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लेखक परिचय

सरला रवीन्द्र

                      

मैं क्यों लिखती हूँ?

मुझसे एक बार किसी पत्रिका के सम्पादक ने पूछा था - आप क्यों लिखती हैं, आपकी रचनाओं का प्रेरणास्रोत क्या है। उनका यह प्रश्न मेरे लिए यक्ष प्रश्न बन गया, क्योंकि मुझे कभी नहीं लगा कि मैं लेखिका हूँ। सायास तो कभी लिखना हुआ नहीं। पितृगृह में संयुक्त परिवार होने के कारण एक विविधरंगी वातावरण स्वाभाविक रूप से सहज उपलब्ध रहा। साहित्यिक अभिरुचि स्वतः ही जाग्रत हो गई। मेरी एक ताई गाँधीयुग के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी एवं पत्रकार श्री गणेश शंंकर विद्यार्थी की सुपुत्री थीं और उनके विवाह में उस कालखण्ड के आदर्शों के अनुरूप सभी जाने माने कवि-लेखकों ने अपनी रचनाएँ उपहार स्वरूप दी थीं। कविगुरु रवीन्द्र नाथ ठाकुर, राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, जैनेन्द्र, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, भगवती प्रसाद वाजपेयी आदि महान साहित्यकारों की रचनाएँ मुझे सहज उपलब्ध थीं। मैंने इन सभी लेखकों का काफ़ी कुछ साहित्य इंटरमीडियट तक पढ़ डाला था। इसके अतिरिक्त धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कहानी आदि पत्रिकाओं को नियमित रूप से देखने-पढ़ने का भी सूयोग मिलता रहा।

 

विवाहोपरांत श्वसुर गृह में भी पठन-पाठन का वातावरण मिला। पतिदेव श्री कुमार रवीन्द्र की अभिरुचियाँ कलात्मक-साहित्यिक थीं। वे एक अच्छे चित्रकार और कवि थे। विवाह के तुरन्त बाद उनके साथ लखनऊ छोड़कर मुझे सुदूर पंजाब के जालंधर नगर जाना पड़ा। एकदम नये परिवेश, बिल्कुल नई परिस्थितियों में अपने को ढालने की समस्या भी थी और उत्साह भी था। साथ ही नये-नये सम्पर्कों से अनुभव अधिक विविध एवं समृद्ध हुए। पतिदेव कालेज से उपन्यास आदि लाते रहते थे। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, सारिका आदि पत्रिकाएँ हम स्वयं लेते थे। इस प्रकार बच्चों का लालन-पालन करते हुए भी मेरी साहित्यिक अभिरुचियाँ निरन्तर जाग्रत बनी रहीं। ईस्वी सन् १९७० में हम थोड़े समय पूर्व ही पंजाब से अलग हुए हरियाणा के ऐतिहासिक नगर हिसार आ गये। यहाँ कुछ ही दिनों में नगर के कवियों-साहित्यकारों की संगत से हमारा घनिष्ठ परिचय हो गया।

 

तो यह है वह पृष्ठभूमि, जिससे मेरे भीतर छिपे कहानीकार का स्फुरण हुआ। पतिदेव और दोनों बच्चे कॉलेज-स्कूल चले जाते थे। कुछ पुराने-नये अनुभव-बिम्ब मन में कुनमुनाने लगे और एक दोपहर मेरी पहली कहानी का जन्म हुआ। और फिर लेखन का सिलसिला चल पड़ा और एक के बाद एक कहानियाँ अवतरित होती गईं। स्थानीय गोष्ठियों में एक-आध कहानी का पाठ किया। लोगों ने सराहा और विश्वास जगा कि मैं बिल्कुल बेकार नहीं लिख रही। फिर आकाशवाणी रोहतक एवं हिसार केन्द्रों से मेरी कहानियों का प्रसारण हुआ एवं हरियाणा साहित्य अकादमी के सम्पादित कहानी संग्रहों में भी मेरी रचनाओं को स्थान मिला। वैसे आज भी मुझे स्वयं को लेखिका कहने या मानने में संकोच होता है।

 

०क्षितिज 310 अर्बन एस्टेट-2

हिसार-125005                                                                       ----- सरला रवीन्द्र