वे अपने ग्रंथों में बार–बार हिमालय की ओर जाते हैं और उनका ‘मेघदूतम’? उसका विस्तार तो हिमालय से लेकर सुदूर छत्तीसगढ़ तक विस्तारित होता चला आता है और सरगुजा में रामगढ़ की पहाड़ी पर ठहराव लेता है. यहीं से विरही यक्ष अपनी प्रियतमा को संदेश भेजता है. मैं जब भी रामगढ़ की उस पहाड़ी पर घुमड़ते मेघों को देखती, तो मेरा मन अलकापुरी की ओर उड़ने लगता.शायद कल्पना की इसी उड़ान के चलते मैं हिमालय की ओर खिंचती रही और पश्चिमी हिमालय की कई–कई यात्रायें कीं ;मगर पूर्वोत्तर की ओर जाना नहीं हो पाया. मैं मन को समझाती ‘धीरज धरो, ऐसा अवसर जरूर आएगा,जब तुम्हारी यह अभिलाषा पूरी होगी.और अवसर आया फरवरी दो हजार बीस में, जब चीन के ईजाद किए करोना का भय दुनिया भर में अपने पैर पसार चुका था. मुझे अरुणाचल जाना था, जिसकी सीमा करोना के जन्मदाता देश की सीमाओं से जुड़ती थी. सो लोगों ने डराया. डर भी लगा.डरने वाली बात तो थी ही ;मगर फिर सोचा जो भी होगा देखा जायेगा और चल पड़ी पूर्वोत्तर की ओर.पूर्वोत्तर जो भारत में होकर भी, भारत से अलग सा है. भाषा–भूषा और खान–पान ही नहीं, लोगों के डील–डौल और उनकी गढ़न भी शेष भारतीयों से एकदम अलग है. मैंने पढ़ा था कि भारत में अनेकता में भी एकता है. सो उसी अनेकता में एकता की डोर थामे मैं बढ़ चली उस ओर, जहाँ सात बहनें एक दूसरे का हाथ थामे खड़ी हैं.

यात्रा प्रारंभ हुई कामख्या एक्सप्रेस से. कोलकाता सब जाना पहचाना था, मगर उसके आगे कभी जाना हुआ नहीं.सो उस अनजानी राह को निहारने की चाह थी ; मगर हावड़ा से आगे बढ़ते ही सूर्य देव ने विदा ले ली और सारा मंजर स्याह परदे में लिपट गया ; मगर बर्धमान आते–आते ट्रेन के भीतर का नजारा बदलने लगा था. चाय, पान रजनीगन्धा, खिलौने, इलेक्ट्रानिक सामानों के साथ-साथ गमछे, चादर और रोटी सब्जी वाले भी डिब्बे में फेरी लगाने लगे थे. उनकी तादात इतनी अधिक थी कि लग रहा था, जैसे हम एसी डिब्बे में नहीं रेल्वे प्लेटफार्म पर बैठे हों. बाकी चीजों का बिकना नया नहीं था ;मगर गमछे, चादर और रोटी–सब्जी का बिकना! बेचने वाले एक टोकरी में रोटी और भगोने में सब्जी लिए लगातार फेरी लगा रहे थे. पूरा खाना तो हर स्टेशन पर और हर रूट पर मिलता है ; मगर रोटी–सब्जी का यूँ बिकना एक नया अनुभव था.

सुबह हुई.अब ऊँची–नीची पहाड़ियाँ, केले के पेड़ों से आच्छादित हरियर धरती बता रही थी कि गाड़ी आसाम में प्रवेश कर रही है. ‘आसाम‘ यह नामकरण कैसे हुआ, इसमें भी कई मत हैं. कुछ विद्वान् इसे संस्कृत के ‘अस्म‘ का अपभ्रंश मानते हैं, जिसका अर्थ है आसमान. कुछ का मानना है कि इसका वास्तविक नाम ‘अहोम‘ है जो कालान्तर में असम हो गया और अंग्रेजी के चलते आसाम कहलाने लगा. एक और खास बात है, असम पर अंग्रेजों से पहले किसी विदेशी का शासन नहीं रहा. मुगलों ने बार–बार कोशिश की आक्रमण किये ; मगर वे परास्त हुए. गुवाहाटी से कुछ किलोमीटर दूर स्थित कामख्या स्टेशन. गुवाहाटी की अनावश्यक भीड़ से बचकर कामख्या मंदिर तक पहुँचना आसान बनता है यह स्टेशन. गाड़ी की मंजिल भी यहीं तक थी. यहाँ से मुझे नाहर लुगुन (अरुणाचल )जाना था. यह गाड़ी रात में थी. सो मेरे पास पूरा दिन था.

असम यानि कामरूप क्षेत्र. यानि काम और रूप का संगम. इस विषय में कई दंत कथाएँ मिलती हैं. एक कथा महाभारत काल से भी जुड़ती है. इसके अनुसार कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध यहाँ की एक युवती उषा के रूप सौंदर्य पर मुग्ध हो गये थे ;मगर असम की जनश्रुति के अनुसार उषा अनिरुद्ध पर मोहित हो गयी थी और उसने उनका हरण कर लिया था.यह कथा लोक में ‘कुमार हरण‘ के नाम से ख्यात है ;मगर मुझे अनिरुद्ध के मोहित होने वाली कथा ज्यादा सटीक लगती है.कारण कामरूप तो यहाँ की स्त्रियों के सौन्दर्य और इनके अटूट प्रेम के लिए ही ख्यात रहा है. यह माना जाता रहा है कि यहाँ की स्त्रियाँ अपने रूप सौंदर्य के साथ–साथ जादू भी जानती हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोक मानस में तो यह सदियों तक पैठा रहा कि यहाँ की स्त्रियाँ मोहनी जानती हैं और अपने मोह में फाँस कर पुरुषों को भेड़ बना लेती हैं. भेड़ यानि जो बिना तर्क, बिना विरोध के सर झुका कर आदेश का पालन करे. तभी तो पूरबी स्त्रियाँ अपने पतियों से कामरूप न जाने की सौगंध लिया करती थीं. तन्त्र–मन्त्र वाले जादू का तो मुझे नहीं पता ; मगर रूप के जादू की मैं भी कायल हूँ. रूप सौंदर्य में आकर्षण तो होता ही है और रूप के साथ जब स्नेह की गलबहिंयाँ हो, तो उस जादू की काट कहाँ. स्नेह में भेड़ तो क्या, कुछ भी बना जा सकता है. मुझे देवियाँ बहुत अच्छी लगती हैं. कारण जो काम देवता नहीं कर पाये उसे उन्होंने कर दिखाया. उनका साहस मुझमें आत्मबल भरता है.मैं उनकी भक्त हूँ यह कहने में मुझे कोई गुरेज नहीं. कामाख्या के प्रति मेरा आकर्षण कुछ ज्यादा रहा है. देवी होने बाद भी वे मुझे साधारण स्त्री के अधिक करीब लगती हैं. शायद वे पहली देवी हैं जिनकी माहवारी को भी लोक स्वीकृति मिली है. इसे अम्बुबाची उत्सव के रूप में मनाया जाता है. इन दिनों में कुंड का पानी लाल हो जाता है. सो सबसे पहले कामख्या की ओर प्रस्थान किया.

मेरे मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि सभी देवियाँ पहाड़ों पर ही क्यों रहती हैं. क्या यह उनका निर्वासन है या खुद उनका एकान्तिक चयन. कामख्या देवी भी नीलांचल नाम की ऊँची पहाड़ी पर विराजमान हैं. मंदिर परिसर में पुलिस की मौजूदगी व्यवस्था भी बनाती है और डंडे भी चलाती है. उस दिन कोई वीआईपी आने वाला था सो वहाँ पुलिस ही पुलिस नज़र आ रही थी. आम लोगों के लिए प्रवेश वर्जित था. मैंने एक अधिकारी से अपनी स्थिति बताई कि मेरे पास कुछ ही घंटे है. देर तक वे पसोपेश में रहे, फिर जाने की इजाजत दे दी. अन्य मंदिरों की तरह प्रसाद लेने का आग्रह करते दुकानदार अपनी दुकानों के बाहर खड़े थे. दुकानों में मेवा और मिठाई के छोटे–बड़े डिब्बे सजे हुए थे. मैं मंदिरों में कभी भी प्रसाद नहीं चढ़ाती. इस विषय में मेरे अपने विचार हैं कि जो ईश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का पालनहार है. जिसका दिया ही हम पाते हैं, उसे भला हम क्या दे सकते हैं. सो मंदिरों में सिर्फ पुष्प अर्पित करने का नियम सा लिया है. वैसे तो मैं अज्ञेय की कविता ‘साम्राज्ञी का नैवेद्य दान ‘ की समर्थक हूँ – “हे महाबुद्ध! मैं मंदिर में आयी हूँ रीते हाथ. फूल मैं ला न सकी. ओरों का संग्रह, तेरे योग्य न होता.”

मगर मंदिरों में मैं फूल चढ़ाती हूँ. कारण यहाँ फूल गरीब को रोजी–रोटी देते हैं. जब हम नींद में डूबे सुखद सपने बुनते हैं, तब छोटे–छोटे बच्चे अपनी सुखद नीद को त्याग कर भोरे–भोरे उठ कर फूल तोड़ने जाते हैं, तो उनके इन फूलों को न चढ़ाना भी तो अपराध है. सो मैंने फूलों का एक दोना खरीदा और आगे बढ़ चली. कामाख्या के विशाल परिसर में प्रवेश करते ही एक प्राचीन गुंबदाकार मंदिर नजर आया, पूछने पर पता चला वही मुख्य मंदिर है. कुछ आगे बढ़ने पर एक लंबी कतार नजर आयी. ‘ इस कतार में लग कर तो कई घंटे लग जायेंगे ‘. भारत के कई मंदिरों में टिकट लेकर वीआईपी दर्शन की व्यवस्था रहती है. यहाँ भी थी. समय कम था, तो सोचा टिकट लेकर एक दिन के लिए वीआई बन लिया जाय. एक पुलिस कर्मी से पूछा टिकट कहाँ मिलेगी, तो उसने उसी लाइन की ओर इशारा किया, जिसे छोड़कर मैं बाहर आई थी. आश्चर्य हुआ टिकट के लिए इतनी लंबी लाइन ! तो बिना टिकट वाली लाइन कितनी लंबी होगी ?


मैंने देखा परिसर में कई पंडित अपने जजमानों की सेवा में संलग्न थे. गेरुआ धोती,जनेऊ और देवी के नामों वाली चादर ओढ़े वे उनके लिए पूजा की विशेष सामग्री उपलब्ध करवा रहे थे. उनके साथ – साथ चलते हुए निरंतर मंत्रोचार कर रहे थे. इस तरह पंडितों को साथ लेकर दर्शन करने वाले ये लोग अपने विशेष होने के अहं में डूबकर, साधारण लोगों से एकदम अलग थलग खड़े थे. उनके लिए शायद कोई विशेष द्वार रहा होगा, जिसके खुलने की प्रतीक्षा में वे बार – बार अपने पंडित से कुछ पूछते और उसके जवाब पाकर, एक ऊबी हुई आश्वस्ति से भर उठते. इस परिसर की और एक खासयित थी, जो इस परिसर को अलगा रही थी. इस परिसर में बड़े–बड़े बकरे थे. उनकी ऊँचाई मझोले बछड़ों जितनी थी. मैंने इतने बड़े बकरे कभी नहीं देखे थे. वे वहाँ स्वच्छंद घूम ही नहीं रहे थे, लोगों के हाथों से प्रसाद और फूल भी छीन कर खा रहे थे. बाद में पता चला ये बकरे देवी के नाम पर छोड़े हुए बकरे हैं. मैंने सुना था कि कामख्या में मंदिर में प्रतिदिन बकरे की बलि चढ़ती है और देवी को सबसे पहले बकरे का ताजा खून चढ़ाया जाता है ; मगर इन्हें यूँ स्वच्छंद छोड़ दिया जाता है यह नहीं मालूम था. ये बकरे टिकट के लिए कतार में खड़े लोगों में भय भी जगा रहे थे.

चैनल गेट खोलकर दस–दस लोगों छोड़ा जा रहा था.लगभग डेढ़ घंटे के बाद मुझे उस गर्भगृह में प्रवेश करने का मौका मिला. सामने कामख्या देवी की प्रतिकृति थी जहाँ पुष्प और अन्य चढ़ावे चढ़ाया जाना था.वहीं से होकर एक सँकरी गली से नीचे जाकर एक कुंड के बीच में कामख्या देवी की पिंडी है. वहाँ सीधे –सीधे जाया जा सकता था; मगर पुजारी लोगों को घूमकर जाने को निर्देशित कर रहे थे. चूँकि वे पंडित थे, तो उन्हें स्त्रियों को छूने का तो लाइसेंस मिला हुआ था.सो वे उन्हें पकड़–पकड़ धकिया रहे थे. मैंने इस तरह धकियाने विरोध किया, तो मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने कोई अपराध किया हो. गर्भगृह में बहुत साधरण सी रौशनी थी.उस रौशनी में मैंने देखा देवी की पिंडी पर ढेरों फूल मालायें लदी हुई थीं.सो दर्शन के नाम पर फूल मालाओं का दर्शन ही करना पड़ा. फिर वहाँ बैठे पंडित जी के कहने पर कुंड के जल को स्पर्श किया और बाहर निकल आयी. बाहर अगर, धूप और दीप प्रज्ज्वलन की अलग व्यवस्था थी. जिन लोगों ने नारियल चढाये थे, वे बाहर प्रागण में नारियल फोड़कर प्रसाद बाँट रहे थे. इस परिसर में कामाख्या के आलावा मातंगी, बगोला, धूमावती, तारा, कमला, भैरवी, चिनमासा भुवनेश्वरी, त्रिपुर सुंदरी, काली, के ये दसो रूप प्रतिस्थापित हैं. कुछ लोग उस बड़े कुंड की ओर जा रहे थे, जिसका जल देवी की पिंडी वाले कुंड में जाता हैं ;मगर कैसे और किधर से यह एक रहस्य ही है.यूँ भी प्रकृति को पूरी तरह जान लेने की तमाम कोशिशों के बाद भी मनुष्य उसे जान कहाँ पाया है. स्वच्छ जलवाला एक मझोला जलकुंड देखकर मन प्रसन्न हुआ. उस जलकुंड के ऊपर की सीढ़ियों पर छोटे–बड़े मेमने बँधे हुए थे, जिन्हें लोग छूकर दान कर रहे थे, ठीक उसी तरह जिस तरह इलाहाबाद और बनारस के गंगा घाट पर बछिया का दान किया जाता है. कुछ लोग बलि के लिए अपने साथ मेमने भी लेकर आये थे. उन मेमनों को देखकर दुःख हुआ. फिर बकरीद पर बिकते ढेरों बकरे आँखों में उभरने लगे.’ इस इक्कीसवीं सदी में भी यह जीव हत्या ! क्या इसे बंद नहीं करना चाहिए?’ सोचते हुए मैं लौट रही थी.

मंदिर से बाहर निकलते ही “ सीड केला ! सीड केला खाइए.“ की आवाज से कदम ठिठके. पूछने पर बेचने वाले बताया कि इस केले में बीज हैं, जिन्हें चबाकर खाया जा सकता है. कुछ लोग बड़े चाव से उस केले को खा रहे थे. मैं पहली बार सुन रही थी कि केले में बीज भी होता है. देखा उन केलों को, जो रूप रंग और आकृति में कुछ अलग थे. आम देसी केलों ( बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मिलने वाली केली ) से कुछ बड़े, कुछ अधिक मोटे और चपटे. केले वाले ने इसरार किया ‘ बहुत सुवाद है.खाके तो देखिए. “ वहीं खड़ी एक एक महिला ने उस की केले की तारीफ़ की, तो मैंने एक केला खरीद लिया. दस रूपये का एक केला. सामान्य केले से अधिक था उसका दाम ;मगर वह सामान्य तो था नहीं और इस जमाने में दस रूपये भी बहुत अधिक नहीं लगते. उसे खाया तो पहले कौर के साथ ही छै सात बीज मुँह में आ गये.हाथ में लेकर देखा, तो ये बीज पालक के बीज के आकार से कुछ बड़े थे. दूसरे कौर में उन्हें चबाकर खाया.केला बहुत मीठा था और उसे बीजों के साथ चबाकर खाना अच्छा लग रहा था. एक नया अनुभव था.

गुवाहाटी में कामख्या के साथ ही ब्रह्मपुत्र भी मेरे आकर्षण में शामिल रहा है, मैंने सुना और पढ़ा था कि भारत की नदियों ( स्त्री लिंगी ) में कुछ नद ( पुल्लिंग) भी हैं, जिनमें ब्रह्मपुत्र प्रमुख है. इसका उदगम तिब्बत में कैलास पर्वत के निकट स्थित यांगजांग झील है. तिब्बत से लेकर बांग्लादेश तक के अपने लंबे सफर में इसे कई नामों से जाना जाता है.तिब्बत में इसे यरलुंग साम्पो, अरुणाचल में सियांग और दिहांग, आसाम में ब्रह्मपुत्र कहा जाने वाला यह नद बांग्लादेश में पहुँचते ही नदी बनकर जमुना कहलाने लगता है.फिर वह जमुना गंगा की धारा में विलीन होकर बंगाल की खाड़ी में समा जाती है. जब मैंने ब्रह्मपुत्र को देखा, तो देखती ही रह गयी. चौड़ा रेतीला किनारा और मीलों तक फैला उसका चौड़ा पाट. निगाहें हद तक जल का असीम विस्तार. कहते हैं ब्रह्मपुत्र का सबसे चौड़ा, लगभग दस किलोमीटर चौड़ा पाट आसाम में ही है. अरुणाचल में दो भागों में बँट जाने वाली इसकी दोनों धारायें आसाम में फिर एक हो जाती हैं और मांजुली जैसे सुंदर द्वीप का निर्माण करती हैं. किसी नदी में बना यह एकमात्र द्वीप है. मन में अज्ञेय की कविता ‘ नदी के द्वीप ‘ उभर आयी ‘.क्या इस कविता की कल्पना का आधार मांजुली ही है ? फिर मैंने देखा ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे मीलों तक छोटे–बड़े मोटर बोट खड़े हुए थे. कहा जाता है किसी जमाने में जब ब्रह्मपुत्र पर कोई पुल नहीं बना था, तब आसाम, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश पहुँचने के लिए ब्रह्मपुत्र ही एक मात्र सहारा था. इसकी गहराई अधिक होने के कारण इसमें बड़े–बड़े स्टीमर आसानी से चला करते थे. अभी भी छोटे बड़े कई स्टीमर और मोटर बोट खड़े हुए थे. मुझे मेरे ऑटो वाले ने सरकारी जेट्टी पर छोड़ा था. वहाँ से उमानन्द के लिए सरकार के द्वारा संचालित स्टीमर मिलता है. किराया बीस रूपये प्रति व्यक्ति.टिकट खिड़की अभी बंद थी और वहाँ बहुत से लोग स्टीमर की प्रतीक्षा में बैठे हुए थे. दूर–दूर फैले जल विस्तार को दो भागों में बाँटता एक लंबा बाँध सा नजर आ रहा था ; मगर वह कृत्रिम नहीं प्राकृतिक था और कुछ आगे जाकर विलीन हो गया था. बाँई और देखा, तो कुछ दूरी पर जल राशि के बीचो बीच एक हरी भरी पहाड़ी नजर आयी. हमें वहीं जाना था. मैंने देखा ब्रह्मपुत्र के जल में लहरें नहीं थीं.उसमें एक ठहराव सा नजर आ रहा था. कुछ देर बाद स्टीमर आता दिखाई पड़ा, तो जेट्टी पर हलचल बढ़ी. टिकट खिड़की खुली, तो टिकट लेकर स्टीमर पर सवार हुए. नीचे बैठने के लिए कुर्सियाँ रखी हुई थीं ; मगर कुछ लोग छत पर जा रहे थे.मैंने भी उस जलयात्रा के लिए छत को चुना. छत पर बैठने की कोई व्यवस्था नहीं थी ; मगर ब्रह्मपुत्र का विहंगम दृश्य, तो वहीं से नजर आता.सो इतना कष्ट उठाना तो लाजिमी था.


स्टीमर आगे बढ़ा तो उस ठहरे हुए पानी में कुछ हलचल हुई. अब स्टीमर से बनती लहरों के आलावा भी छोटी–छोटी जल लहरियाँ नजर आने लगी थीं, जिनसे भान हुआ कि हम प्रवाह के विपरित दिशा की ओर बढ़ रहे थे. कुछ ही देर में हम उस पीकाक पहाड़ी के नीचे थे, जिस पर उमानन्द मंदिर है. हमारे यहाँ देवी दर्शन के बाद भैरव दर्शन की परम्परा है. माना जाता है कि उमानंद मंदिर में विराजमान शिव ही कामाख्या के भैरव हैं. इसल