... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

बदमाश प्रेत

आई थी हमारे घर में कायस्थों के यहाँ से एक लड़की. शादी क्या थी, फँसा लिया था उसने पोते को, वो लओ वाली मैरिज करा के. बड़ी चिड़ मचती थी. जब कभी मैडम सामने आती थीं, खून खौल उठता था. ना काम की थीं, ना धाम की. कोई काम करने को कहो, तो ऐसे हौंले-हौंले हाथ-पैर उठातीं, कि पोता खुद भाग के हाथ बटाने में लग जाता. छप्पन छुरी थीं सो अलग. कह कर जाती थीं कि हम छत पर कपड़े फैलाने जा रही हैं, मगर जो घंटों-घंटों पड़ोस के लड़कों पर डोरे डाले जाते थे, मैं ना जानूँहूँ क्या?

बस मेरी ये पोते-बहु से टकरार ही शायद खल गई थी चित्रगुप्त को. बड़ा तंग किया. धम से अपना लजिस्टर सामने रख कर उसने पन्ने पलटना शुरू कर दिया और उँगलियाँ चाटते-चाटते बोला, “फिर आ गईं तुम? तुम सुधरोगी नहीं. मुझे तो ये समझ नहीं आ रहा है कि तुम जैसों के साथ किया क्या जाए.”

तैश में आ कर उस दिन पानी का अधभरा कलश बहु की ओर दे मारने को जो उठाया, कलश सिर के ऊपर उठ कर पीछे की तरफ़ चलता चला गया, कंधों के नीचे पीठ ऐसे ज़ोर से टूटी कि उसकी चटाख अब तक कानों में गूँज रही है. आवाज़ गले में अटक गई, साँस जो थमी, नीचे की साँस नीचे और ऊपर की साँस ऊपर रह गई, प्राण निकलने के सब रास्ते तो खुल गए थे, सो दिल को उसी वक्त दौरा भी आ गया. वो पल जब मैंने दम तोड़ा बड़ा अपशकुनी था. अपने ही अंगों की बगावत देखनी पड़ी. ऐसा सदमा पहुँचा कि चित्रगुप्त के सामने घिग्घी बन्ध गई.

वो बड़ी शान से लजिस्टर उलट-पलट रहा था. जीभ से ‘किच’ करके बोला, “ना! ना! बड़ा आसान केस है. एक ही जगह बची है तुम्हें भेजने की. देखो, क्या बोल रहे हैं तुम्हारे ही घर वाले तुम्हारे बारे में? सुनोगी, तो खुद मानोगी कि मैं जो करने वाला हूँ सही करने वाला हूँ.”

मेरी तेरवीं के दिन, मेरे ही पति ने, सब नाते-रिश्तेदारों के सामने मेरे गुण गाने के बजाय, मेरा कोठरी में बंद बकस तोड़ खोला और हरेक चीज़ जो मैंने इतने सालों में इकट्ठी की थीं, उनके पुराने स्वामियों और स्वामिनियों को माफ़ी समेत लौटाल दीं. मैंने देखा कि पड़ोसी की मँझली बहु अपनी शादी के दिन खोया हुआ अपनी माँ का दिया हार वापस पा कर फूँटफूँट कर रो रही थी और बार-बार कृतज्ञ-भाव से इनके पैरों को छू कर इन्हें स्वामी-महात्मा बना रही थी. आसमान से ये ढोंग देख कर मेरी आँखों में खून उतर रहा था.

“बन्द करो ये नाटक-नौटन्कीबाज़ी!” मैं ज़ोर से दहाड़ उठी.

चित्रगुप्त ने गला खँखारा और शुरू हो गए.

“आत्मा बेचारी तो स्वच्छ चीज़ होती है. वो जो इस पुनरुज्जीवन के चक्कर में फँस गई है, उसका देहांतरण जीव के उसके जीवन में किये गए कर्म तय करते हैं. कर्म ही नहीं साथ में हम ये भी देखते हैं की जीव के कर्मों के पीछे उसकी नीयत क्या थी. तू तो बुरी नीयत से बार-बार लगातार अनगिनत बुरे कर्म किये चलती गई. अब बता, वो शमीम आलम के घर के बनाने के लिये जो ईंटें लाई गईं थीं, वो तेरे बक्से में क्या कर रही थीं? मरने के बाद भी तू अपने परिवार वालों को शर्मिंदा करने से बाज़ नहीं आई.”

“किस ने कहा था सबके सामने मेरा बकस खोलने को?” मुझसे रहा नहीं गया और वहीं मैंने उस चित्रगुप्त को हाँक दिया.

फिर गला खँखार कर उसने कई पन्ने पलटे और दुबारा शुरू हो गया.

“तो ठीक है. मैं भी अब निर्णय पर पहुँच गया हूँ. संसार के चौरासी लाख जलचर, थलचर और नभचरों में तेरे जैसे के लिये कोई जगह नहीं बन सकती. अरे, तू तो इत्ती खतरनाक है, तुझे तो मैं पेड़ बना कर भी नहीं भेज सकता. सुना. तुझे तो मैं सीधा पाताल लोक भेज रहा हूँ. वहीं जा, हज़ार साल तक सड़. अरे मन तो मेरा तुझे उस पाताल लोक में भेजने को कर रहा है जहाँ से तुझे तैंतीस हज़ार सालों तक मुक्ति ना मिले. मगर मेरा ऐसा करना वर्जित है. तू औरत जो है. शुकर मना कि तू इस जन्म में औरत पैदा हुई थी.”

बस मैंने तो उसकी बातें सुनना ही बन्द कर दिया था. वो अपनी भड़ास जो निकालने में लग गया था, बोले चला जा रहा था. तभी मैंने इन्द्र के सवारों को गुज़रते देखा. ग्यारह सौ दमकते घोड़े थे जो इन्द्र-देव का महारथ खींचे पृथ्वी की ओर दौड़े जा रहे थे. इधर वो चित्रगुप्त आँखें मूँदे अपने बाख्यान-बरनन में लगा हुआ था. मैंने झट छलांग लगाई और महारथ में चढ़ कर लौट आई मानव लोक के डैनमार्क देश की स्वर्गनुमा कॉपनहैगन नगरी में.

मैं खुश. कॉपनहैगन में मेरी नई-ब्याहता पर-पोती, सुष्मा जो रहती थी. मैं, एक प्रेतनी, माप में रोयेँ की नोक का सिर्फ़ एक बटा दस हज़ारवाँ भाग, बस डाल दिया उसके सिर के अंदर डेरा.

शुरू में इस गज़ब के शहर में पहुँच कर अपना अहोभाग्य ही मनाती रही. चारों तरफ़ लम्बे, सुनहरे बालों वाली जलपरियों समान लड़कियाँ, लम्ब-तड़ंग, गबरू जवान, हँसों से लदे तालाबों वाले हरे-हरे उपवन, मज़बूत खड़े मकान, चौड़ी, मगर खाली सड़कें. धूप हो, पानी बरसे या बरफ़ गिरे, यहाँ के लोगों को अपनी साइकिलें ऐसी प्यारी हैं जैसे पुराने ज़माने के राजपूतों को अपने घोड़े थे. पता चला कि इतनी आराम की ज़िन्दगी बिताते हैं ये डैनिश लोग कि यहाँ के हर दसवें आदमी को शराब की लत लगी हुई है, और हर दूसरा जोड़ा बिना मर-मिटाव के शादी तोड़ देता है. जब मालुम चला कि यहाँ शादियाँ इस वजह से टूटती है कि यहाँ की औरतें अपने जीवन काल में अन्य आदमी भी आज़माना चाहती हैं, मैंने तो ताली ही पीट ली. लोग स्वर्ग क्यों जाना चाहते हैं, सीधा यहाँ क्यों नहीं आते, इस अचम्भे में पड़ गई.

सुष्मा सुन्दर तो थी ही, लेकिन जब उसकी शादी उस लड़के से तय हुई जो विदेश में इंजिनियर था, तो उसके भाग्य को घर में सब ने सराहा. इसलिये, यहाँ आकर उसे दुःखी देख मैं हैरान हो गई. पता चला कि वो ऐसे देश में है जहाँ कि बोली उसके लिये उतनी ही गिटपिट है जितनी मेरे लिये अंग्रेज़ी, इसलिये पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी वो ना काम कर सकती है, ना बाहर जा कर लोगों से बातें.  मुझे उस शम्भु – उसका पति – और उसके परिवार वालों पर बड़ा गुस्सा आया. सुष्मा के लिये कई अच्छे रिश्ते आए थे और दो-एक अमरिका के भी थे. मुझे दिखने लगा कि उन लोगों ने हम लोगों की लड़की ले कर हम लोगों को ठग लिया था और हमारे साथ जो हुआ था वो एक घाटे का सौदा था. बात एकदम साफ़ थी. मेरे गुस्से का पारा फिर ऊँचाइयाँ छूने लगा.

सुष्मा को ज़रूरत थी अपनी ज़िन्दगी को पूरी तरह अपने वश में करने की. मैंने तय कर लिया कि अपनी बिटिया को खुद्दारी का पाठ सिखाने का वक्त आ गया है.

“वो मर्द है तो क्या हुआ. तेरे पास औरत वाले हथयार हैं. उनका इस्तेमाल कर.”

मर्दों की बात से मुझे फिर अपनी तेरवीं के रोज़ अपने पति का रवैया याद आ गया और मर्द को नामर्द कैसे बनाते हैं, ये मैंने सुष्मा को सिखाने की ठान ली.

पहली बात जो सिखाई वो ये कि चाहे कुछ हो जाए, अपने पति की तारीफ़ कभी ना कर. ये पाठ उसे घुट्टी में घोल कर ऐसा पिलाया कि जब कोई इन दोनों से मिलने आता, तो बात करते-करते ना जाने कैसे बात को घुमाव देती और शुरू हो जाती मेरी लाड़ली अपने पापा की तारीफ़ के पुल बाँधने.

“गाड़ी तो मेरे पापा की तरह कोई चला ही नहीं सकता. कैसी नक्शेबाज़ी से चलाते हैं!”

और जब शुरू हो जाती, तो वो बोलती चली जाती, बोलती चली जाती. मेहमान शालीनता से सुनते रहते और दामाद जी का सिर धीरे धीरे झुकता जाता. सूरजमुखी को पानी यदि मिलना कम हो जाए, तो उसका फूल झुकता जाता है, फिर वो फूल ऐसी तेज़ प्यास से तड़पता है कि अचानक लुड़क जाता है. ठीक वैसे ही दामाद जी भी अपने ससुर की तारीफ़ सुनते सुनते यकायक लुड़क जाते. सिर को वहीं मेहमान के सामने सुष्मा की गोद में टिका कर कहते, “पापा के लिये इतना कुछ और मुझमें तुम्हे एक तारीफ़-लायक चीज़ नहीं दिखती?”

फिर, “ग्रो अप शम्भु,” कहकर मेरी चतुर चेली सम्भाल कर उसका सिर गोद से हटा देती.   

एक सबक और दिया. मैंने उसे याद दिलाया कि तुम औरत हो, यही तुम्हारा सबसे बड़ा हथयार है. कह दो इतना काम बिना नौकर-चाकर के अकेले कैसे होगा.

एक दिन धुलने को इतने कपड़े इकट्ठे हो गए, कि ऑफ़िस जाने से पहले वो शम्भु दूसरे कमरे से चिल्लाया, “सुष्मा, मेरी गुलाबी वाली कमीज़ नहीं मिल रही है... और अगर अंडरवेयर मिल जाता तो ...”

उस दिन तो सुष्मा को मेरा सिखाया हुआ बोलने में थोड़ी दिक्कत हुई फिर भी वो इतना बोल पाई कि वो सब चीज़ें लॉन्ड्री में होंगी. अभी थोड़ी तबियत खराब है, जब ठीक हो जाएगी तो वो लॉन्ड्री कर लेगी.

उस रोज़ शम्भु चुपचाप ऑफ़िस चला गया. वापस आया तो पूरी लॉन्ड्री की. फिर अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर पिछवाड़े में अरगनी पर कपड़े फैला दिये. फिर तो रोज़ ऑफ़िस से लौट कर कपड़े धोना, बाहर फैलाना और सूखने पर उन्हें वापस लाना और तय करके ड्रैसर में अपने-अपने जगह रखना उसका ही काम बन गया. एक कपड़ों की इस्त्री नहीं करता था, ये बात मैंने बड़ी कोशिश करी सुष्मा के ज़हन में डालने की, मगर वो ऐसी गाय थी, उस शम्भु से इस्त्री करने को ना कह सकी. मैंने भी कहा, “ठीक है. समय के साथ ये कहना सिखा ही दूँगी.”

अक्सर खिड़की से हम नीचे देखती थीं, वो अरगनी से कपड़े बीनता जाता था, और पड़ोस की और औरतें भी आ कर कपड़े फैलाने या बीनने में लग जातीं, साथ में उस से बतियाती भी थीं. जल्द ही कॉम्पलैक्स की कई औरतों के साथ शम्भु की अच्छी खासी दोस्ती हो गई.

जुलाई के एक दिन बड़ी बढ़िया धूप खिली थी. शायद कॉम्प्लैक्स की डैनिश औरतों को इसी दिन का इंतज़ार था. तितलियों की तरह अपने-अपने फ़्लैटों से बाहर पिछवाड़े में निकल आईं और लगी उतारने ऊपर के अपने सब कपड़े. बदन पर क्रीम मलने के बाद पूरे दो या तीन घंटे लेटी रहीं, वहीं, धूप सेकती रहीं. बड़ा मज़ा आया खिड़की से ये नज़ारा देख कर. मेरा इस बात पर ध्यान ही नहीं गया कि किस प्रकार मेरी सुष्मा उत्तेजित हो रही थी. गुस्से में नीचे उतरी और सारे कपड़े बीन कर ले आई. उस दिन के बाद से कपड़ों का काम उसने फिर अपने ज़िम्मे ले लिया. किसी हाल में वो शम्भु को इन औरतों के पास फटकने नहीं देना चाहती थी. समय के साथ ये औरतें भी अब सुष्मा की सहेलियाँ बन गईं हैं.

नीचे के फ़्लैट में दो पाकिस्तानी भाइयों के परिवार रहते थे. सुष्मा की दोनों भाइयों की बीवियों से दोस्ती भी हो गई. रेहाना और डेज़ी नाम थे इनके. अरगनी रेहाना के बैडरूम के एकदम सामने थी. अक्सर बैडरूम और खिड़की के आसपास डस्टिंग करते हुए एक शलवार कमीज़ पहने लाल बाल वाली डैनिश महिला दिखती. हर बार जब दिखती, मैं सुष्मा पर ज़ोर डालती कि अगर इस वक्त रेहाना दिखे तो वो उससे ये पूछने में ना चूके कि आखिर ये महिला है कौन. एक दिन रेहाना बाहर निकल कर आ भी गई. वो लाल बाल वाली मैडम इस दफ़ा भी डस्टिंग में लगी थी. लेकिन मेरी लाख खलबली मचाने पर भी उस दुष्ट सुष्मा ने दुनिया भर की बातें कर डालीं, मगर मेरी वाली बात नहीं पूछी. तब तक डेज़ी भी आ गई थी. अचानक रेहाना बोल उठी, “वैसे एक साथ हसबैंड के बजाय आपने कैसे कपड़े फैलाने शुरू कर दिये?” पहले तो सुष्मा थोड़ी सहमी. बोली, “हमारे यहाँ हम काम बाट कर करते हैं. इसमें क्या ख़राबी है?” उसका इतना कहना था कि डेज़ी ने फ़ौरन अपना सुर्रा छोड़ दिया, “हाँ-आँ, आपने हसबैन्ड का हाथ बँटाया, इसमें क्या ख़राबी हो सकती है?” और ऐसा कहकर दोनों औरतें खिलखिला कर हँसने लगीं. सुष्मा को उनका हँसना अच्छा नहीं लगा. फिर उसकी नज़र उस लाल बाल वाली महिला पर पड़ी और वो पूछ बैठी, “ये आपके कमरे में कौन सफ़ाई कर रही हैं?” खिसियाने की अब इन दोनों की बारी थी. किस मुँह से कहतीं जब ब्याह कर रेहाना कॉपनहैगन आई थी, तो घर में मिया और देवर के अलावा, इन लाल बाल वाली देवी को भी पाया था. ज़ारा तो चुप रही. अपनी खनकती सी आवाज़ में रेहाना ने ही जवाब दिया, “ये तो मेरी आपा हैं.”

तीसरा सबक जो मैंने सुष्मा को सिखाया वो था ये कि सुन्दर तो तुम हो, लेकिन असली सुन्दरी वो जो अंग-अंग से सुन्दर हो, हर तौर से सुन्दर. जो बात बोले, ऐसे ज़ोर दे कर बोले के सुनने वाले को उसका परम दर्जा महसूस हो. नाक उठा कर बोले. जब बोले “मैं लेडी श्री राम कॉलिज की पढ़ी हूँ,” तो ये लगे कि सामने मिसेज़ प्रसाद नहीं, वरन् शम्भु नाम के बन्दर के साथ ख़ुद लेडी श्री राम खड़ी हैं.

“ज़्यादा खुश ना दीखा करो. थोड़ा चिढ़चिढ़ाना सीखो.” मैंने उसके दिमाग ये बात भी डालनी शुरू कर दी. वो पूछेगा, “अब क्या हुआ, जानी.” तुम उसको जवाब घूर कर देना. ऐसे घूरना कि वो वहीं का वहीं गड़ा रहे. थोड़ा रुक कर ही कहना, “दिन भर खुद तो मटरगश्ती करते हो, और मैं घर में पड़े-पड़े सढ़ती रहती हूँ.”

उसने ऐसा ही किया. शम्भु ने इस पर भी बड़े प्यार से, जानी-जानू कहकर, उस से कहा, “तुम यहाँ की कम्यून द्वारा चलाई गई डैनिश भाषा की क्लासिस में क्यों नहीं जाती. कुछ यहाँ की भाषा भी सीख लोगी और नए लोगों से मिलोगी तो मन बहला रहेगा.” इस पर मेरी सुष्मा ने जो जवाब दिया बडा गौरव महसूस किया मैंने. “क्यों? मुफ़्त वाली क्लासें क्यों ज्वॉइन करूँ मैं? क्या मैं किसी गए-गुज़रे ख़ानदान से आई हूँ कि अनपढ़-गँवार इमिग्रैन्ट लोगों के साथ बैठ कर क्लास में जाऊँ? याद रक्खो, मैं लेडी श्री राम की पढ़ी हूँ.” शम्भु की इतनी हैसियत नहीं थी कि सुष्मा को प्राइवेट क्लास के लिये भेज पाता, सो अपना सा मुँह ले कर ऑफ़िस चला गया. सुष्मा ने ये पाठ ठीक से सीख लिया था और अक्सर ऐसे ही तुनक कर बोलती थी. शम्भु पर भी लगता है इसका असर हुआ. बेहतर, ज़्यादा कमाई वाला काम ढूँढने में लग गया. अमरिका में भी काम की खोज शुरू कर दी. इधर बिना कुछ कहे, सुष्मा ने कम्यून की क्लासें लेनी शुरू कर दीं. नए दोस्त बनें. जिम भी जाने लगी. जीवन में काफ़ी सुधार आ गया. मगर शम्भु के साथ तुनक-मिज़ाज़ी बरकरार रही.

एक बार तो शम्भु के साथ अपने नए डैनिश मित्रों के यहाँ गई. उनके यहाँ के कुत्ते को बड़े प्यार से पुचकारने लगी, उसको दुलारने लगी. फिर एक नज़र शम्भु पर फेंकी. उसे कुत्तों से डर लगता था. दूर, सीधा सा खड़ा था. डैनिश मित्रों ने कहा भी कि हम कुत्ते को बाहर कर देते हैं, तो ज़ोर से सुष्मा बोली, “अरे, क्या बात कर रहे हैं? ये हमारा घर है या कुत्ते का? कुत्ता क्यों बाहर जाएगा? नहीं, इसे बाहर ना करिये.” फिर शम्भु पर नज़र फेंक कर ज़ोर से हँसने लगी. “वो देखिये, कैसे पथरा गया है शम्भु?” उस वक्त मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था. मैंने फ़ौरन पास उड़ती मक्खी के बदन में प्रवेश किया और भिन्ना कर अपनी प्यारी सुष्मा के सिर के चारों ओर जयमाला स्वरूप एक बड़ा सा चक्कर बना दिया.

वो समय भी आ गया जब शम्भु पिटा-पिटा सा दीखने लगा था. रोज़ ऑफ़िस जाता, ज़्यादा काम लेने लगा था, देर से वापस आता, चुप सा डरा सा रहता. सुष्मा को भी बात-बात पर उसकी खिल्ली उड़ाने का खूब चसका लग गया. इतनी माहिर हो गई थी, उसने तो इसी को एक नई कला में बदल दिया था.

मेरी सुष्मा तैयार हो गई थी. मैंने उसे एक आख़िरी सीख दी, कि “बेटा, जो भी हो, है तो तेरा पति. तूने पति को अँगूठे के नीचे रखना सीख लिया. अच्छा है. मगर ऐसा ना होने देना, मेरी बेबी, कि वो तुझसे नफ़रत ही करने लगे. औरत के जीवन में भावों के थान भरे हैं. प्रेम तो सिर्फ़ एक कतरन है. इसके लत्ते उड़ जाएँ, कुछ ज़्यादा नुकसान नहीं होता. मगर इस कतरन में एक डोरा है जो काम का है, वो वासना वाला डोरा. वो गोश्त के उस रेशे की तरह होता है, जो महीन होने के बावजूद, दाँत से जितना काटो नहीं कटता. बस वो वासना वाला डोरा सम्भाल के रखना.” मुझे लगा उसने मेरी बात ठीक से नहीं सुनी क्योंकि इस बात पर जिस तरह वो हँस दी, मुझको कुछ समझ नहीं आ पाया.

चेली हाथ से निकली जा रही है, इस बात का एहसास मुझे उस सुबह हुआ जब उस भोलेनाथ शम्भू के ऑफ़िस जाने के बाद वो देर तक कटोरे में परसे कॉर्न-फ़्लेक्स को देखे जा रही थी और मंद-मंद मुस्कुरा रही थी. “इतना काहे को मुस्कुरा रही है?” मैंने पूछा लेकिन उसके कान पर जूँ नहीं रेंगी. मुझे गुस्सा आ गया. झट कॉर्न-फ़्लेक्स में डले दूध को खराब कर दिया और लगी करने इंतज़ार कि देखें अब कैसे पुलाव पकाएँगीं मैडम ख़्यालों के. लेकिन मैडम ने एक चम्मच चखा, कटोरे समेत उठीं और पूरे दूध और कॉर्न-फ़्लेक्स को सिंक में फेंक दिया. मुस्कान फिर भी नहीं हटी. फिर कमरे में जा कर कपड़े बदले और जिम के लिये निकल पड़ीं.

मेरा माथा ठनक गया. धीरे-धीरे बात समझ आने लगी.

कुछ दिन हुए, ये जिम में बड़ी देर तक खड़ी-साइकल चला रही थी. मेरी बातें ध्यान ना भंग करें, सो किताब जो अब हर दम साथ रखने लगी थी, उसी को पढ़ रही थी. तभी जिम-सहायक 35-40 साल के एक अंधे आदमी को सहारा देते हुए उस ट्रैड-मिल पर ले आया जो सुष्मा की साइकल के बगल में था. मुझे थोड़ी हैरानी हुई. सोचा कि एक अंधा आदमी ट्रैड-मिल पर चढ़ेगा? तो थोड़ी देर उसकी गत ही देखती रही. अभी 5 मिनट भी नहीं बीते होंगे उसे शुरू हुए, अचानक वो बोला, “इतनी अच्छी महक! लगता है आज मेरा लकी-डे है. मिस वर्ल्ड के निकट रहने को मिल रहा है.”

सुष्मा ने किताब से मुँह उठा कर उस आदमी से डैनिश में पूछा, “क्या आपने मुझसे कुछ कहा?”

“वाह, क्या आवाज़ है? और वो ऐक्सैन्ट. क्या आप भारत की रहने वाली हैं?”

सुष्मा ने सिर हिला दिया. फिर ये सोचकर कि भला सिर का हिलाना इसे क्या दिखाई देगा, बोली, “हाँ, मैं भारत से हूँ,” और साईकल का पैडल तेज़ चलाने लगी.

“आह!” बड़ी लम्बी आह ली थी उसने. “भारत तो मेरा सबसे प्रिय देश है. मेरे लिये भारत साल में एक बार जाना ज़रूरी है. हर साल जाता हूँ.”

“हैं ...” मुझे विश्वास नहीं हुआ. “और जो हर साल जाते हो भैया, तो वहाँ करते क्या हो. मेरा मतलब एक अंधे आदमी के लिये भारत जाना या चीन जाना तो एक ही बात हुई ना.” दिखता तो कुछ है नहीं इन लोगों को. तो भला क्यों कोई पैसा बरबाद करे दूर-दराज़ देशों में जा कर.

मैं इस अचम्भे में ही थी और उधर सुष्मा का सवालनामा भी शुरू हो गया. इतने सवाल सुनकर वो हँस दिया. बोला, “अगर आप बुरा ना माने तो कहीं बैठ कर बात करें. आपको अपने सवालों के जवाब मिल जाएँगे, मुझे ये कहने को मिल जाएगा कि आज मैंने एक भारतीय राजकुमारी के साथ बैठ कर कॉफ़ी पी.”

उस निगोड़े के बस तीन शब्दों से सुष्मा की बाछें खिल गईं. मुझे तो यक़ीन ही नहीं हुआ कि एक अनजान आदमी के साथ वो कॉफ़ी पीने को तैयार भी हो गई. “क्या कर रही हो?” मैं चिल्लाई. “तुम्हारा सिर तो नहीं फिर गया है?”

मेरी बात कहाँ उस तक पहुँचती. उल्टे मैंने उसे कहते हुए सुना, “ठहरिये, मैं ज़रा क्विक शॉवर ले लूँ. आई ऐम स्टिन्किंग.”

फिर वो हल्का सा हँसा और कहने लगा, “पता नहीं आप समझ पाएँ या नहीं, लेकिन जैसे अक्सर लोग कहते हैं, नैचुरल बीयूटी इज़ द रीयल बीयूटी, उसी तरह हम ब्लाईन्ड लोग कहते हैं, नैचुरल स्मैल इज़ द रीयल स्मैल. इसे आप धोईये नहीं, प्लीज़.”

मैं इस वार्तालाप को सुनकर सिर ठोंक कर बैठ गई.

ये दोनों उस दिन कॉफ़ी के लिये मिले. खूब बातें कीं. वो स्कूल में टीचर था. मुझे हैरानी हुई कि इस देश में आँखों से गए आदमी के लिये काम है, मगर सुष्मा जैसी पढ़ी-लिखी, अच्छी-खासी, भले नाक-नक्श वाली के लिये कुछ उपलब्ध नहीं. फिर भी उसने बताया कि हर गर्मी और जाड़ों की छुट्टियों में वो दुनिया के किसी ना किसी कोने में जाता है. वहाँ की आवाज़ें- “उफ़ वो बछड़ों का मिमियाना, वो हाथियों की चिंघाड़, वो चिड़ियों की चें-चें, मोरों की चीख, वो आवाज़ें जब मेरे कानों पर पड़ती हैं, तो निकाल लेता हूँ मैं अपनी बाँसुरी, और मिला देता हूँ उस उन्माद में अपने भी राग. मुझे तो तुम्हारे देश के टिड्डों की चरमराहट, गायों की रम्भाहट, कबूतरों की गुटरगू और आदमियों की अजीब फुसफुसाहट, रोंदन, गीत और वार्तालाप सुनते ही जैसे कुछ हो जाता है.”

मुझे तो उस बाँसुरीबाज़ की बातें सुनते-सुनते ऐसा गुस्सा आया, मैं भी चीख मार-मार के सुष्मा से कहने लगी, कि “क्या कर रही है तू? चल, घर चल, बड़ा काम पड़ा है घर में.”

मगर सुष्मा किसी और ही दुनिया में खो चुकी थी. अब वो कमबख़्त गंधों की बात जो करने लगा था.

“ओह, एयरपोर्ट में उतरते ही जब फ़िनौल में सींची हवा मेरे नाक में घुसती है, तो मुझे लगता है पूरा हिन्दुस्तान मुझे आलिन्गन में भर रहा है. फिर बाहर निकल कर प्लास्टिक और कागज़ जल कर मेरा भरपूर स्वागत करते हैं. मैं खुश हो जाता हूँ. रास्ते चलते पेशाब और पसीने के बू के बीच, अचानक चमेली की सुगन्ध उड़ के आती है और मैं समझ जाता हूँ कि एक भारतीय हसीना नज़दीक से गुज़री है. कहीं प्याज़ भुन रहा है, घर की लक्ष्मी खाना तैयार करने में लगी है, माँस जलने की बू आती है, मैं गंगा जी का किनारा ढूँढने लगता हूँ, अगरबत्ती की महक तो मैं हाथ जोड़ के भग्वान को नमस्कार कर लेता हूँ. मंदिर की सीढ़ियाँ ढूँढ कर बैठ जाता हूँ. नई कविता लिखने लगता हूँ. तुम्हारे देश में कितना जादु है, सुष्मा.”

बस, मैंने “चलो, चलो, चलो,” कहना शुरू कर दिया. मुझे ये एक शादीशुदा औरत और एक अँधे आदमी के बीच होते हुए  बेकार की बातचीत ग़लत लग रही थी. लेकिन वो क्या मेरी बात सुनती. उसके कान तो कहीं और ही चिपक गए थे.

महीना बीत गया है, ये दोनों यूँ ही मिलते रहते हैं. वो इसे दुनिया भर की बातें बताता रहता है – हाँ-आँ, उसने खूब दुनिया जो देख रखी है - और ये चुपचाप उसकी वीरान, पोली आँखों में डूबने की कोशिश करती रहती है. मुझसे ये अधर्मी बात नहीं देखी जाती. कितनी शान से हमने अपनी बीरादरी का होनहार लड़का ढूँढ कर इसे घर से विदा किया था. अब तो शम्भु की शक्ल से ही इसे नफ़रत हो गई है. वैसे ही देर से लौट कर आता है बेचारा, अगर सुष्मा सोते हुए ना मिले तो मुँह से सुर्रे छोड़ते हुए मिलती है. “क्या? तुम फिर वापस आ गए?” उसकी बातें सुनकर मैं तो फक पड़ जाती हूँ. ये देखने की हिम्मत ही नहीं पड़ती कि बेचारे शम्भु का क्या हाल हो रहा होगा. मैं नहीं मान सकती कि इतना घाघपना मेरा सिखाया हुआ है.

इधर कुछ दिनों से शम्भु, जो इतना भोला है, उस तक को शक होने लगा है. मुझे काटो तो खून नहीं निकलता. ढक्कन डालना भी चाहूँ, तो कैसे डालूँ. मच्छर से भी छोटी एक आवाज़ भर थी, उसे भी इस लड़की ने अपनी उँगलियों के बीच मसोस कर भींच के रख दिया. फ़िलहाल, शम्भु ने समझना चाहा ही भर था कि मामला खुद-ब-खुद सामने आ गया. सुष्मा के होश ऐसे गुम गए हैं कि वो खुले आम उस अंधे के साथ घूमती है, घर भी ले आती है. एक दिन शम्भु ऑफ़िस से दोपहर को ही वापस आ गया. घर में पराये मर्द को देखकर बौखला गया. जब वो आदमी चला गया तो फूँट-फूँट कर रोने लगा. फिर कहने लगा मैं तुम्हारे पापा मम्मी को फ़ोन करने जा रहा हूँ. सुष्मा ने बड़ी क्रूरता के साथ कहा, “मेरे सामने बिलखने से मन नहीं भरा, अब दुनिया के सामने गिड़गिड़ाने का जी कर रहा है. फ़ोन करना है करो, मुझे क्यों बता रहे हो?”

पता नहीं उस दिन शम्भु ने फ़ोन क्यों नहीं किया? करता, तो शायद बात थोड़ी सुधर पाती.

एक दिन हाथ में हाथ डाल के जा रहे थे ये लैला-मजनू. सामने से रेहाना और ज़ारा आँख चुरा कर निकल गए, फिर भी उस बेशर्म लड़की ने ज़ोर से उन दोनों को ‘हाय’ कर दिया. पीछे से शायद ज़ारा से रहा नहीं गया. चिल्ला कर पूछ बैठी, “मुझे तो ये समझ नहीं आता कि आपके हसबैंड ये सब बर्दाश्त कैसे कर लेते हैं?” ये सुनना भी काफ़ी नहीं था सुष्मा के लिये. छूटते ही कह दिया, “मेरे हसबैन्ड ये सब वैसे ही बर्दाश्त कर लेते हैं जैसे आपकी रेहाना दीदी उन लाल बालों बाली मैडम को बर्दाश्त कर लेती हैं.”

हाय, मेरी फूटी किस्मत. क्यों ली थी मैंने इन्द्र-देव की वो सवारी. इससे तो मैं नरक में ही ठीक रहती. कम से कम मेरी आवाज़ तो मेरे साथ होती.

उस दिन शम्भु बड़ा खुश धड़ल्ले से दरवाज़ा फाड़ के घर में घुसा. सुष्मा सिगरेट फूँक रही थी, बेशरम. फिर भी, वैसे ही हँसते-हँसते उस भले लड़के ने उसे खींच के उठाया और कहा, “चलो, सुष्मा. हमारी सारी मुश्किलें खत्म हो गईं. ये देखो, टिकिट. हम आज ही अमेरिका जा रहे हैं. मुझे वहाँ बड़ी अच्छी नौकरी मिल गई थी, बताया नही. सोचा था, जब टिकिट ले लूँगा, तब ही बताऊँगा. वो, सरप्राईज़. देखना, अब सब ठीक हो जाएगा.”

सुष्मा की आँखों में घृणा भरी थी. धक्का दे कर चिल्लाई, “तुम मुझसे दूर ही रहो तो अच्छा होगा. मुझे नहीं जाना अमेरिका. मैं तो यहीं रहूँगी. तुम्हे जाना है तो जाओ.”

फिर पास की दराज़ खींच कर कुछ कागज़ निकाले और बोली, “लेकिन जाने से पहले इस पर अपना साइन करके जाना.” वो कागज़ तलाकनामा था. उसमें लिखा था कि शम्भु प्रसाद और सुष्मा प्रसाद, ने पाण्डे, खुशी-खुशी अपनी शादी रद्द करना चाहते हैं.

कागज़ देख कर शम्भु की आँखें भर आईं. मुँह से सिर्फ़ ‘नहीं’ भर निकल पाया. नज़रें उठा कर जब सुष्मा को देखा तो शक्ल देख कर काँप गया. एकदम खूँखार लग रही थी. हाथ में पैन पकड़े हुई थी. आँखें फाड़-फाड़ के सिगनल भेज रही थी कि फ़ौरन साइन करो.

शम्भु ने अपने हस्ताक्षर उस कागज़ में कर दिये और कागज़ लेकर वो पर्स उठा कर बाहर निकल गई. शम्भु भी शायद बिस्तर पर लेट कर देर तक रोता रहा.

शाम को जब वो वापस आई, शम्भु एक छोटे से बक्से में अपनी एक गुलाबी और एक पीली कमीज़, चार-पाँच अन्डरवेयर, एक स्वेटर, और जीन्स भरे उसका इन्तज़ार कर रहा था. दरवाज़े से निकल रहा था और सुष्मा ने एक बार उस से एक प्रेमपूर्वक शब्द तक नहीं कहा.

वो बाहर निकल गया. मैं गुस्से में तमतमा रही थी. यों दरवाज़ा बन्द हो रहा था, मैंने फ़ौरन छलांग लगाई और घुस गई शम्भु के सिर के एक कोने में. सोचने लगी, “ये लड़की अब हमारे वंश की नहीं रही. छोड़ो इसे. अमरिका तो मैं भी देखना चाहती हूँ. और शम्भु कुछ ज़्यादा ही भोला है. किसी को तो इसे ठीक करना पड़ेगा.”

हवाई जहाज़ में वो रास्ते भर सामने ट्रे पर सिर टिकाए रोए जा रहा था. पास बैठा पैसिन्जर तक शर्मिन्दा हो रहा था. मुझे मालुम है मेरे आगे बड़ा लम्बा-चौड़ा काम फैला पड़ा है. लेकिन इस वक्त मैं इसे रोने दूँगी. “जी भर के रो ले बेटा, अंधेरा गहराये तो सवेरा हो.”

 

 

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