अपने-अपने कब्रिस्तान

रतन चंद ‘रत्नेश’

संक्षिप्त-परिचय

नामः                                    रतन चंद ‘रत्नेश’

जन्मः                                   20 अगस्त 1958

पुस्तकें प्रकाशितः         - सिमटती दूरियां (कहानी-संग्रह ), एक अकेली (कहानी-संग्रह ), झील में उतरती ठंड (कहानी-संग्रह)

- उन्नीस-बीस (लघुकथा-संग्रह )

- बचपन (बालगीत)

- बांग्ला की श्रेष्ठ कहानियां  (अनुवाद)

                                             - पेड़ और मनुष्य  (अमर मित्र की बांग्ला कहानियों का अनुवाद)

                    - जेल में तीस वर्ष (बांग्ला से अनुवाद)

- हिमाचल की श्रेष्ठ लघुकथाएं  (संपादन)

- लघुकथा हिमाचल (संपादन)

- ओस (संपादन)  

देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां, लघुकथाएं, कविताएं, व्यंग्य, यात्रावृत, बांग्ला और पंजाबी से अनुवाद तथा बाल-साहित्य का निरंतर लेखन।

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अब्दुल कादिर के चेहरे पर हताशा और निराशा की रेखाएं स्पष्ट नज़र आ रही थीं। बड़ी देर से घर में इन्तजार कर रही नसीमा ने उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश की तो जैसे वह कुम्हला-सा गया। नसीमा को यह समझते देर नहीं लगी कि जिस काम के लिए वे लोग गए थे, वह बन नहीं पाया है। मध्यम कद का दुबला-पतला कादिर एक चटाई खींचकर बरामदे में बैठ गया और घर के सामने के कच्चे मकान की मुंडेर पर थोड़ी-थोड़ी देर पर झटके से पूंछ उठाती काली-सफेद चिडि़या की ओर देखते हुए कहा, ‘‘नूरा भी नहीं माना।...वही शर्त रख दी। बदले में बेगारी कौन करेगा ?... अब हममें रजिया बी का सगा तो कोई है नहीं। हम सब तो भाईबंद के नाते उसके दरवाजे पर नाक रगड़ने गए थे। बहुत मिन्नत की पर टस से मस न हुआ खुदा का बंदा।... कहने लगा, ज़मीन फालतू में नहीं खरीद रखी है कि खैरात में बांटते फिरें।’’

‘‘शरम ना आती इन माटी मिलों को। गांव का अस्सी-पचासी किला ज़मीन तो  इन नूरा जैसे दबंगों ने ही कब्जाया हुआ है।’’ नसीमा ने तमतमाते हुए कहा।

‘‘जिसकी लाठी उसकी भैंस। हम भूमिहीनों की कौन सुने। पुलिस-दरोगा, पंचायती राज, सरकार सब उना की ही सुने है। हमरी कौन सुने जिना के पल्ले कुछ नहीं...।’’ कादिर के मुंह से थके-थके से शब्द निकल रहे थे।

‘‘सारे नियम-कानून गरीबां बास्ते । इ दबंग जो चाहे सो करें। मैं पूछू हूं, क्या इना की खातिर कोई नियम-कानून ना है।’’ बड़बड़ाते हुए नसीमा नींद से जागे दो साल के बच्चे को चुप कराने उसके पास चली गई जो एक ढीले नवार के मंजे पर झूलता पड़ा था।

अब्दुल कादिर की आंखों के सामने सुबह की पड़ी रजिया की लाश एक धीमी फिल्म की तरह छा गई। बेचारी रजिया जिसका न कोई आगे रहा, न पीछे था। शौहर को गुजरे कितने साल हो गए, उसकी गिनती भी वह कब की भुला चुकी थी। औलाद अल्लाह ने करम में लिखा नहीं था। बस दूसरों की जननगी करती रही। उसी से जैसे-तैसे गुजारा चलता आ रहा था बेचारी का। जब शौहर सुपुर्दे-खाक हुए थे, उस वक्त माहौल कुछ और था। थोड़ी दया-माया भी थी लोगों में। गांव का अपना छः एकड़ में एक साझा कब्रिस्तान पास बहती नदी के किनारे हुआ करता था। लाश को दफनाने की चिन्ता भी कभी पैदा होगी, ऐसा किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। रजिया के शौहर के इंतकाल के अगले ही बरस नदी में ऐसी बाढ़ उफनी कि उसने करवट बदलकर ही दम लिया। लिहाजा कब्रिस्तान उसी में समा गया। फिर तो जैसे गांव के नक्शे से कब्रिस्तान का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। अभी कुछ महीने पहले ज़मींदार नूरा के अब्बाजान का जब इंतकाल हुआ तो नूरा को कोई परेशानी नहीं हुई।  उसने अपनी ज़मीन के एक हिस्से में कब्रिस्तान बना डाला। उसी की देखादेखी दूसरे सभी बड़े काश्तकारों ने भी अपने-अपने कब्रिस्तान अपनी-अपनी ज़मीनों में आरक्षित कर लिए । पर जिनके पास ज़मीन ही न हो, वह क्या करे? जीते जी यहां-वहां मजदूरी कर पेट भर लेंगे या फिर ज़मीदारों के यहां खेतीबारी कर रोटी का जुगाड़ परंतु मरने के बाद पार्थिव देह को कहां से नसीब होगी मिट्टी?

आज बेज़मीन रजिया की मिट्टी खराब हो रही थी। कल किसी और के साथ भी ऐसा होना है। करे तो क्या करे बेज़मीन आदमी। पुश्तैनी गांव छोड़कर किसी ऐसी जगह चला जाय जहां कम-से-कम एक अदद कब्रिस्तान हो ताकि मरने के बाद उसे दो गज़ ज़मीन नसीब हो सके। पर यह ख्याल भी कितना अजीबोगरीब है? सिर्फ इसलिए जीते जी कब्रिस्तान ढूंढना शुरू कर दें कि उसकी बेजान देह को ज़मीन नसीब हो। किस्मत में न जाने क्या-क्या लिखा है? कैसे जीना है, कहां जीना है? कैसे अपने परिवार को बचाए रखना है?

ऐसी बेगैरत ख्यालों को अपने सिर से झटकता कादिर खड़ा हुआ और नसीमा को बिना बताए गांव की ओर निकल पड़ा। सुबह से लावारिस-सी पड़ी रजिया की लाश न उसे चैन से बैठने दे रही थी और न दूसरे बेज़मीनी लोगों को। सबकी चिन्ताएं रजिया की लाश की तरह उनसे भी जुड़ी हुई थीं। आज रजिया की लाश दफनाने का ठौर-ठिकाना नहीं मिल रहा था। कल उनमें से किसी और की लाश का भी वही हश्र होने वाला है।

पंचायत-घर के पास रजिया की लाश को घेरे सब खड़े थे और इसी मसले पर बातचीत चल रही थी कि लाश को कहां दफनाएं? कुछ दूरी पर एक घर के बाहर औरतों का झुंड भी किसी नतीजे के इंतजार में बेसब्री से बैठा था। उनका आना-जाना लगातार जारी था। एक आती कोई वहां से चली जाती, कोई जाती कोई एक चली आती।

‘‘बर्फ की सिल्ली ही मंगवा लेते। कहीं सड़न न शुरू हो जाय।’’ फैयाज बोला।

‘‘तुम भी फैयाज, कैसी बेसिरपैर की कह रहे हो ? सिल्ली जहां मिलेगी, वहां से यहां तक लाते-लाते वह बचेगी भी क्या?’’

‘‘क्या बात करते हो भाई, जीप में जाकर ले आएं और खासा नमक छिड़ककर जूट की बोरी से ढककर लाएं तो इतनी जल्दी नहीं गलती सिल्ली।’’

‘‘पर जीप देगा कौन?’’

‘‘अरे ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं दे सकते तो क्या बर्फ लाने के लिए अपनी जीप भी नहीं देंगे ये ज़मीदार?  गैरत इतनी तो ना मरी है उनकी।’’

‘‘कौन बात करे उनसे? नूरा से उसके कब्रिस्तान में दफनाने की इजाजत मांगी तो ऐसे भड़का जैसे उसकी ज़मीन पर कब्जा कर रहे हों।’’ इस बार कादिर बोला।

‘‘सरपंच साब की जीप क्यों नहीं मांग लेते ?’’

‘‘वे तो सुबह से ही गायब हैं। घर में पूछा तो बताया गया कि रजिया की लाश को दफनाने के मसले पर ही दूसरे गांव गए हैं।’’

‘‘लो और सुनो। दूसरे गांव वाले क्या साथ देंगे जब अपने गांव के लोग ही इतने बेरहम हो गए हैं।’’

‘‘सरपंच साब कुछ-न-कुछ करेंगे।’’ पंचायत घर की देखरेख करने वाला चौकीदार रूल्दा बोला।

‘‘खाक करेंगे वह। इस सारे फसाद की जड़ वही तो है मरदूद।’’

सबको जैसे इस बात का इल्म था कि गांव का सरपंच फिरदौस ज़मींदार सरीखे दबंगों के इशारे पर नाचता है।

इस्माइल के कहे फसाद की जड़ पर सबने जैसे चुप्पी साध ली। सरपंच या ज़मींदारों के खिलाफ बोलना जैसे एक नई मुसीबत मोल लेना हो पर सहनशक्ति भी कब तक साथ देती रहेगी। सबकी चुप्पी ने जैसे इस्माइल को और भड़का दिया।

‘‘क्या इस नामाकूल फिरदौस से बात छिपी हुई है कि नूरा जैसे दबंगों ने गांव की तकरीबन पचासी किला पंचायती जमीन पर नाजायज कब्जा जमा राख्या है। इस ज़मीन का कुछ हिस्सा भूमिहीनों के लिए आसानी से कब्र दे सके था पर उना से वापस लेने के वजाय यो सरपंच उना की ही तरफदारी करता फिरे है। इन्हीं भूस्वामियों के डर के कारण ही तो उसने कब्रिस्तान के लिए ज़मीन न होने का प्रस्ताव वक्फ बोर्ड को भेज्या था, पर वहां से भी मदद ना मिली। रेंट कलेक्टर ने साफ कह दिया कि बोर्ड के पास इतना फंड नहीं कि कब्रिस्तान खरीदकर दे। लिहाजा गांववालों को खुद ही अपनी ज़मीन का बन्दोवस्त करना होगा।’’

‘‘हममें से ही किसी ने वक्फ बोर्ड को हड़प की गई पंचायती जमीन का हवाला दे दिया होगा।’’ रहमान ने बिना इस्माइल को देखे कहा, पर इशारा उधर ही था।

इस नाजुक मौके पर कादिर को इस तरह की बहस बेकार लगी और उसने तल्खी से कहा, ‘‘यह भी कोई समय है लानत-मलानत का। मुद्दे की बात पर आओ और रजिया बी की सोचो।’’

इस्माइल को जैसे रजिया की लाश में कोई दिलचस्पी थी, न हमदर्दी। उसे तो दरअसल न किसी मुर्दे में दिलचस्पी थी और जि़ंदा लोगों में। पिछले चुनाव में फिरदौस के खिलाफ खड़ा हुआ था और हारने के बाद कुछ ज्यादा ही बौखलाया हुआ था। उसे तो बस गांव की सुआभातिरी में दिलचस्पी थी। इस समय जिन दबंगों के खिलाफ ज़हर उगल रहा था, उन्हीं की खिदमत में वह जब तब हाजिर रहता और अपना काम निकालता रहता। इस नाजुक मौके पर भी उपस्थित होने का मतलब भी उसका कोई स्वार्थ था। रसीदा के साथ उसके नाजायज सम्बंध की भी गांव में चर्चा थी। वहां बैठी औरतों में निश्चय ही इस बात को लेकर खुसुर-पुसुर हो रही थी। इस बात का इल्म रसीदा के पति ज़हीर को भी था। शुरू में ज़हीर ही अकेला शौकत की ज़मीन पर मजदूरी किया करता था, पर जब अपनी बीवी के रूमानी किस्से उसके कानों में पड़े तो उसे भी मजदूरी के लिए साथ ले जाने लगा। पर कहते हैं न कि अच्छी सूरत भी बुरी शै है। रसीदा के हुश्न पर ज़मीदार शौकत को भी फिदा होते देर न लगी। उसकी नाजोअदा थी ही कुछ ऐसी कि किसी भी मर्द को फिसलने पर विवश कर दे। फिर ज़मीदार जैसे लोग तो अपने मातहतों पर अपना पूरा अधिकार समझते हैं। खैर, वक्त की नज़ाकत को भांपते हुए रसीदा लम्बे समय तक मजदूरी करते हुए मालिक से यह आश्वासन पाने में कामयाब रही कि मरने के बाद उसे और उसके पति की लाश वे अपनी ज़मीन में रखवा देंगे।

पंचायतघर के सामने बैठे इस्माइल ने जैसे कादिर की दुखती रग में जैसे हाथ रख दिया, ‘‘अब रजिया के मरने के बाद उसकी इतनी ही फिक्र हो रही है तो पहले ही कोई इंतजाम कर कुरा लेते।’’

कादिर को बात चुभी और इशारा समझने के बावजूद इस समय इस हरामखोर के मुंह लगने से बेहतर चुप रहना ही समझा। इसी मसले को सुलझाने  बैठे उम्रदराज तौफिक मियां ने बात बदल दी, ‘‘देखो, काश्तकारों के यहां दो गज जमीन बुक कराने की हैसियत आखिर कितने लोगों में है? मरने के बाद अपनी लाश को चील-कौओं से बचाने के लिए हममें से तो कई ज़मींदारों से दो गज जमीन की भीख मांगते फिर रहे हैं। बेगारी करो तो कोई-कोई पसीजे वरना उनकी मांगें और शर्तें....तौबा तौबा । ज़मीर का हाल किससे छुपा रहा? सत्तर साल की बूढ़ी खाला का इंतकाल हुआ तो लाश को दफनाने के लिए वह ज़मीदार जलालुद्दीन के पैरों पर गिरकर रोता रहा। उसका दिल नहीं पसीजा तो दूसरे ज़मींदार अमीन के पास गया। वहां भी उसकी मुराद पूरी नहीं हुई तो तीसरे के पास, फिर चौथे की ड्योढ़ी में । हारकर कलैक्टर से गुहार लगानी पड़ी। तब कहीं जाकर उनके हुक्म पर तहसीलदार ने एक ज़मींदार को ज़मीन देने को फरमान जारी किया।’’

मुंहफट इस्माइल को आखिरकार ज़मींदारों की हिमायत करनी ही पड़ी, ‘‘जिस खेत में लाश दफन की जाती है, वहां फिर से खेती ना होती। यह तो आप भली जानते होंगे बड़े मिंया।...तो क्या अपनी ज़मीन पर कब्रिस्तान बनाकर ज़मींदार खुद बेज़मीन हो जांय? ज़मीन का क्या भाव चल रहा है किसी को पता भी है। इतनी महंगी ज़मीन को कोई भी ज़मींदार खराब नहीं करना चाहेगा।’’

वहीं बैठे सत्तर साल के भूरा, साठ के वजीर और अपने अस्सी साल के बाप के लिए खैरू को भी अभी से चिंता सता रही थी कि उनकी मौत के बाद लाश का क्या होगा? आज जो रजिया की हालत है और सभी उसकी लाश को लेकर परेशान है, उनके बारे में क्या कोई सोचेगा भी?

पंचायतघर के बाहर सरपंच फिरदौस का इंतजार बेसब्री से होता रहा। वह आए तो जैसे मसला सुलझे। रूल्दू ने जो आस जगायी थी उसी की डोर थामे वे सब वहां बैठे थे। रह रहकर उनकी निगाहें गांव की ओर आती सड़क पर उठ जातीं। मानो वह दूसरे गांव में कोई कब्रिस्तान खरीदने गया हो। ऐसा कब्रिस्तान जो अपनी जीप से बांधकर वह इस गांव में ले आएगा और रजिया बी उसमें दफन हो जाएगी। तीन हजार की आबादी वाले इस गांव के तकरीब आठ सौ लोग भूमिहीन थे।

उधर आंगन में पड़ी रजिया बी की लाश के ऊपर खुली धूप वाले नीले आसमान में चील गोलाई में घूमने लगे थे जो धीरे-धीरे ज़मीन की ओर उतरने की तलाश में थे। गांव में अक्सर कम दिखने वाले कौओं के एक झुंड को भी जैसे किसी अनजाने ने न्योता दे दिया हो।

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